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नीलम देश की राजकन्या

nilam deshki rajkanya

जैनेंद्र कुमार

जैनेंद्र कुमार

नीलम देश की राजकन्या

जैनेंद्र कुमार

और अधिकजैनेंद्र कुमार

    वह सात समुंदर पार जो नीलमका द्वीप है, वहीं की कहानी है।

    वहाँ की राजकन्या को एकाएक किन्नरी-बालाओं का हास-कौतुक जाने क्यों फीका लगने लगा है। आमोद के साधन सभी हैं। अनेकानेक स्वर्ग की अप्सराएँ सेवा में रहती हैं, अनेकानेक गंधर्व-बालाएँ और किन्नरी तरुणियाँ। महल हैं तीन। एक पुखराज का है, दूसरा पन्ने का और तीसरा हीरे का। अप्सराएँ उनमें ऐसे डोलती हैं जैसे फुलवारी और उनसे उज्ज्वल हँसी की फुहार फूटकर पराग-सी चहुँ ओर बिखरी रहती है। और उसके आसपास सभी कहीं दुलार और अभ्यर्थना है। पर राजकन्या का जी जाने कैसा रहने लगा है।

    बड़े बड़े प्रासादों के आँगनों और कोष्ठों में जा-जाकर राजकन्या अपने को बहलाती फिरती है। पर सब तरुणी संगिनियों के बीच में घिरी रहकर भी जाने कैसा उसे सूना-सूना लगता है।

    कहती है—“तुम जाओ। मुझे तो तुमने बहुत आनंदित कर दिया है। मैं उतने के योग्य नहीं हूँ। बस, तुम्हारे हाथ जोड़ती हूँ, मुझे अब अकेला छोड़ दो।”

    किन्नरियाँ सुनकर खिलखिलाकर हँस पड़ती हैं, कोई वेणी में फूल खोंस देती है, कोई राज-कन्या की देह पर पराग बखेर देती है। कहती हैं—“सखि! हमको दुत्कारो मत। राजकुमार आएँगे तब-हम अपने आप चली जाएँगी।” यह कहकर वे फिर खिलखिलाकर हँस पड़ती हैं।

    राजकन्या कहती है—“कैसे राजकुमार! कौन राजकुमार! तुम मेरी बैरिन क्यों बनी हो?”

    इसपर वे किन्नरी बालाएँ और भी खिलखिल हँसती हुई कहती हैं—“कोई राजकुमार तो आते ही होंगे। नहीं तो हमने क्या बिगाड़ा है कि हमें झिड़कती हो? पर सखिजी, यह नीलम का द्वीप है। बीच में समुंदर सात हैं, तब धरती आती है। यहाँ तक तो कोई भी राजकुमार नहीं सकते हैं। यहाँ का नियम यही है।”

    राजकन्या यह सुनकर वहाँ से चल देती है। कुछ नहीं बोलती, नहीं ही बोलती। अप्सरा- किन्नरियों की खिलखिलाहट भी उसके पीछे चलती है। तब राजकन्या हठात् सोचती है, सब झूठ है। पर सब झूठ है?...

    ...तो यह भीतर प्रतीक्षा कैसी है? अभिषेक नहीं होना है तो रस इकट्ठा होकर मन को उभार की पीड़ा क्यों दे रहा है? जब किसी को भी आना नहीं है तो भीतर प्रतिक्षण यह निमंत्रण किसका ध्वनित हो रहा है? क्या किसी का भी नहीं? आँगन पुष्पित प्रतीक्षमाण है, रोज़-रोज़ प्रातःसायं मैं उसे धो देती हूँ, आसन बिछा देती हूँ। क्या उस आँगन पर चलकर आसन पर अधिकार जमाने वाला सचमुच वह 'कोई' नहीं आनेवाला है? तब आँगन आप ही आप पुष्पित क्यों हो उठता है? आएगा ही यदि कोई नहीं अपने पग-चाप से उसे कँपाता हुआ—अपने निक्षेप से उस कंपन को मिटाता हुआ, तो क्यों मैं उस अपने वक्ष को रोज़-रोज़ आँसुओं से धोया करती हूँ? क्यों है यह? क्या सब व्यर्थ? सब झूठ? किंतु नहीं है व्यर्थ। नहीं है झूठ। किसी क्षण भी कंटकित हो उठनेवाली मेरी पुष्पित देह मेरी प्रतीक्षा की साक्षी है। और वह मेरी प्रतीक्षा ऐसी सत्य है कि मैं कुछ भी और नहीं जानती। इस ओर यह सत्य है, तब उधर प्रति-सत्य भी है। वह है कैसे नहीं जो आएगा, देखेगा और जिसके दृष्टि-स्पर्श से ही मैं जान लूँगी कि मैं नहीं हूँ, मैं कभी नहीं थी—सदा वही था, वही है और मैं उसी में हूँ। जो आएगा और मेरे सब कुछ को कुचल देगा। कहेगा, “अब तक तू भूल थी। अब मेरी होकर तू सच हो। तू यह अलग कौन है? तू मुझमें हो।” ऐसा जो है वह है, वह है। मेरा अणु-अणु कहता है कि वह है। वही है, मैं नहीं हूँ।

    प्रासाद अप्सराओं और किन्नरी-कन्याओं से उद्यान बना रहता है...हरियाला, रंगीन और जगमग। राजकन्या की प्रसाधना-सेवा ही उन सेविकाओं का काम है। और वे ऐसी हैं, कि निष्णात। उनकी विनोद-लीलाओं का पार नहीं। राजकन्या के चारों ओर पुष्पहार के समान वे ऐसी इथी गुथीं रहती हैं कि अवकाश कहीं से भी संधि पाकर राजकन्या के पास नहीं सके। क्या पता, उस अवकाश-संधि में से फिर कोई प्रश्न, कोई अभाव, कोई अवसाद ही झाँकने लग जाए?

    पर एक अभाव तो झाँकने लगा ही। बाहर से नहीं, वह तो भीतर से ही झाँक उठा। राजकन्या कुछ चाहने लगी—कुछ वह कि जाने क्या! किन्नरी-कन्याएँ यह देख सोच में पड़ गई। उनसे क्या असावधानी हुई? क्या उन्होंने राज कन्या के मन को कभी एक छन को भी अवकाश दिया है? अपने प्रभु वैभवशाली इंद्र की आज्ञा पर जो राजकन्या की सेवा नियोजित हैं, सो क्या उन्होंने अपने कर्तव्य में तनिक भी त्रुटि की है? फिर यह राजकन्या में कैसे लक्षण दीखने लगे हैं? और वे किन्नरी-बालाएँ अत्यधिक तत्परता से राजकन्या के जी-बहलाव में लग पड़ीं।

    बोलीं—“आओ राजकन्या, खेलें।”

    राजकन्या ने फीकी मुस्कुराहट से कहा—“खेलोगी? अच्छा खेलो।”

    किन्नरियाँ बोलीं—“राजकन्या, तुम यह कैसे बोलती हो? पहले हमसे ऐसे पराए भाव से नहीं बोलती थीं। तुम्हारा मन कैसा हो गया है? हमसे उदास क्यों रहती हो?”

    राजकन्या ने कहा—“नहीं-नहीं, सखियो, मैं कहती तो हूँ, आओ खेलें।

    किन्नरियों ने विषण्ण भावसे कहा—“राजकन्या, हम जानती हैं कि तुम्हारा चित्त हमसे उदास है। हमसे ऐसी क्या भूल हुई है?”

    राजकन्या उन सबके गले मिल—मिलकर कहने लगी—नहीं नहीं सखियो, ऐसी बात मत कहो। हम सब बचपन की संगिनी हैं। तुम्हारे बिना मैं क्या हूँ? चित्त कभी उदास हो जाता है, सो जाने क्यों? पर मैं तुम लोगों से अलग नहीं हूँ, तुम्हारी हूँ।

    किन्नरियों ने कहा—तुम अब हमारी नहीं रह गई हो राजकन्या, तुम अकेली होती जा रही हो।

    “अकेली! अकेलापन तो हाँ, मुझे कुछ-कुछ लगता है। मैं क्या करूँ? पर अब मैं ऐसी नहीं रहूँगी। अकेलापन मुझसे सहा नहीं जाता।”

    किन्नरियों ने कहा कि राजकन्या, अब हमारा खेलने का अंत गया दीखता है। जैसा भाग्य। किंतु राजकन्या, दोष तो हमारा कोई नहीं है।

    इस पर राजकन्या ने सबको एक-एक कर अपनी छाती से लगाकर कहा—“नहीं-नहीं सखियो, मैं ख़ूब खेलूँगी, ख़ूब खेलूँगी। कभी-कभी चित्त मेरा बुरा हो आता है। तब तुम यह मत समझो, मुझे क्लेश नहीं होता। मन पर उस वक़्त बड़ा बोझ रहता है। पर अब मैं खुलकर ख़ूब खेला करूँगी। सच, ख़ूब खेला करूँगी।”

    अरी-अरी राजकन्या, तू कैसी बात करती है? तू ख़ूब-ख़ूब खेला करेगी, तू? भली खेलेगी तू! तेरे भीतर इस पुष्पित आँगन के किनारे से लगा जो आसन बिछा है, और जो वहाँ एक की बाट जोही जा रही है, वह क्या झूठ है? तू जानती है वही तेरा सच है। फिर क्या तू खेल में उसे पूरी तरह बिखेर देकर निबट रहना चाहती है? पगली, यह चाहती है तो करके देख। पर...

    और राजकन्या क्या सचमुच ख़ूब-ख़ूब खेलती रह सकी? पर खिलौनों से कब तक कोई अपने को बहला सकता है?

    ***

    अगले दिन कहाँ गईं वे किन्नरियाँ! कहाँ गईं वे अप्सराएँ! कहाँ गईं गंधर्व-बालाएँ? पुखराज के उस बड़े-बड़े महल के बड़े-बड़े आँगनों और कोष्ठों में राजकन्या भाग-भाग कर देख आई—कहाँ गईं वे सब सखियाँ? कहाँ गई वे मन की परियाँ! कहीं भी तो कोई नहीं दीखता। क्या वे सपना थीं? माया थीं? पन्नों का महल वह देख आई, हीरे का भी देख आई। कहीं कोई नहीं, कहीं कोई नहीं। यहाँ से वहाँ, वहाँ से यहाँ, भटककर उसने देखा—कहीं कोई नहीं, कहीं कोई नहीं। फूल हैं तो फीके हैं। पराग है तो बिखरा है। जो है, सूना है।

    “अयि, तुम कहाँ गई हो सखियो? मुझे छोड़ तुम कहाँ गई?” दूर-पास उसका प्रश्न टकराने लगा, “तुम सच्ची नहीं थीं क्या सखियो? फिर मुझे छोड़ क्यों गई?” और वह उस टकराहट के जवाब में भीतर मानो ध्वनित-प्रतिध्वनित होता हुआ संबोधन भी सुनने लगी, “ओ राजकन्या, तुम अकेली कब नहीं थीं जो अब अकेली रहो? हमसे तुम जब तक बहली, तब तक हम थीं। तुमने अपना अकेलापन सँभाला और हम जिस लायक़ थीं उस लायक़ रह गई। राजकन्या, तुम्हारा अकेलापन तुम्हारा है। इसे वही लेगा जो इसके लिए है।”

    राजकन्या कहना चाहने लगी, “नहीं-नहीं-नहीं, अब मैं अकेली नहीं रहूँगी, तुम सब जाओ। मैं बस अब खेलती रहूँगी, खेलती रहूँगी।”

    पर अपने ही उत्तर में वह सुनने लगी “यह झूठ है, राजकन्या! तू वह नहीं है। तू खेल नहीं है। तू उनसे अकेली है, यद्यपि अंत तक अकेलापन छल है।”

    ***

    पल बीते, दिन बीते, मास बीते। राजकन्या पुखराज और पन्ने और हीरे के अपने महलों के बड़े-बड़े आँगन और कोठों में घूम-घूमकर परखने लगी कि वह एक है, अकेली है। कहीं कोई नहीं है, कहीं कोई नहीं है। महल हैं जो जितने बड़े हैं उतने ही वीरान हैं। हवा उनमें से साँय- साँय करती हुई निकल जाती है। समुंदर का जल सीढ़ियों पर पछाड़ खाता रहता है। पक्षी आकर ऊपर ही ऊपर उड़ जाते हैं। बादल जहाँ-तहाँ भागते रहते हैं। आसमान गुंबद-सा नीला-नीला निर्विकार खड़ा रहता है। और राज-कन्या पाती है, उसका कोई नहीं है, कोई नहीं। वह अपनी ही है।...लेकिन क्या वह अपनी ही है?

    बीतते पलों के बीच काल स्थिरता से देख रहा है। राज-कन्या के मन के भीतर निमंत्रण अहर्निशि झंकार दे रहा है, यद्यपि बाहर सब मौन है। वह मंत्र की निरंतर जागृत ध्वनि ही उसका सहारा है, नहीं तो एकदम सब शून्य है, सब व्यर्थ है। उसके भीतर जो प्रतीक्षा है, वही है सब निस्सारता के बीच सार सत्य। जब प्रतीक्षा है सत्य, तो वह असत्य कैसा जिसकी प्रतीक्षा हो? जब प्रतीक्षा में कर रही हूँ तो प्रतीक्षा को समाप्त कर देने या उसे असमाप्त रखनेवाला भी है। वह नहीं है, तो मैं ही नहीं हूँ।—पर मेरे भीतर की झंकार तो है ही, तब उसको धारण करनेवाली मैं भी हूँ। और तब उसको ध्वनित करनेवाला वह भी है और है।

    पर मास बीते, वर्ष बीते, शताब्दियाँ बीती, युग बीते। महल के बड़े-बड़े आँगन-प्रकोष्ठों में खड़े हुए स्तंभ, ऊपर की छतें, सामने की दीवार और चारों ओर का शून्य गुँजा-गुँजा कर कहता है—कोई नहीं है, कोई नहीं है। अरी राजकन्या, बस काल है जो बीतने का नाम है। काल है जो मौत का भी नाम है। अरी राजकन्या, बस कहीं और कुछ नहीं है।”

    पर राजकन्या के भीतर तो अहरह एक मंत्रोंच्चार की ध्वनि हो रही है, उसे इंकार करे तो कैसे? नहीं कर सकती, नहीं कर सकती। इसमें काल को चुनौती मिलती है तो भी क्या। “वह है, वह है। नहीं तो मैं किसके लिए हूँ? अपनी प्रतीक्षा के लिए मैं हूँ और मेरी प्रतीक्षा उसके लिए है।”

    हवा सन-सन करके उसके कानों मे से भाग जाती है। समुंदर का हाहाकार चेतना को दबोच लेना चाहता है। काल आकर उसके सब कुछ को मानो रौंदता हुआ उसके ऊपर से जाकर भी नहीं जाता, वह भागता हुआ भी उसके ऊपर डटा खड़ा है।

    राजकन्या को लगता है, मानो एक अट्टहास कह रहा हो कि “ओ राजकन्या, देख, चारों ओर सब खोखला है कि नहीं? अरी ओ, कुछ नहीं है, कुछ नहीं है। तेरे मन के भीतर का राग एक रोग है। मत बीत और मत अपने को बिता। राजकन्या, कहीं कोई नहीं है, कहीं कोई नहीं है। धरती दूर है, बीच में समुंदर सात हैं, और आने वाला राजपुत्र कहीं कोई नहीं है, कोई नहीं है। कह तो एक बार कि 'कोई नहीं है।' फिर देख कि रे सब किन्नरियाँ पलक मारते में तेरे पास आती हैं या नहीं। वह सब मेरी बाँदियाँ हैं।”

    राजकन्या पुकारना चाहती है कि “ओ! मेरी सखियों को मुझे दे दो। पर जिसके लिए मैं हूँ, वह तो है, वह है। नहीं तो मैं नहीं हूँ।”

    उसकी इस बात पर मानो अट्टहास और भी सहस्र-गुणित होकर उसके चारों ओर व्याप जाता है, मानो उसे लील लेना चाहता हो।

    तब राजकन्या आँख मूँद कर, कान मूँद कर, प्राणपण से भीतर ही कह उठती है, “तू है। नहीं आया है तो भी तू ही रहा है। तू आने के लिए ही नहीं आया है। इस तेरी ठगाई में आकर मैं प्रातःसंध्या तेरे आँगन को धोने में चूक करनेवाली नहीं हूँ, छलिया! जो नहीं जाने वह नहीं जाने। पर क्या यह हँसनेवाला काल बली भी नहीं जानता है? पर मैं जानती हूँ। सुन, सुन, मैं और मेरी प्रतीक्षा, हम दोनों तुझसे टूटने के लिए ही टिके हैं। नहीं तो हम होते ही क्यों? तू आएगा, और मैं टूट कर कृतार्थ हूँगी!”

    चारों ओर होता हुआ अट्टहास चीत्कार का रूप धर उठा। मानो सहस्रों कंकाल दाँत किटकिटाकर विकट रूप से गर्जन कर रहे हों। हवा प्रचंड हो उठी। समुद्र दुर्दांत रूप से महल पर फन पटक पटक-कर फूंकार करने लगा। जान पड़ा, सब ध्वंस हो जाएगा।

    इस आतंगकारी प्रकृति के रूप के नीचे राजकन्या भय से काँप-काँप गई। पर वह जपती रही, “तू है। तू है।”

    थोड़ी देर में किसी ने उसके भीतर ही जैसे हँसकर कहा, “आई बड़ी राजकन्या! पगली, ढिट्-ढिट्!! मैं कहाँ अलग हूँ? अरे कहीं मेरे सिवा कुछ है भी जो डरती है? कह क्यों नहीं देती कि मैं नहीं हूँ? क्योंकि मैं तो तेरे ‘नहीं’ में भी रहूँगा। सुना? अब आँख खोल और हँस।”

    उस समय राजकन्या ने दोनों हाथों से पूरे ज़ोर से अपने वक्ष को दबा लिया। उसके सारे गात में पुलक हो आया। वह यह सब कैसे सहे? कैसे सहे? उसके मुँह से हर्ष की एक चीख़ निकली। मानो वह पागल हो गई है।

    क्षण-भर बाद उसने आँख खोली। देखती है,—सब ओर बसंत है और महल के द्वार से किन्नरी बालाएँ भाँति-भाँति के उपहार लिए बढ़ती चली रही हैं।

    पास आने पर राजकन्या ने जाने कैसी मुस्कान से कहा—“तुम गई? यह क्या-क्या लिए रही हो?”

    किनरी बालाओं ने कहा—“उपहार है। ये राजपुत्र की इच्छानुसार हमें लाने को कहा गया है।”

    “राजपुत्र! कैसे राजपुत्र?”

    “अभी हमारे आगे-आगे उनकी सवारी रही थी, राजकन्या! सचमुच अब वह कहाँ गए?”

    राजकन्या ने मुस्कुराकर कहा—“कौन राजपुत्र जी? एक तो आए थे, उनको मैंने क़ैद में डाल लिया है। अब वह उपद्रव नहीं करेंगे। हमारे द्वीप में उनका क्या काम, क्यों सखियो?”

    इसके बाद राजकन्या उठकर अपनी किन्नरी सखियों के साथ एक-एक से गले मिली। अनंतर वह हर प्रकार की क्रीड़ा में मग्न भाव से भाग लेने लगी, और फिर अवसाद उसके पास नहीं आया।

    स्रोत :
    • पुस्तक : जैनेन्द्र : प्रतिनिधि कहानियाँ (पृष्ठ 132)
    • संपादक : शिवनंदन प्रसाद
    • रचनाकार : जैनेंद्र कुमार
    • प्रकाशन : पूर्वोदय प्रकाशन
    • संस्करण : 1967

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