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मेंढक

menDhak

गम्भीर सिंह पालनी

और अधिकगम्भीर सिंह पालनी

    हम लड़कों ने मेंढक से सबसे पहला जो पाठ सीखा, वह था लंबी-लंबी छलाँगें लगाते हुए लोगों की पकड़ से दूर भागना। घरवालों की पकड़ में हम तभी पाते जब हम लोग या तो थक चुके होते या मेंढक बिरादरी के कई सदस्यों को नमक के घोल से भरे टिन के डिब्बे में बंद किए लौटते।

    गाँव के बीचोबीच स्थित पानी का जो बोरिंग अब सूख गया है, वह पहले चौबीसों घंटे स्वतः चलता रहता था। उसके आसपास नालियों में अक्सर बहुत-से मेंढक जमा रहते और हम कई लड़के (झुंड बनाए हुए) मेंढकों के झुंडों पर शिकारियों की तरह धावा बोल देते।

    उन दिनों हम लोगों को मेंढक के अलावा कुछ भी सूझता था। सुबह, दुपहर, शाम और रात हर समय हम मेंढक के बारे में ही सोचते रहते। यहाँ तक कि मेंढक हम लोगों के सपनों में भी आते।

    सपनों में तो मेंढक तभी से आने लगते थे जब लड़के आठवीं क्लास में पढ़ रहे होते और हाई स्कूल या इंटरमीडिएट के लड़कों को मेंढक पकड़ते हुए देख-देखकर सोचते कि हम लोग कब आठवीं पास करके नवीं कक्षा में पहुँचें और झा कॉलेज में बायलॉजी वर्ग में एडमिशन लें।

    उन दिनों झा कॉलेज ही दूर-दूर तक एकमात्र ऐसा इंटरमीडिएट कॉलेज था, जिसमें साइंस ग्रुप की पढ़ाई होती थी। हर माँ-बाप की यही ख़्वाहिश होती थी कि उनका बेटा झा कॉलज में पढ़े और वो भी बायलॉजी वर्ग में। जिन लोगों के बच्चे झा कॉलेज में पढ़ रहे होते, वे रिश्तेदारी और समाज में यह बात बताते हुए बड़ा फ़ख़्र महसूस करते।

    बच्चा अभी गाँव की पाठशाला में पाँचवीं कक्षा में ही पढ़ रहा होता कि टीका सिंह मास्साब कहते, 'पढ़ाई ठीक से करो, समझे! वरना झा कॉलेज की छठी कक्षा की प्रवेश परीक्षा में नहीं निकल पाओगे। फिर सड़ोगे जनता कॉलेज में, जहाँ आठवीं के बाद आर्ट साइड की पढ़ाई के अलावा कुछ भी नहीं है।...और जनता कॉलेज से आठवीं किए हुए लड़कों को झा कॉलेज में नवीं में साइंस साइड में एडमिशन मिल पाता। दो-चार सीटें यदि बची हों तब उन लड़कों को एडमिशन देते हैं, जिनके नंबर बहुत अच्छे हों जबकि झा कॉलेज से ही आठवीं पास किए हुए लड़कों को बड़ी आसानी से साइंस साइड में एडमिशन मिल जाता है।'

    घरों में अक्सर यही चर्चा बड़ों-बुज़ुर्गों में होती—'साइंस का ज़माना है। बच्चों को साइंस साइड दिलवाएँगे।'

    साइंस से उनका मतलब मेंढक की चीर-फाड़ करने वाली पढ़ाई से होता था। यदि कोई उन्हें बतला भी देता कि साइंस से मतलब केवल मेंढक चीरने से नहीं है, तब भी शायद वे इस बात का विश्वास नहीं करते। संतोष पंत ने हाई स्कूल के बाद भौतिकी रसायन विषय गणित के साथ लिए थे, लेकिन गाँव के लोग इस बात को सच ही नहीं मानते थे कि वह साइंस का छात्र है चूँकि उसे उन्होंने कभी भी मेंढकों के पीछे भागते नहीं देखा था। लोगों में यह बात प्रचलित हो गई थी कि चूँकि मेंढक वाली पढ़ाई कठिन थी, संतोष से नहीं चली, इसलिए उसने दूसरी साइड पकड़ ली। जबकि वस्तुस्थिति यह थी कि संतोष पंत वाले सेक्शन में एडमिशन होना भी बहुत मुश्किल होता था।

    लोग संतोष की पढ़ाई को कैलाश की पढ़ाई जैसी ही समझते थे जो कि जनता कॉलेज में आर्ट ग्रुप का छात्र था। लोग कहते—हिंदी-फिंदी, इंगलिश-फिंगलिश, इतिहास, भूगोल वग़ैरह भी भला कोई विषय हैं, लड़कों के पढ़ने के! इन्हें तो लड़कियाँ पढ़ती हैं और अब तो लड़कियों में भी होड़ लगी रहती है कि झा कॉलेज में एडमिशन हो ताकि साइंस लेकर मेंढक की चीर-फाड़ करना सीख सकें।

    यद्यपि लड़कियाँ मेंढक पकड़ने से डरती थीं लेकिन उनकी समस्या बड़ी आसानी से हल हो जाया करती। चूँकि उन्हें प्रभावित करने हेतु मजनूँ टाइप के लड़के जो-जो हथकंडे अपनाना ज़रूरी समझते थे, उनमें से एक यह भी था कि लड़कियों को प्रयोगशाला में चीरे जाने हेतु मेंढक पकड़कर उपलब्ध कराए जाएँ और यदि कॉलेज कैंपस में ही कोई मेंढक कूदता-फाँदता दिख जाता तो स्वयं को रोमियो साबित करने के लिए लड़कों में प्रतिस्पर्धा शुरू हो जाती कि कौन मेंढक के पीछे मेंढक की तरह कूदता-फाँदता अपने फुर्तीले होने का परिचय देते हुए, कन्याओं के समक्ष मेंढक का उपहार प्रस्तुत करे।

    इन चक्करों में यदि कोई लड़का कभी भी नहीं पड़ा तो वह था मेंढक। मेंढक का असली नाम प्रभुलाल था। प्रभुलाल चाक दुबला-पतला था और मेंढक की तरह उचक-उचककर चलता था तथा मोटे शीशे वाला कमानीदार चश्मा आँखों पर चढ़ा होने के कारण उसकी आँखें मेंढकों जैसी दिखलाई पड़ती थीं—इसलिए लड़कों ने उसका नाम मेंढक रख दिया था।

    उसका रंग भी बहुत काला था। क्लास में वह बिल्कुल पीछे एक कोने में बैठता था। उसे किसी क़िस्म का शऊर भी नहीं था, यहाँ तक कि मेंढक चीरने का भी नहीं। डिसेक्शन के उसके काम में हाथ की सफ़ाई नहीं रहती थी। वह अक्सर डिसेक्शन के शुरू में ही मेंढक की निचली अंतस्त्वचा में स्थित नस पर कैंची चलाने की ग़लती कर बैठता था, जबकि सिखाया यह जाता है कि हर हालत में यह रक्त नली कटने से बची रहे।

    मेंढक काटने के काम में सबसे अधिक सफ़ाई जिस लड़के के हाथ में थी, उसका नाम था चिंतामणि। चिंतामणि बड़ा ही पढ़ाकू था और क्लास में हर बात में अव्वल रहता था—सामान्य ज्ञान से लेकर सांस्कृतिक कार्यक्रमों तक, पहले पीरियड से लेकर आख़िरी पीरियड तक।

    चिंतामणि को सभी शिक्षक बहुत पसंद करते थे। विशेषकर बायलॉजी वाले जौहरी जी। जौहरी जी से मतलब छोटे जौहरी जी से है, जो नाटे क़द के थे और उम्र में भी अँग्रेज़ी वाले जौहरी मास्साहब से छोटे थे, जिन्हें 'बड़े जौहरी' जी कहा जाता था।

    छोटे जौहरी जी जब बायलॉजी लैब में लंबी मेज़ों के किनारे लाइन से खड़े हुए लड़कों द्वारा 'डिसेक्ट' किए गए मेंढकों की ट्रे का निरीक्षण करते तो ऐसा लगता, मानो मार्च पास्ट की सलामी गारद का निरीक्षण कर रहे हों। अचानक एक रैपट उस लड़के के चेहरे पर पड़ता जिसने 'डिसेक्ट' किए गए मेंढक के भीतरी अंगों पर झंडी ग़लत लगाई होती। ये झंडी सूई को निर्दिष्ट अंग पर गाड़कर उसके ऊपर कैंची से काटा गया झंडीनुमा काग़ज़ लगाकर बनाई जाती थी।

    रैपट तो अग्रवाल मास्साहब भी बड़े ज़ोर का मारते थे किंतु उनके द्वारा यह कार्य लैब के बजाए क्लासरूम में संपन्न किया जाता था। उनका रिकॉर्ड रहा था कि प्रतिवर्ष जब वे दरजा नौ (बायलॉजी) में भरती हुए नए लड़कों की क्लास पहले-पहले दिन लेने पहुँचते तो सब लड़कों को बारी-बारी से खड़ा करके पूछते—'विज्ञान किसे कहते हैं?'

    इस प्रश्न का सही-सही जवाब कोई भी लड़का दे पाता और फिर होती सभी लड़कों की पिटाई। अग्रवाल मास्साहब कहते, 'डॉक्टर बनने आए हो और यह भी नहीं जानते कि विज्ञान किसे कहते हैं!'

    जिस दिन पहली-पहली बार मैंने अग्रवाल मास्साब के हाथ का ज़ोरदार रैपट खाया तो एक बार तो मन हुआ कि बायलॉजी वर्ग ही छोड़ दूँ। यह विचार कई बार मन में आता रहता चूँकि कई बार अग्रवाल मास्साहब अपने हाथ के पंजे के निशान हम लोगों के गालों पर छापते। किंतु बायलॉजी वर्ग छोड़कर एग्रीकल्चर वर्ग में नाम लिखाने का विचार त्यागना ही पड़ा चूँकि एक तो मुझे डॉक्टर बनना था, दूसरे यह कि एग्रीकल्चर वर्ग में पढ़ने वाले लड़कों को हेय दृष्टि से देखा जाता था।

    एक दिन मुझे कुछ लड़कों ने नाइंथ (एग्रीकल्चर वर्ग) के हरमेश सिंह से बातें करते देख लिया तो टोकते हुए बोले, अरे यार, तुम बायलॉजी वाले होकर भी एग्रीकल्चर वालों से दोस्ती रखते हो?

    एग्रीकल्चर वालों से मतलब था नाइंथ 'ए' वालों से। नाइंथ 'ए' वालों को जहाँ एक ओर नाइंथ 'बी' वाले हिकारत भरी नज़रों से देखते थे, वहाँ दूसरी ओर नाईथ 'सी' के विद्यार्थियों को बड़ी हसरत-भरी नज़रों से देखते थे। यद्यपि 'बी' और 'सी' दोनों ही सेक्शन वायलॉजी वर्ग के थे। इसका कारण यह था कि एक तो 'सी' सेक्शन में लड़कियाँ होती थीं और दूसरा यह कि अच्छे अंक वाले लड़कों को ही 'सी' सेक्शन में एडमिशन दिया जाता है—ऐसा माना जाता था। अब भले ही 'सी' सेक्शन में कम नंबरों वाले लड़कों को भी एडमिशन मिल गया हो किंतु 'बी' सेक्शन वाले स्वयं को 'सी' सेक्शन वालों से हीन समझने की भावना से ग्रस्त रहते।

    ये सब बातें जो भी हों लेकिन चूँकि लड़कियों के 'सी' सेक्शन में होने का मामला था, इसलिए 'सी' सेक्शन में एडमिशन के लिए लड़कों का एक तरह से स्क्रीन टेस्ट होता और चेहरे-मोहरे से शरीफ़ दिखने वाले लड़कों को सेक्शन 'सी' तथा ज़रा-सा भी उजड्ड लगने वाले लड़कों को सेक्शन 'बी' में एडमिशन दिया जाता था।

    हमारी बार यह स्क्रीन टेस्ट करने वाले शिक्षकों की समिति से त्रुटि हो गई और चेहरे से निहायत शरीफ़ दिखाई पड़ने वाले सतीश पंत को 'सी' सेक्शन में एडमिशन मिल गया। फिर क्या था, एक दिन सतीश ने मोना गर्ग नामक एक लड़की की डेस्क की दराज़ में एक मेंढक छिपा दिया। जब मोना लंच के बाद वापस आई और उसने दराज़ में हाथ डाला तो वह चीख़ते हुए उछल पड़ी।

    इसके बाद बतौर सज़ा सतीश पंत को सेक्शन 'बी' में भेज दिया गया। वहाँ लड़के अक्सर उसे घेरकर उक्त मेंढक-प्रकरण सुनाने के लिए फ़रमाइश करते और हर बार नया रस लेते हुए सुनते।

    सतीश भी हर बार यह बात ज़रूर कहता, 'इस सड़े कॉलेज में मुझे लड़कियों के साथ पढ़ने का मौक़ा नहीं दिया जा रहा तो क्या हुआ, मेडिकल कॉलेज में तो लड़कियाँ ही लड़कियाँ मिलेंगी। तब वहाँ अपना ऐश करेंगे।'

    उसी दरमियान एक और घटना हुई, जिससे सतीश पंत का ही नहीं बल्कि सभी सड़कों का दिल टूट गया। जाफ़री साहब नए प्रिंसिपल होकर आए और लड़कियों की सुविधा और सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए सेक्शन 'सी' की क्लास ग्राउंड फ्लोर के कमरे में शिफ़्ट कर दी गई जबकि सेक्शन 'बी' और 'ए' की क्लासें पूर्ववत् फ़र्स्ट फ़्लोर पर ही लग रही थीं।

    हम लोग सोचते थे कि लड़कियों को भला सीढ़ियाँ चढ़कर फ़र्स्ट फ़्लोर तक पहुँचने में क्या परेशानी थी। वे तो फुदकती हुई यह चढ़ाई चढ़ सकती थीं। सोढ़ियाँ चढ़ने में असली परेशानी तो हिंदी वाले दुबे मास्टरजी को होती थी चूँकि उनके शरीर में कमर के नीचे कुछ ऐसा विकार था, जिसके लिए लड़कों ने उनका नाम पंसेरी रख दिया था।

    हम लोग सोचते थे कि दुबे मास्टर जी अपना इलाज इसलिए नहीं करवा पाते हैं चूँकि हिंदी विषय के मास्टर होने के कारण उन्हें बायलॉजी और फ़िज़िक्स, केमिस्ट्री जैसे विषयों के शिक्षकों से कम तनख़्वाह मिलती होगी। ऐसा ही हम अँग्रेज़ी वाले मास्टर जी के बारे में भी सोचते थे।

    हमारे ख़याल में सिर्फ़ गणित वाले मास्टर जी की तनख़्वाह ही बायलॉजी वाले मास्टर जी के बराबर हो सकती थी चूँकि गणित कठिन विषय है। फिर बायलॉजी और फ़िज़िक्स-केमिस्ट्री वाले शिक्षकों के अतिरिक्त केवल एक वही तो थे जो टाई लगाते थे और प्रेस किए हुए कपड़े पहनते थे।

    और आज भी मुझे लगता है कि ये शिक्षकगण स्वयं को हिंदी एवं अँग्रेज़ी के शिक्षकों से सुपीरियर समझते थे।

    धीरे-धीरे हम लोग भी स्वयं को हिंदी और अँग्रेज़ी के शिक्षकों से अधिक सुपीरियर समझने लगे थे चूँकि हम बायलॉजी जो पढ़ रहे थे। हम सोचते थे कि अँग्रेज़ी वाले मास्टर भी भला क्या खाकर जानेंगे कि मेंढक का अँग्रेज़ी नाम 'फ़्रॉग' ही नहीं होता बल्कि उसे 'राना टिग्रीना' भी कहा जाता है। इस बायलॉजिकल नाम में 'राना' मेंढक का वंश तथा 'टिग्रीना' उसकी जाति होती है।

    किसी मेंढक का अपना कोई निजी नाम तो होता नहीं, इसलिए सभी मेंढकों को एक ही नाम दे दिया जाता है। ऐसे ही हमें यह भी जानकारी हो गई थी कि हम मनुष्य हैं और मनुष्य का बायलॉजिक नाम 'होमो सेपियंस' है। हम अक्सर एक-दूसरे से मिलते तो यह कहते हुए आपस में हाथ मिलाते—'हैलो, होमो सेपियंस! क्या हाल-चाल हैं!'

    किंतु कुछ समय बाद हम लोगों ने एक-दूसरे को संबोधित करने के लिए एक नया संबोधन ढूँढ़ निकाला था। अब जब भी हम आपस में मिलते तो एक-दूसरे को 'डॉक्टर' कहकर संबोधित करते। कोई सहपाठी मुझसे मिलता तो कहता, 'हैलो, डॉक्टर गोविंद सिंह, कैसे हो?'

    और अब जब भी मैं बाज़ार से गुज़रते समय डॉक्टरों की दुकानों पर लगे बोर्ड देखता था, यथा—डॉक्टर दिनेश रस्तोगी, फ़िजिशियन एंड सर्जन, तो इसी तरह के बोर्ड मेरी कल्पना में भी उतर आते—डॉक्टर गोविंद सिंह, फ़िजिशियन एंड सर्जन!

    बोर्डों के ये अक्षर तब और भी ज़्यादा उभर-उभरकर मेरे सामने आते, जब मैं अपने घर के पीछे वाले बरसाती गंदे पानी के बड़े-से गड्ढे के किनारे गिरिजाशंकर के साथ मेंढक पकड़ने के काम में पूरे तन-मन से जुटा होता। तब हम दोनों सोचते कि काश, मेंढक पकड़ने के लिए भी मछली पकड़ने की तरह के जाल या काँटे हुआ करते! वैसे हम दोनों ने एक-दो बार मछली पकड़ने वाले काँटे से भी मेंढक पकड़ने के प्रयास किए थे। काँटे पर केंचुआ लटकाए घंटा-भर गड्ढे के किनारे बैठे रहने के बाद एक दिन अंतिम रूप से हम इस निष्कर्ष पर पहुँचे कि मेंढक मछलियों की तरह बेवक़ूफ़ नहीं होता बल्कि चालाक और समझदार जंतु होता है।

    हाँ, मेंढकों के इसी रवैये से आक्रोश में आकर हम दोनों ने गाँव के हमउम्र सहपाठी लड़कों की एक बैठक में मेंढकों के विरुद्ध कुछ प्रस्ताव पास किए थे और मेंढक पकड़ने का एक तरीक़ा यह भी तय किया गया था कि पानी के गड्ढे में किनारे की तरफ़ आने वाले मेंढकों पर भाले से प्रहार किया जाए।

    हम लोगों को इस तरह प्रहार करने में बड़ा मज़ा आता और जैसे ही कोई मेंढक चोट खाकर तिलमिलाता, हमें बड़ा सुख मिलता। हम उल्लास और आनंद से भर उठते गोया कि शेर के शिकार में सफलताएँ पा रहे हों। भाला चलाने की हमने बारियाँ बाँध ली थीं कि पाँच बार भाला चलाने के बाद अगले लड़के का नंबर आएगा।

    इसी क्रम में भाला चलाकर प्रहार करने के चक्कर में एक दिन मैं फिसलकर गड्ढे के गंदे पानी में गिर गया और लड़के किनारे खड़े ताली बजाने लगे। गड्ढे के गंदे पानी से बाहर निकलने पर मैं कीचड़ वग़ैरह में सना होने की वजह से किसी मेंढक की तरह लग रहा था। उस दिन बाबूजी ने जमकर मेरी पिटाई की और भाला छीनकर छुपा दिया।

    पिटाई तो मेरी एक बार पहले भी हुई थी, जब मैं रसोईघर से लकड़ी का चौका चुराने के बाद उस पर कीलों से मेंढक ठोंककर चीर-फाड़ में मगन था कि फटाक् से एक झाड़ मेरी पीठ पर पड़ी। 'मेरी रसोई का चौका अपवित्र कर दिया नासपीटे ने'—माँ चीख़ी थी—'बड़ा आया डॉक्टर बनने वाला!'

    मैंने प्रतिवाद किया, 'माँ, नाराज़ क्यों होती हो, यह चौका धोकर फिर रसोई में रख देंगे!' तो माँ ने कहा, 'धर्म भ्रष्ट करेगा? इस चौके पर तो मिट्टी का तेल छिड़ककर मैं आग लगा दूँगी।'

    इसके बाद चौके से डिसेक्शन की ट्रे का काम लेना वर्जित हो गया। अब मैंने और जगदीश ने मिलकर एक नई चीज़ का आविष्कार किया कि एक टूटा हुआ कनस्तर कटवाकर उसकी ट्रे बनवाई और नदी के किनारे से शहद के छत्ते तोड़कर उनका मोम पिघलाकर इस ट्रे में भरा!

    डिसेक्शन की यह ट्रे अपने घर पर ही बना लेने में मिली हमारी इस सफलता को देखकर कई सहपाठी बहुत कुढ़ने लगे थे और यह सोचकर कि कहीं डॉक्टर बनने में वे हमसे पीछे रह जाएँ, वे सभी इस दिशा में जुट गए।

    यह रहस्य तब खुला जब एक दिन श्याम सूजा हुआ चेहरा लिए दिखाई दिया। पता चला कि विगत संध्या को वह मोम के लिए डिंगारा मक्खी के शहद के छत्ते तोड़ने का प्रयास अपने खेत में कर रहा था कि मक्खियों ने उस पर धावा बोल दिया।

    लड़कों में इस तरह की ईर्ष्याएँ और प्रतिस्पर्धाएँ तब और भी बढ़ गई जब रमेश एक बार अपने मामा के यहाँ बरेली गया। वहाँ से वापस आने पर वह एक चार्ट ख़रीद लाया, जिसमें मेंढक के धमनी तंत्र का चित्र बना हुआ था।

    अब क्या था, सब लड़के अपने-अपने अभिभावकों को परेशान करते—'हमें भी चाहिए मेंढक का चार्ट, हम भी बरेली जाएँगे।'

    गाँव में मेंढक के चार्टों की माँग को देखते हुए गाँव का पंसारी लाला रूढचंद विविध क़िस्म के कई ऐसे चार्ट ले आया। अब घर-घर की बैठक में यही चार्ट सुशोभित थे।

    लड़कों के माँ-बाप भी इन चार्टों को बैठक में लगा देखकर पुलकित होते और तब तो और भी ज़्यादा, जब उनका बच्चा उन्हें मेंढक के शरीर की भीतरी संरचना के बारे में विस्तार से बताता।

    मेंढकों के पोस्टरों की महिमा देवी-देवताओं के कैलेंडरों से कुछ कम नहीं थी।

    तभी तो अब यदि किसी लड़के से उसके अभिभावक किसी छोटे-मोटे काम, यथा—भैंसों के लिए कुट्टी काटने या चक्की से गेहूँ पिसाकर लाने को कहते, तो वह जवाब देता, 'मैं अभी महेंद्र के घर मेंढक चीरने के लिए महेश के साथ मेंढक पकड़ने जा रहा हूँ। छोटा भाई चुन्नू ख़ाली बैठा क्या करता है? उसी से कहिए।'

    अभिभावक इस धाँस में जाते, चूँकि लड़के में उन्हें एक भावी डॉक्टर दिखलाई दे रहा होता। मेंढक चीरने की योग्यता रखने वाले लड़कों को घास लाने, भैंस दुहने, गोबर उठाने, कंडे बनाने जैसे कामों से छुटकारा मिल गया था।

    अभिभावकों की इस कमज़ोरी का लड़के भी ख़ूब फ़ायदा उठाते। वे मेंढक पकड़ने का बहाना बनाकर घर से निकलते और दूर कहीं जाकर गुल्ली-डंडा खेलते या कुश्तियाँ लड़ते।

    धीरे-धीरे केवल अभिभावक ही नहीं अपितु गाँव के अन्य बड़े-बुज़ुर्ग भी यहाँ-वहाँ हमारे द्वारा अनायास की जाने वाली गलतियों या सायास की जाने वाली शरारतों को नज़रअंदाज़ करने लगे थे। चूँकि हम भावी डॉक्टर थे। पूरे गाँव को जैसे मेंढक-मीनिया हो गया हो।

    बरसात के दिनों में मेंढक आँगन में जाते तो बड़े-बुज़ुर्ग भी आवाज़ें लगाते है 'ज्ञानेंद्र, आँगन में एक मेंढक आया हुआ है, पकड़ ले!' छोटे भाई-बहनों को भी हिदायतें दी जाती थीं कि कहीं भी अगर मेंढक दिखे तो फ़ौरन इत्तिला की जाए। घर में एक घड़े को ज़मीन में गाड़कर उसमें मेंढक भरकर रखे जाते।

    गणेश के तो पिताजी भी मेंढक पकड़वाने में उसकी मदद करते थे। उन्हें कई बार तो कान से जनेऊ लपेटे धान के खेत में मेंढक पकड़ते हुए देखा गया।

    शैलेश की माँ ने तो इस मामले में एक नया ही कीर्तिमान स्थापित किया और मेंढक पकड़ने के क्षेत्र में महिलाओं का नाम रोशन किया।

    उस विधवा स्त्री के बेटे के लिए भला और कौन मेंढक पकड़ता? एक दिन वह नल पर कपड़े धो रही थी कि उसे एक मेंढक पास ही दिखाई दिया तो वह उस पर झपटी किंतु मेंढक उसके हाथ से फिसलकर निकल भागा।

    अब क्या था, मेंढक आगे-आगे और केवल पेटीकोट-ब्लाउज़ में ही शैलेश की माँ उसके पीछे-पीछे।

    स्त्रियों के बीच कई दिन तक इस विषय पर चर्चा होती रही। शैलेश की माँ का रुतबा केवल नारी समाज में ही नहीं बल्कि पूरे गाँव पर छा गया था। कई दिन तक वह मेंढक लोगों के दर्शनार्थ रखा गया।

    एक दिन जब शैलेश उस मेंढक को चीरने के बाद अपनी दादी को मेंढक का दिल फेफड़े वग़ैरह दिखा रहा था तो उसकी दादी ने पूछा, बबुआ, इसमें गुर्दा कहाँ पर होई?

    दादी के गुर्दे में पथरी हो गई थी और ग़रीबी के कारण ऑपरेशन की बात टलती रही थी। शैलेश ने दादी को मेंढक का गुर्दा दिखलाया तो दादी बड़ी भाव-विभोर होकर बोली, अब अपना शैलेश डॉक्टर बन जाए, जभी ऑपरेशन करवाऊँगी।...

    देखियो शैलेश, जब तू मेरा ऑपरेशन करेगा तो कैंची ज़रा धीरे-धीरे चलाइयो।

    दादी ऑपरेशन करवाने के लिए भले ही शैलेश के डॉक्टर बन जाने तक इंतज़ार करने को तैयार थीं किंतु शैलेश को लगता था कि दादी का ऑपरेशन करने लायक़ क्षमता तो वह अब भी हासिल कर चुका है। कई बार उसने इस सिलसिले में अपना इरादा भी स्पष्ट किया था कि स्कूल में यह तो पढ़ाया ही जाता है कि आदमी और मेंढक की अंदरूनी संरचना में कोई फ़र्क़ नहीं होता, लिहाज़ा जब कभी दादी सोई होंगी तो मेंढक को बेहोश करने वाला लैब से चुराया गया क्लोरोफॉर्म दादी को सुँघाकर उन्हें बेहोश कर दिया जाएगा और चीर-फाड़ करके पेट से पथरी निकाल दी जाएगी। जब दादी होश में आएँगी तो उन्हें वह पथरी दिखलाई जाएगी कि दादी, ये देखो, इसी की वजह से तुम परेशान थीं।

    लेकिन इस योजना को हम कार्यरूप नहीं दे सके चूँकि हमारे सामने दिक़्क़त यह थी कि विद्यालय में हमें यह तो सिखाया ही नहीं जाता था कि मेंढक की चीर-फाड़ करने के बाद उसे सिलाई करके किस तरह इस योग्य स्थिति में लाया जा सके कि वह फिर से चलता-फिरता दिखाई दे।

    शैलेश यह भी चाहता था कि ऑपरेशन सफल हो और दादी चल-फिर सकें चूँकि यदि दादी को कुछ हो गया तो एक तो माँ उसे ज़िंदा नहीं छोड़ेगी, दूसरे दादी ही तो थीं जो शैलेश द्वारा स्नानोपरांत बिना धोए छोड़ दिए गए अंडरवियर और बनियान धो दिया करती थीं जबकि माँ कहा करती थीं, 'बेटा, अब तुम बड़े हो गए हो। अब अपने भीतर के कपड़े ख़ुद धोया करो।'

    कपड़े धोने का काम एक ऐसा काम था जो शैलेश को बड़ा अरुचिकर लगता था। एक बार जब शैलेश स्कूल प्रांगण में मेंढक के पीछे-पीछे दौड़ रहा था और मेंढक था कि शैलेश को छका रहा था, तब इंटर बायलॉजी के मास्साब जी. एल. शाह जी यह दृश्य देखकर चिल्लाए, बक अप, बक अप। इस पर शैलेश और भी उत्साहित होकर मेंढक के पीछे दौड़ने लगा कि मेंढक पकड़ लेने पर शाह जी उसकी पीठ थपथपाते हुए कहेंगे, वेलडन, वेलडन! लेकिन इसके बजाए हुआ यह कि मेंढक ने पिचकारी की तरह पेशाब की तेज़ धार छोडी और शैलेश की क़मीज़ ख़राब हो गई।

    कोई अन्य लड़का होता तो तुरंत ही फुर्ती से क़मीज़ उतारकर लड़कियों के समक्ष अपने शरीर सौष्ठव का प्रदर्शन करने का अवसर हाथ से नहीं निकलने देता, किंतु शैलेश ने क़मीज़ धोने से बचने के लिए क़मीज़ उतारने के बजाए नल पर जाकर भीगे हुए रूमाल से रगड़कर क़मीज़ साफ़ कर ली थी।

    उस दिन उस मेंढक का भाग जाना काफ़ी देर तक सबको खलता रहा चूँकि यह वो दिन था जब कॉलेज में मेंढक कम पड़ गए थे।

    छात्र यूनियन के नेताओं की हड़ताल नारेबाजी के फलस्वरूप प्रधानाचार्य जी ने कॉलेज के लैब के पास मेंढक रखने का एक पौंड (तालाब) बनवा दिया था। उस रोज़ जब लैब का चपरासी चंद्रिका प्रसाद पौंड से मेंढक निकालने पहुँचा तो उसने पाया कि मेंढक बहुत कम दिखलाई दे रहे हैं। अचानक पौंड में एक बड़े-से सर्प के दर्शन होने पर कारण स्पष्ट हुआ। दशहरे की छुट्टियों-भर ये सर्प महोदय मेंढकों का भक्षण करते रहे थे।

    इंटरवल की घंटी बजते ही सब लड़के-लड़कियाँ पौंड के पास पहुँचे और पानी में लाठियाँ चला चलाकर साँप को मारकर बाहर किया।

    उस दिन कॉलेज में यह आदेश जारी हुआ कि सेक्शन 'बी' और 'सी' के लड़के-लड़कियाँ साथ-साथ मेंढक चीरेंगे और चार-चार विद्यार्थियों के एक ही ग्रुप को मेंढक मिलेगा। इस प्रकार यह दिन 'बी' सेक्शन वाले लड़कों के लिए सौभाग्यशाली दिन बन गया चूँकि उस दिन उन्हें 'सी' सेक्शन की लड़कियों के क़रीब जाने का सुअवसर मिला।

    'बी' सेक्शन के वे लड़के जिन्हें उस ग्रुप में शामिल होने का मौक़ा मिला था, जिसमें कोई लड़की हो—ख़ुशी से फूले नहीं समा रहे थे। उन्होंने सर्प देवता को मन-ही-मन धन्यवाद दिया जबकि अन्य लड़कों ने नागपंचमी का व्रत रखने का संकल्प लिया।

    उस दिन 'बी' सेक्शन वाले सभी लड़कों के दिल की यही आवाज़ थी कॉलेज में हमेशा ही मेंढकों की 'शॉर्टेज' बनी रहे।

    लड़के बहुत दिनों तक इस विषय पर बहसें करते रहे कि पौंड में सर्प कैसे घुसा होगा? अँग्रेज़ी की 'पार्जिंग', गणित के समीकरणों या केमिस्ट्री, फ़िज़िक्स के सूत्रों का काम पूरा करने के बजाए हम इसी विषय पर चिंतन को प्राथमिकता देते। अब में लटूर सिंह के इस निष्कर्ष से सभी सहमत हुए कि सर्प पौंड के पास खड़े विशाल गुलमोहर के पेड़ पर पक्षियों के अंडे खाने चढ़ा होगा और वहाँ से अचानक पौंड में गिर पड़ा होगा।

    हम लटूर सिंह की पैनी दृष्टि को मान गए। उसकी पैनी दृष्टि ही तो थी कि उसने 'सी' सेक्शन वाली संध्या के दिल को भेदकर उससे चक्कर चलाने में कामयाबी हासिल कर ली थी।

    आलम यह था कि इंटरवल के बाद लड़के जब क्लासरूम में लौटते तो ब्लैकबोर्ड पर लिखा हुआ पाते—'लटूर लव्ज संध्या।' यही नहीं, कॉलेज की गैलरी टॉयलेट की दीवारों पर भी लटूर सिंह ने यह इबारत लिख दी थी। यही बात मेंढकों वाले पौंड की मुँडेर पर चाकू से खुदी हुई मिलती। पौंड से लगे गुलमोहर के पेड़ के तने पर चाकू से खोदकर पीपल का पत्ता तथा उसे भेदते हुए तीर का चित्र भी लटूर सिंह ने बना दिया था। अपनी डेस्क पर भी उसने संध्या का नाम खोद लिया था। इसके अलावा वह बुशशर्ट के भीतर दिल वाली जगह के ऊपर लाल पैन से अँग्रेज़ी का अक्षर 'एस' लिखे रहता था और बुश्शर्ट के ऊपर वाले दो-तीन बटन खुले रखता था ताकि लड़कों को 'एस' नज़र आता रहे। उसने अपना नाम भी लटूर के बजाए 'लवी' रख लिया था।

    इस संबंध में संध्या क्या करती थी—यह हमारे लिए बहुत दिनों तक रहस्य बना रहा किंतु एक दिन यह रहस्य खुल ही गया जब छोटे जौहरी जी ने बायलॉजी लैब में डिसेक्शन का प्रदर्शन करने के लिए कैंची निकालने हेतु संध्या का लाल डिसेक्शन बॉक्स खोला तो उसमें उनके हाथ एक लेटर लगा जो कि बॉक्स के अस्तर से झाँक रहा था।

    संध्या ने यह पत्र लटूर सिंह को देने के लिए रखा हुआ था। जौहरी मास्साहब ने ज़ोर-ज़ोर से पढ़ना शुरू किया—माई लव लटूर... इसके आगे वे ज़ोर से नहीं पढ़ सके किंतु अंत में उन्होंने फिर ज़ोर-ज़ोर से पढ़ा—तुम्हारी जनम-जनम की प्यासी—संध्या।

    जौहरी जी ने यह पत्र पूरा होने के साथ ही एक ज़ोरदार झापड़ संध्या को रसीद किया और लटूर संध्या को कान पकड़कर प्रिंसिपल साहब के पास ले गए।

    बाद में हमें पता चला कि लवी ने ज़ोरदार लहज़े में कहा था, प्रिंसिपल साहब, हम एक-दूसरे को प्यार करते हैं और कोई भी दीवार हमें रोक नहीं सकती!...प्यार करने वाले किसी बात की परवाह नहीं करते सर!

    उस रोज़ लड़कों ने देखा कि प्रिंसिपल साहब के ऑफ़िस के आगे लटूर सिंह डेढ़ घंटे तक मुर्ग़ा बना रहा। यही नहीं, उधर से गुज़रते हाशमी मास्साब ने उसके ऊपर दो ईंटें भी रख दी थीं।

    इस घटना के बाद लड़कों ने संध्या का नाम 'मुर्ग़ी' रख दिया था। लड़के बड़ी दबी ज़ुबान से यह नाम लिया करते थे चूँकि ऐसा करने पर ख़तरा लवी से भी था और शिक्षकों से भी।

    यूँ शिक्षकों से और भी बहुत-से ख़तरे थे। जैसे एक बार हिंदी वाले नागर जी ने देख लिया कि सुभाष आहूजा एक मेंढक को ज़बरदस्ती बीड़ी पिलाने का प्रयास करते हुए उसका मुँह खोलने में लगा है तो उन्होंने जमकर उसे डाँट पिलाई।

    सुभाष का मानना था कि मेंढक के मामले में कुछ भी कहने का अधिकार हिंदी के शिक्षक को नहीं, हम मेंढक को चाहे बीड़ी पिलाएँ या शराब पिलाएँ, हिंदी शिक्षक को क्या लेना-देना?

    शराब गाँव में कच्ची मिलती थी। एक बार पप्पू ने अपने पिताजी की शराब की बोतल में से कुछ शराब निकालकर ड्रॉपर से एक मेंढक को पिला दी थी। यह मेंढक काफ़ी देर तक उछल-कूद मचाने के बाद पस्त पड़ गया था।

    इस तरह गाँव के सारे लडकों का दिन मेंढक के चक्कर में बीतता और रात-रात-भर हम अलाव के किनारे बैठे हुए या मंदिर के प्रांगण में बैठे हुए यही बातें करते, 'यार, सुनते हैं कि जापान में मेंढक का अचार खाया जाता है। बंबई से पानी के जहाज़ों में लादकर मेंढक जापान को निर्यात किए जाते हैं।'

    मेंढक की टाँगों का अचार खाने वाले जापानी बड़े बुद्धिमान होते हैं—इस बात से प्रेरणा लेकर लालमणि ने एक दिन एक अद्भुत प्रयोग किया। बाज़ार में एक जगह पर लिखा था, 'यहाँ सूअर का अचार मिलता है।' वहाँ से उसके पिताजी एक मर्तबान भरकर अचार लाए थे। लालमणि ने एक रोज़ मौक़ा पाकर चुपके से मेंढक की चार टाँगें इस मर्तबान में डाल दी थीं कि एक-एक टाँग घर के हर सदस्य के हिस्से में जाएगी।

    किंतु कुछ दिनों बाद जब मर्तबान से बदबू आने लगी तो उसकी माँ ने मर्तबान में झाँका। उसमें झाँकते ही वह जोरों से चिल्लाई, मानो कोई अनहोनी घट गई हो।

    ठीक उसी प्रकार वह उस दिन भी चिल्लाई थी, जिस दिन लालमणि एक मेंढक को पकड़ने के चक्कर में उसका पीछा करते हुए बरसाती काई जमे आँगन में फिसल पड़ा था और उसकी बाँह टूट गई थी।

    मेंढकों के चक्कर में सिर्फ़ लड़कों की बाँहें ही नहीं टूटती थीं बल्कि उनके अभिभावकों के बीच लाठियाँ चलने और सिरे फूटने की भी नौबत जाती थी।

    लड़कों के कैरियर का सवाल था और उनके माँ-बाप यह क़तई बर्दाश्त नहीं कर पाते थे कि उनका बेटा मेंढक के मामले में किसी प्रकार भी पीछे रहे। एक दिन पड़ोसी विदुर के आँगन में मैं और विदुर मेंढक पकड़ने में जी-जान लगा रहे थे, किंतु मेंढक कभी आँगन से लगी सब्ज़ी की क्यारियों में पिनालू के पत्तों के पीछे छुप जाता तो कभी मक्का के पेड़ों के पीछे। अंत में हुआ यह कि हाँका लगाते हुए मैं मेंढ़क को अपने आँगन में ले आया चूँकि हमारे आँगन से लगी कोई क्यारी नहीं थी, जिसमें मेंढक छिप पाता।

    अंततः मैंने मेंढक को दबोच लिया और पकड़कर अपने डंगरों के गोठ में एक डिब्बे में रख लिया। इस पर विदुर ने चीख़-पुकारकर महाभारत का माहौल तैयार किया और उसके पिता पंडित हनुमान चंद्र चतुर्वेदी जी मेरे पिता के पास लड़ने 'पहुँच गए कि आपका बेटा हमारे आँगन से मेंढक हाँक लाया है, विदुर बहुत परेशान है, उसका मेंढक लौटा दिया जाए।

    मेरे पिताजी भी कुछ कम नहीं थे। उन्होंने उस समय पी रखी थी। वे बोले, पंडितजी, आप तो ऐसे लड़ रहे हैं, जैसे मेरा बेटा आपके यज्ञ की गायें हाँक लाया हो।...मेंढक पर आपका नाम लिखा था क्या? जाइए, नहीं मिलेगा मेंढक।

    मेंढक से जुड़ना प्रतिष्ठा का विषय माना जाता था। श्याम चौधरी की तो इस चक्कर में एक रईस घर में शादी भी हो गई। हुआ यह कि ज़िला मेरठ से एक चौधरी साहब गुड़ की तिजारत के सिलसिले में गाँव के लाला उसेंद्र के क्रेशर पर आए हुए थे। चौधरी बिरादरी के होने के नाते वे हमारे गाँव के चौधरी साहब के घर भी परिचय बढ़ाने के वास्ते मिलने चले गए।

    वहाँ जब उन्होंने देखा कि गाँव नादानपुर के चौधरी साहब का बेटा आम के पेड़ के नीचे खटिया पर बैठा मेंढक चीर रहा है तो वे लड़के के उज्ज्वल भविष्य के प्रति बड़े आश्वस्त हुए और चौधरी साहब से अपना समधी बनाने के लिए निवेदन किया। भावी दामाद 'सैंस' (साइंस) की पढ़ाई कर रहा है, सोच-सोचकर उनकी छाती चौड़ी होती रही।

    इसके बाद तो श्याम और भी उत्साह के साथ मेंढक पकड़ता। शाम के समय लंबी टॉर्च लिए वह आगे-आगे चलता और हम लड़के उसके पीछे-पीछे।

    श्याम मेंढक के सामने की तरफ़ जाकर उसकी आँखों पर टॉर्च की तीव्र रोशनी डालता और कोई लड़का मेंढक के पीछे से जाकर मेंढक को दबोच लेता।

    मेंढक का कंकाल निकालने के तरीक़े भी हम सीख रहे थे। पहला तरीक़ा यह था कि मेंढक को बेहोश करने के बाद उसका मांस नोच-नोचकर निकाल दिया जाए।

    ऐसे ही एक दिन मांस नोचते समय राकेश की एक मुर्ग़ी अचानक वहाँ पर पहुँची और उसने मांस के टुकड़े चोंच से उठा-उठाकर खाने शुरू कर दिए। बस, फिर क्या था, लड़कों को एक नया खेल मिल गया था।

    लड़के अब बातें करते—जिसकी मुर्ग़ी अंडे देती हो, उसे मेंढक का दिल फेफड़े वग़ैरह काटकर खिलाओ। मुर्ग़ी के लिए यह ख़ुराक खोज लेने पर हम यह नया फ़ॉर्मूला पंतनगर यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों के सामने रखने जाना चाहते थे ताकि पौष्टिक मुर्ग़ी आहार सारे देश की मुर्ग़ियों को मिल सके।

    मेंढक की आँख में पुतली के स्थान पर एक सफ़ेद पारदर्शी गोलक या गोली होती है। हम मेंढक को चीरने के बाद सूखने डालते और कुछ दिन बाद उसकी आँखों से सूखी हुई गोलियाँ निकालते, उन्हें ऐसे इकट्ठा करते मानो वे माला के मोती हों।

    मेंढक का कंकाल निकालने का तीसरा तरीक़ा यह था कि मेंढक को किसी डिब्बे में कास्टिक सोडे के घोल में उबाला जाता। इसके लिए घर के बाहर ईंटों का दूल्हा बनाया जाता।

    हिंदी के पीरियड में लड़के कबीर के दोहों पर नहीं बल्कि मेंढक के कंकाल को निकालने की प्रक्रियाओं पर ज़्यादा चर्चा करते।

    एक दिन हिंदी वाले बेनीमाधव वर्मा मास्टर जी ने हमें आपस में खुसुर-फुसुर करते देख टोका और कई लड़कों को खड़ा कर दिया। सतीश से उन्होंने कहा, यह तुम डेस्क के भीतर क्या छिपा रहे हो?

    सतीश बोला, कुछ नहीं सर! वर्मा जी सतीश की डेस्क के पास पहुँचे और डेस्क से कंकाल निकालते हुए बोले, इसी कंकाल की बातें कर रहे थे न!...हिंदी की पढ़ाई को तुम ग़ैरज़रूरी समझते हो...अच्छा चलो, आज यही देखें कि तुम्हारा इस कंकाल के बारे में कितना ज्ञान है?

    इसके बाद उन्होंने प्रश्न दाग़ने शुरू किए—चलो बताओ, इसमें प्रिस्टर्नम कहाँ है?

    अल्नेयर कहाँ है?

    मीकेल्स कहाँ है?

    टेरिग्वाइड कहाँ है?

    नए-नए आए हुए हिंदी के मास्टर वर्मा जी के इन सवालों से हम स्तब्ध रह गए। हममें से कोई भी इन चारों हड्डियों को पहचानकर नहीं बता पाया। हम यह तो बता सकते थे कि इसमें सिर कहाँ है और टाँगें कहाँ हैं, किंतु हमने साल-भर मेंढकों को अपना खेल का साधन समझने के अलावा और किया ही क्या था?

    बाद में हमें वर्मा मास्साहब ने बताया कि उन्होंने एम.एस-सी. करने के बाद हिंदी से एम. ए. किया है तो हम सकते में गए। राज सिंह थोड़ा उजड्ड क़िस्म का था। उसने प्रश्न किया, सर, आपने इतने बरस तक बायलॉजी पढ़ी तो फिर हिंदी की टीचरी में क्यों आए? आपको तो डॉक्टरी लाइन में जाना चाहिए था।

    वर्मा मास्साहब ने बड़े संजीदा होकर जवाब दिया, कोई व्यक्ति ख़ुद के चाहने-भर से डॉक्टर थोड़े ही बन जाता है। अब तुम इतने सारे लड़के बायलॉजी पढ़ रहे हो तो सभी थोड़े ही डॉक्टर बन जाओगे!

    हम सारे-के-सारे लड़के फिर सकते में गए और बोले, तो क्या हम सब डॉक्टर नहीं बन पाएँगे?

    तभी अगले पीरियड की घंटी बज गई। वर्मा मास्साब तो चले गए किंतु हमारे लिए सोचने हेतु एक अप्रत्याशित नया विषय छोड़ गए। अगला पीरियड बायलॉजी का था। छोटे जौहरी साहब हमेशा की तरह पाँच-सात मिनट की देरी से आए। उनके आने से पहले आपस में डिस्कशन करके हम लोग इस निष्कर्ष पर पहुँचे थे कि डॉक्टर बनने या बन पाने के हमारे भविष्य के बारे में जो कुछ वर्मा मास्टर बोल रहा था, वह वर्मा मास्टर नहीं बल्कि उसका 'फ़्रस्ट्रेशन' बोल रहा था, चूँकि वह ख़ुद तो डॉक्टर नहीं बन पाया; इसीलिए हम लोगों को भी गधा समझता है कि हम लोगों को मेंढक के कंकाल की हड्डियों के नाम ठीक से नहीं मालूम थे, लेकिन उससे क्या फ़र्क़ पड़ता है। आख़िर आचार-व्यवहार से तो हम आधे डॉक्टर हो ही गए थे। हम हर रोज़ प्रेस किए हुए कपड़े पहनते। धान के खेतों में पानी लगाने के लिए जाते समय भी प्रेस किए हुए कपड़े पहने रहते। शाम को सोने के लिए हमने नए कुर्ते-पाजामे सिलवा लिए थे और जिस दिन हम सोने से पहले यह पाते कि कुर्ते-पाजामे प्रेस किए नहीं हैं, उस रात हमें नींद ही नहीं आती चूँकि कपड़ों की सलवटें हमें चुभती हुई महसूस होतीं।

    हमारे गाँव की हर माँ को पता लग चुका था कि 'एच टू ओ' के माने साइंस में पानी होते हैं चूँकि हम लोग घर में खाना खाते समय यही कहते, 'माँ, ज़रा एक गिलास 'एच टू ओ' लाना!'

    हम आर. डी. विद्यार्थी की लिखी जंतु विज्ञान की किताब लिए हुए ही एक मुहल्ले से दूसरे मुहल्ले में जाना प्रतिष्ठा का विषय समझते थे, फिर चाहे हम पेन में भरने के लिए मित्र के घर स्याही माँगने हीं जा रहे हों।

    डिसेक्शन बॉक्स की कैंचियों से हम अपने शरीर पर हाल ही में उगने वाले अनचाहे बालों को काटने लगे थे।

    बॉक्स में रखे रहने वाले लेंस से एक-दूसरे की किताबें या कभी-कभी पीठ पर किरणें केंद्रित कर क़मीज़ भी जलाना सीख गए थे। लटूर सिंह ने तो माचिस रखनी छोड़ दी थी और धूम्रपान के लिए बीड़ी सुलगाने हेतु वह लेंस का ही प्रयोग करता था।

    यही नहीं, हमने तो डॉक्टरी संबंधी कई बातें भी ख़ूब अच्छी तरह सीख ली थीं। क़स्बे के सरकारी अस्पताल के ड्राइवर का लड़का हरिमोहन हमारे साथ पढ़ता था। वह हमें बतलाता था कि नसबंदी करने के लिए औरत की कौन-सी नस काटी जाती है और अगर पुरुष की नसबंदी करनी हो तो चीरा कहाँ पर लगाया जाता है।

    हरिमोहन एक दिन अस्पताल से एक अद्भुत एवं रोमांचकारी चीज़ क्लास में लाया तो उसका रुतबा पूरी क्लास पर छा गया। यह एक निरोध था। फिर उसने इसके महत्त्व पर प्रकाश डालते हुए बतलाया कि ऐसी सामग्री अस्पताल में मुफ़्त मिलती है और डॉक्टर-डॉक्टरनियाँ लोगों को इसके प्रयोग के लिए प्रेरित करते हैं।

    हम लोगों ने भी सोचा कि वह दिन कब आएगा, जब हम ऐसी चीज़ें लोगों को बाँटा करेंगे। बाँटने में भला क्या रखा था। वो तो हम अब भी बाँट सकते थे लेकिन ऐसा करने से घर के बुज़ुर्गों द्वारा पिटाई किए जाने का डर था।

    बहरहाल, हमने डॉक्टरी लाइन की अन्य सेवाएँ गाँव वालों को देनी शुरू कर दी थीं। जैसे एक टीन के बक्से पर लाल क्रॉस बनाकर हम लड़कों ने उसमें सिर-दर्द, मोच, चोट, खाँसी-ज़ुकाम आदि की दवाइयाँ तथा कुछ पट्टियाँ रुई रख ली थीं और सब लड़के ग्रामवासियों की नज़र में डॉक्टर साहब हो गए थे।

    फिर इतना सब कुछ होने के बावजूद वर्मा मास्साब द्वारा डॉक्टर बनने संबंधी हमारे भविष्य पर प्रश्नचिह्न लगाना हमें कुछ जँचा नहीं था।

    तभी जब छोटे जौहरी मास्साब क्लासरूम में प्रविष्ट हुए थे तो कुछ ही देर बाद राज सिंह ने अपनी जगह पर खड़े होकर यह सवाल दाग़ दिया था, सर, एक बात पूछना चाहता हूँ! अभी-अभी इससे पहले पीरियड में हिंदी वाले वर्मा मास्साब जी ने एक बात कही थी कि तुम सबके सब लड़के डॉक्टर थोड़े ही बन जाओगे। सर, क्या हम सब डॉक्टर नहीं बन पाएँगे?

    छोटे जौहरी साहब ने बड़ी गंभीरता के साथ जवाब दिया, डॉक्टर बनने के लिए मेडिकल कॉलेज में एडमीशन के लिए पी एम. टी. की परीक्षा देनी पड़ती है। इंटरमीडिएट करने के बाद जो लड़के इस परीक्षा में पास हो पाते हैं, वह ही मेडिकल कॉलेज में दाख़िला पा सकते हैं। फिर सिर्फ़ पी. एम. टी. की परीक्षा पास कर लेने से ही कुछ नहीं होता, जब तक घरवाले इतने समर्थ हों कि ढाई-तीन सौ रु. प्रतिमाह ख़र्चा भेज सकें। मुझे ही देखो, मैं इंटरमीडिएट फ़र्स्ट क्लास पास था और पी.एम.टी. की परीक्षा में भी पास हो गया था किंतु सिर्फ़ इसलिए मेडिकल कॉलेज में नहीं पढ़ सका कि घर में ग़रीबी थी!

    हम सबके सब सन्न रह गए। हमारी पूरी क्लास में दो-चार को छोड़कर बाक़ी सभी लड़के ऐसे थे जिनके घरवाले ढाई-तीन सौ तो क्या, एक सौ रुपया महीना भी मनीऑर्डर नहीं कर पाते।

    तब मैं एकाएक उठ खड़ा हुआ था और मैंने कहा था, सर, जब हमारे डॉक्टर बनने की संभावनाएँ इतनी क्षीण हैं तो फिर ये बातें हमें शुरू में ही क्यों नहीं समझाई जातीं! सरकार शुरू से ही कुछ ऐसे छात्रों को क्यों नहीं चुन लेती जो बौद्धिक आर्थिक रूप से इतने सक्षम हों कि डॉक्टर बन सकते हों?...अब हमारे दो वर्ष बरबाद हो चुके हैं। हाईस्कूल की बोर्ड की परीक्षा सिर पर है।...अब तो हमें परीक्षा देनी होगी लेकिन...

    उस दिन क्लास में इसी तरह की बातें होती रहीं। जौहरी मास्साब ने भी कुछ नहीं पढ़ाया।

    हम लोगों ने कुछ समय बाद हाईस्कूल की परीक्षा दी। हिंदी और अँग्रेज़ी में मेरे नंबर पचपन प्रतिशत थे, जबकि इन विषयों की पढ़ाई पर मैंने कभी ज़्यादा ध्यान नहीं दिया था। यही हाल अन्य लड़कों का भी था। बायलॉजी साइंस में हम लोगों के नंबर बहुत ही कम थे जबकि हम लोग स्वयं को साइंस—बायलॉजी का स्टूडेंट कहते थे। गणित में भी हम लोग जैसे-तैसे पास हो गए थे।

    हाईस्कूल के बाद हम लोगों के पास और कोई चारा नहीं था, सिवाय इसके कि हम ग्यारहवीं में बायलॉजी में प्रवेश लेते। सब लड़के यही कहते थे कि अब जब हाईस्कूल बायलॉजी ग्रुप से कर लिया है तो जनता स्कूल में आर्ट साइड में नाम लिखवाने कैसे जाएँ? एक तो ऐसा करने में हमारी नाक कटती थी, दूसरे यह कि वहाँ भी तो सीटें फुल ही होंगी चूँकि वहाँ के लड़के हाईस्कूल पास करके ग्यारहवी में पहुँच गए होंगे।

    इंटरमीडिएट में भी हम लोग मेंढकों के पीछे भागते थे। गाँव में बसे हुए बुज़ुर्ग द्वितीय विश्वयुद्ध में अँग्रेज़ों की सेना में भरती होकर जर्मनी, बर्मा और जापान आदि देशों में रह थे। यह बात गाँव के खचेड़ू मिस्त्री को भी मालूम थी। लड़कों को अक्सर शाम के समय मेंढक पकड़ते देख वह बहुत दिनों तक यही सोचता रहा कि ये रिटायर्ड फ़ौजियों के लड़के हैं और इनके पिताओं ने जापान में रहने के दौरान जापानियों से मेंढक की सब्ज़ी बनाने की विधि सीखी हुई है, तभी तो हर शाम को इनके घर मेंढक की सब्ज़ी बनती है।

    यह बात उस दिन खुली जब एक दिन शाम को खचेड़ू मिस्त्री हमारे घर पर आया और पिताजी से बोला, ठाकुर साब, एक कटोरा मेंढक की सब्ज़ी हमें भी दे दियो। हम भी चखकर देखें कि आप लोगन की ज़ुबान पर मेंढक को ऐसो कैसो स्वाद चढ़ो है कि रोज़ शाम को साग राँधने के ताँय मेंढक पकड़ने लरिका निकल पड़ते हैं।

    उस शाम को पिताजी द्वारा बहुत समझाने पर भी खचेड़ू मिस्त्री की समझ में यह बात नहीं आई थी कि मेंढक का लड़कों की पढ़ाई से या भावी ज़िंदगी से कोई संबंध हो सकता था।

    वैसे सच कहूँ, मेरी समझ में भी आज तक यह बात नहीं पाई। अब जबकि मैं दूर एक शहर में नौकरी कर रहा हूँ और अपने गाँव के पास के क़स्बे में बस गया हूँ, उस घटना को लगभग पंद्रह बरस बीत चुके हैं। कल शाम जब मेरी निर्माणाधीन कोठी के लिए भट्टे के ठेकेदार ने ईंटें भिजवाईं तो मैंने देखा कि ईंटों की बुग्गी चलाने वाला व्यक्ति तो सहपाठी लटूर सिंह है।

    इतने बरस बाद एक दिन लटूर सिंह एकाएक इस तरह दिखाई पड़ेगा—इस बात की मैंने कभी कल्पना भी नहीं की थी। उसने एक दिन एकाएक कॉलेज आना छोड़ दिया था और फिर उसका कुछ पता नहीं चला था।

    लटूर सिंह पहले तो मुझे 'साहब-साहब' ही कहता रहा किंतु जब उसे लगा कि मैं बैंक का अफ़सर होने के बावजूद उसके साथ दोस्ती के दिनों को नहीं भूला हूँ तो वह मेरे आगे बिफर पड़ा। बोला, डॉक्टर तो क्या, वार्ड ब्वॉय या कंपाउंडर भी नहीं बन पाया मैं तो।...अगर ऐसा ही पता होता तो क्यों साइंस साइड में टैम ख़राब करता। आर्ट साइड लेकर हाईस्कूल इंटर कर लेता तो कहीं बाबू तो लग ही जाता।...

    अन्य लड़कों के बारे में हमने बातें शुरू कीं। पता चला कि तब के पूरे बैच में केवल एक ही लड़का डॉक्टर बन पाया है और वह है प्रभुलाल जो कि अब डॉक्टर पी लाल के नाम से जाना जाता है और डिस्ट्रिक्ट हॉस्पिटल में पोस्टेड है। मुझे बड़ा आश्चर्य हुआ कि प्रभुलाल उर्फ़ मेंढक डॉक्टर बन गया है जबकि वह पढ़ाई में भी बड़ा कमज़ोर था। पी. एम. टी. परीक्षा में भी उसके प्राप्तांकों का प्रतिशत कोई ख़ास नहीं रहा होगा। यह भी पता चला कि चिंतामणि जैसा मेधावी लडका डॉक्टर नहीं बन पाया। पी.एम.टी. परीक्षा में उसके प्राप्तांक प्रभुलाल से ड्यौढ़े थे किंतु फिर भी उसे मेडिकल कॉलेज में एडमिशन नहीं मिल पाया, जिससे वह टूट गया।

    मैंने लटूर सिंह से कहा, इतनी बातें तो मुझे भी नहीं मालूम। तुम्हें कैसे मालूम चलीं?

    वह बोला, अरे साहब, चिंतामणि तो अक्सर मुझे मिलता है। वह इंटर कॉलेज में मेंढक सप्लाई करने का धंधा भी करता है। एक दिन गाँव के तालाब से मैं चिकनी मिट्टी लेने बुग्गी लेकर गया था तो वहाँ वह मेंढक पकड़ रहा था। तब से अक्सर उससे भेंट होती रहती है। ऐसे ही और भी लड़के हैं...बड़ी मुश्किल से दो-तीन लोग कहीं परचून की क्लर्क हो पाए हैं और बाक़ी लोग खेती सँभाल रहे हैं या छोटी-मोटी दुकान। हरिमोहन अपने स्वर्गीय पिता की जगह पर अस्पताल में ड्राइवर हो गया है। सतीश पंत एक डॉक्टर के यहाँ कंपाउंडर-कम-वार्डब्वाय के रूप में चाकरी कर रहा है। श्याम सिंह चौधरी दिल्ली की एक सरकस कंपनी के किसी जोकर से हरे रंग के कपड़े का सिला लिबास ले आया है, जिसे पहनकर वह तराई के गाँवों में घूमने वाली एक नौटंकी-कंपनी के मंच पर और कभी-कभी रामलीला के स्टेज पर मेंढक का स्वाँग रचते हुए उछल-कूद मचाता लोगों का मनोरंजन करके थोड़ा-बहुत इनाम पाने का धंधा करता है। गणेश एम. बी. प्लाईवुड कंपनी की फ़ैक्ट्री के अहाते में बने मंदिर में पुजारी हो गया है। शैलेश ने पान का खोका खोल लिया था।

    सहसा मुझे ध्यान आया कि मैंने भी तो मजबूरन एक क्लर्क के रूप में ज़िंदगी शुरू की थी। इंटर के बाद प्राइवेट बी. ए. किया चूँकि बी.एस-सी. करने के लिए बाहर पढ़ने जाने की सामर्थ्य नहीं थी और यदि बी. एस-सी. करके दूसरे शहर गया भी होता तो शायद थर्ड डिवीज़न से पास होता। फिर शायद क्लर्की भी मिल पाती। वो तो हुआ यह कि बी. ए. में हिंदी, इंगलिश, इतिहास, भूगोल लेने के बाद जब अंक-सूची मुझे मिली तो मैंने पाया कि मेरे प्राप्तांक पूरे उनसठ प्रतिशत हैं यानी इंटरमीडिएट के प्राप्तांकों से चौदह प्रतिशत ज़्यादा। इतने ही प्रतिशत प्राप्तांक मुझे हाईस्कूल इंटर में भी मिलते यदि मैंने आर्ट साइड ली होती।

    तब मुझे लगा था कि आर्ट साइड में तो मुझे शुरू से ही होना चाहिए था और फिर मैंने हिंदी साहित्य से एम. ए. किया था, जिसमें विश्वविद्यालय में सर्वप्रथम स्थान मैंने जिस मेहनत से पा लिया, उतनी मेहनत से तो मैं जनम-भर एम.सी. कर पाता।

    तो क्या व्यवस्था ने मुझे ग़लत दिशा में पटक रखा था और अब मैं सही दिशा में पाया था?

    हाँ, शायद ऐसा ही था। तभी तो मैं बड़ी आसानी से एक बैंक में हिंदी सहायक और फिर हिंदी अधिकारी हो गया था।

    तभी मैंने लटूर सिंह से एक और प्रश्न पूछ डाला, जिसकी शायद उसने कल्पना भी की होगी। मैंने पूछा, संध्या की याद आती है?

    इस पर उसने विस्तार से बताया—एक दिन जब संध्या के साथ साइकिल चलाता हुआ थाने के सामने से गुज़र रहा था तो एकाएक एक सिपाही की नज़र उस पर पड़ी और उसे थाने के भीतर ले जाकर वह बोला, 'दारोगा जी की लड़की के पीछे घूमते हो!' इसके बाद सिपाहियों ने लाठियों से लटूर सिंह की ख़ूब कुटाई की थी और रात-भर उसे मच्छरों से भरी हवालात में बंद रखकर सुबह छोड़ा था।

    इस घटना के बाद लटूर सिंह इतना घबराया था कि उसने कॉलेज आना ही छोड़ दिया था।

    लटूर सिंह की यह करुण दास्तान सुनकर मैं भी बड़ा दुखी हुआ और मैंने पूछ लिया, संध्या के बारे में कुछ जानकारी है?

    इस पर वह बड़ा रुआँसा होकर बोला, भैया, यह बुग्गी में ईंटें ढोना भी भला कोई काम है! बार-बार पुराने ज़ख़्म हरे कर देता है। आज तुमसे मुलाक़ात हुई। कुछ ही दिन पहले उससे भी ऐसे ही मुलाक़ात हुई थी।

    संध्या से...! कहाँ हैं वह...? मैंने प्रश्न किया।

    इस पर जवाब मिला, “सिविल लाइंस में एक इंजीनियर का नया बँगला बन रहा है। मैं वहाँ बुग्गी से ईंटें पहुँचाने गया तो देखा, इंजीनियरनी की जगह पर संध्या खड़ी है।...उसने मुझे पहचानकर भी नहीं पहचाना।

    इतना कहते-कहते वह जेब से एक लैंस निकालकर धूप से उसकी किरणें केंद्रित कर बीड़ी सुलगाने लगा और भावुक होकर बोला, संध्या के प्यार की निशानी है यह लेंस। एक दिन बायलॉजी लैब में मेंढक चीरते समय वह मुझे यही लेंस देने के बहाने लव-लेटर देने आई थी।...हम आज भी उसकी यह निशानी करेजवा से लगाए हुए हैं लेकिन देखो—उसने उस दिन हमारी औकात मनुष्य तो क्या, किसी मेंढक जितनी भी नहीं समझी, जिसे देखते ही वह अपनी स्टूडेंट लाइफ़ के दिनों को याद कर लेती।

    लटूर सिंह की इस मर्मभेदी बात पर मुझे लगा कि हम लोग जितने लड़के मेंढकों के पीछे भागा करते थे, हम सब भी तो मेंढक ही थे, जिन्हें कूदते फाँदते-भटकते हुए पता नहीं होता कि जाना कहाँ है?

    स्रोत :
    • पुस्तक : शताब्दी की कालजयी कहानियाँ (खंड 3) (पृष्ठ 414)
    • संपादक : कमलेश्वर
    • रचनाकार : गम्भीर सिंह पालनी
    • प्रकाशन : किताबघर प्रकाशन
    • संस्करण : 2010

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