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क़ौम

qaum

मंज़ूर एहतेशाम

और अधिकमंज़ूर एहतेशाम

    तब तक यह अंदाज़ा कि मैं ग़लत फँस गया हूँ, बहुत अच्छी तरह हो चला था।

    आप भी अगर यूँ सोचेंगे, सामने बैठी फ़रीदा दुपट्टे की कोर अपने हाथ की उँगलियों में लपेटते, ग़मगीन और कुछ-कुछ मायूसी में डूबे लहज़े में कह रही थी, तब तो फिर किसी से भी कुछ उम्मीद रखना बेकार है, अब्बा, अम्मा और दूसरे तमाम ख़ानदान वाले... अपना जुमला उसने पूरा नहीं किया।

    ख़ामोशी उभर आई और मेरे अंदर 'क्या कहना चाहिए' और 'क्या कहना चाहता हूँ' के बीच फिर रस्साकशी शुरू हो गई। मैं जानता था कि वह बड़े विश्वास और उम्मीद के साथ मेरे पास आई थी और मैं उससे यूँ टाल-मटोली में बातचीत कर रहा था। उसके आने से पल-भर पहले भी अगर मुझे इस समस्या का आभास हो जाता तो शायद मैं ख़ुद को कुछ तैयार कर लेता। हुआ कुछ यूँ कि मैं बिल्कुल अचानक ही पकड़ा गया और अगर ईमानदारी से कहूँ तो अभी मैं यह फ़ैसला नहीं कर पाया था कि सिचुएशन फ़िक्शन की किसी कलाकृति से उठाई हुई थी या उसका संघर्ष यथार्थ और सीधा-सीधा जीते-जागते लोगों से था। इसी दुविधा में फँसा मैं फ़रीदा के सामने यूँ मुँह बनाए बैठा था।

    'क्या ऐसा हो पाएगा!' आप ही आपमें बुदबुदाया।

    सलीम भाई, माफ़ कीजिए फ़रीदा के लहज़े में मायूसी अपनी जगह थी, क्या आपके सोचने और ज़िंदा रहने में भी इतना फ़र्क़ है? मैं तो आपको बाक़ी तमाम लोगों से कहीं ज़्यादा ईमानदार और खुले ज़ेहन का समझती थी।

    मैंने ऐसा कुछ कहा, जिससे तुम्हारी राय बदले?

    कहते तो फिर भी शायद सब्र जाता! लहज़े की कड़वाहट भरपूर थी, यह हैरानी और टालने का अंदाज़ तो कहीं ज़्यादा तकलीफ़देह है।

    मैं हैरान हूँ, बात टाल रहा हूँ। उसे बताने से ज़्यादा शायद सोचने के लिए ख़ुद कुछ और समय हासिल करने को मैं जम्हाई लेते हुए बड़बड़ाया, दरअसल, मुझे दो दिन पहले ही एक पुराने दोस्त से हुई मुलाक़ात याद गई। जो अपने आपमें मीठी नहीं है।

    मैं चुप हो गया था और वह सवालिया नज़रों से मेरी तरफ़ देख रही थी।

    तुम भी मेरे हवाले या किसी और तरह उसे या उसकी बीवी को जानती होंगी। ऐनक उतारकर रूमाल से शीशा साफ़ करते हुए मैंने कहा, दो दिन पहले तो मुसलमान लड़कों की सिफ़ारिश लेकर मेरे पास आया था, इस दर्द और शिकवे के साथ कि आज मुल्क में मुसलमानों को पूछता कौन है, मैं ख़ुद मुसलमान होने के नाते उसके लिए कुछ-न-कुछ करूँ।

    फ़रीदा की नज़रों से मैं अंदाज़ा लगा सकता था कि वह दोस्त को पहचान नहीं पाई। मैं, कुछ रुककर मैंने कहा, बासित की बात कह रहा हूँ...पहचानी?

    वह पहचान गई। उसने सिर्फ़ गर्दन हिलाकर कहा था और अजीब नज़रों से मुझे घूरती हुई बैठी थी।

    यह भी होता है। सीधे अपना मतलब बयान करने के बजाए मैंने ख़ुद को हलकी निशानदेही तक ही सीमित रखा, और आज से छह साल पहले यही बासित था जिसने अपने ख़ानदान तक से ताल्लुकात तोड़ लिए थे। यह भी होता है।

    आख़िर आप साबित क्या करना चाहते हैं? फ़रीदा की आवाज़ में मेरी अक़्ल के प्रति उदासीनता और सारे मुद्दे को लेकर थकान पैदा हो चुकी थी।

    समझदार और खुले दिमाग़ का तो मैं बासित और पद्मा को भी समझता था। शादी करते वक़्त अपने-अपने ख़ानदानों से दुश्मनी मोल लेते हुए कुछ-न-कुछ आदर्श, असूल तो उनके भी रहे होंगे। फिर छह साल और दो बच्चों के बाद दोनों के बीच एकदम इस्लाम कहाँ से गया।

    पूछा नहीं आपने? लाख बहादुर बनने की कोशिश के बाद भी फ़रीदा की आवाज़ सहमी हुई थी।

    पूछता क्या? मैंने कुछ झुँझलाहट से कहा, बताने को नया क्या होगा? किसी दूसरे दोस्त ने पूछ लिया तो गठरी खोलकर बैठ गए—उन्हीं चिथड़ों की जिन पर शादी से पहले थू-थू करते थे! छह साल में लगता है, उस गठरी के अलावा कुछ हाथ ही नहीं आया। बच्चों को कलमा सिखाने, कुरान पढ़ाने से लेकर क़ब्र और मौत के बाद की ज़िंदगी...सब सताने लगे। ऐसों से क्या पूछना।

    शुक्र है! फ़रीदा ने एक लंबी साँस खींचकर छोड़ते हुए कहा, आपने कुछ तो दिल बढ़ाया। ऐसे बुज़दिलों और कम अक़्लों की बात ही क्यों करे। मुझे तो आप बुज़दिल नहीं समझते?

    मैं ख़ामोश बैठा कंडीशनर की गुनगुन सुन रहा था। लाख चाहते हुए भी फ़रीदा से सीधा-सीधा यह नहीं कह पा रहा था कि बुज़दिल तो एक समय, जब दुनिया-जहान के विरोध के बावजूद बासित और पद्मा ने शादी की थी, मैं उन्हें भी नहीं समझता था। केवल इतना, वे दोनों तो मुझे हिम्मत-हौसले की मिसाल और आने वाली पीढ़ी के लिए एक आदर्श लगे थे। दोनों को पास से जानते हुए मैं उन्हें मूर्ख या कमअक़्ल भी नहीं कह सकता था।

    मैं तो सिर्फ़ यह कह रहा था, उसका सवाल नज़रअंदाज़ करते हुए, फ़रीदा की आँखों में अपलक देखते हुए मैंने दोहराया, कि यूँ भी होता है।

    लेकिन मैं बुज़दिल नहीं हूँ, सलीम भाई! अपने एक-एक शब्द पर ज़ो देकर, मुट्ठी हलके-से मेज़ पर मारते हुए फ़रीदा बोली, और, एक क्षण को वह रुकी, और वह।

    कौन? मैंने मासूम बनने का नाटक किया।

    सलीम भाई! मेरे अंदाज़ को मज़ाक़ समझकर उसने इठलाते हुए हँसकर कहा, आपको इस वक़्त भी मज़ाक़ सूझ रहा है। भैया, मेरे लिए, ख़ुदा के लिए, थोड़ी देर को संजीदा हो जाइए।

    तुम्हें मालूम है। मेरी आवाज़ ख़ुद-ब-ख़ुद संजीदा और भारी हो आई, बासित और पद्मा की शादी में मैं सबसे आगे-आगे था। अगर कोर्ट-मेरिजेज में भी कोई निकाही-बाप हुआ करता तो मैं उन लोगों का निकाही-बाप ही कहलाता और अब तुम अंदाज़ा करो, जो सूरतेहाल उन दोनों के बीच आजकल है; पद्मा मुसलसल बीमार रहती है, छह साल पहले की पद्मा कितनी सेहतमंद, ज़िंदादिल, हिम्मत-हौसले वाली लड़की थी, कोई सोच भी नहीं सकता, और बासित! लगता है, एकदम पागल ही हो गया। उसके घरवाले 'मुसलमान' एक बहुत ही फ़ंक्शनल सेंस में रहते हैं; नमाज़-रोज़ा तक ज़िंदगी में शायद ही कभी किया हो। लेकिन यह बासित तो पहले इंक़लाबी हुआ और उसके फ़ौरन बाद ही मोमिन हो गया! शायद हिंदुस्तान में भी 'निज़ामे-मुस्तफ़ा' टाइप की किसी चीज़ की तमन्ना करता होगा! मुझे उससे कोई हमदर्दी नहीं, लेकिन दिमाग़ यह सोचने पर मजबूर ज़रूर होता है कि ऐसा क्यों हुआ।

    लगता है! फ़रीदा के लहज़े में खीज थी लेकिन मैं आपके पास यह सब अंदेशे सुनने के लिए नहीं आई। मैं और अनिल शादी करना चाहते हैं, इस बात में असूलन क्या आपको कुछ ग़लत लगता है? लगता है तो दो-टूक कह दीजिए कि आप हमारी कोई मदद नहीं कर सकते। अगर एतराज़ नहीं है तो प्लीज! सलीम भाई, ख़ुदा के लिए, यूँ इम्तिहान लेने के बजाए हम दोनों की मदद कीजिए।

    मुझे ‘हम दोनों’ का इस्तेमाल खटक रहा था। जिस लड़के को मैंने देखा तक नहीं था उसके लिए दिल में एकदम कोई अपनाइयत पैदा कर पाना मेरे लिए संभव नहीं था।

    फ़र्ज़ करो, मैंने बहुत बुर्दवारी से टेबल पर रखे पेपर-वेट को उलटते-पलटते हुए कहा, फ़र्ज़ करो, मैं इंकार कर दूँ?

    फ़रीदा को हक्का-बक्का होते मैं देख रहा था। जैसे कोई अनहोनी उसके सामने हो गई हो।

    फ़र्ज़ करो, मैंने आवाज़ की मुलाइमत बरक़रार रखते हुए जोड़ा, मैं मदद करने से इंकार कर दूँ और इस शादी के खिलाऊ हो जाऊँ...तो क्या होगा?

    यह शादी होगी, सलीम भाई! फ़रीदा धीरे-धीरे जैसे अपने आपे में आते हुए मेरी आँखों में सीधे देखते बोली थी, चलिए! ज़बान तालू से लगाकर पछतावे के 'तच्' की आवाज़ निकालते हुए उसने बहुत कड़वे लहज़े में कहा, एक ग़लतफ़हमी और दूर हुई। शायद सब ही अंदर से कुछ होते हैं, नज़र कुछ और आते हैं।

    फ़रीदा दिल का ग़ुबार निकाल रही थी। मैं चुप बैठा सुन रहा था। जब एकदम कुर्सी खिसकाकर वह जाने को उठी तो मैंने थोड़ी सख़्ती और नाराज़गी से बैठ जाओ कहते हुए टेबल की दराज़ से लिफ़ाफ़ा निकालकर उसके सामने खिसका दिया। देखो इसे। अपनी नज़र दूसरी दिशा में फेरते हुए मैंने कहा। एक पल को बग़ावत और झिझक के मिले-जुले असरात उसके चेहरे पर आए, फिर टेबल से उठाकर वह लिफ़ाफ़ा खोलने लगी।

    इसका मतलब? लिफ़ाफ़े से निकली तस्वीर को मेरी ओर करते हुए उसने पूछा। तस्वीर एक जवान लड़के की थी।

    यह नईम है। मैंने आँखें मिलाए बिना धीरे-धीरे कहा, इंजीनियर है। बंबई में नौकरी करता है। कोई चार हज़ार के क़रीब माहाना तनख़्वाह, फ़्लैट, कार सब हैं।

    माँ-बाप नहीं हैं।

    मैं समझी नहीं।

    मेरी पहचान का है और पिछली बार जब शहर आया था तो तुम्हें भी देख चुका है शायद तुमने भी उसे देखा हो।

    मुझे याद नहीं। फ़रीदा ने उलझते हुए तस्वीर पर एक नज़र दौड़ाई। और देखा भी हो...तो?

    दरअसल! मैंने ठहर-ठहरकर अपनी बात में वज़न पैदा करने की कोशिश हुए कहा। मैं तुम्हारे यहाँ आने ही वाला था। अब्बा-अम्मा से मिलने। नईम ने तुम्हें देखा, तुम उसे अच्छी लगीं और वह चाहता है, मैं इस सिलसिले में बातचीत शुरू करूँ। आज ही फ़ोन पर बंबई बात हुई तो पूछ रहा था, मामला कहाँ तक पहुँचा।

    फ़रीदा ख़ामोश बैठी मुझे ताक रही थी। कुछ वैसा ही भाव था उसका जैसे कोई पालतू जानवर अपने ही मालिक के हाथों चोट खा बैठे।

    बहुत अच्छा लड़का, अच्छी नौकरी, और सास-ससुर के झंझट से पाक। बहुत ख़ुशनसीब लड़की होगी जिसे नईम-सा शौहर मिले।

    मिलिए आप अम्मा-अब्बा से। बहुत धामी आवाज़ में उसने कहा, हमदर्द हैं, आपसे यही उम्मीद की जा सकती है!

    तुमने, मैंने फ़ौरन ही वार करते हुए कहा, यह भी सोचा कि तुम्हारी जात के अलावा तम्हारी और तुम्हारे प्रिंस चार्मिंग क्या नाम बताया था? सुनील? नहीं-नहीं, अनिल की शादी का असर बाक़ी लोगों और ख़ानदान पर क्या पड़ेगा?

    क्या और कैसा ख़ानदान? फ़रीदा नाराज़गी से बोली, ख़ानदान वाले जब कुछ करते हैं तो सोचते हैं, उसका असर हम पर क्या पड़ेगा? किसी उलझन-परेशानी या मजबूरी में कोई ख़ानदान वाला आज तक काम आया है? हाँ, जब नाम रखने या उँगली उठाने का मौक़ा होता है, तब ज़रूर होते हैं ख़ानदान वाले सबसे आगे!

    मौत-मैय्यत में तो यही लोग साथ होते हैं।

    होते होंगे। मुझे ज़िंदगी की ज़्यादा परवाह है।

    दूर के रिश्तेदारों को छोड़ो। तुमने अपने घरवालों के बारे में भी सोचा अम्मा-अब्बा?

    सोचा! उसने बहुत कड़वाहट के साथ कहा, और इसीलिए आपके पास आई थी कि अगर आपने थोड़ा साथ दे दिया तो बहुत-सी चीज़ें आसान हो जाएँगी।

    अब्बा और अम्मा दोनों ही आपकी बात सुनते और मानते हैं।

    और बाक़ी घरवाले?

    मेरे अनिल से शादी करने पर मेरी बहनों को क्या एतराज़ हो सकता है। वे भी अनिल को जानती और पसंद करती हैं।

    क्या तुम्हें यह भी अहसास नहीं कि तुम घर की सबसे बड़ी बेटी हो? तुमने यह भी सोचा कि इस मनमानी शादी का असर बहनों की ज़िंदगी पर क्या पड़ेगा?

    फ़रीदा का फक होता चेहरा मेरे सामने था।

    नहीं सोचा तो मैं बताता हूँ, मनमानी करके जो होगा उसके नतीजे के लिए तुम ख़ुद को तो तैयार कर सकती हो और क़िस्मत ने साथ दिया तो हो सकता है, अपनी ज़िंदगी भी कामयाबी के साथ गुज़ार ले जाओ। मसला बनेंगी तुम्हारी होने वाली औलादें। यह तो हुई बाद की बात, शादी के फ़ौरन बाद क्या होगा, यह भी सोचते चलें। बहुत मुमकिन है, अम्मा-अब्बा तुम्हारी मुहब्बत की ख़ातिर इस शादी की इजाज़त दे ही दें। नहीं दें तो क्या, तुम्हें ज़्यादा-से-ज़्यादा 'आख' ही तो करेंगे। जीते-जी तुम्हारी सूरत नहीं देखेंगे, तो यह भी गवारा। वह लोग अपनी ज़िंदगी लगभग जी चुके, बरस-दर-बरस और जीते-जी तुम्हें कोसेंगे और अपने रास्ते जाएँगे। छोटी बहनों का क्या बनेगा? तुम किसी मालदार घराने की भी नहीं कि लोग पैसों की ख़ातिर या जो ख़ानदान के नाम पर बट्टा कहलाएगा, नज़रअंदाज़ करते हुए छोटी बहनों के लिए रिश्ता भेजें। कम-से-कम अच्छे या तुम्हारे बराबर के ख़ानदान वाले तो हरगिज़ नहीं भेजेंगे। नतीजा? क्या उन्हें भी तुम जैसे, जैसा तुम कहती हो 'आइडियलिस्ट और सेक्यूलर दिमाग़' के लोग मिल पाएँगे या वह अपनी जात और बिरादरी में अपने से बहुत कमतर लोगों के साथ ही ज़िंदगी बिताने पर मजबूर होंगी?

    फ़रीदा पत्थर बनी सुन रही थी। उसकी आँखों में आँसू भर आए थे जो कभी भी बह सकते थे।

    और कुछ पल के लिए मैंने ठंडी साँस लेकर कहा, दूसरी सबसे बड़ी बदक़िस्मती यह है कि घर में कोई लड़का नहीं, अगर कोई लड़का होता तो भी शायद सूरते-हाल इतनी संजीदा होती...

    मैं आगे क्या बोलता, फ़रीदा फूट-फूटकर हिचकियों से रोने लगी और मैं ख़ामोश बैठा पेपरवेट उलटता-पलटता रह गया। मुझे इस तूफ़ान की आमद का बहुत ख़ूब अंदाज़ा था। इसलिए कहीं अपने में ही दुबका इसके बीतने का इंतज़ार करता रहा। गुबार से गँदलाया आसमान हवा के साथ बहते पानी में घुलकर पाक-साफ़ होते मैंने बारहा देखा है। किस ख़ूबी से इसके बाद साफ़ उजली धूप निकलती है, जैसे धुली और बेशिकन आसमानी चादर सिर के ऊपर तन जाती है। कब यह आसमानी गेंदलाते झोंके चलना बंद होंगे। कब हम बिना ख़ौफ़ो-ख़तर अपनी मनचाही ज़िंदगियाँ जी पाएँगे?

    फ़रीदा मेरी सगी बहन नहीं थी और यूँ देखा जाए तो उसका मुझसे कुछ भी पैदाइशी रिश्ता नहीं था—सिवाय इसके कि हम दोनों मुसलमान थे। उसके माँ-बाप और बाक़ी बहनें भी मेरा ख़ासा ख़याल करते थे, क्योंकि फ़रीदा ने एक दिन, जब उसकी उम्र मुश्किल से दस-ग्यारह साल रही होगी, मुझे भाई बनाया था। यह रिश्ता काफ़ी मज़बूत हुआ और अब मैं चाहे हफ़्तों उसके घर जाऊँ, यह यक़ीन ज़रूर रहता था कि घरवाले कोई भी बड़ा क़दम उठाते हुए मेरी सलाह ज़रूर लेंगे। इस लंबे समय में फ़रीदा ने मुझे अपने अंदाज़ में समझाने की कोशिश भी की थी, जो कहीं-कहीं ठीक साबित होता था, कहीं ग़लत। मेरे लिए वह बिल्कुल छोटी बहन ही थी।

    मैं सलीम...! अपने सामने खड़े लड़के से ख़ुद का परिचय कराते हुए मैंने कहा, “फ़रीदा का भाई।

    लड़का मामूली सूरत-शक्ल का था। लंबा क़द, साँवला रंग और काले घुँघराले बाल। सिर्फ़ उसकी आँखें थीं जो एक मामूली चेहरे को ग़ैरमामूली बनाती थीं।

    नमस्ते। मेरे आगे बढ़े हाथ को उसने अपने हाथों में थामते हुए कहा, आइए न, अंदर ऑफ़िस में आइए। फ़रीदा अक्सर आपकी बात किया करती है।

    नहीं अनिल, मैंने उसे समझाने के अंदाज़ में कहा, फिर कभी। इस वक़्त सच पूछो तो एक ख़ास काम, तुमसे एक ख़ास बात करने आया था, जो शायद अंदर ठीक लगे। यह बताओ, तुम्हें आधे घंटे की फ़ुर्सत मिल सकेगी?

    उसने एक पल सोचने के बाद कहा, आप ठहरें, मैं अभी आता हूँ।

    अनिल कॉलेज में लाइब्रेरियन था।

    कितना वक़्त हुआ तुम्हें सर्विस ज्वाइन किए? अनिल के लौटने पर हम दोनों कार में बैठे, और इस शहर में आए?

    तीन साल हो जाएँगे, अगले महीने। उसने आँखें झपझपाकर मेरी ओर देखते हुए कहा, तभी से यहाँ हूँ।

    फ़रीदा तुम्हारी बहुत तारीफ़ करती है। बात को सीधे रास्ते लाने की कोशिश में मैंने कहा।

    बुरा तो शायद मैं आपको भी नहीं लगूँ। बिना अपनी बात में वज़न पैदा करने की कोशिश किए उसने सहजता से हँसकर कहा, वैसे मेरे सामने तो फ़रीदा आपके ही क़सीदे पढ़ती रहती है। उसने बताया, फ़रीदा बताती है, आपने बहुत अच्छी कहानियाँ लिखी हैं। एक पल की ख़ामोशी के बाद उसी संजीदगी से कहा, आपकी कुछ कहानियाँ तो, जैसा मैंने बताया, मैं ख़ुद तो उर्दू पढ़-लिख नहीं सकता, फ़रीदा ने मुझे पढ़कर सुनाईं, मुझे भी अच्छी लगीं।

    एक-आध हमें भी पता चलें? मैं कार का दरवाज़ा खोले बैठा था और हमारे क़रीबो-दूर लहराती हरियाली और वीराना था। कॉलेज से हम काफ़ी दूर निकल आए थे।

    अनिल एक पल को अपनी गहरी, संजीदा आँखों से मुस्कुराया था, इस वक़्त तो एक ही याद रही है। उसके लहज़े में ठहराव था। एक कहानी जो आपने हिंदू-मुस्लिम शादी को लेकर लिखी थी।

    हुँह! मैंने व्यंग्यात्मक आवाज़ में एक हुंकारा भरा था और सब कुछ ख़ामोश हो गया था। आसमान में मँडराती-चकराती चीलें अगर चिल्ला भी रही हों तो उनकी आवाज़ों की पहुँच हम तक नहीं थी।

    तुम्हें मालूम है, इस सकते को तोड़ते हुए कुछ देर बाद मैंने कहा! कार रुकी खड़ी थी लेकिन मेरे हाथों में दबा स्टेयरिंग बराबर हरकत कर रहा था, मेरा दिल क्या चाहता है? चाहता है, जो कुछ लिखा, सब फाड़कर चिंदी-चिंदी कर दूँ ख़ासकर वह कहानी जिसका ज़िक्र तुमने अभी-अभी किया!

    क्यों? बग़ैर किसी चौकन्नेपन को दर्शाए आवाज़ मुझसे सवाल कर रही थी।

    क्योंकि वह सब झूठ है! लिखा जा सकता है सिर्फ़, जिया नहीं जा सकता।

    आप जो कुछ कह रहे हैं, उसने थमे हुए स्वर में कहना शुरू किया, जिसमें बहुत कुछ सच होगा या सच है, इससे मैं इंकार नहीं करता। उम्र में फ़र्क़ भी पड़ता है। बिल्कुल पड़ता होगा, मैं सोच सकता हूँ। इस सबके बावजूद दुनिया बदल रही है, और शायद हर समय में अपनी ज़रूरतों और सहूलियतों के हिसाब से बदलती रहती है...यह भी शायद मैं कोई नई बात नहीं कह रहा। आपने मुझसे ज़्यादा दुनिया देखी है। आपको ज़्यादा ठीक से अंदाज़ा होगा। और सलीम भाई! अगर आप मुझे भाई कहने का हक़ दें तो, मैं दुनिया को बदलने पर सचमुच विश्वास करता अपने ढंग से कोशिश भी करता हूँ और जानता हूँ कि एक एक दिन इसका नतीजा ज़रूर निकलेगा।

    किसी अक़्लमंद का कहना है कि जो अठारह साल की उम्र में क्रांति के बारे में सोचे, उसके दिल के साथ गड़बड़ है, लेकिन जो चालीस के बाद भी सोचता रहे उसके दिमाग़ में कोई ख़राबी है! मेरी उम्र तुम देख रहे हो!

    बात पूरी होने से पहले ही वह खिलखिलाकर हँसने लगा था। बेक़ाबू हँसते उसकी आँखों से आँसू बह निकले थे और काफ़ी कोशिश के बाद उसने हँसी को रोका था।

    मैं तो जो हूँ, आपके सामने हूँ। और सिर्फ़ इसी वजह से नहीं कि मेरी उम्र चालीस से कम है। कहकर वह फिर बेक़ाबू हँसने लगा।

    ख़ुद को क्रांतिकारी साबित करने का बस, यही एक तरीक़ा रह गया है कि मुसलमान लड़की से शादी कर डालो!

    उसके हँसने की आवाज़ और चेहरे पे खेलती मुस्कुराहट एक पल में ग़ायब हो गई और उसकी जगह संजीदगी किसी घनी छाँव की तरह घिर आई। अगर मेरे कहे से उसे कोई चोट लगी या तकलीफ़ पहुँची हो तो उसकी तड़प उस छाँव में छिप गई और कम-से-कम मैं उसे नहीं देख पाया।

    आप जानते हैं। मुस्कुराहट उसके चेहरे पर फिर लौट आई थी, लेकिन अब उसमें बच्चों-सी शोखी के बजाए बूढ़ों-सी संजीदगी थी, मैं फ़रीदा से शादी ख़ुद को कुछ साबित करने के लिए नहीं करना चाहता। मुझे विश्वास है, इतनी देर में आपको यह तो अंदाज़ा हो गया होगा। और अगर नहीं हुआ तो फिर मैं आपको समझा भी नहीं सकता।

    तुमने इस शादी के दूसरे नतीजों के बारे में भी सोचा है? फ़रीदा अपने घर की सबसे बड़ी लड़की है। इस शादी के बाद बाक़ी छोटी बहनों का क्या होगा? उनकी शादियाँ किससे होंगी?

    जैसे दुनिया में और लड़कियों की होती है, वैसे ही उनकी भी होंगी।

    हर घर की लड़की इतनी ख़ुदसर नहीं होती कि अपने मज़हब के बाहर किसी से शादी करने की सोचे! और तुम जानते हो, फ़रीदा का ताल्लुक एक मिडिल क्लास घराने से है, जिसमें दान-दहेज की भी कोई कशिश नहीं। जो कुछ भी देने को है, वह बस, यही पढ़ी-लिखी लड़कियाँ हैं। ख़ान साहब—फ़रीदा के अब्बा—आने वाले चंद महीनों में रिटायर हो जाएँगे। औलाद में लड़का कोई है नहीं। इन हालात में तुम ख़ुद फ़रीदा के एक हमदर्द की हैसियत से सोचो, बाक़ी घरवालों और छोटी बहनों का क्या बनेगा?

    उसके चेहरे पर रवानी के साथ बदलते भाव में देख सकता था। लगा जैसे मैंने जो कुछ उससे ऊँची आवाज़ में कहा, उसमें कुछ भी नया नहीं था। वह ख़ुद इन चीज़ों को सोच चुका है। शायद सिर्फ़ इतना ही नहीं, इसके आगे भी।

    फिर आप बताएँ... उसने गंभीर स्वर में कहा। पल-भर को उसका चेहरा बिल्कुल सादा हो गया था वहाँ कुछ भी नहीं था पढ़ने को, क्या किया जा सकता है?

    ख़ामोशी! आसमान में मँडराती चीलें भी नज़र से ओझल हो चुकी थीं। कार में बैठे-बैठे हलकी गर्मी-सी लगने लगी थी।

    तुम्हें देर हो रही है। मैंने घड़ी देखते हुए इस लंबी ख़ामोशी को तोड़ा, अभी नहीं, चाहो तो तुम सोचकर मुझे बाद में बता सकते हो।

    सोचना कुछ नहीं। उसने उसी फ़ुर्सत और इत्मीनान के लहज़े में सिगरेट का गुल झाड़ते हुए कहा, हद यह कि मेरे बारे में तो जो आपको सोचना था वह आपने भी नहीं सोचा। बहनें और दूसरे घरवाले तो मेरे भी हैं। और इस शादी के बाद जो हालात पैदा होंगे, उनका सामना तो मुझे अपनी ज़िंदगी में भी करना पड़ेगा। बहरहाल, वह मेरी अपनी समस्या है जिसे नज़रअंदाज़ करने का मुझे आपसे कोई गिला नहीं! फ़रीदा की समस्या जो आपने सामने रखी, तो मैं बताऊँ—धर्म-वर्म का महत्त्व मेरी नज़रों में इतना है नहीं। सिर्फ़ दुनिया को ही दिखाने की बात है तो मैं जैसा हिंदू, वैसा मुसलमान! मैं किसी भावुकता में बहकर कुछ नहीं कह रहा। अगर इससे फ़रीदा की बहनों के भविष्य पर कोई अच्छा असर पड़ सकता है तो मैं दिखावे का मुसलमान हुआ जाता हूँ। मेरे घरवालों की चिंता आप करें, वह मेरी समस्या है! लेकिन... वह एक पल को रुका था—लेकिन यह शुद्ध और निरा पाखंड होगा। एक झूठा दिखावा, जिससे अगर कुछ देर के लिए किसी का कुछ बिगड़ने से बचता है तो मैं तैयार हूँ।

    मैं सकते के आलम में बैठा, उसका चेहरा देखता रह गया।

    मुझे फ़रीदा अच्छी लगती है, जीवन उसके साथ बिताना चाहता हूँ...इस विश्वास के साथ कि वह भी ऐसा ही चाहती है। लड़का होने के नाते मैं कुछ ऐसे बड़े क़दम भी उठा सकता हूँ जिनकी उम्मीद लड़की होने के नाते उससे नहीं की जा सकती।

    यह बात'', मैंने अटकते-से स्वर में कहा था, तुमने यह बात फ़रीदा से तो नहीं की?

    अभी नहीं, लेकिन समय आने पर...

    यह बात तुम उससे कभी मत कहना! अपने लफ़्ज़-लफ़्ज़ पर ज़ोर देकर मैंने कहा, कभी नहीं!

    यह फ़िज़ूल की बात है। मेरा जुमला ख़त्म होने से पहले ही ख़ान साहब झँझलाकर बोले, प्रेक्टिकल! थ्योरेटिकल! अमाँ, जिस चीज़ को अपनाया ही नहीं जा सकता उसकी तारीफ़-ताईद, मेरी नज़रों में दोनों फ़िज़ूल हैं।

    मज़हब भी, एहतियातन मैंने बहुत धीमे स्वर में कहा, लोगों के लिए आजकल कुछ ऐसी ही चीज़ होकर रह गया है।

    तौबा, तौबा! बेगम साहिबा ने अपने गाल पीटे थे और ख़ान साहब गर्दन हिलाकर किसी गहरी चिंता में डूब गए थे। उनकी नजरें खिड़की के बाहर फैली धुँधली धूप में भटक रही थीं।

    सलीम मियाँ, देखो बेटे! ख़ान साहब मेरी ओर वापस मुड़े थे, तुम्हारा अपना सोचने का ढंग है और मैं उस पर रायजनी करने वाला कोई नहीं होता। इस वक़्त जो मसला दरपेश है, बात उसी को लेकर करें तो ज़्यादा बेहतर होगा। तुम ही ज़रा ठंडे दिमाग़ से सोचकर मुझे मशवरा दो, कोई हल सुझाओ, मैंने मानने से कब इंकार किया है! मेरे सारे हालात बख़ूबी जानते हुए कोई हल तुम्हें अच्छी तरह मालूम हैं कि कठमुल्ला नहीं, लेकिन यहाँ बात उससे बहुत आगे की है।

    मियाँ! बेगम साहिबा आबदीदा होकर कह रही थीं, हमारा इन बेटियों के अलावा और सगा है कौन...या... वह पल-भर रुककर बोली थीं, अल्लाह तुम्हें जीता रखे, एक तुम हो जिसे जब-तब परेशान कर लेते हैं। कोई भी माँ-बाप अपनी औलाद की ख़ुशी से ज़्यादा क्या चाहेगा? और इसीलिए यह सोच पाना भी मुमकिन नहीं कि पल की ख़ुशी, उम्र का जलापा बन जाए।

    लेकिन, मैंने बहुत धीमे से कहा, यह तमाम समझदारी की बातें करते हम एक चीज़ बिल्कुल भूल रहे हैं। ईमानदारी से देखा जाए तो फ़रीदा बालिग है और उसे उसकी मर्ज़ी के ख़िलाफ़ शादी करने पर मजबूर नहीं किया जा सकता। आपकी सारी परेशानियों से इत्तिफ़ाक़ करते हुए भी यह मैं फ़रीदा और उस लड़के की भलमनसाहत ही कहूँगा कि उन्होंने कोई क़दम आपकी मर्ज़ी के ख़िलाफ़ नहीं उठाया है—यह जानते हुए भी कि कोई उनके साथ नहीं होगा, ख़िलाफ़ ही होंगे।

    कैसे उठाती! बेगम साहिबा तुनककर बोलीं, कुछ ख़ानदान और परवरिश के भी माने होते हैं। हिम्मत कैसे कर सकती थी इतनी! पूछा।

    अपन लोग उसका या उन दोनों का क्या कर लेते? मैंने सहजता के साथ पूछा।

    टाँगें तोड़ देती मैं उस कमीनी की! बेगम साहिबा का ग़ुस्सा बढ़ता जा रहा था, आवाज़ ऊँची हो गई थी, जीते-जी उसकी शक्ल नहीं देखती, दूध नहीं माफ़ करती! शादी करने से क़ानूनन रोक नहीं सकतीं।

    यह सब कर सकती थीं, मैंने बहुत इत्मीनान के साथ कहा, लेकिन उसे बेगम साहिबा होंठों ही होंठों में बुदबुदाती शायद अपने मुक़द्दर को कोस-पीट रही थीं और ख़ान साहब की आँखें एक ख़ास चमक लिए, खिड़की के बाहर भटक रही थीं। सबीहा, फ़रीदा से छोटी बहन चाय-नाश्ते का सामान लिए कमरे में गई।

    लो मियाँ, बिस्किट की प्लेट मेरी ओर खिसकाती बेगम साहिबा बोली और चाय की प्याली में चमचा चलाने लगीं। तभी ख़ान साहब ने एक ज़ोर का ठहाका लगाकर हँसना शुरू कर दिया और बेगम साहिबा और मैं दोनों ही फ़िक्रमंद, संदेह-भरी नज़रों से उनकी ओर देखने लगे।

    कुछ नहीं, ख़ान साहब ने हँसते हुए अपनी पत्नी की आँखों में आँखें डालकर कहा, ऐसे ही ख़याल आया कि क्या पता, सलीम मियाँ जिसको ख़तरा बनाकर हमारे सामने रख रहे हैं, वह अभी तक हो भी चुका हो!

    क्या मतलब? बेगम साहिबा सचमुच नहीं समझी थीं। वह एक सादा, घरेलू औरत थीं; अपनी अक़्ल का उन्हें कोई दावा था भी नहीं।

    मतलब यह कि आपकी बिटिया का ब्याह अभी तक हो भी चुका हो!

    हाय अल्ला! बेगम साहिबा के हाथ में चाय की प्याली डगमगाई कैसी मनहूस बातें करते हैं आप! ज़ुबान पर लाने से पहले कभी सोच भी लिया कीजिए!

    अरे आप मर्द, सब एक जैसे! उनका आँसू बहाना, नाक सुडकना, साड़ी का पल्लू भीगना शुरू हो गया, अरे, कभी एक माँ के दिल से सोच लिया कीजिए!

    ख़ान साहब ने तो सिर्फ़ एक बात कही। मैंने बेगम साहिबा को दिलासा देने की कोशिश में कहा।

    जो सही भी हो सकती है! ख़ान साहब की तेजाबी हँसी तंज में बुझी थी—क्यों, सलीम मियाँ!

    सही तो कोई बात भी हो सकती है! लाख क़ाबू रखने की कोशिश के बाद भी मेरे स्वर में थोड़ी झुँझलाहट ही गई, जिसे ख़ान साहब ने फ़ौरन महसूस कर लिया। एक ख़ामोशी जिसमें सिर्फ़ बेगम साहिबा के कभी-कभी सुबकने की आवाज़ उभर आती, और अगर अभी तक नहीं, मैंने ख़ुद पर कंट्रोल करने की कोशिश करते हुए कहा, तो लगता है, आगे हो जाएगा।

    लो! ख़ान साहब हँस ज़रूर रहे थे लेकिन उस हँसी में बहुत टूटन थी, देख लिया!'' वह बेगम साहिबा से अपनी दिलशिकनी छिपाते हुए हँसकर कह रहे थे, अपने सलीम मियाँ ही धमकी दे रहे हैं। यह भी तो फ़रीदा के भाई हैं। अब बताओ, क्या करें? अब तो मामला धमकी तक पहुँचा है।

    कोई धमकी नहीं। मैंने ख़ान साहब की तरफ़ झुकते हुए बहुत मुलाइमत के साथ कहा, “यक़ीन जानें, मैं आपके हुक्म के ख़िलाफ़ कुछ नहीं होने दूँगा, चाहे वह मेरी मर्ज़ी के कितना भी ख़िलाफ़ हो, बुज़ुर्गों का एहतिराम करना हमारी रिवायत रही है और इसे क़ायम रखने में हमने बड़ी-से-बड़ी क़ुरबानी दी है। क्या होगा, ज़्यादा से-ज़्यादा दो लोगों की ज़िंदगी ही बर्बाद होगी, तो रिवायतों के एहतिराम की ख़ातिर यह भी हँसी-ख़ुशी क़बूल! आप फ़िक्र मत कीजिए, अनिल और फ़रीदा की तरफ़ से यह गारंटी मैं देता हूँ। सब कुछ आपकी मशा और मर्ज़ी के मुताबिक़ होगा।

    सिर्फ़ बेगम साहिबा के सुबकने की आवाज़।

    और यह सब इस तरह का पहला मौक़ा तो होगा नहीं। मैंने धीमे स्वर में बात जारी रखी, जाने मुल्क के कितने नौजवान इन रिवायतों को क़ायम रखने के लिए अपनी ज़िंदगी जीते-जी जहन्नुम बनाते आए हैं और... मैंने लंबी साँस लेकर एक उचटती-सी नज़र खिड़की के बाहर दौड़ाई जहाँ रोशनी का गंदलापन घुटन का माहौल बनाए हुए था, और ज़्यादा दूर भी क्यों जाया जाए, अपने आसपास, क़रीब, बल्कि ख़ुद को ही लेकर बात करें तो चीज़ें ज़्यादा आसानी से समझ में पाएँगी। कम-से-कम मैं तो ख़ुद को लेकर बात कर ही सकता हूँ।

    बेगम साहिबा की आँसुओं में डबराई और ख़ान साहब की टटोलती, टोह लेने की कोशिश करती आँखें मेरी तरफ़ तक रही थीं।

    बेगम साहिबा... मैं जब उन्हें संबोधित कर रहा था तो अपनी आवाज़ भी किसी फ़ासले से आती लगी, मुझसे जान-पहचान और ताल्लुक के इस लंबे अरसे में एक सवाल आपने ख़्वाहिश के लहज़े में बारहा पूछा है; हमेशा 'क्यों' से बचकर, यह कहते हुए—मुझे शादी कर लेनी चाहिए। मैं जानता हूँ कि इसके पीछे आपकी मुझसे मुहब्बत और मेरे आने वाले वक़्त को लेकर पैदा हुई फ़िक्र ही काम करते रहे हैं। साथ ही साथ मुझे यह भी अंदाज़ा है कि उम्र, जो अब चालीस साल होने जा रही हैं, इस बात की गुंजाइश नहीं छोड़ती कि बाक़ी चंद सालों के लिए कोई बड़ा क़दम उठाने की हिम्मत की जाए। लेकिन मैं यहाँ, उम्र की इस सरहद तक पहुँचा कैसे, अंदाज़ा है आप लोगों को?

    मैंने चाय की आख़िरी चुस्की लेकर प्याली रखते हुए देखा, ख़ान साहब की चाय वैसी ही रखी थी। उनका दाहिना पैर हिल रहा था। दोनों हाथ सीने पर बँधे हुए, गर्दन बाएँ कंधे की ओर मुड़ी हुई और नजरें बाहर धीरे-धीरे अँधेरे में तब्दील होते धुँधलके में एक लाचारी से गड़ी हुई थीं।

    शायद कुछ अंदाज़ा तो आपको पहले से ही रहा हो। ख़ामोशी को फिर मेरी ही आवाज़ ने तोड़ा, और जो तफसील जानते हैं, उनको भी आज हो सकता है, सारी बात एक हिमाक़त और बेवक़ूफ़ी से ज़्यादा लगती हो। ख़ुद मैंने ज़िंदगी में इस बात को लेकर कभी मुँह खोला और अगर आज यह मौक़ा आता, तो कभी खोलता। सुनेंगे आप लोग मेरी बात?

    उन लोगों को मेरी ओर देखने को 'हाँ' मानकर में शुरू हो गया था। था क्या कहने को? बहुत संक्षिप्त। मेरी ज़िंदगी का पहला और आख़िरी संबंध, साथ पढ़ने वाली एक लड़की से था, जो इत्तिफ़ाक़ से हिंदू थी। हम दोनों एक-दूसरे को पसंद करते थे, शादी करना चाहते थे। बीच में दोनों तरफ़ के बुज़ुर्ग मय अपनी-अपनी रिवायतों के धमके।...नतीजा? हमेशा की तरह रिवायतें जीत गई। हम दोनों ने ख़ुद ही मिलकर तय किया कि अपने बड़ों के लिए अड़चनें पैदा करने के बजाए हमें उनका कहा मान लेना चाहिए। यूँ हुआ मैं और मेरी ज़िंदगी के इतने साल!

    लेकिन! बात ख़त्म होने पर ख़ान साहब ने बहुत संजीदगी से मेरी तरफ़ देखते हुए कहा, उस लड़की की तो बाद में कहीं शादी हुई होगी। और आज वह अपने शौहर और बच्चों के साथ ख़ुशो-ख़ुर्रम ही होगी। बात में सवाल नहीं जैसे मेरी याद-दहानी थी।

    ख़ुशो-ख़ुर्रम!” मेरे लहज़े में कड़वाहट थी। हाँ, शायद ख़ुशो-ख़ुर्रम ही हो। लेकिन दो लोग ख़ुशी-ख़ुर्रम रहते, क्या यह ज़्यादा बेहतर होता?

    यह सब जज़्बातियत है, मियाँ! ख़ान साहब जैसे अपने आपसे ही चिढ़कर बोले थे, उम्र दाना और भूसा, दोनों फटककर अलग कर देती है!

    मुझे आप क्या कहेंगे?

    कोई जवाब नहीं। दोनों ख़ामोश, नज़रें गाड़े बैठे थे।

    और जज़्बात क्या कोई गाली जैसा लफ़्ज़ है? मैं होंठों ही होंठों में बुदबुदा रहा था, नौजवानी क्या अपने आपमें जिए जाने लायक़ चीज़ ही नहीं? क्यों हम नौजवानों को अपने तज़ुर्बे सुना-सुनाकर, उम्र के भारी-भरकम हिंदसों से सहमाकर, वक़्त से पहले बूढ़ा करने पर तुले रहते हैं! हमारी ग़लती क्या हर एक इंसान के लिए, सही और ग़लत के बीच फ़ैसला करने का कोई पैमाना हो सकती है?

    यह तुम्हारी भलमनसाहत है मियाँ, कि इतनी तकलीफ़ उठाकर भी किसी को इल्ज़ाम नहीं दे रहे। बेगम साहिब इस अंदाज़ से बोली थीं जैसे मुझे दिलासा देना उनका फ़र्ज़ बनता हो। और उसने घर भी बसा लिया! देखा, यह फ़र्क़ होता है...

    हिंदू और मुसलमान के बीच, ना? जुमला ख़ान साहब की मज़ाक़ उड़ाती, तेज़ाब में बुझी आवाज़ ने पूरा किया। मुसलमान कुँवारा मरना पसंद करता है! इस हिसाब से तो फिर शायद अपनी फ़रीदा भी कुँवारी ही ज़िंदगी बिताए! यही कहना चाहती हो ना आप?

    बेगम साहिबा अपने ही शब्दों की पकड़ में आकर तौबा-तिल्ला करने पर मजबूर हो गईं। फिर इससे फ़ारिग़ होकर उन्होंने एकदम वह बात कह दी, जिसका मुझे का से ख़तरा और इंतज़ार था।

    ऐसा क्यों नहीं करते, मियाँ! उन्होंने विनती के स्वर में बहुत धीमे से कहा इतना ऊँचा कि सिर्फ़ में सुन-भर सकूँ, उससे कहो कि इस्लाम क़बूल कर ले।

    मुझे अच्छी तरह अंदाज़ा था कि ख़ान साहब ने अभी बोला गया एक-एक शब्द सुना है, लेकिन वह बेख़बर बने बैठे रहे।

    ख़ान साहब, कुछ देर की ख़ामोशी के बाद मैंने उन्हें पुकारा, आपने सुना बेगम साहिबा का मशवरा? आपको इत्तिफ़ाक़ है?

    वह चुप रहे, सिर्फ़ उनका पैर तेज़ी से हिले जा रहा था।

    सोच लीजिए आप दोनों कि क्या यह मुनासिब रहेगा, मैंने जैसे अपने आपसे ही कहा था, अनिल के सामने यह शर्त रखी जा सकती है, वह क़बूल करता है या नहीं, इसके लिए तो इंतज़ार करना पड़ेगा। वैसे ख़ुद उसने तो फ़रीदा से एक बार भी यह नहीं कहा कि तुम अपना मज़हब छोड़ दो।

    अभी कहें, मियाँ! बेगम साहिबा बोली थीं, आख़िरकार तो औरत को ख़ुद मर्द के रंग में रहना ही पड़ता है। और फिर बच्चे तो बाप के नाम...

    ऐसी सूरत में सबसे बड़ी मरन तो बच्चों की हो जाती है! ख़ान साहब के होंठ आप ही आप खुलकर बंद हो गए थे।

    तसलीम। मैंने सिर झुकाकर कहा, लेकिन जो आदमी आज एक लड़की के लिए मज़हब छोड़ सकता है, कल क्या किसी बड़ी चीज़ के लालच में अपनी बेटी को नहीं छोड़ सकता? क्यों उसे आप एक बेमसरफ इम्तिहान में डालना चाहते हैं?

    बात बग़ैर किसी नतीजे पर पहुँचे दायरों में घूम रही थी।

    तुम बताओ, क्या करें? एक बार फिर सवाल मेरे सामने खड़ा कर दिया गया था, जो तुम मशवरा दोगे, वही करेंगे।

    मशवरा मैं कुछ नहीं दे सकता, सिर्फ़ जो ख़ुद सोचता हूँ, वह आपके सामने रख सकता हूँ। मैंने थककर कहा, कोई गारंटी नहीं है किसी भी चीज़ की। हो सकता है, जो तमाम ख़तरे आप सोच और गिना रहे हैं. सौ फीसदी सच साबित ही, हो सकता है, ऐसा कुछ भी हो। रिस्क तो है, लेकिन उससे शायद कुछ ही ज़्यादा जितना फ़रीदा को किसी मुसलमान लड़के से व्याहते हुए होता। मैं पूछता हूँ, ऐसी शादियाँ अव्वल तो होती कितनी हैं और उनमें जो ख़ुशहाल रहते हैं उनका ज़िक्र कोई नहीं करता? सिर्फ़ उन मिसालों को क्यों चुना जाता है जिनमें कुछ कड़वाहट या बदमजगी हो? मैं आपको इल्ज़ाम नहीं दे रहा। सब यही करते हैं, मैं भी करता हूँ।

    आख़िर कब तक चीज़ों को संजीदगी से समझे बग़ैर हम सिर्फ़ रिएक्ट करते रहेंगे। मुझे नहीं लेना कुछ अपने पुरखों की शानदार तारीख़ से जिसमें उन्होंने हिंदुस्तान पर सदियों हुक़ूमत की, उस अलहदगी के जज़्बे से जिसने मुल्क का बँटवारा कराया। मुझे अपनी ज़िंदगी यहाँ और इन लोगों के बीच बितानी है जो मुझे तमाम फ़र्क़ के ढिंढोरा पीटे जाने के बाद भी एक-से लगते हैं। कब हम मानेंगे कि एक फ़र्क़ की पब्लिसिटी कुछ लोगों की रोज़ी-रोटी और वजूद बनाए रखने का तरीक़ा है और इससे नुक़सान वह उठा रहे हैं जिनके किए से लोग आपस में क़रीब सकते हैं।

    ऐसी शादियों से पैदा हुए बच्चे...कितनी शादियाँ और कितने बच्चे!! इन बच्चों की हो तो जाने दीजिए, तादाद इतनी कि उन्हें गिना या एक मसला समझा जा सके और इस मसले का हल मैं और आप नहीं, वहीं लोग खोजेंगे जो इस आपस के मिलने से पैदा होंगे।

    कुछ दिन और यूँ ही चलेगा। आपसी डर, शको-सुबह, हिचकिचाहट...लेकिन आख़िर कब तक? अलग-अलग मज़हब के मानने वाले हैं जिन्हें एक क़ौम की हैसियत से जीना है। कल सूरतेहाल बदलेगी और इस रिश्ते की ख़ूबसूरती को सराहा जाएगा। कल यह तसलीम किया जाएगा कि इन अलग-अलग इकाइयों में बाँट दिए गए लोगों में रिश्ता मज़हब से कहीं गाढ़ा है। कभी-न-कभी तो कुछ अच्छा होगा, ख़ान साहब, बेगम साहिबा...कोई-न-कोई तो ज़रूर ख़ुशो-ख़ुर्रम जी पाएगा। शादी होने दीजिए। इन लोगों के बीच आने के बजाए इन्हें सिर्फ़ वक़्त को सौंप दीजिए। ताकि कल जब वह अच्छा वक़्त आए तो फ़रीदा और यह लड़का उन पछताने वालों में से हों जिन्होंने हिम्मत तो की, मगर फिर पीछे हट गए। आपको मालूम है, आज मुझे सबसे बड़ा पछतावा क्या है? कि मैंने उन तमाम रस्मो रिवायत की परवाह क्यों की और ज़िंदगी जैसे सोची थी, उस तरह क्यों नहीं गुज़ारी। लेकिन अब मैं सिर्फ़ पछता ही सकता हूँ।

    नौजवानी बड़ी सखी, बहुत दरियादिल होती है, ख़ान साहब, बेगम साहिबा, एक इशारे पर उम्र ख़ैरात कर देने का हौसला रखती है। मत कीजिए! फ़रीदा और अनिल को अपनी ज़िंदगी ख़ैरात करने पर मजबूर मत कीजिए। इसके बदले मैं, बावजूद कि मेरा अकीदा किसी ख़ुदा, किसी भगवान में नहीं, सारी ज़िंदगी हाथ उठाकर आप दोनों के लिए दुआ करूँगा!

    मुझे नहीं मालूम, बोलते-बोलते मैं कब उठकर खड़ा हो गया। खिड़की की चौखट मैंने भींचकर पकड़ी हुई थी और आँखों में नमी से चश्मा धुँधला गया था। ख़ान साहब और बेगम साहिबा मेरे पास खड़े थे। उनके हाथों का गर्म स्पर्श मैं अपने सिर और पीठ पर महसूस कर रहा था।

    सलीम मियाँ! सलीम मियाँ! ख़ान साहब मुझे पुकार रहे थे, कैसे बेटे हो यार, तुम हमारे!'' उनकी रुँधी हुई आवाज़ मुझ तक पहुँच रही थी—हम पर भरोसा नहीं! अब तुम्हारा क्या होगा या हम जैसे सठियाते लोगों का! पानी पियो। बैठ जाओ! यह कैसा बहादुर भाई है फ़रीदा का! उन्होंने मेरे गाल थपथपाकर कहा।

    बुलाओ ना, यह लड़की है कहाँ? वह बेगम साहिबा से कह रहे थे, देखो, अंदर ही होगी।

    जब मैं वहाँ से चलने को हुआ तो रात ख़ासी बीत चुकी थी। बाहर सड़कों पर उस समय घना कोहरा बसा हुआ था और कुछ दूर का सूझना भी दूभर हो रहा था।

    बहुत ख़ुशी और हलका महसूस करता मैं आप ही आप मुस्कुराया और अगले ही क्षण गहरी चिंता में डूब गया।

    स्रोत :
    • पुस्तक : शताब्दी की कालजयी कहानियाँ (खंड 3) (पृष्ठ 316)
    • संपादक : कमलेश्वर
    • रचनाकार : मंज़ूर एहतेशाम
    • प्रकाशन : किताबघर प्रकाशन
    • संस्करण : 2010

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