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संदेह

sandeh

तेनालीराम

तेनालीराम

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तेनालीराम

और अधिकतेनालीराम

    यह बात उन दिनों की है जब राजा कृष्णदेव राय उन दिनों, रायचूर, बीजापुर और गुलबर्गा पर आक्रमण करने की तैयारी कर रहे थे। उन्होंने अपने राज्यपालों से कहा कि वे सेना के लिए आदमी और धन इकट्ठा कर भेजें ताकि शत्रु का सिर पूरी तरह कुचल दिया जाए।

    एक पड़ोसी राजा को तो वह हरा ही चुके थे। अब उत्तर के शत्रु राज्यों की बारी थी। उनकी तैयारियाँ सैनिक शक्ति और साधन संपन्नता देखकर बीजापुर का सुल्लान चिंता में पड़ गया। अगर कृष्णदेव राय ने हमला कर दिया, तो सल्लनत बचाना नामुमकिन होगा।

    उसने एक मुसलमान जासूस को ब्राह्मण के भेष में विजयनगर भेजा ताकि वह राजा का विश्वास प्राप्त करे और सही मौक़ा हाथ आते ही राजा को क़त्ल कर डाले। सुलतान ने सोचा कि अगर राजा को मार दिया गया तो पहली बात तो हमले का ख़तरा टल जाएगा, दूसरे उसके मरने से राज्य में जो आपाधापी मचेगी, उसका लाभ उठाकर विजयनगर पर धावा बोलकर उसे जीता जा सकता है।

    इस प्रकार एक तीर से दो शिकार हो जाएँगे। जासूस बड़ा घाघ था। वह पहले एक हिंदू राजा की गुप्तचर संस्था में कार्यरत था, इसलिए उसकी हिंदी, संस्कृत आदि पर पूरी तरह पकड़ थी। वह ब्राह्मणों के ढेरों कर्मकांड भी जानता था।

    जासूस तमिल ब्राह्मण का भेष बनाकर विजयनगर के दरबार में पहुँचा। वहाँ वह शुद्ध संस्कृत बोलता, वेदों का पाठ करता, शास्त्रों पुराणों और नाटकों के अंश सुनाया करता। राजा कृष्णदेव राय विद्वानों का आदर तो करते ही थे।

    अतः शीघ्र ही नकली ब्राह्मण ने दरबार में एक विशेष स्थान बना लिया। उसे दिन या रात किसी भी समय राजा के महल में जाने की इजाज़त भी मिल गई। शुरू में तो वह सावधान रहा, लेकिन धीरे-धीरे उसने अपनी पहुँचे महल के अंदरुनी कक्षों तक भी बना ली।

    वह ऐसे स्थान की तलाश में था, जहाँ मौक़ा पाकर वह राजा पर वार कर सके। एक समस्या यह भी थी कि राजा जहाँ भी आता-जाता, कुछ लोग हमेशा उसके साथ रहते थे। ऐसे मौक़े पर पकड़ लिए जाने का ख़तरा था। तेनालीराम हर वक़्त राजा के साथ रहता था, इसलिए जासूस को उससे बड़ी चिढ़ थी।

    तेनालीराम को भी वह अच्छा नहीं लगता था। उसे शक हो गया था कि हो हो, यह ब्राह्मण किसी शत्रु का जासूस है। बस, जिस क्षण से तेनाली को उस पर शक हुआ, उसी क्षण से वह उसे बेनक़ाब करने की कोशिशों में लग गया।

    एक दिन अचानक तेनालीराम ने राजा के सामने ही जासूस से पूछ लिया, “तुम्हारा वेद और गौत्र कौन सा है?” जासूस ने उसका बिल्कुल ठीक उत्तर दिया जिसमें शक की कोई गुंजाइश नहीं थी। ब्राह्मण जासूस के जाने के बाद राजा ने तेनालीराम से पूछा, “तुमने उससे यह प्रश्न क्यों किया?”

    “महाराज, मुझे शक है कि यह आदमी जासूस है। इस पर भरोसा करने से पहले इसे परख लेना चाहिए। ग़लत आदमी पर की गई कृपा बहुत नुक़सान पहुँचाती है। क्या कहते हो तेनालीराम? क्या अब भी तुम्हारा शक दूर हुआ?

    महाराज! आप ज़रा इस विषय पर सोचें, दिखावे और स्वभाविकता में बहुत अंतर है। यह दिखावा कुछ ज्यादा ही कर रहा है। शुद्ध संस्कृत बोलने का प्रयत्न। पूजा-पाठ का दिखावा वहीं करेगा, जिसने सिद्ध करना हो कि वह कर्मकांडी है।

    “तुम्हारी बात में कुछ दम तो है, पर मुझे यक़ीन नहीं होता। वैसे तो वह अबोला कर ही क्या सकता है।” “आपकी हत्या।” “मगर मुझे अकेले को मारकर उसे क्या मिलेगा? मेरे मरने पर भी मेरे लाखों सिपाही तो जीवित रहेंगे। राजा ने कहा।

    “एक शेर लाखों भेड़ों से अधिक ताक़तवर होता है और फिर आपके होने से सेना में फूट पड़ जाएगी। इससे शत्रु को हमें कुचलने का अवसर मिल जाएगा। अगर महाराज आज्ञा दें तो मैं सिद्ध कर सकता हूँ कि यह आदमी शत्रु का जासूस है। तेनालीराम ने कहा।

    महाराज कृष्णदेव राय ने एक क्षण कुछ सोचा, फिर बोले : “ठीक है, सिद्ध करो। लेकिन तुम जो भी करना चाहते हो, तुम्हें मेरे सामने करना पड़ेगा। जब तक उसका अपराध सिद्ध हो जाए उस पर आच नहीं आनी चाहिए।

    उस रात जब ब्राह्मण बना जासूस अपने कमरे में सो रहा था, तब तेनालीराम राजा कृष्णदेव राय के साथ वहाँ पहुँचा और ठंडे पानी की बाल्टी उस पर उड़ेल दी। जासूस एकाएक चिल्लाता हुआ उठ बैठा : “या अल्लाह! या अल्लाह!

    तभी उसकी नज़र तेनालीराम पर पड़ी और क्रोध में आकर उसने अपनी तलवार निकाल ली, मगर इससे पहले कि वह वार कर पाता, राजा कृष्णदेव राय ने तलवार से उसका सिर धड़ से अलग कर दिया। इस तरह तेनालीराम ने अपनी समझदारी सूझबूझ से महाराजा कृष्णदेव राय की जान बचा ली।

    स्रोत :
    • पुस्तक : चर्चित एवं लोकप्रिय कहानियाँ “तेनालीराम” (पृष्ठ 151)
    • रचनाकार : तेनालीराम
    • प्रकाशन : प्रशांत बुक डिस्ट्रीब्यूटर
    • संस्करण : 2018

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