भक्तिकाल (पूर्वमध्यकाल)
bhaktikal (purvmadhykal)
भक्ति-साहित्य
वास्तविक हिंदी साहित्य का आरंभ
भक्ति-साहित्य का आरंभ : चौदहवीं शताब्दी तक हिंदीभाषी प्रदेशों में देशी भाषा का साहित्य कैसा था, इस बात की धारणा बहुत अस्पष्ट रूप में ही होती है। हम केवल इतना जानते हैं कि पूर्वी प्रदेशों में सहजयानी और नाथपंथी साधकों की साधनात्मक रचनाएँ प्राप्त होती हैं और पश्चिमी प्रदेशों में नीति, शृंगार और कथानक-साहित्य की कुछ रचनाएँ उपलब्ध होती हैं। एक में भावुकता, विद्रोह और रहस्यवादी मनोवृत्ति का प्राधान्य है और दूसरी में नियमनिष्ठा, रूढ़िपालन और स्पष्टवादिता का स्वर है; एक में सहज सत्य को आध्यात्मिक वातावरण में सजाया गया है, दूसरी में इहलौकिक वायुमंडल में। चौदहवीं-पंद्रहवीं शताब्दी में दोनों प्रकार की रचनाएँ एक में सिमटने लगी थीं। दोनों के मिश्रण से उस भावी साहित्य की सूचना इसी समय मिलने लगी जो समूचे भारतीय इतिहास में अपने ढंग का अकेला साहित्य है। इसी का नाम भक्ति-साहित्य है। यह एक नई दुनिया है और जैसा कि डॉक्टर ग्रियर्सन ने कहा है, कोई भी मनुष्य जिसे पंद्रहवीं तथा बाद की शताब्दियों का साहित्य पढ़ने का मौक़ा मिला है, उस भारी व्यवधान को लक्ष्य किए बिना नहीं रह सकता जो पुरानी और नई धार्मिक भावनाओं में विद्यमान है। हम अपने को ऐसे धार्मिक आंदोलन के सामने पाते हैं, जो उन सब आंदोलनों से कहीं अधिक व्यापक और विशाल है, जिन्हें भारतवर्ष ने कभी भी देखा है। यहाँ तक कि वह बौद्ध धर्म के आंदोलन से भी अधिक व्यापक और विशाल है, क्योंकि उसका प्रभाव आज भी वर्तमान है। इस युग में धर्म ज्ञान का नहीं, बल्कि भावावेश का विषय हो गया था। यहाँ से हम साधना और प्रेमोल्लास के देश में आते हैं और ऐसी आत्माओं का साक्षात्कार करते हैं जो काशी के दिग्गज पंडितों की जाति की नहीं हैं, बल्कि जिनकी समता मध्ययुग के यूरोपियन भक्त बर्नार्ड ऑफ़ क्लेयरवक्स, टॉमस-ए-केम्पिस और सेंट थेरिसा से है। जो लोग इस युग के वास्तविक विकास की कथा नहीं जानते उन्हें आश्चर्य होता है कि ऐसा कैसे हुआ। स्वयं डॉक्टर ग्रियर्सन ने लिखा है कि बिजली की चमक के समान अचानक इस समस्त पुराने धार्मिक मतों के अंधकार के ऊपर एक नई बात दिखाई दी। कोई हिंदू यह नहीं जानता कि यह बात कहाँ से आई और कोई भी इसके प्रादुर्भाव का कारण निश्चय नहीं कर सकता। इत्यादि। ग्रियर्सन का अनुमान है कि वह ईसाइयत की देन है। ईस्वी सन् की दूसरी या तीसरी शताब्दी में नेस्टोरियन ईसाई मद्रास प्रेसीडेंसी के कुछ हिस्सों में आ बसे थे और रामानुजाचार्य को इन्हीं ईसाई भक्तों से भावावेश और प्रेमोल्लास के धर्म का संदेश मिला। यह बात एकदम ग़लत है। अब इस अटकल के सहारे स्थिर किए हुए मत पर कोई विश्वास नहीं करता, इसलिए इसका उत्तर देना बेकार है।
यह भी बताया गया है कि जब मुसलमान हिंदुओं पर अत्याचार करने लगे तो निराश होकर हिंदू लोग भगवान् का भजन करने लगे। यह बात अत्यंत उपहासास्पद है कि जब मुसलमान लोग उत्तर भारत के मंदिर तोड़ रहे थे, तो उसी समय अपेक्षाकृत निरापद दक्षिण में भक्त लोगों ने भगवान् की शरणागति की प्रार्थना की। मुसलमानों के अत्याचार के कारण यदि भक्ति की भावधारा को उमड़ना था तो पहले उसे सिंध में और फिर उत्तर भारत में प्रकट होना चाहिए था, पर हुई वह दक्षिण में। असल बात यह है कि जिस बात को ग्रियर्सन ने 'अचानक बिजली की चमक के समान फैल जाना' लिखा है वह ऐसा नहीं है। उसके लिए सैकड़ों वर्ष से मेघखंड एकत्र हो रहे थे। फिर भी ऊपर-ऊपर से देखने पर लगता है कि उसका प्रादुर्भाव एकाएक हो गया। इसका कारण उस काल की लोकप्रवृत्ति का शास्त्रसिद्ध आचार्यों और पौराणिक ठोस कल्पनाओं से युक्त हो जाना है। शास्त्रसिद्ध आचार्य दक्षिण के वैष्णव थे। सन् ईस्वी की सातवीं शताब्दी से—और किसी के मत से तो और भी पूर्व से—दक्षिण में वैष्णव भक्ति ने बड़ा ज़ोर पकड़ा। इसके पुरस्कर्त्ता आलवार भक्त कहे जाते हैं। इनकी संख्या बारह है जिनमें कम-से-कम नौ को ऐतिहासिक व्यक्ति मानने में किसी को कोई आपत्ति नहीं है। इनमें 'आंडाल' नाम की एक महिला भी थी। इनमें से अनेक ऐसी जातियों में उत्पन्न बताए जाते हैं जिन्हें अस्पृश्य समझा जाता है। इन्हीं लोगों की परंपरा में सुविख्यात वैष्णव आचार्य श्री रामानुजाचार्य का प्रादुर्भाव हुआ।
उन दिनों भी दक्षिण में आज की ही भाँति जाति-विचार जटिलतर अवस्था में था, फिर भी रामानुजाचार्य—जैसे सद्वंशजात, सर्वजन-श्रद्धेय आचार्य ने तथाकथित नीच जातियों में प्रचलित ऐकांतिक भक्ति-धर्म को बहुमान दिया और देशी भाषा में लिखित शठकोप, तिरुवल्लुवर प्रभूति के शास्त्रों को वैष्णवों के वेद का सम्मान देकर समादर दिया। धर्म की दृष्टि में सभी समान माने गए, पर सामाजिक व्यवहार मे जातिभेद की मर्यादाएँ बनी रहीं। एक मध्यमार्ग यह निकाला गया कि प्रत्येक व्यक्ति अलग-अलग भोजन करे, इसी को दक्षिण में तेनकलै या दक्षिणवाद कहते हैं। इस बात को कुछ अधिक स्वाधीनता समझकर पंद्रहवीं शताब्दी में वेदांतदेशिक ने इसके साथ वेदवाद और प्राचीन रीति को पुनः प्रवर्त्तित किया। स्पष्ट है कि आलवारों का भक्तिवाद भी जनसाधारण की वस्तु था, जो शास्त्र का सहारा पाकर सारे भारत में फैल गया। भक्तों के अनुभूतिगम्य सहज सत्य को बाद के आचार्यों ने दर्शन का क्रमबद्ध और सुचितित रूप दिया।
उत्तर भारत में भक्ति आंदोलन : यही बात उत्तर भारत के विषय में भी सत्य है। यहाँ भी साधारण जनता के भीतर जो धर्म-भावना वर्तमान थी, उसने शास्त्र की अँगुली पकड़कर अपने को शक्तिशाली रूप में प्रकट किया। इन प्रदेशों में पौराणिक धर्म का प्रचार पहले से ही था। गाहड़वार राजाओं के समय उत्तर भारत प्रधान रूप से स्मार्त्त धर्मावलंबी था। निस्संदेह नाथों का शैव धर्म भी पर्याप्त प्रभावशाली था, किंतु साधारण जनता स्मार्त्त मतावलंबी थी। भक्ति के लिए जो बात नितांत आवश्यक है वह है भगवान् के ऐसे रूप की कल्पना जिसके साथ व्यक्तिगत संबंध स्थापित किया जा सके। उत्तर भारत की जनता विष्णु के विविध अवतारों में विश्वास करती थी। यद्यपि महाभारत के पुराने अंशों से पता चलता है कि पहले विष्णु के छः ही अवतार माने जाते थे, परंतु धीरे-धीरे वह संख्या दस तक पहुँच गई और मध्ययुग के सबसे अधिक प्रभावशाली पुराण भागवत में अवतारों की संख्या 24 तक हो गई है। इस युग में अवतार को माननेवाली दृष्टि में थोड़ा परिवर्तन भी हुआ है। पहले विश्वास किया जाता था कि भगवान् दुष्टों के दमन और साधुओं के परित्राण के लिए अवतार धारण करते हैं—गीता में अवतार का हेतु यही बताया गया है—किंतु बाद में इस दृष्टिकोण में परिवर्तन हुआ। भागवत पुराण के अनुसार भगवान् वैकुंठ आदि धामों में तीन रूपों में रहते हैं—स्वयंरूप, तदेकात्मरूप और आवेशरूप। स्वयंरूप तो श्रीकृष्ण हैं। तदेकात्मरूप में उन अवतारों की गणना होती है जो तत्त्वतः भगवत्-रूप होकर भी रूप और आकार में भिन्न होते हैं। मत्स्य, वाराह, कूर्म आदि अवतार इसके उदाहरण हैं। ज्ञानशक्ति आदि विभाग द्वारा भगवान् जिन महत्तम जीवों में आविष्ट होकर रहते हैं उन नारद, शेष, सनक सनंदन आदि महानुभावों को आवेशरूप कहा जाता है। इस काल तक आकर यह विश्वास किया जाने लगा कि भगवान् के अवतार का मुख्य हेतु भक्तों पर अनुग्रह करने के लिए लीला का विस्तार करना ही है। भक्त भगवान् के चरित का अनुशीलन किसी अन्य उद्देश्य से नहीं, भक्ति पाने के उद्देश्य से करते हैं। भागवत का मुख्य प्रतिपाद्य विषय ऐकांतिक भक्ति ही है। कैवल्य (मोक्ष) या अपुनर्भव को भी भक्त लोग इसके सामने तुच्छ समझते हैं।
मध्यकालीन भक्ति-साहित्य का प्रधान स्वर अवतारवाद : मध्यकाल के भक्तिमार्ग में इसी ऐकांतिक भक्ति का स्वर प्रबल रहा है। अवतारों की कल्पना ने इसको बहुत सहारा दिया। अवतारों से ही उस लीला का विस्तार होता है जिसका श्रवण और मनन भक्ति का प्रधान साधन है। अवतारों की विविध लीलाओं के फलस्वरूप ही विविध नामों का उद्भव होता है, जिनका क्रीर्त्तन और जप भक्त के लिए बहुत आवश्यक साधन है। भक्ति के लिए भगवान् के साथ वैयक्तिक संबंध आवश्यक है और अवतार उस संबंध के लिए आवश्यक सामग्री प्रस्तुत करते हैं। यही कारण है कि मध्ययुग के प्रायः सभी धार्मिक संप्रदायों ने किसी-न-किसी रूप में अवतार की कल्पना अवश्य की है। शिव के अनेक अवतारों की चर्चा मिलती है। गोरखनाथ और मत्स्येंद्रनाथ को भी शिव का अवतार माना गया है। और तो और, आगे चलकर अवतारवाद के घोर विरोधी कबीर को भी 'ज्ञानीजी' का अवतार ही माना जाने लगा। केवल भगवान् के ही अवतार में नहीं, संतों के अवतार में भी विश्वास किया जाने लगा। इस प्रकार सूरदास उद्धव के, हितहरिवंश मुरली के और तुलसीदास वाल्मीकि के अवतार समझे गए। वस्तुतः सगुण भक्ति के मार्ग के मूल में अवतार की कल्पना है।
मुख्य अवतार : वैसे तो अवतारों की संख्या बहुत मानी गई है, परंतु मुख्य अवतार राम और कृष्ण के हैं। इनमें भी कृष्णावतार की कल्पना पुरानी और व्यापक है। इन दो अवतारों की प्रधानता स्थापित होने का प्रधान कारण इनकी लीला की बहुलता ही है। शुरू के साहित्य और शिल्प में इनका प्रधान चरित दुष्टों का दमन और भक्तों की उनसे रक्षा ही था, पर धीरे-धीरे दुष्टदमनवाला रूप दबता गया और लीलारूप ही प्रधान होता गया। श्रीकृष्णावतार के दो मुख्य रूप हैं। एक में वे यदुकुल के श्रेष्ठ रत्न हैं, वीर हैं, राजा हैं, कंसारि हैं, दूसरे में वे गोपाल हैं, गोपीजनवल्लभ हैं, 'राधाधर-सुधापानशालि-वनमाली' हैं। प्रथम रूप का पता बहुत पुराने ग्रंथों से चल जाता है, परंतु दूसरा रूप अपेक्षाकृत नवीन है।
रामावतार का महत्त्व भी बहुत अधिक रहा है। पुराने से पुराने अवतार-प्रसंगों में भी श्रीरामचंद्र का उल्लेख मिलता है। कालिदास ने रघुवंश में विस्तारपूर्वक चर्चा की है कि किस प्रकार विष्णु को भूभार-हरण के लिए देवताओं ने प्रसन्न किया था। हमेशा से श्रीरामचंद्र दुष्ट-दमनकारी और मर्यादापुरुषोत्तम के रूप में चित्रित हुए हैं। पंद्रहवीं शताब्दी के बाद के साहित्य में राम के भक्त साहित्यिकों में भी लीलागान की दृष्टि समादृत हुई, किंतु उनका दुष्टदमन और मर्यादा पुरुषोत्तम रूप कभी भी म्लान नहीं हुआ। अठारहवीं शताब्दी के बाद के साहित्य में श्रीरामचरित को भी माधुर्य भावना के रंग में रंगना पड़ा और ऐसे साहित्य की रचना हुई जिसमें प्रेम-क्रीड़ा और रासलीला का प्राधान्य था।
नौवीं-दसवीं शताब्दी के बाद से भारतीय साहित्य मे 'दशावतारचरित' नाम देकर अनेक काव्य लिखे गए। 'पृथ्वीराजरासो' में भी एक 'दसम' है जो वस्तुतः दशावतारचरित है। इन पुस्तकों में दस अवतारों की स्तुति और चरित लिखे गए हैं, लेकिन प्रधानता राम और कृष्ण की ही है। मनुष्य-रूप में होने के कारण और मनुष्य को प्रभावित करनेवाली लीलाओं का आश्रय होने के कारण इन दो अवतारों को प्रधानता मिल गई है। तुलसीदासजी के बाद से उत्तरी भारत में राम-अवतार को बहुत प्रमुखता प्राप्त हो गई, परंतु श्रीकृष्ण-अवतार की महिमा घटी नही, क्योंकि श्रीकृष्णावतार की लीलाओं में एक विचित्र मानवीय रस है। सख्य, वात्सल्य और माधुर्य की लीलाओं का आश्रय होने के कारण यह चरित सार्वभौम आकर्षण का कारण बना है।
दो मुख्य आचार्य : उत्तर भारत में भक्ति की धारा को नए सिरे से प्रवाहित करने का श्रेय दो आचार्यों को है—स्वामी रामानंद और महाप्रभु वल्लभाचार्य। स्वामी रामानंद का संबध दो श्रेणी के भक्तों से बताया जाता है। एक तो वे जो निर्गुण भाव से राम के उपासक भक्त थे; दूसरे वे, जो राम की उपासना अवतार रूप में करते थे। इन दोनों प्रकार के भक्तों में प्रधान समानता केवल रामनाम की थी। दूसरे आचार्य वल्लभाचार्य ने श्रीकृष्णभक्ति का प्रचार किया। इन्होंने लीला-पक्ष पर बहुत अधिक जोर दिया, इसलिए इस संप्रदाय के भक्तों में भगवान् के धर्मरक्षक, मर्यादापुरुषोत्तम और दुष्टदमन रूप गौण हो गए और निखिलानंद संदोह प्रेममय रूप प्रधान हो गया। बंगाल के श्री चैतन्यदेव के अनुयाई भक्तों ने भी वृंदावन को अपना साधनाक्षेत्र बनाया था। इनमें रूपगोस्वामी, सनातन गोस्वामी और जीव गोस्वामी बड़े भारी शास्त्रज्ञ विद्वान थे। इन्होंने भागवत द्वारा प्रचारित भक्ति को क्रमबद्ध दर्शन और तर्कसंगत शास्त्र का रूप दिया। परंतु प्रधान रूप से इन गौड़ीय वैष्णवों में उपासनाभाव विह्वल आराधना के रूप में ही प्रकट हुआ। ये लोग गोपी-भाव से भगवान् का भजन करते हैं। इन लोगों का ब्रज की भक्तिधारा पर प्रभाव पड़ा है और शास्त्रीय चिंतन-पद्धति पर भी इनकी विचारधारा का प्रभाव पड़ा है। यहाँ तक कि अठारहवीं-उन्नीसवीं शताब्दी में गलता (जयपुर), चित्रकूट, जनकपुर और अयोध्या की मधुर भाव की उपासना भी इन आचार्यों के ग्रंथों से प्रभावित हुई है। बंगाल के प्रेम-विलास और भक्ति-रत्नाकर नामक ग्रंथों से पता चलता है कि चैतन्यदेव के प्रधान शिष्य श्री नित्यानंद प्रभु की छोटी पत्नी जाह्नवीदेवी जब वृंदावन गई, तो उन्हें यह देखकर बड़ा दुःख हुआ कि श्रीकृष्ण के साथ श्री राधिका की मूर्त्ति की कहीं पूजा नहीं होती थी। घर लौटकर उन्होंने नयान भास्कर नामक मूर्तिकार से श्रीराधिका की मूर्तियाँ बनवाई और उन्हें वृंदावन भिजवाया। जीव गोस्वामी की आज्ञा से ये मूर्तियाँ भगवान् के पार्श्व में रखी गई और तभी से श्रीकृष्ण के साथ राधिका की भी पूजा होने लगी। इस प्रकार गौड़ीय वैष्णव संप्रदाय ने भक्ति-साहित्य की भावधारा और विचार-दर्शन को ही नहीं, उसकी उपासना-पद्धति को भी प्रभावित किया है।
आगे चलकर ब्रजभूमि में ऐसे भी संत हुए, जिनके भक्तगण यह नहीं स्वीकार करना चाहते थे कि उनका वल्लाभाचार्य और श्री चैतन्यदेव के संप्रदायों से किसी प्रकार भी संबंध है। यथास्थान उनकी चर्चा आगे की जाएगी। उनका संबंध इन संप्रदायों से हो चाहे न हो, परंतु उनकी विचारधारा पर इन संप्रदायों के भक्तों का प्रभाव पड़ा अवश्य है।
वल्लभाचार्य : महाप्रभु वल्लभाचार्य का जन्म सं. 1535 की वैशाख कृष्णा एकादशी को अर्थात् 1478 ई. में हुआ था और ये सं. 1587 अर्थात् 1530 ई. तक जीवित रहे। ये नाना शास्त्रों के निष्णात पंडित थे। इनका प्रवर्तित मार्ग पुष्टिमार्ग कहलाता है। भगवान् के अनुग्रह से ही प्रेम-प्रधान भक्ति की ओर जीव की प्रवृत्ति होती है। भगवान् के इस अनुग्रह को ही पोषण या पुष्टि कहते हैं। इसी से इस मार्ग को पुष्टिमार्ग कहते हैं। जीव तीन प्रकार के होते हैं—प्रवाहजीव, मर्यादाजीव और पुष्टिजीव। प्रवाहजीव तो सांसारिक पचड़ो में पड़े हुए साधारण कोटि के जीव हैं; मर्यादाजीव सामाजिक विधि-निषेध के अनुसार चलनेवाले तथा लोक-मर्यादा का पालन करनेवाले मध्यम कोटि के जीव हैं, परंतु पुष्टिजीव वे ही हैं जो भगवान् पर एकांत भाव से विश्वास करते हैं, उनके अनुग्रह का भरोसा करते हैं और इसी अनुग्रह से पोषण पाते हुए अंत में नित्यलीला में लीन होते हैं। तात्पर्य यह है कि पुष्टिमार्ग भगवान् के अनुग्रह पर पूर्ण रूप से निर्भर रहने का मार्ग है, इसमें शास्त्रविहित विधि-निषेध का बंध नहीं है। इनके सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण ग्रंथ वेदांतसूत्र पर लिखा हुआ अणुभाष्य और भागवत की सुबोधिनी टीका हैं। इनकी और भी कई पुस्तकें मिलती हैं, पर ये दोनों विशेष महत्त्वपूर्ण हैं। पहली शुद्धाद्वैतवाद का प्रधान मूल है और दूसरी भक्ति-सिद्धांतों का आकर ग्रंथ।
गेय पदों की परंपरा : वल्लभाचार्य के संप्रदाय में पाई जानेवाली परंपराओं से पता चलता है कि सूरदास ने महाप्रभु वल्लभाचार्य से दीक्षा ली थी। एक मनोरंजक कहानी में बताया गया है कि सूरदास पहले दीनभाव से भजन बनाया करते थे। बाद में महाप्रभु के उपदेश से लीलागान करने लगे। परंतु यह नहीं कहा जा सकता कि सूरदास को यह वस्तु एकदम नई प्राप्त हो गई। इस बात को जानने का कोई साधन नहीं है कि सूरदास के पहले लीलागान किस प्रकार का होता था। हमने पहले ही देखा है कि ध्रुवक या टेक देकर पद लिखने की प्रथा पूर्व भारत में पहले ही से थी। बारहवीं शताब्दी के कवि जयदेव के संस्कृत पद, बौद्ध साधकों के गान, और चंडीदास और विद्यापति के पद इस बात के सबूत हैं। भगवान् के अवतार को लक्ष्य बनाकर लीलागान करनेवाले भक्तों में सूरदास के पूर्व के तीन भक्तों की चर्चा प्रायः की जाती है—उड़ीसा के संस्कृत कवि जयदेव, बंगाल के चंडीदास और मिथिला के विद्यापति। वे तीनों ही महाप्रभु चैतन्यदेव के प्रिय थे और उनके भक्तों के साथ वृंदावन में भी इन तीन कवियों के भजन निश्चित रूप से पहुँच चुके थे। जहाँ तक सूरसागर का सबंध है, उसमें गीतगोविंद के प्रभाव का प्रमाण तो खोजा जा सकता है, परंतु विद्यापति या चंडीदास के भजनों का कोई प्रत्यक्ष प्रभाव इस ग्रंथ में नहीं खोजा जा सकता। हिंदी साहित्य का इतिहास कहे जानेवाले ग्रंथों में सूरदास के भजनों की परंपरा को विद्यापति के पदों के साथ मिलाने का प्रयत्न किया जाता है, पर विद्यापति की वैष्णव पदावली का प्रभाव पूर्व की ओर ही अधिक रहा है। इसने बंगाल, असम और उड़ीसा के साहित्य को तो प्रभावित किया है, किंतु पश्चिम के साहित्य को प्रत्यक्ष रूप से वह प्रभावित नही कर सका। टेक या ध्रुवक देकर पद लिखने की प्रथा पश्चिम भारत में भी थी, यह बात सिद्ध की जा सकती है। राजपूताने के नाथ-सिद्धों के भजन काफ़ी पुराने हैं और ग्रंथ साहेब में संगृहीत पश्चिम और दक्षिण प्रदेशों के भक्तों की इस श्रेणी की रचनाएँ प्राप्त हुई हैं। दसवीं शताब्दी के कवि क्षेमेंद्र के दशावतारचरित में गोपियों के मुख से एक भजन गवाया गया है जो बहुत कुछ गीतगोविंद की पद्धति पर है। भजन इस प्रकार है :
ललितविलासकलासुखखेलन—
ललनालोभनशोभनयौवन मानितनवमदने।
अलिकुलकोकिलकुवलयकज्जल—
कालकलिंदसुताविव लज्जल, कालियकुलदमने।
केशिकिशोरमहासुरमारण,
दारुणगोकुलदुरितविदारण गोवर्धनधरणे।
कस्य न नयनयुगं रतिसङ्गे,
मज्जति मनसिजतरलतरङ्गे, वररमणीरमणे।
—दशावतारचरित, 8-173
इससे यह सूचित होता है कि पश्चिम भारत में भी लोकभाषा में भी उस प्रकार के गान प्रचलित थे, जिनका पता गीतगोविंद के भजनों में लगता है। निश्चय ही ब्रजभूमि में भी इस प्रकार के भजन प्रचलित थे। तानसेन और बैजूबावरा के पदों में इस श्रेणी के गानों का संस्कार किया गया था और हो सकता है कि सूरदासजी भी वल्लभाचार्य से मिलने के पहले दैन्य भाव के भजनों के साथ इस जाति के भजन भी बनाया करते हों। दीर्घ काल से इस प्रकार के पद जनता में प्रचलित थे, और जनता के पदों में दो बातों की ही प्रधानता रहती है—शृंगार की और धर्म की। शृंगार और धर्म के लिए रचे जाने वाले इन पदों को सूरदास ने नया स्वर दिया। इनमें भगवान की लीला की प्रमुखता हो गई और ऐकांतिक भक्ति का प्राधान्य प्रतिष्ठित हुआ।
भाषा में परिवर्तन : शास्त्रीय मतवाद का सहारा पाने के कारण इन भजनों की भाषा भी बदली। दसवीं शताब्दी के बाद से हमारे साहित्य में धीरे-धीरे गद्य की भाषा में तत्सम शब्दों का प्रचार बढ़ने लगा था। सूरदास आदि भक्त कवियों के साहित्य में पद्म में भी संस्कृत तत्सम शब्दों का प्रवेश हुआ। पद्य की भाषा को अपभ्रंश की रूढ़ियों से जकड़ने का प्रयत्न शिथिल हुआ और बोलचाल की भाषा का सहज-प्रसन्न प्रवाह आया। यहाँ से क्या भाव, क्या भाषा और क्या वक्तव्य वस्तु, सब ओर से नवीन प्राणों का स्पंदन दिखाई दिया। अब सच पूछा जाए तो यहीं से हिंदी भाषा के साहित्य का वास्तविक सूत्रपात हुआ। इसके पहले के 400 वर्षों का साहित्य अपभ्रंश की रूढ़ियों से जकड़ा हुआ था, हासोन्मुखी कविता के कवि-समयों और काव्य-रूढ़ियों से ग्रस्त था, गतानुगतिक ढंग से पिटे-पिटाए छंदों में बँधी-सधी बोलियों के बोलने का अभ्यस्त था। उसमें पुरानी प्रथा के अंधानुकरण की जरठ मनोवृत्ति का प्राधान्य था। यहाँ से उसमें नवीन आदर्शों के निर्माण का उल्लास और नवीन आशाओं और आकांक्षाओं को रूप देने का उत्साह प्रकट हुआ।
सांस्कृतिक द्वंद्व का काल : जिस काल से हिंदी साहित्य का बनना शुरू हुआ, वह काल भारतीय इतिहास का बहुत ही उथल-पुथल और परिवर्तन का काल है। इस समय देश की केंद्रीय शक्ति क्षीण हो गई थी और पश्चिम सीमांत से मुसलमानों का आक्रमण हो रहा था। आक्रमण होना कोई नई बात नहीं थी, इसके पहले भी भारत पर अनेक आक्रमण हो चुके थे, परंतु वे आक्रमण अधिकतर सैनिक और राजनीतिक आक्रमण थे। परंतु इस बार का आक्रमण एक विशिष्ट धर्ममत और संस्कृति का भी आक्रमण था। इस बार के आक्रमणकारी एक संगठित धर्म या मज़हब के अनुयाई थे। मज़हब और संगठित धर्मसंस्था भारत के लिए अपरिचित ही थी। इस धर्ममत में एक ईश्वर को माना जाता है, एक आचरण का पालन किया जाता है, और ये लोग जब किसी नस्ल, क़बीले या जाति के व्यक्ति को एक बार अपने संगठित समूह में मिला लेते हैं तो उसकी सारी विशेषताएँ दूर हो जाती हैं। यह धर्म-साधना व्यक्तिगत नहीं, समूहगत होती है। यहाँ धार्मिक और सामाजिक विधि-निषेध एक दूसरे से गुँथे होते हैं। भारतीय समाज नाना जातियों का सम्मिश्रण था। किसी जाति का कोई व्यक्ति दूसरे में नहीं जा सकता था। परंतु मज़हब ठीक इससे उल्टा है, वह व्यक्ति को अपने समूह का अंग बना देता है, और अंगीकृत होने के बाद व्यक्ति की जाति हमेशा के लिए ग़ायब हो जाती है। भारतीय समाज जातिगत विशेषता रखते हुए व्यक्तिगत साधना का पक्षपाती था, जबकि इस्लाम जातिगत विशेषता का लोप करके समूहगत उपासना का प्रचारक था। एक का केंद्र-बिदु चारित्र्य था, दूसरे का धर्ममत। भारतीय समाज में यह स्वीकृत तथ्य था कि विश्वास चाहे जो भी हो, चरित्र शुद्ध है तो व्यक्ति श्रेष्ठ हो जाता है, फिर चाहे वह किसी जाति का क्यों न हो। मुसलमानी समाज के साधारण लोगों का विश्वास था कि इस्लाम ने जो धर्ममत प्रचार किया है उसको स्वीकार कर लेनेवाला ही अनंत स्वर्ग का अधिकारी होता है, और जो इस धर्ममत को नहीं मानता है, वह अनंत नरक में जाने के लिए बाध्य है। इस्लाम ने भारत के समस्त कुफ़्र को तोड़ डालने की प्रतिज्ञा लेकर इस देश में पदार्पण किया।
जाति-प्रथा की कठोरता का कारण : इस देश की धार्मिक और सामाजिक स्थिति पर इसकी बड़ी ही कठोर प्रतिक्रिया हुई। भारतीय समाज अपनी आत्मरक्षा के लिए धीरे-धीरे अपने-आप में ही सिमटता गया। ऊँची समझी जानेवाली जातियों में सुरक्षित स्थान में पहुँचकर अपनी विशेषता बनाए रखने का उद्योग शुरू हुआ और इस प्रकार देश-विदेश के नाम से अपना परिचय देने की प्रथा चल पड़ी। दसवीं शताब्दी के पहले के दान-पत्रों में ब्राह्मणों के केवल गोत्र और प्रवर का उल्लेख मिलता है किंतु बाद के दान-पत्रों में देश और ग्राम भी दिए जाने लगे और यह संकोचनशील प्रवृत्ति निरंतर बढ़ती गई।
इस प्रकार यह अद्भुत विरोधाभास है कि जाति-पाँति के कुफ़्र को तोड़ने वाले धर्म-संप्रदाय के संपर्क में आने के बाद हिंदुओं की जाति-पाँति की प्रथा और भी सकीर्ण और कठोर हो गई और कसी जाने लगी। इस कसाव का परिणाम यह हुआ कि किनारे पर पड़ी हुई बहुत-सी जातियाँ छूट गई और बहुत दिनों तक ना-हिंदू ना-मुसलमान बनी रहीं। बहुत-सी पाशुपत मत को माननेवाली और संयासी से गृहस्थ बनी जातियाँ धीरे-धीरे मुसलमान होने लगीं। इस प्रकार काशी की जुलाहा जाति नाथमत को माननेवाली थी, जो निरंतर उपेक्षित रहने के कारण क्रमशः मुसलमान होती गई। इसी जाति में मध्यकाल के स्वाधीनचेता सत कबीर उत्पन्न हुए थे।
टीका युग : दसवीं से चौदहवी शताब्दी मे एक ओर जहाँ उत्तर भारत से समस्त हिंदू राज्य नष्ट हो गए, वहीं दूसरी ओर सामाजिक और धार्मिक संकीर्णता से हिंदू जाति अभिभूत हो गई। विचार के क्षेत्र में यह युग टीकाओं का है। ज्ञान के प्रत्येक क्षेत्र में यह विश्वास कर लिया गया कि जो कुछ उत्तम और अविसंवादी सत्य है, वह पूर्वकाल के ऋषियों ने और आचार्यों ने लिख दिया है। इस युग के आदमी केवल उसके अर्थ समझने का प्रयास कर सकते हैं, नया कुछ नहीं दे सकते। टीकाओं की टीका और उसकी भी टीका लिखने में इस काल के पंडितों ने अपनी सारी शक्ति लगा दी। एक दूसरे प्रकार का प्रयोग संगति लगानेवाले निबंध-ग्रंथ थे जो बहुत कुछ टीकाओं की ही श्रेणी के हैं। ऐसी ही स्वाधीन चिता की कुठा के समय बौद्ध और नाथ-सिद्धों ने अपनी अक्खड़ शैली में बाह्याचार और निरर्थक रूढ़ियों का विरोध किया। परंतु उनके पास देने लायक़ कोई नई सामग्री नहीं थी, वे केवल अर्थहीन आचारों का विरोध-भर करते रहे।
नाथमत और भक्तिमार्ग : ऐसे ही समय में दक्षिण से भक्ति की नई धारा उत्तर भारत की ओर आई। उन दिनों उत्तर के हठयोगियों का धर्ममत प्रबल था। उनमें और दक्षिण के भक्तों में मौलिक अंतर था। एक के लिए समाज की ऊँच-नीच भावना उपहास और आक्रमण का विषय थी, पर दूसरे के लिए मर्यादा और स्फूर्त्ति का। वज्रयानी और नाथपंथी योगी डटकर जातिभेद पर आघात करता था, बाह्याचार और उन्मूलक श्रेष्ठता को फटकार बताता था और चौरासी लाख योनियों में निरंतर भटकते हुए माया के ग़ुलाम गृहस्थों से अपने को श्रेष्ठ समझता था। दक्षिण से आया हुआ भक्तिवाद समाज में प्रचलित वर्णव्यवस्था और ऊँच-नीच मर्यादा को स्वीकार करके भी उसकी कठोरता को शिथिल करने में समर्थ हुआ। इसके पास अनंत शक्ति, ऐश्वर्य और प्रेम के आकर लीलामय भगवान् की भक्ति का संबल था। एक बार भगवान् की शरण गहने पर नीच-से-नीच व्यक्ति अनायास भवसागर पार कर सकता था। इस युग के हिंदू गृहस्थ के लिए यह एक महत्त्वपूर्ण निधि थी। इसे बौद्ध और नाथसिद्ध नहीं दे सके थे, टीका और निबंधों के लेखक शास्त्रज्ञ विद्वान् नहीं बता सके थे और अलंकारों से लदी हुई कविता भी नहीं दिखा सकी थी।
क्या भक्ति-आंदोलन प्रतिक्रिया है? : कुछ विद्वानों ने इस भक्ति आंदोलन को हारी हुई हिंदू जाति की असहाय चित्त की प्रतिक्रिया के रूप में बताया है। यह बात ठीक नहीं है। प्रतिक्रिया तो जातिगत कठोरता और धर्मगत सकीर्णता के रूप में प्रकट हुई थी। उस जातिगत कठोरता का एक परिणाम यह हुआ कि इस काल में हिंदुओं में वैरागी साधुओं की विशाल वाहिनी खड़ी हो गई, क्योंकि जाति के कठोर शिकंजे से निकल भागने का एकमात्र उपाय साधु हो जाना ही रह गया था। भक्तिवाद ने इस अवस्था को सँभाला और हिंदुओं में नवीन और उदार आशावादी दृष्टि प्रतिष्ठित की। चौदहवीं शताब्दी के बाद हिंदी साहित्य की मूल प्रेरणा भक्ति ही रही। इसके पूर्ववर्ती साहित्य में यह वस्तु नहीं है, इसीलिए उसमें न तो किसी प्रकार का स्पंदन दिखाई देता है और न वक्तव्य वस्तु की कोई ताज़गी। चौदहवीं शताब्दी के बाद का हिंदी साहित्य अत्यत संवेदनशील प्राणधारा से उद्वेलित है और महान् आदर्शों से अनुप्राणित है। रोगमुक्त मनुष्य की भाँति उसमें स्वास्थ्यजन्य क्षुधा और नैरुज्यजन्य स्फूर्त्ति स्पष्ट परिलक्षित होती है। यहाँ से हिंदी साहित्य नए मोड़ पर खड़ा हो जाता है और यद्यपि वह पुरानी परंपरा से एकदम विच्युत नहीं हो जाता, तथापि उसमें रूप और शोधा के प्रति रुग्ण आकर्षण का अभाव है। रूप और शोभा में वह दैवी ज्योति देख सकता है और अपने पाठकों को ऊँचे धरातल पर बैठाकर तलदेश की गंदगी से दूर रख सकता है। इस साहित्य में कृत्रिमता का अभाव है और सहज-सरल मानव जीवन के प्रति आस्था है।
गुरु रामानंद : इस भक्ति आंदोलन के आरंभ में इस युग के महागुरु रामानंद का नाम सुनाई देता है। इसके पहले भी कुछ भक्त संतों की साहित्य रचना प्राप्त होती है जिनकी चर्चा हम आगे करेंगे। परंतु रामानंद अपने पांडित्य और औदार्य के कारण सबसे श्रेष्ठ ठहरते हैं। माघ कृष्ण सप्तमी संवत् 1356 वि. अर्थात् सन् ईस्वी की तेरहवीं शताब्दी के अंत में इनका जन्म हुआ था और लगभग पूरी चौदहवीं शताब्दी-भर ये अपने धार्मिक प्रचार का कार्य करते रहे। ऐसी प्रसिद्धि है कि प्रयाग के किसी कान्यकुब्ज ब्राह्मण वंश में इनका जन्म हुआ था। इनके लिखे तीन संस्कृत ग्रंथ प्राप्त हैं। एक तो वेदांत सूत्रों पर आनंद भाष्य, दूसरा श्रीरामार्चन पद्धति, और तीसरा वैष्णव मताब्जभास्कर। श्रीरामार्चन पद्धति में उन्होंने जो गुरु-परंपरा दी है, उसके अनुसार रामानंदजी रामानुज से चौदह पीढ़ी नीचे आते हैं। रामानुजजी का परलोकवास 1137 ई. में हुआ था। यदि प्रत्येक पीढ़ी के लिए 20 वर्ष का समय रखें तो इनका समय सन् ईस्वी की चौदहवीं शताब्दी के शुरू में या तेरहवीं के अंत में पड़ेगा।
आनंद भाध्य और प्रसंग पारिजात : आनंद भाष्य के विषय में विद्वानों में मतभेद है। अभी तक कोई ऐसा पुष्ट प्रमाण नहीं उपलब्ध हुआ जिससे यह कहा जा सके कि स्वामी रामानंद ने इस भाष्य को नहीं लिखा था। रामानुजाचार्य के मत से इस भाष्य के प्रतिपादित मत का अंतर नाममात्र का है। यह तो मान ही लिया जा सकता है कि रामानंदजी मनस्वी संत थे, इसलिए उन्होंने स्वयं यदि भाष्य लिखकर अपनी स्वतंत्र चिंतन-शक्ति का उपयोग किया हो तो यह आश्चर्य या शंका की बात नहीं है। परंतु इधर सांप्रदायिक प्रतिद्वंद्वितावश बहुत-सी जाली पुस्तकें तैयार होने लगी हैं, अतः ख़ूब सावधानी से इनकी छानबीन होनी चाहिए। रामानंद के आनंद भाष्य के संबंध में भी इस प्रकार की सावधानी आवश्यक है। हाल ही में प्रसंग पारिजात नामक विचित्र पुस्तक प्रकाशित हुई है, जिसकी भाषा से लेकर भविष्यवाणियों के विषय तक सभी बातें मनोरंजक हैं। पुस्तक पैशाची भाषा में लिखी बताई जाती है। इसे स्वामी रामानंदजी के साथ रहने वाले किसी स्वामी चेतनदास ने दैवी शक्ति की सहायता से लिखा था। इसमें स्वामीजी का जीवन-वृत्त तो आया ही है, उनकी भविष्यवाणियाँ भी हैं। एक अष्टपदी में कबीरदास के मोहनदास के रूप में अवतरित होकर देश को स्वाधीन कराने की भी भविष्यवाणी है। अब तक यह ग्रंथ इसलिए नहीं प्रकाशित किया गया था कि इसमें एक स्थान पर कहा गया है कि जब तक स्वराज्य न हो जाए तब तक जो इसे प्रकाशित करेगा वह पागल हो जाएगा। सौभाग्यवश अब वह बाधा नहीं है। जब प्रकाशित करनेवालों के पागल होने की कोई आशंका तो नहीं है, पर विश्वासपूर्वक इसे सत्य माननेवालों के वैसा हो जाने की पूर्ण आशंका बनी हुई है। इसकी भाषा का एक नमूना इस प्रकार है :
मस्तीन सुरवा डाहिबी। आसीम औरम थाहिबी॥
धीधी धुना नुप जाहिबी। फीफी फिना सत साहिबी॥
कौड़ीस कोणप करतरी। उनत्रीस ओखर धरधरी॥
फातेस जसता जरजरी। टाणेस टरबर भरभरी॥
मूड़ मारकर भी कोई पैशाची का पंडित इस नई पिशाच भाषा का उद्धार नहीं कर सकेगा। सौभाग्यवश टीकाकार ने इसका अर्थ स्पष्ट कर दिया है : शंखवार्त्ता-रूपी दिव्य निनाद को सुनकर सर्पराज शेष ध्यानमग्न हो गए, लक्ष्मी-रूपी मृगी आनंदित और थकित हो गई, इत्यादि। बाबा तुलसीदासजी के साथ रहने वाले बाबा वेणीमाधवदास की डायरी का जो सम्मान विद्वानों ने किया है, उसे देखते हुए इस प्रकार की नई-नई वाणियों का अवतार होने लगना कुछ आश्चर्य की बात नहीं है। तुलसीदास की पत्नी और चेलों की बातें छप चुकी हैं। यदि उनकी ससुराल के अन्य संबंधियों की भी कुछ रचनाएँ छप जाएँ तो आश्चर्य करने की बात नहीं होगी। ऐसी भारवर्द्धक पुस्तकों की कड़ी आलोचना होनी चाहिए, नहीं तो साहित्य के इतिहास में ऐसी बे-सिर-पैर की पुस्तकों के तथ्य की आलोचना होने लगेगी तो फिर साहित्य के मूल प्रवाह को समझना असंभव हो जाएगा। नित्य नए ग्रामों के जन्म-स्थान होने के दावों ने साहित्य के मंदिर के सामने बे-मतलब के कूड़ों का अंबार लगा रखा है। अस्तु।
रामानुज और रामानंद : कुछ पंडितों का दावा है कि रामानंद चाहे जिस दृष्टि से रामानुज के मतावलंबी क्यों न रहे हों, तत्त्व दृष्टि से तो उनके मतावलंबी नहीं थे। कुछ दूसरे पंडित ठीक इसके विरुद्ध मत का प्रतिपादन करते हैं। वे तत्त्व-दृष्टि से तो रामानंद को रामानुज का अनुयाई मानते हैं, पर उपासनापद्धति में एकदम अलग। इसमें कोई संदेह नहीं कि सारी परंपराएँ रामानंद का रामानुज संप्रदाय से संबंध बताती हैं, पर साथ ही कुछ ऐसी दलीलें भी उपस्थित की गई हैं जिनसे इस अनुमान की पुष्टि हो जाती है कि दोनों आचार्यों का संबंध दूर-दूर का ही था। कहा गया है कि रामानंद द्वारा प्रवर्त्तित संप्रदाय में राम और सीता को जिस प्रकार एकमात्र परमाराध्य माना जाता है, उस प्रकार रामानुज के प्रवर्त्तित श्रीवैष्णव संप्रदाय में नहीं माना जाता। श्रीवैष्णव सभी अवतारों की उपासना करते हैं। फिर रामानंदी लोगों में जो मंत्र प्रचलित हैं, वे भी रामानुज संप्रदाय के मंत्र से भिन्न हैं। उनका तिलक रामानुजीमत के तिलक से मिलता-जुलता है, फिर भी हू-ब-हू वही नहीं है बल्कि थोड़ा भिन्न है। स्वयं रामानंदजी त्रिदंडी संन्यासी नहीं थे, यह भी सिद्ध किया गया है। फिर एक बात और भी विचारणीय है—रामानंदी संप्रदाय का नाम भी हू-ब-हू वही नहीं जो रामानुजीय संप्रदाय का है। इस प्रकार नीचे लिखी तालिका से स्पष्ट हो जाता है कि दोनों संप्रदायों में सभी महत्त्वपूर्ण बातों में भेद है :
रामानुजीय रामानंदीय
संप्रदाय श्रीवैष्णव संप्रदाय ॐ श्रीसंप्रदाय
मंत्र नमो नारायणाय ॐ रामायनमः
भाष्य श्रीभाष्य आनंदभाष्य
फिर भी परंपरा से रामानंद का संबंध रामानुजीय संप्रदाय से सिद्ध है। इसका एक समाधान इस प्रकार से किया गया है कि तमिल देश में बहुत पुराने ज़माने से कोई राम संप्रदाय चला आ रहा था जो कभी श्रीवैष्णवों में प्रविष्ट हो गया था। रामानंद उसी संप्रदाय के आचार्य थे। कहा गया है कि ऐसा मान लेने से सभी बातों की संतोषजनक मीमांसा हो जाती है। पहले एक समस्या खड़ी करके फिर उसका समाधान करने का प्रयत्न भारतीय साहित्य और समाज के क्षेत्र में यह अकेला ही नहीं है।
आनंदभाष्य का मत : रामानंदजी का रचित बताया जानेवाला 'आनंदभाष्य' अनन्य भक्ति को ही मोक्ष का एकमात्र और अव्यवहित उपाय मानता है और प्रपत्ति को मोक्ष का हेतु, और कर्म को भक्ति का अंग बताता है। इसके अनुसार जगत् का अभिन्न निमित्तोपादान कारण ब्रह्म है। इसके अनुसार जीवों का परस्पर-भेद और नानात्व सिद्ध है। इसी प्रकार स्वरूपतः जीव अणु, कर्त्ता, भोक्ता, ज्ञाता तथा नित्य हैं। जीव और ब्रह्म का भेद है। यह मत वर्णाश्रम व्यवस्था को स्वीकार करता है, विवर्त्तवाद का बारंबार प्रत्याख्यान करता है और नारदपांचरात्र को प्रमाणरूप में उद्धृत करता है। निर्विशेषक ब्रह्म का अनेक स्थलों पर तिरस्कार करके और सविशेषक ब्रह्म का प्रतिपादन करके सत्ख्यातिवाद को स्वीकार करता है। इस प्रकार जहाँ तक इस भाष्य के मुख्य प्रतिपादित सिद्धांतों का प्रश्न है, उसकी प्रामाणिकता को अस्वीकार करने का कोई कारण नहीं है।
परंतु सुप्रसिद्ध विद्वान् फर्कुहर का कहना है कि परंपरा से यह प्रसिद्ध है कि पहले-पहल रामानंदजी ही अध्यात्म रामायण और अगस्त्य-सुतीक्ष्ण संवाद दक्षिण से ले आए थे। निस्संदेह उनके संप्रदाय में इन ग्रंथों का बड़ा समादर है। प्रसिद्ध रामभक्त गोसाईं तुलसीदास के रामचरितमानस पर इन ग्रंथों का प्रभाव सर्वविदित है। आज भी रामानंदी वैष्णव इन ग्रंथों को संप्रदायमान्य ग्रंथ मानते हैं और यह आश्चर्य की बात है कि ये ग्रंथ विशिष्टाद्वैत की अपेक्षा शंकरमत की ओर अधिक झुकते हैं (तुलनीय अध्यात्म रामायण, 1-32-52)। इस प्रकार यह अनुमान असंगत नहीं कहा जा सकता कि रामानुजजी के मत में भक्ति ही बड़ी चीज़ थी, तत्त्ववाद नहीं। उनके शिष्यों में केवल एक बात को छोड़कर बाक़ी बातों में काफ़ी स्वतंत्रता का परिचय पाया जाता है। वह बात है अनन्य भक्ति। उनके कितने ही शिष्य उनकी भाँति वर्णाश्रम व्यवस्था नहीं मानते, जीवों का ब्रह्म से भेद नहीं मानते और कितने तो यह भी नहीं मानना चाहते कि दिव्य गुणों से भगवान् का सगुणत्व भी सिद्ध होता है और संपूर्ण वेदांत शास्त्र सगुण ब्रह्म का ही प्रतिपादन करता है। केवल प्रपत्ति या शरणागति को मोक्ष का साधन समझने में उनके सभी शिष्य एक हैं।
रामानंद के गुरु राघवानंद थे। भक्तमाल में नाभादासजी ने गुरु राघवानंद को ही रामानंद का गुरु मोना है। इन गुरु राघवानंद की एक हिदी-रचना सिद्धांत पचमात्रा प्राप्त हुई है, जो काशी विद्यापीठ से प्रकाशित और स्व डॉ. पीतांबरदत्त बड़थ्वाल द्वारा संपादित 'योग-प्रवाह' नामक पुस्तक में संगृहीत है। सिद्धांत पंचमात्रा से ही स्पष्ट हो जाता है कि राघवानंदजी योग-मार्ग की साधना से परिचित थे और अंतःसाधना और अनुभवसिद्ध ज्ञान की महिमा के विश्वासी थे। गुरु रामानंद को उदार दृष्टि और व्यापक भक्तिचेतना अपने गुरु से उत्तराधिकार के रूप में ही मिली थी।
रामानंद में कुछ-न-कुछ ऐसी साधना अवश्य थी जिसके कारण योगप्रधान भक्ति-मार्ग, निर्गुणपंथी भक्तिमार्ग और सगुणोपासक भक्तिमार्ग, तीनों ही के पुरस्कर्त्ता भक्तों ने उन्हें अपना गुरु माना है।
गुरुग्रंथसाहब में इनका एक पद संगृहीत है जिसमें इन्होंने बहुत कुछ निर्गुण उपासकों की ही तरह अपने विचार प्रकट किए हैं :
जहाँ जाईए तहँ जल पषान, तू परि रहिउ है नभ समान।
वेद पुरान सब दैषे जोई, ऊहाँ तउ जोइऐ जल इह्याँ न कोई॥
हिंदी में गुरु रामानंद की नई रचनाएँ प्राप्त होती हैं जो आकार में बहुत छोटी हैं। स्व. डॉ. पीतांबरदत्त बड़थ्वाल ने इनकी रामरक्षा, ज्ञानलीला, योगचिंतामणि, ज्ञान तिलक नाम की रचनाओं का संपादन किया था जो अब नागरी प्रचारिणी सभा से प्रकाशित हैं। इनमें रामरक्षा को उन्होंने बहुत महत्त्वपूर्ण और प्रामाणिक रचना समझा था, किंतु खोज-विवरणों से इसके अनेक रूपों का पता चलता है। अन्य रचनाओं के प्राप्त रूप भी पूर्ण रूप से प्रामाणिक नहीं माने जा सकते। परंतु इन रचनाओं से रामानंद के विश्वासों का थोड़ा-बहुत पता तो चल ही जाता है। इन ग्रंथों में से कई बाद में रामानंद के नाम के साथ जोड़े गए जान पड़ते हैं (आगे देखिए)।
भक्तमाल में इनके बारह शिष्य बताए गए हैं—अनंतानंद, सुखानंद, सुरसुरानंद, नरहर्यानंद, भावानंद, पीपा, कबीर, सेन, धना, रैदास, पद्मावती और सुरसुरी। इनमें से कई छोटी समझी जानेवाली जातियों में उत्पन्न हुए हैं जो रामानंद के औदार्य के साक्षी हैं।
रामानंद और वल्लभाचार्य का प्रभाव : इस प्रकार इन दो महात्माओं (श्री रामानंद और श्री वल्लभाचार्य) ने इस काल के साहित्य को प्रधान रूप से प्रभावित किया। हिंदीभाषी प्रदेशों में जो धर्म-साधनाएँ उन दिनों प्रचलित थीं, उन पर इन आचार्यों द्वारा प्रवर्त्तित भक्ति-भावधारा का प्रभाव पड़ा। निर्गुण भावापन्न योगप्रधान भावधारा के क्षेत्र में भक्ति का बीज पड़ा और वह निर्गुण मार्ग के रूप में प्रकट हुआ। प्रेमलीला-प्रधान सगुण भावधारा के क्षेत्र में वह श्रीकृष्ण-अवतार को केंद्र करके अपूर्व प्रेमाभक्ति के रूप में प्रकट हुआ और स्मार्त्तभावप्रधान पौराणिक विश्वासों के क्षेत्र में उसने राम-अवतार को केंद्र करके अत्यंत विशाल रूप में आत्मप्रकाश किया। इस प्रकार यह भक्ति का अंकुर तीन रूपों में विकसित हुआ। यही भक्ति-साहित्य हिंदी की मुख्य भावधारा है। इसी ने उत्तर भारत के लोकचित को मथित और चालित किया है, इसी ने उसे नवीन लक्ष्य और नवीन आदर्श दिए हैं।
महान् आदर्श का साहित्य : रामानंद और वल्लभाचार्य के पहले का हिंदी साहित्य किसी बड़े आदर्श से चालित नहीं था। आश्रयदाता राजाओं के गुणकीर्तन और काव्यगत रूढ़ियों पर आधारित साहित्य सूक्तियों को जन्म दे सकता है, पर वह समाज को किसी नए रास्ते पर चलने की स्फूर्त्ति नहीं दे सकता। चौदहवीं शताब्दी से पूर्व के साहित्य ने कोई नई प्रेरणा नहीं दी। किंतु नया साहित्य मनुष्य जीवन के एक निश्चित लक्ष्य और आदर्श को लेकर चला। यह लक्ष्य है भगवद्भक्ति, आदर्श है शुद्ध सात्विक जीवन, और साधन है भगवान् के निर्मल चरित्र और सरस लीलाओं का गान। इस साहित्य को प्रेरणा देनेवाला तत्त्व भक्ति है, इसीलिए यह साहित्य अपने पूर्ववर्ती साहित्य से सब प्रकार से भिन्न है। उसका लक्ष्य था—राजसंरक्षण, कवियश और वाक्सिद्धि। प्रेरक तत्त्व के बदलने के कारण पंद्रहवीं शताब्दी के बाद का साहित्य बिल्कुल नवीन-सा जान पड़ता है। चंद्र, जज्जल, विद्याधर, शांगधर आदि की रचनाओं में अनाडंबर स्वस्थ जीवन और अलौकिक पारमार्थिक लक्ष्य प्राप्त करने की स्फूर्त्तिदायिनी प्रेरणा नहीं है। परंतु इस युग के साहित्य में वह प्रेरणा पूरी शक्ति के साथ काम करती दिखाई देती है। यही कारण है कि इस काल के आरंभ में ही कबीर, नानक, सूरदास, तुलसीदास, मीराबाई, मलिक मुहम्मद जायसी और दादूदयाल जैसे महान साहित्यकार उत्पन्न हुए जो अपने-अपने क्षेत्रों में दिक्पाल—जैसे दिखाई देते हैं। इस काल का हिंदी साहित्य ऊर्ध्वबाहु होकर घोषणा करता है कि लक्ष्य बड़ा होने से ही साहित्य बड़ा होता है। जिस दिन हिंदी साहित्य इस तथ्य को भूल गया और सूक्तियों को लेकर खिलवाड़ करने के चक्कर में पड़ गया, उसी दिन से साहित्य का अधःपतन शुरू हुआ।
वास्तविक लोक साहित्य : इस प्रकार पंद्रहवीं शताब्दी के बाद सचमुच का लोकभाषा का साहित्य बना। भाषा इसकी वास्तविक और सच्ची है, शैली सहज और प्रसन्न। लोक-प्रचलित काव्यरूपों के साथ जीवन के बड़े लक्ष्य और आदर्श का योग हो जाने से इस साहित्य में अपूर्व तेजस्विता आ गई है। इसके छंदों में किसी प्रकार की कृत्रिमता का बोझ नहीं है और भाषा और भाव की अनाडंबर महिमा को वहन करने में यह पूर्ण समर्थ है। यहाँ से मात्रिक छंदों का अबाध प्रवेश होता है। हिंदी के जितने भी महान् कवि हुए हैं, उनकी रचनाएँ मात्रिक वृत्तों में ही चमकी हैं। जिन कवियों ने कई छंदों में रचना की है वे भी मात्रिक छंदोंवाली रचना लिखकर ही कृतकार्य हुए हैं। यहाँ से हिंदी कविता ने अपने असली छंदों को पहचाना। संभवतः लोक में इन्हीं छंदों का अधिक प्रचार था।
- पुस्तक : हिंदी साहित्य : उद्भव और विकास (पृष्ठ 58)
- रचनाकार : हजारीप्रसाद द्विवेदी
- प्रकाशन : राजकमल प्रकाशन
- संस्करण : 2021
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