योरप की स्त्रियाँ

yorap ki striyan

रामनारायण मिश्र

रामनारायण मिश्र

योरप की स्त्रियाँ

रामनारायण मिश्र

और अधिकरामनारायण मिश्र

    किसी देश की स्त्रियों के संबंध में कुछ लिखते या कहते बड़ा संकोच होता है। जहाज़ में बैठते ही कुछ असाधारण बातें देखकर भारतीय हृदय को बहुत बड़ा सदमा पहुँचता है। योरप पहुँचकर और वहाँ की बाहरी अवस्था देखकर वह दुःख और भी बढ़ जाता है। स्त्रियों का सिगरेट और शराब पीना साधारण-सी बात है। हमने सुना था कि भोजन के अनंतर सिगरेट पीने के लिए मर्द स्त्रियों से अलग हो जाते हैं, यह बात अब नहीं है। लोगों ने हमें बतलाया कि इन दोनों बुराइयों को वहाँ की स्त्रियों ने लड़ाई के समय सीखा जब वे दिन रात चिंता में रहती थीं। उनके मर्द, भाई, पिता सब लड़ाई में गए थे, उनके ऊपर केवल बच्चों के पालने का ही भार था बल्कि रुपया कमाने का उत्तरदायित्व भी उनके सिर पर पड़ा था। ऐसे समय में वे बेचारी अपने दुःख को दूर करने के लिए थोड़ी मदिरा पी लेती थीं या सिगरेट का प्रयोग कर लेती थीं।

    जहाज़ में, बाग़-बग़ीचों में यहाँ तक कि गिरजाघरों के बाहर भी अँधेरा होने पर औरत और मर्द ऐसा व्यवहार करते हुए मिले जिसके देखने का अवसर हिंदुस्तानियों को अपने देश में नहीं मिलता। इसके लिए लंडन का हाइडपार्क बहुत बदनाम है। ऐसे जीवन का मुख्य कारण शराब है। गंदी बीमारियाँ सारे योरप में बढ़ रही हैं। किसी सभ्य लेखनी द्वारा ऐसी बातों का वर्णन करना कठिन है। वहाँ के लोग निजी जीवन को सार्वजनिक जीवन से अलग समझते हैं। किसी के निजी जीवन की जाँच पड़ताल नहीं करते। ऐसी बातों को देखकर बग़ल से चले जाते हैं।

    इटली पहुँचकर हमने देखा कि स्त्रियाँ अपने होठों को लाल रँगती हैं। यह प्रथा फ़्रांस में अधिक पाई। रेल में स्त्री मर्द एक ही कमरे में एक साथ यात्रा करते हैं। शीशा, कंघी, पाउडर उनके साथ रहता है। आवश्यकता पड़ने पर वे सबके सामने शीशा निकालकर अपना मुँह देखने लगती हैं। कंघी से अपने बाल सँवार लेती हैं और चेहरे पर पाउडर लगा लेती हैं। पर पुरुष के सामने खिलखिलाकर हँसना बुरा नहीं समझा जाता है। शरीर को बनावटी तौर पर सुंदर रखने के लिए अनेक प्रकार के साबुन और मक्खन, तरह तरह की बुकनी बाज़ारों में मिलती हैं। Complexion soap, Complexion cream, cleansing cream, Nourishing cream आदि के इश्तिहार मोटे मोटे अक्षरों में चारों तरफ़ देखने में आते हैं। अनेक प्रकार की ऐसी वस्तुएँ बिकती हैं जिनसे होठ या गाल रंगे जाते हैं।

    हम लोगों का विश्वास था कि हमारे देश में पति-पत्नी-संबंधी विचार बच्चों को योरप की अपेक्षा जल्दी हो जाता है जिसके हम तीन कारण समझते थे—एक इस देश की गर्मी, दूसरे माता पिता की असावधानी और तीसरे गली बाज़ारों में रात दिन गालियों का सुनना। गाड़ीवाला घोड़े को, बैलवाला बैल को, माँ बहन की गाली देता है, जिसको लोग बचपन ही से सुनते हैं। परंतु योरोपीय देशों में भी इस संबंध की ऐसी बहुत सी बातें हैं। उनमें से दो एक का उल्लेख हमने ऊपर कर दिया है। दूसरे, माता पिता का सदैव एक बिस्तर पर सोना। तीसरे, अधिक बच्चों के पैदा होने को रोकने के संबंध की सामग्री का खुल्लमखुल्ला दूकानों पर बिकना। वीयना में लघुशंका करने के स्थान में रबर की ऐसी एक चीज़—जिसका नाम Gummi लिखा है—रखी रहती है। कल में पैसा डालते ही वह बाहर निकल आती है। फ़्रांस में गर्मी, सुज़ाक आदि रोगों से बचने के उपाय कहीं कहीं पेशाबख़ानों में सचित्र लटके रहते हैं। वहाँ वेश्याओं की सामयिक डाक्टरी परीक्षा होती है। जर्मनी में एक बड़े विद्वान् और अनुभवी मित्र ने हमें बतलाया कि विद्यार्थियों में ये रोग बहुत बढ़ रहे हैं जिसके कारण वहाँ के शिक्षक लोग बहुत चिंतित हैं। दुःख की बात है कि यह शिकायत हिंदुस्तान में भी सुनने में रही है। चौथे, योरप भर में नंगी मूर्तियाँ सब जगह मिलती हैं। ऐसी मूर्तियाँ हमें संग्रहालयों में, सड़कों पर, क्रिस्टल पैलेस में और विश्वविद्यालयों के बाहर भी मिली। वे कहते हैं कि ऐसी मूर्तियों को मूर्ति निर्माण-कला की दृष्टि से देखना चाहिए। जहाज़ में और कई दूसरी जगह जहाँ केवल मर्द ही मर्द नहाते-धोते हैं वहाँ कई बेर देखा कि मर्द नंगे होकर सबके सामने तौलिए से बदन पोछने लगते हैं। बहुत से थियेटर और अन्य तमाशों में स्त्रियाँ प्राय: नंगी होकर खेल दिखलाती हैं। पाँचवें, बड़े-बड़े नगरों में इस बात का विज्ञापन रहता है कि आप चाहें तो वहाँ की नाईट लाइफ़ देख लें 'Night Life of Paris, Night Life of Berlin' आदि मोटे अक्षरों में लिखा रहता है। जो देखना चाहे उसका प्रबंध गाइड लोग कर देते हैं। यह हवा मिस्र देश की राजधानी तक पहुँच गई है।

    केवल येही बातें देखकर यदि हम भारतवर्ष लौट आए होते तो हमें बड़ा दुःख होता और कुछ भी फ़ायदा होता। जिन महासभाओं में हम गए और वहाँ जिन महिला-रत्नों के हमें दर्शन हुए और जिन बहिनों ने अपने घरों में हमें निमंत्रित किया उन्होंने स्त्री जाति के लिए हमारे हृदय में सच्चा आदर पैदा कर दिया। हमें यह मालूम हो गया कि अपने अपने देशों का सिर संसार में ऊँचा करने के लिए योरप की स्त्रियों ने पूरा प्रयत्न किया है। शिक्षा प्रचार में और जनता की सेवा में इनका कार्य अलौकिक है। इस समय सारे संसार में इटली को डाक्टर मांटीसोरी का नाम फैल रहा है। इन्होंने शिक्षा-प्रणाली में विलक्षण परिवर्तन कर दिया है। यह पहली स्त्री थीं जिन्होंने रोम के विश्वविद्यालय से चिकित्साशास्त्र की डिग्री प्राप्त की। पहले इनको ऐसे स्कूलों के डाकर मांटीसोरी निरीक्षण का भार दिया गया था जिनमें बोदे, कम बुद्धिवाले और कमज़ोर लड़के पढ़ते थे। ऐसे स्कूल भी योरप में बहुत हैं। कुछ दिनों के बाद इनकी शिक्षा-प्रणाली से बोदे लड़कों की बुद्धि भी चमक निकली। अनुसंधान से पता लगा कि इनके सिद्धांतों के अनुसार यदि साधारण बुद्धि के बालकों को भी शिक्षा दी जाए तो उनका कल्याण हो।

    दूसरी महिला-रत्न जिनके अद्भुत वक्तृत्वशक्ति, संगठन-शक्ति और शिक्षा-सिद्धांतों के ज्ञान ने हमें प्रसन्न कर दिया, मिसेज बिइट्रसे एनसोर (Mrs. Beatrice Ensor) हैं। यह इंग्लैंड देश से कोई देवी इस नीरस गद्यमय संसार को मधुर काव्य-रस से ओत-प्रोत करने गई हैं। बाइबल, मिल्टन, ब्राउनिंग, शेक्सपियर, रवींद्र नाथ टैगोर आदि के पद इन्हें याद हैं और वे उन्हें इस प्रकार पढ़ती हैं कि उनके अर्थ चुभते हुए आपके हृदय में जाकर बैठ जाते हैं।

    लंडन के ईस्टएंड में बहुत ग़रीब और गंदे लोग रहते हैं। वहाँ के लोगों के सुधार के लिए जितना कार्य स्त्रियाँ करती हैं वह संसार के लिए मनुष्य-सेवा का अद्भुत उदाहरण है। मिस लेस्टर एक महिला हैं जिनको अपने पिता से लाखों की संपत्ति मिली थी। उन्होंने सारी संपत्ति ईस्टएंड के सुधार के लिए दे दी, और आप स्वयं वहीं एक साधारण से मकान में साधारण भोजन पर रहती हैं। एक स्त्री हमें मिली जो उच्च कुल में धनी के घर पैदा होकर भी बचपन से ईस्टएंड के लोगों की सेवा अवैतनिक रूप से कर रही हैं, यहाँ तक कि उन्होंने अपना विवाह भी उसी श्रेणी के एक मर्द से कर लिया है जिसके कारण समाज ने उनका एक प्रकार से बहिष्कार कर दिया है। इन्होंने कृपापूर्वक हमें ईस्टएंड का बहुत सा हिस्सा दिखलाया। इनसे बिदा होते समय मैंने उनका पता पूछा। उन्होंने पता लिख दिया। उनके पति भी उस जलसे में मौजूद थे जहाँ वे मुझे ले गई थीं। इन महिला का नाम मिसेज प्लैटन है। मैंने इनसे पूछा कि मुझसे पत्र व्यवहार करने के लिए क्या आपको अपने पति से आज्ञा लेने की आवश्यकता होगी। उन्होंने कहा, नहीं, वह मेरा विश्वास करते हैं और मैं उनका विश्वास करती हूँ।

    प्राय: जितनी सभा-समितियों में हम लोग गए उनमें स्त्रियों को बहुत काम करते पाया। हम लोगों से वे इतने प्रश्न पूछती थीं कि हम उनकी बुद्धिमत्ता पर चकित हो जाते थे। डेनमार्क में स्त्रियों को प्राय: तीन भाषाएँ बोलते पाया-अँग्रेज़ी, जर्मन और अपनी मातृभाषा।

    खाते समय वहाँ प्रत्येक स्त्री के साथ एक पुरुष बैठता है। पुरुष का कर्तव्य होता है कि उसके पास जो स्त्री बैठे उसको वह बातचीत में लगाए रहे। मुझे जब जब किसी स्त्री के पास बैठने का सौभाग्य प्राप्त हुआ मैंने उसके ज्ञान का क्षितिज अपने से अधिक विस्तृत पाया। ऐसे समय मैं बहुधा भारतवर्ष की चर्चा छेड़ देता था जिसके संबंध में उनको बहुत कम मालूम रहता था। बात यह है कि योरप के देशों में अनिवार्य शिक्षा है, इसलिए प्रत्येक स्त्री पढ़ी लिखी हैं। वे अपने व्यवसाय संबंधी और अन्य विषयों पर भी पुस्तकें और समाचारपत्र पढ़ा करती हैं। इसके अतिरिक्त योरप में संग्रहालयों और जंतु-शालाओं की इतनी प्रचुरता है कि इनमें एक बेर घूम आने से भी ज्ञान का विस्तार बढ़ जाता है। रेल के कमरों में भौगोलिक और प्राकृतिक दृश्यों के सुंदर चित्र लगे रहते हैं, गली-गली ऐतिहासिक व्यक्तियों की विशाल मूर्तियाँ वे प्रति दिन देखा करती हैं, इसलिए कोई आश्चर्य नहीं है कि एक पढ़े लिखे भारतवासी की अपेक्षा एक पढ़ी लिखी योरोपियन महिला अधिक ज्ञान रखती है। पेरिस, में हम लोगों को एक महिला मिली जो संस्कृत पढ़ रही थी। उन देशों में ज्ञान उपार्जन के अनेक साधन हैं। बर्लिन और म्यूनिक में हम लोगों ने प्लैनिटेरियम देखे। कमरों के अंदर लोग कुर्सी पर बैठ जाते हैं और अँधेरा कर दिया जाता है। एक यंत्र के चलते ही आकाश और पृथ्वी चलते हुए मालूम होते हैं। आकाश पर तारे निकल आते हैं। एक सज्जन व्याख्यान द्वारा सब बातें समझाते चलते हैं। इसके अतिरिक्त सामाजिक जीवन के उपयोगी शिक्षा भी उन्हें दी जाती है। रोटी पकाना, सीना-पिरोना, नाचना-कूदना, खेलना इत्यादि जानना आवश्यक है। एक स्त्री ने जहाज़ में मुझसे कहा (“Your education is incomplete”) तुम्हारी शिक्षा अधूरी है, क्योंकि तुम खेल-कूद हँसी-मज़ाक़ में तो शरीक होते ही नहीं।

    वहाँ की स्त्रियों में एक प्रकार का व्यक्तित्व है। पहले रेल में या ट्रामवे में भीड़-भाड़ के समय मर्द स्त्रियों को बैठने की जगह दे देते थे और आप खड़े रहते थे। यह बात अब बहुत कम हो गई है। स्त्रियाँ अब अपने पैरों पर खड़ा होना पसंद करती हैं। इंग्लैंड, फ़्रांस और जर्मनी में मदों की अपेक्षा स्त्रियों की संख्या अधिक है। लड़ाई में हज़ारों मर्द मारे गए। ऐसी अवस्था में अनेक स्त्रियाँ बिना व्याही हैं और उनको बिना किसी मर्द की सहायता के अपनी जीविका उपार्जन करनी पड़ती है। वे दूकानें करती हैं, भोजनालयों में खाना परोसने का अथवा ख़ज़ानची का काम करती हैं, लोगों के कपड़े धोती हैं अथवा स्कूलों में पढ़ाने का काम करती हैं; पुलिस में कांसटेब्ल भी हैं। इस प्रकार संसार से युद्ध करती हैं और अपने व्यक्तित्व की रक्षा करती हैं। मजाल है कि कोई मर्द उनकी तरफ़ आँख उठाकर देख ले। हमारे देश में मंदिरों में, घाटों पर, बाज़ारों में मर्दों का स्त्रियों की ओर घूरना मामूली सी बात है। इसका बहुत बड़ा कारण निरक्षरता और पर्दा है। योरप में कई बार ऐसा देखने में आया कि एक अकेला मर्द एक अकेली स्त्री के साथ किसी दफ़्तर में काम कर रहा है अथवा लिफ़्ट में ऊपर-नीचे जा रहा है। सर्द देश होने के कारण वहाँ के लोगों को आदत पड़ गई है कि सब काम दरवाज़े बंद करके करें। सोने, शौच आदि जाने और नहाने का प्रबंध स्त्रियों के लिए अलग रहता है, परंतु नहाने का कपड़ा पहनकर मर्द और स्त्री एक ही स्थान पर तैरते हुए मिलते हैं। स्त्रियाँ ख़ूब कसरत करती हैं।

    वेदों से हमें अभय की शिक्षा मिली है—

    अभयं नः करत्यन्तरिक्षमभयं द्यावापृथिवी उभे इमे॥

    अभयं पश्चादभयं पुरस्तादुत्तरादधरादभयं नो अस्तु॥

    अभयं मित्रादभयममित्रादभयं ज्ञातादभयं परोक्षात्॥

    अभयं नक्तमभयं दिवा नः सर्वा श्राशा मम मित्रं भवन्तु॥

    (अथर्ववेद)

    हम सबको अंतरिक्ष और पृथ्वी अभय प्रदान करे, हम सब पीछे से अभय होवें, आगे से अभय होवें, ऊपर से और नीचे से अभय होवें, हम सब मित्र से अभय होवें, शत्रु से अभय होवें, ज्ञात पदार्थ से अभय होवें, और अज्ञात पदार्थ से अभय होवें, रात को अभय रहें और दिन को अभय रहें, सब दिशाओं के रहनेवाले हमारे मित्र होवें।

    ऊपर लिखे हुए वेदमंत्र में 'अभय' होने के लिए प्रार्थना की गई है। पर हमारे देश में हो रहा है अब इसका उलटा। हमारी स्त्रियों का जीवन रात-दिन डर ही में बीतता है। वे मर्दों से डरती हैं, अपने पति से डरती हैं, यात्रा करते समय डरती हैं, अँधेरे से डरती हैं, देवी-देवताओं से डरती हैं, भूतों से डरती हैं, इसी का परिणाम है कि हमारे बच्चों को 'अभय' का मंत्र सुनानेवाली माताएँ कम मिलती हैं।

    योरप देश की यात्रा में स्त्रियों को मैंने 'अभय' की मूर्ति पाया, उनमें से कई अकेली संसार की यात्रा कर आती हैं। पैरिस में एक इंग्लिश महिला से भेंट हुई, वह 36 बेर एटलांटिक महासागर पार कर चुकी थी अर्थात् 18 बेर योरप से अमेरिका हो आई थी। यह हँसता हुआ चित्र 18 बरस की एक जर्मन लड़की का है, उसका नाम है लुई हाफमन। उसका जन्म जुलाई 1810 को हुआ था और 10 जुलाई 1828 को उसने हवाई जहाज़ चलाने की परीक्षा पास की। गत सितंबर में जब मैं जर्मनी में था तब वहाँ उसकी बड़ी चर्चा थी। निर्भय होकर यह लड़की आकाश में उड़ती है। उस समय जर्मनी में 13 स्त्रियाँ ऐसी थी जो हवाई जहाज़ चलाती थीं पर उनमें सबसे छोटी कुमारी हाफमन थी।

    यह तो हुई आकाश की बात। डेनमार्क की मेली गेड नाम की स्त्री ने इंगलिश चैनल पार किया। यह समुद्र का एक टुकड़ा है, जहाज़ साधारणत: सात घंटे में इसको पार करता है। यह निडर स्त्री तैरकर इसको पार कर गई। अभी थोड़े ही दिन हुए कुमारी मरसीडीज़ डीजे 26 घंटे पानी के अंदर तैरती रही। जुलाई के अंत में जब मैं जनीवा में था, मैंने अनेक स्त्रियों को वहाँ की झील में तैरते हुए देखा। यही बात सारे योरप में पाई। स्कूलों में अथवा सर्वसाधारण के स्नानागारों में जिनका प्रबंध वहाँ की म्यूनिसिपैलिटी करती है स्त्रियाँ ख़ूब तैरती हैं, और ऊपर से पानी में बेधड़क कूद जाती हैं।

    विस्सूवियस का ज्वालामुखी पर्वत देखने जब हम गए तब वहाँ स्त्रियों को खड्ड में उतरते देखा जिसमें कहीं कहीं आग का धुआँ भी निकलता था। कुछ दिनों के बाद 'शामोनी पर्वत' में जब हम बर्फ़ की नदी देखने गए तो कई स्त्रियों को ग्लेशियर पार करते देखा और भयानक स्थानों में कलोलें करते पाया। वे बर्फ़ के गहरे गड़हों में कूद जाती जहाँ फिर से ऊपर पाना उनके लिए मुश्किल हो जाता। ऊपर से हाथ खींचकर या नीचे से ढकलकर उनके साथी उनको ऊपर चढ़ा देते पर वे फिर नीचे कूद जाती। इसी प्रकार अनेक टोलियाँ अपने अपने साहस का परिचय देती थीं।

    मिस्र देश के अलेकजेंडरिया नगर में पाम्पी नाम का एक स्तंभ है जो 88 फुट ऊँचा है। कहा जाता है कि मिस टैलबट नाम की एक योगपियन महिला उसके ऊपर चढ़ गई और वहाँ बैठकर उसने खाना खाया और एक पत्र लिखा।

    जब हम कोलंबो से जहाज़ पर योरप जा रहे थे, एक स्त्री जाँघिया और तंग कुरती पहने हुए सबके सामने लड़कियों को कसरत करा रही थी। नित्य प्रति वह ऐसा ही करती थी।

    27 अगस्त को बर्लिन में हम वहाँ की सबसे बड़ी व्यायामशाला देखने गए। वहाँ अनेक प्रकार की कसरतों का अद्भुत प्रबंध था। उसको संचालिका एक स्त्री है। उसका नाम मिस मोगडा कावस्की है। उसके शरीर की सी बनावट, उसका-सा फुर्तीलापन, उसके जैसी सुंदरता हमारे देश में स्वप्न में भी देखने में नहीं आती।

    इन्हीं कारणों से संसार की दौड़ में वहाँ की स्त्रियाँ मर्दों का साथ देती हैं। सभा-समाजों में स्त्रियों को संख्या मर्दों से कम नहीं रहती, और वाद-विवाद में भी उनका हिस्सा मर्दों से किसी तरह कम नहीं होता। ऐसी माताओं की संतान भानमती के पिटारे में रखने लायक़ बबुए नहीं होते। उसी बर्लिन की व्यायाम-शाला में जिसका वर्णन ऊपर आया है तालाब के किनारे हम लोग बैठे थे, दूसरी तरफ़ एक स्त्री और एक मर्द विश्राम कर रहे थे और उनका बच्चा खेल रहा था। खेलते-खेलते वह पानी के पास चला आता और फिर चला जाता। कभी-कभी पानी में पैर तक डाल देता; उसके माता पिता दूर से देखकर हँसते थे। जहाज़ में छोटे छोटे बच्चे मस्तूल के रस्सों पर, किनारे के छड़ों पर बेखटके चढ़ जाते हैं। लंडन में एक दिन असबाब लादने की खुली लंबी चलती मोटर गाड़ी पर मैंने एक लड़के को कूदकर पीछे से ऊपर चढ़ते हुए देखा। हमारी माताएँ बच्चों को ऐसा करते देखकर घबरा जाती हैं, चिल्लाने लगती हैं और कभी कभी उनको मार भी देती हैं—यही कारण है कि हम लोग बचपन ही से बोदे, डरपोक और रोगी होते हैं, घर बैठे एक रोटी मिल जाए तो बाहर यदि साम्राज्य भी मिले तो नहीं जाएँगे।

    छः महीने की यात्रा में हम लोग अनेक नगरों और ग्रामों में गए, अनेक गृहस्थों और व्यापारियों के साथ रहे, साधारणत: कहीं भी रोता हुआ बच्चा नहीं मिला। यह बहुत बड़ी बात है। दिन में बीस दफ़ा रानेवाले बच्चों की, जवानी में स्वाभाविक रोनी सूरत हो जाती है। योरप की स्त्रियों के लिए यह महान् गौरव की बात है कि उनके बच्चे साधारणत: नहीं रोते। हमारे यहाँ बच्चों का रोना मामूली बात है। वहाँ के छोटे-छोटे बच्चे भी निडर होते हैं। 18 जुलाई को एक देवी ने मुझे पैरिस में भोजन के लिए निमंत्रित किया। भारत संबंधी बात-चीत करते रात के ग्यारह बज गए। पैरिस के लोग बड़े रंगीले हैं। रात के समय इतने लोग मोटरों में बाहर निकलते हैं कि सड़क पर एक तरफ़ से दूसरी तरफ़ जाना कठिन हो जाता है। देवी की दो छोटी भतीजियाँ थीं, मुझे सड़क की दूसरी तरफ़ जाकर अंडर ग्राउंड रेल से जाना था। मोटरों की भरमार थी। पटरी से सड़क पर पैर रखने की हिम्मत नहीं थी पर ये दोनों लड़कियाँ सड़क पर उतर ही गईं। बच्चों को देखकर वहाँ के लोग गाड़ी की चाल धीमी कर देते हैं।

    स्वाभिमान, संयम और निर्भयता आदि गुणों के कारण वहाँ की स्त्रियाँ साहसी, योद्धा और विद्वान उत्पन्न कर सकती हैं।

    जनीवा झील में एक दिन हमने देखा कि एक जहाज़ छूटने ही वाला था, ठीक समय पर एक मोटर आई उस पर महिलाएँ थीं। जहाज़ पर एक मेम, जो उनकी मित्र थी, पहले ही चढ़ चुकी थी। वह दौड़ी और उसने उन्हें जहाज़ पर खींच लिया, तीनों बैठ गई और जहाज़ खुल गया। एक पिछड़ गई, इसलिए बैठ सकी। पर वह घबराई नहीं। झट मोटर में बैठी और मोटर दौड़ाकर आगे के बंदरगाह पर पहुँच गई, जहाँ उसको वही जहाज़ मिल गया। यह है उनका साहस और धैर्य।

    योरप में प्रायः हर एक बड़े नगर में एक एक चित्रशाला है। इन चित्रशालाओं में प्राचीन और नवीन चित्रों का अद्भुत और बहुमूल्य संग्रह मिलता है। वहाँ बैठी हुई विशेष विशेष चित्रों की प्रतिलिपि लेती हुई स्त्रियाँ देखने में आई। इन चित्रों द्वारा वे बहुत सा रुपया कमा लेती हैं। हमने एक लड़की को देखा जो एक चित्र तैयार कर रही थी, उसने कहा कि मैं इसको अमुक प्रदर्शनी में भेजूँगी जो एक वर्ष बाद होनेवाली थी। वह उसके लिए पहले ही से तैयारी कर रही थी।

    वहाँ की स्त्रियाँ मर्द बनने का प्रयत्न कर रही हैं। बालों को कटवाती हैं, ऊँचा कोट और ऊँचा मोज़ा पहनती हैं और बहुत तेज़ी के साथ चलती हैं। हमारे देश में गाँव के लड़के भी शहर के स्कूलों में आकर बाल रखने और माँग काढ़ने लगते हैं। तेज़ या दूर तक चलने की उनकी आदत छुट जाती है। एक दिन जब मुझे स्वीडन से जहाज़ पर बैठकर प्रात: काल डेनमार्क आना था मैं बड़े सबेरे अपने स्थान से बंदरगाह की ओर तेज़ी से जा रहा था। मैं समझता हूँ कि तेज़ चलने का मुझे कुछ अभ्यास है। दूर जाकर मुझे पीछे की तरफ़ किसी के चलने की आहट मालूम हुई। घूमकर देखा तो दो स्त्रियाँ आती हुई दिखलाई दीं। वहाँ का नियम है कि पटरी पर मर्द सड़क के किनारे की तरफ़ चलता है। मैं सड़क की तरफ़ हो लिया और मैंने स्त्रियों को आगे बढ़ जाने के लिए स्थान दे दिया। उन्होंने कहा क्या आप भी लेक्चर सुनने के लिए उस पार चल रहे हैं?” मैंने कहा—“जी हाँ।” उन्होंने कहा—तो तेज़ चलना जारी रखिए।