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तेनाली की आत्मा

tenali ki aatma

तेनालीराम

तेनालीराम

तेनाली की आत्मा

तेनालीराम

और अधिकतेनालीराम

    एक बार किसी बात से रुष्ट होकर महाराज कृष्णदेव राय ने तेनालीराम को मृत्युदंड दे दिया यह समाचार आग की तरह पूरे नगर में फैल गया। जिस दिन यह समाचार फैला, उसी दिन से तेनालीराम लोगों को दिखाई देने बंद हो गए।

    तभी लोगों की ऐसी धस पेड़ के नीचे की जानी निश्चित हुई, जहाँ अपराधियों को मृत्युदंड दिया जाता था। यह ख़बर तेनालीराम तक भी पहुँच गई। रात होने से पहले ही वह उस बरगद के पेड़ पर जा बैठा। उसने सारे शरीर पर लाल मिट्टी पोत ली और धुएँ की कालिख चेहरे पर पोत ली।

    इस तरह उसने भटकती आत्मा का रूप बना लिया। रात में ब्राह्मणों ने छोटी-छोटी लकड़ियों से आग जलाई और उसके सामने बैठकर उल्टे-सीधे मंत्र पढ़ने लगे। वे जल्दी से जल्दी पूजा का कार्य समाप्त कर घर जाकर बिस्तरों में दुबक जाना चाहते थे।

    जल्दी-जल्दी मंत्र पढ़कर उन्होंने दिखाने के लिए तेनालीराम को पुकारा, “तेनालीराम।” “कहिए, मैं उसकी आत्मा हूँ। एक आवाज़ वहाँ गूँजी और यह आवाज़ शर्तिया तेनालीराम की थी। उसकी आवाज़ सुनते ही ब्राह्मणों की सिट्टी-पिट्टी गुम हो गई। चेहरे पीले पड़ गए। आहूतियाँ देते हाथ काँपने लगे।

    उनमें खुसर-फुसर होने लगी : “भटकती आत्मा ने सचमुच उत्तर दिया है। हमें तो इस बात की आशा बिल्कुल नहीं थी।” असलियत तो यह थी कि वे लोग इस प्रकार की ढोंगबाज़ी करके राजा से कुछ धन ऐंठने के चक्कर में थे। उन्होंने स्वप्न में भी नहीं सोचा था कि तेनालीराम की आत्मा भटक रही होगी।

    उन्हें तो उसके मरने की ख़बर भी एक दूसरे से सुना-सुनी ही मिली थी। मगर अब तेनालीराम की भटकती आत्मा पहली ही पुकार पर सामने थी तो उन्हें सूझा ही नहीं कि उससे क्या बात करें। दरअसल आत्मा आदि से बोलने बतियाने का कोई अनुभव भी उनके पास नहीं था।

    उधर जब तेनालीराम ने देखा कि ब्राह्मणों को कुछ सूझ ही नहीं रहा है, तो एकाएक अजीब-सी गुर्राहट के साथ वह पेड़ से कूदा। ब्राह्मणों ने उसकी भयानक सूरत देखी, तो डर के मारे चीख़ते-चिल्लाते सिर पर पाँव रखकर भाग खड़े हुए। आगे-आगे राजगुरु और पीछे-पीछे दूसरे ब्राह्मण।

    हाँफते-हाँफते वे राजा के पास पहुँचे और उन्हें पूरी बात बताई कि किस प्रकार उनके मंत्र बल से तेनालीराम की आत्मा साक्षात प्रकट हुई। राजा ने उन सबसे जब यह कहानी सुनी तो वह बहुत हँसे : “तुम लोग तो बस बड़ी-बड़ी बातें बनाना ही जानते हो। जिस भटकती आत्मा को शांत करने के लिए तुम्हें भेजा था उसी से डर कर भाग आए।”

    ब्राह्मण सिर झुकाए खड़े रहे। “विचित्र बात तो यह है कि इस भटकती आत्मा ने मुझे दर्शन नहीं दिए। तुम लोगों को ही दिखाई दिया।” राजा ने कहाः “जो हुआ सो हुआ। अब जो इस भटकती आत्मा से मुक्ति दिलवाएगा, उसे एक हज़ार स्वर्ण मुद्राएँ दी जाएँगी।

    राजा की घोषणा के तीन दिन बाद एक ही संन्यासी राजदरबार में उपस्थित हुआ। उसकी दाढ़ी बगुले के पंख की तरह सफ़ेद थी। उसने कहा, महाराज, इस भटकती आत्मा से आपको मैं मुक्ति दिला सकता हूँ। शर्त यह है कि जब आपको संतोष हो जाए कि भटकती आत्मा नहीं रही, तो आपको मुझे मुँहमाँगी वस्तु देनी होगी।

    अगर वह चीज़ हमारे सम्मान और प्रजा के लिए हानिकारक हो तो हमें कोई आपत्ति नहीं।” राजा ने कहा। संन्यासी ने कहा, “बेफिक्र रहें महाराज! मैं ऐसी कोई वस्तु नहीं माँगता, जो आपके सम्मान और प्रजा के लिए हानिकारक हो।

    “ठीक है, आप मुझे इस भटकती आत्मा से तो छुटकारा दिलवाइए ही, साथ ही मुझे ब्रह्म-हत्या के पाप से भी मुक्ति दिलवाइए। वह बेचारा मेरे क्रोध के कारण मारा गया, हालांकि उसका अपराध छोटा-सा ही था।” राजा ने कहा।

    “आप चिंता करें, मेरे उपाय के बाद आपको ऐसा लगेगा, जैसे ब्राह्मण मरा ही नहीं।” संन्यासी बोला : “यदि चाहेंगे तो मैं उसे साक्षात् जीवित अवस्था में आपके सामने उपस्थित कर दूँगा।” “ऐसा हो सके तो और क्या चाहिए।” राजा ने कहा, हालाँकि मुझे विश्वास नहीं हो रहा है कि ऐसा हो सकता है।”

    राजगुरु पास ही बैठा था, बोला, “लेकिन महाराज, कभी मुर्दे भी जीवित हुए हैं? और फिर उस मसखरे को जीवित करने से लाभ ही क्या है? वह फिर अपनी शरारतों पर उतर आएगा और आपसे दुबारा मौत की सजा पाएगा।

    कुछ भी हो, हम यह चमत्कार अवश्य देखना चाहते हैं और फिर हमारे मन पर जो बोझ है, वह भी तो उतर जाएगा। संन्यासी जी आप यह कार्य कब करना चाहेंगे?” राजा ने कहा। अभी और यहीं। संन्यासी ने उत्तर दिया।

    लेकिन भटकती आत्मा यहाँ नहीं, बरगद के उस पेड़ के ऊपर है, महाराज, मुझे तो लगता है कि संन्यासी कोरी बातें ही करना जानता है, इसके बस का कुछ नहीं।” राजगुरु ने राजा से कहा। दरअसल वह संन्यासी की बातें सुनकर डर गया था कि कहीं संन्यासी सचमुच में ही उसे जीवित कर दे।

    “राजगुरु जी, जो मैं कह रहा हूँ वह करके दिखा सकता हूँ। आप ही कहिए यदि मैं उस ब्राह्मण को आपके सामने ही जीवित कर दूँ तो क्या भटकती आत्मा शेष रहेगी?” संन्यासी बोला। “बिल्कुल नहीं।” राजगुरु ने उत्तर दिया। “तो फिर लीजिए देखिए चमत्कार।” संन्यासी ने अपने गेरुए वस्त्र और नक़ली दाढ़ी उतार दी। अपनी सदा की पोशाक में तेनालीराम राजा और राजगुरु के सामने खड़ा था।

    दोनों हैरान थे। उन्हें अपनी आँखों पर विश्वास नहीं हो रहा था। तेनालीराम ने तब राजा को पूरी कहानी सुनाई। उसने राजा को याद दिलाया, “आपने मुझसे मुँहमाँगा इनाम देने का वादा किया है। आप उन अंगरक्षकों को क्षमा कर दीजिए जिन्हें आपने मुझे मारने के लिए भेजा था।

    दरअसल मेरी चालाकी से ही वे मुझे मारने में असफल रहे थे, किंतु मैंने ही उनसे भेष बदलकर कहा कि वे आपके पास जाकर झूठ बोल दें। मैंने ऐसा इसलिए किया महाराज कि मैं जानता था कि बाद में आपको अपने इस फ़ैसले पर अफ़सोस होगा।

    इस धृष्टता के लिए आप मुझे मेरी मुँहमाँगी वस्तु क्षमा दें।” “तुमने बहुत ठीक ही सोचा था तेनालीराम। हमने तुम्हें क्षमा किया और साथ ही तुम्हें दस हज़ार मुद्राओं का पुरस्कार भी देते हैं।” कहकर राजा ने उसे गले से लगा लिया।

    स्रोत :
    • पुस्तक : चर्चित एवं लोकप्रिय कहानियाँ “तेनालीराम” (पृष्ठ 148)
    • रचनाकार : तेनालीराम
    • प्रकाशन : प्रशांत बुक डिस्ट्रीब्यूटर
    • संस्करण : 2018

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