Font by Mehr Nastaliq Web

परीक्षा

pariksha

तेनालीराम

तेनालीराम

परीक्षा

तेनालीराम

और अधिकतेनालीराम

    मुग़ल बादशाह ने अपने दरबारियों से तेनालीराम की बहुत प्रशंसा सुनी थी। एक दरबारी ने कहा, आलमपनाह, सुनने में आया है कि तेनालीराम की हाजिर-जवाबी और अक्लमंदी बेमिसाल है।

    बादशाह इस बात की सत्यता परखना चाहता था। उसने राजा कृष्णदेव राय को एक मित्रतापूर्ण पत्र भेजा, जिसमें उसने निवेदन किया कि तेनालीराम को एक मास के लिए दिल्ली भेज दिया जाए जिससे उसकी सूझबूझ का इस्तिहान लिया जा सके।

    कृष्णदेव राय ने तेनालीराम को विदा करते समय कहा, “तेनालीराम! तुम्हारी सूझबूझ और बुद्धिमानी की परीक्षा का समय गया है। जाओ और अपना कमाल दिखाओ। अगर तुम पुरस्कार ले आए तो हम भी तुम्हें एक हजार स्वर्ण मुद्राएँ देंगे और अगर तुम पुरस्कार प्राप्त कर सके तो इसके लिए तुम्हें दंड मिलेगा, क्योंकि तुम्हारी हार हम अपनी हार मानेंगे।”

    तेनालीराम के दिल्ली पहुँचेने की सूचना जब बादशाह को मिली तो उसने अपने दरबारियों से कहा, हम इस आदमी का इम्तिहान लेना चाहते हैं। मेरी ताकीद है कि आप लोग इसके कारनामों पर तो हँसे और वाह-वाह करें। यह आदमी यहाँ से आसानी से इनाम हासिल करके ले जाने पाए।

    दरबार में पहुँचेकर तेनालीराम ने अपनी बातों से बादशाह और दरबारियों पर प्रभाव ज़माने की चेष्टा की, किंतु असफल रहे। उनकी बातें सुनकर हँसना तो दूर किसी ने वाह-वाह भी नहीं की। यह क्रम पंद्रह दिन तक चलता रहा, लेकिन कोई लाभ हुआ।

    अब तेनालीराम समझ गए कि दाल में कुछ काला है। सोलहवें दिन से तेनालीराम ने दरबार जाना छोड़ दिया। एक दिन बादशाह रोज की तरह सैर को निकला। उसके साथ एक सेवक भी था, जिसके हाथों में अशर्फ़ियों की थैलियाँ थीं।

    बादशाह ने देखा कि सड़क के किनारे एक बेहद बूढ़ा व्यक्ति गड्ढा खोदकर उसमें आम का पौधा लगा रहा था। उस व्यक्ति की कमर झुकी हुई थी। सिर के वाल ही नहीं भवें तक सफ़ेद थीं जो उसकी बड़ी उस की जली कर रही थीं।

    बादशाह ने उसके पास जाकर कहा, “बूढ़े मियाँ, यह क्या कर रहे हो?” “आम का पेड़ लगा रहा हूँ। समय आने पर फल लगेंगे।” “लेकिन आप तो उम्र दराज़ हैं, इस पेड़ के फल खाने के लिए आप तो शायद ही रहें, फिर इतनी मेहनत से क्या फ़ायदा?

    “आलमपनाह, मेरे अब्बाजान ने जो पेड़ लगाए थे। उनके फल मुझे खाने को मिले। इसी तरह मेरे लगाए हुए पेड़ के फल कोई और खाएगा। जब अब्बाजान ने मेरे लिए पेड़ लगाए तो मैं आने वाली पीढ़ियों के लिए ऐसा क्यों करूँ? बूढ़ा बोला।

    “हमें आपकी बात पसंद आई।” बादशाह ख़ुश होकर बोला। बादशाह के कहते ही नौकर ने सौ अशर्फ़ियों की एक थैली बूढ़े को दे दी। “बादशाह सलामत बहुत मेहरबान हैं। बूढ़े ने कहा, “सब लोग पेड़ के बड़े हो जाने पर उसके फल पाते हैं। मुझे पौधा लगाने से ही फल प्राप्त हो गया। दूसरों की भलाई का विचार करने भर का ही नतीजा कितना अच्छा है!

    “बहुत ख़ूब!” कहकर बादशाह ने फिर सेवक की ओर देखा। सेवक ने एक और थैली बूढ़े को थमा दी। बूढ़ा फिर बोला, “बादशाह सलामत की मुझ पर बहुत मेहरबानी है। यह पेड़ तो जब पूरा जवान हो जाएगा तो एक साल में एक बार फल देगा, लेकिन जहांपनाह ने तो इसे लगाने के दिन ही दो बार मेरी झोली भर दी।

    हमें यह बात भी बेहद पसंद आई।” बादशाह ने कहा। नौकर ने फिर एक थैली बूढ़े को दे दी। बादशाह ने हँसते हुए अपने नौकर से कहा, “यहाँ से निकल चलो, नहीं तो यह आदमी ऐसी लच्छेदार बातें करके हमारा ख़ज़ाना ही खाली कर देगा।

    एक पल इंतज़ार कीजिए जहांपनाह।” कहकर बूढ़े ने अपने ऊपर के कपड़े और नक़ली दाढ़ी मूँछें उतार दीं। बादशाह चौंका। देखा, सामने तेनालीराम खड़ा था। “बादशाह सलामत बहुत दरियादिल हैं। तेनालीराम ने कुछ ही देर में जहांपनाह से तीन बार ईनाम हासिल किया है।” तेनालीराम ने मुस्कुराकर कहा।

    बादशाह ने कहा, “तेनालीराम। तुम्हारी जैसी प्रसिद्धि हमने सुनी थी, तुम्हें वैसे ही पाया। तुमने सिद्ध कर दिया कि जो इनामो-इकराम तुमने आज तक हासिल किया है, तुम उसके सच्चे अधिकारी थे।” तेनालीराम वापस विजयनगर आया और राजा कृष्णदेव राय को सारी कहानी सुनाई तो राजा ने प्रसन्न होकर उसे एक हज़ार स्वर्ण मुद्राएँ और पुरस्कार में दीं।

    स्रोत :
    • पुस्तक : चर्चित एवं लोकप्रिय कहानियाँ “तेनालीराम” (पृष्ठ 125)
    • रचनाकार : तेनालीराम
    • प्रकाशन : प्रशांत बुक डिस्ट्रीब्यूटर
    • संस्करण : 2018

    Additional information available

    Click on the INTERESTING button to view additional information associated with this sher.

    OKAY

    About this sher

    Close

    rare Unpublished content

    This ghazal contains ashaar not published in the public domain. These are marked by a red line on the left.

    OKAY