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तेनाली की ईमानदारी

tenali ki iimandari

तेनालीराम

तेनालीराम

तेनाली की ईमानदारी

तेनालीराम

और अधिकतेनालीराम

    तेनालीराम के व्यवहार की शिकायत लेकर कुछ ब्राह्मण राजगुरु के पास पहुँचे। इनमें अधिकांश ब्राह्मण वही थे जिन्हें तेनालीराम सबक सिखा चुका था। राजगुरु तो पहले ही तेनालीराम से जला बैठा था और बदला लेने की ताक में था, क्योंकि उसकी वजह से राजगुरु को कई बार नीचा देखना पड़ा था।

    राजगुरु उन ब्राह्मणों से मिलकर तेनालीराम को पाठ पड़ाने का उपाय सोचने लगा। फैसला यह हुआ कि राजगुरु तेनालीराम को अपना शिष्य बनाने का नाटक करे और रीति के अनुसार उसके शरीर को दाग़ा जाए। दागा भी इस ढंग से जाए कि तेनालीराम जन्म-जन्मांतर तक याद रखे।

    जब इस प्रकार तेनालीराम से बदला ले लिया जाए तो राजगुरु उसे यह कहकर शिष्य बनाने से इंकार कर दे कि वह नीची जाति का ब्राह्मण है। तय हुआ कि यह योजना उन एक सौ आठ ब्राह्मणों तक ही सीमित रहे, जिन्हें तेनालीराम अपने घर बुलाकर दग़वा चुका था।

    सारी बातें तय हो गईं। अब तेनालीराम से बदला लेने को वे सब बहुत उत्सुक थे। योजना के अनुसार राजगुरु ने एक दिन तेनालीराम को अपने घर बुलाया और कहा कि उसकी भक्ति-भावना और ज्ञान को देखते हुए वह उसे अपना शिष्य बनाना चाहता है।

    यह सुनते ही तेनालीराम के मन में संदेह का कीड़ा कुलबुलाया कि अवश्य ही दाल में कुछ काला है पर वह नाटक करता रहा कि राजगुरु के प्रस्ताव से बहुत ख़ुश है। पूरी बात सुनकर बड़ी उत्सुकता से तेनालीराम ने पूछा : “आप कब मुझे अपना शिष्य स्वीकार करेंगे?

    “अगला शुक्रवार बड़ा ही शुभ दिन है। स्नान करके तुम्हें क़ीमती वस्त्र पहनने होंगे, जो तुम्हें मेरी ओर से भेंट किए जाएँगे। भेंट के रूप में मैं तुम्हें एक सौ स्वर्ण मुद्राएँ भी दूँगा। इसके बाद रीति के अनुसार तुम्हें पवित्र शख और लौहचक्र से दाग़ा जाएगा। इस तरह तुम विधिवत् मेरे शिष्य हो जाओगे।” राजगुरु ने उत्साहपूर्वक कहा।

    ठीक है। कहकर तेनालीराम चला गया। घर जाकर उसने सारी बात अपनी पत्नी को कह सुनाई। फिर बोला, “अवश्य इस धूर्त के मन में कोई चाल है। पत्नी बोली : “तुमने उसका शिष्य बनना स्वीकार ही क्यों किया?” “परेशान होने की कोई बात नहीं है।

    राजगुरु अगर डाल-डाल है तो मैं पात-पात हूँ।” तेनालीराम ने कहा। आख़िर आपने सोचा क्या है? पत्नी ने पूछा। “मुझे पता चला है कि जिन एक सौ आठ ब्राह्मणों को मैंने अपने घर निमंत्रण दिया था, उनकी राजगुरु के यहाँ कोई सभा हुई है। असली बात का पता लेने का एक तरीक़ा मेरे पास है।

    इन ब्राह्मणों में से एक का नाम सोमा है। उसके यहाँ बच्चा होने वाला है, पर उसके पास ख़र्च के लिए पैसों का अभाव है। मैं दस स्वर्ण मुद्राएँ देकर सोमा से सारी बातें मालूम कर लूँगा। फिर देखना, इस राजगुरु के बच्चे की मैं क्या गत बनाता हूँ।” तेनालीराम ने कहा।

    उसी रात तेनालीराम सोमा पंडित के घर गया और उसे उसकी स्थिति का हवाला देकर तथा जेब से दस स्वर्ण मुद्राएँ निकालकर उसके सामने रखते हुए कहा : अगर तुम मुझे यह बता दो कि राजगुरु के घर हुई गुप्त बैठक में क्या बात हुई है, तो मैं तुम्हें ये स्वर्ण मुद्राएँ दे दूँगा।”

    “नहीं, नहीं, मैंने यह बता दिया तो मैं कहीं का नहीं रहूँगा।” सोमा ने कहा। “मैं वादा करता हूँ कि यह बात मैं अपने तक ही सीमित रखूँगा।” तेनालीराम बोला : “सोचो, तुम्हारी पत्नी इस समय कितनी नाज़ुक अवस्था में है। मुर्खता मत करो।

    इस समय तुम्हें राजनीति खेलकर अपनी नाज़ुक स्थिति पर गौर करना चाहिए। इस समय ये दस स्वर्ण मुद्राएँ तुम्हारे लिए अधिक उपयोगी हैं ना कि राजनीति। मुसीबत के समय मैं स्वयं चलकर तुम्हारी मदद को आया हूँ या राजगुरु।

    सोमा पंडित को यह बात जम गई। उसने स्वर्ण मुद्राएँ ले लीं और बोला : “देखो, किसी को यह पता चले कि मैंने यह भेद खोला है। और फिर उसने तेनालीराम को वहाँ हुई सभी बातें बता दीं। तुम बिल्कुल निश्चिंत रहो। तेनालीराम ने कहा : “किसी को हवा भी नहीं लगेगी कि तुमने मुझे कुछ बताया है।”

    तत्पश्चात् घर आकर तेनालीराम ने अपनी पत्नी को यह बात बताई। पत्नी बोली, “अब आप क्या करेंगे।” “तुम देखती जाओ, मैं राजगुरु को ऐसा सबक सिखाऊँगा कि वे भी याद रखेंगे।” शुक्रवार के दिन तेनालीराम सुबह उठा, स्नान किया और राजगुरु के घर जा पहुँचे।

    राजगुरु ने उसे पहनने के लिए लगभग हज़ार रुपए मूल्य के रेशमी वस्त्र दिए। साथ ही सौ स्वर्ण मुद्राएँ भी दीं। अब बारी आई दाग़ने की रीति पूरी करने की। शंख और लौहचक्र आग में तप रहे थे। राजगुरु और ब्राह्मण मन ही मन मुस्करा रहे थे कि आज आए हो झाँसे में। अब आएगा मज़ा जब लौहचक्र से दाग़े जाओगे।

    जैसे ही शंख और लौहचक्र दाग़े जाने के लिए तैयार हो गए तेनालीराम ने पचास स्वर्ण मुद्राएँ राजगुरु के आगे फेंक दी और यह कहकर भाग खड़ा हुआ, “आधा ही बहुत है। बाक़ी आधा मैंने वापस कर दिया है।” राजगुरु और ब्राह्मण गर्म-गर्म शंख और लौहचक्र लेकर उसके पीछे भागे।

    रास्ते में और भी बहुत-सी भीड़ इकट्ठी हो गई। तेनालीराम भागता हुआ राजा के पास पहुँचा और बोला, “महाराज, इंसाफ़ करें। जब समारोह हो रहा था, तब मुझे अचानक ध्यान आया कि मैं राजगुरु का शिष्य होने योग्य नहीं हूँ क्योंकि में वैदिकी नहीं, नियोगी ब्राह्मण हूँ।

    मान और रेशम के वस्त्र पहनने की रीति पूरी करने की पचास स्वर्ण मुद्राएँ मैंने रख लीं और शेष पचास राजगुरु को लौटा दी हैं, जो उन्होंने मुझे दाग़ने की रीति पूरी करने के लिए दी थीं।” राजगुरु को राजा के सामने मानना पड़ा कि नियोगी ब्राह्मण होने के कारण तेनालीराम उसका शिष्य नहीं बन सकता।

    अब उसने बहाना बनाया कि वह तेनालीराम के नियोगी ब्राह्मण होने की बात तो भूल ही गया था। असली बात वह राजा से कैसे बताता? तेनालीराम की ईमानदारी प्रशंसा के योग्य है। उसे इस ईमानदारी के लिए पुरस्कार मिलना चाहिए। और फिर, तेनालीराम को हज़ार स्वर्ण मुद्राएँ पुरस्कार स्वरूप प्राप्त हुईं और राजगुरु को मुँह की खानी पड़ी।

    स्रोत :
    • पुस्तक : चर्चित एवं लोकप्रिय कहानियाँ “तेनालीराम” (पृष्ठ 139)
    • रचनाकार : तेनालीराम
    • प्रकाशन : प्रशांत बुक डिस्ट्रीब्यूटर
    • संस्करण : 2018

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