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जीवन-मूल

jivan mool

लियो टॉल्स्टॉय

लियो टॉल्स्टॉय

जीवन-मूल

लियो टॉल्स्टॉय

और अधिकलियो टॉल्स्टॉय

    एक

    एक रैदास-मोची अपने स्त्री-बच्चों के साथ एक किसान की झोंपड़ी में रहा करता था। नाम था ननकू। उसके पास अपनी ज़मीन नहीं थी, घर। रोज़ जूते गाठकर रोज़ी चलाता था। पर काम का भाव सस्ता था और अनाज का महँगा। सो जो कमाता था, खाना जुटाने में ख़र्च हो जाता। स्त्री-मर्द के बीच जाड़ों के लिए बस एक लोई थी। वह भी चिथड़े हो चली थी। यह दूसरा साल था कि दोनों सोचते थे कि अबके दोहर-लिहाफ़ बनवाएँगे। सो जाड़ों के दिनों तक ननकू ने उसके लिए कुछ पैसा बचा भी लिया था। पाँच का एक नोट घर के बक्स की तलहटी में रखा था और कोई इतना ही पैसा बस्ती में लोगों से उसे लेना निकलता था।

    सो एक सवेरे कंबल-लोई लेने के ख़याल से ननकू बस्ती जाने को तैयार हुआ। उसने कुरता पहना, उस पर बीबी के बदन की मिरजई, और ऊपर एक गाढ़े की चादर डाल ली। नोट जेब में रखा। झाड़ से एक डंडा तोड़ सहारे को हाथ में लिया, और कलेऊ करके राम-नाम ले रवाना हो लिया। सोचा कि जो पाँच रुपए बस्ती में लेने निकलते हैं, वे भी उगाह लूँगा। सो पाँच तो वे, पाँच ए—दस रुपए में जाड़े के लिए ख़ासे गरम कपड़े हो जाएँगे।

    बस्ती में आया और अपने कर्ज़दार एक किसान के घर गया। लेकिन किसान घर पर मिला नहीं। स्त्री थी, सो स्त्री ने वचन दिया कि पैसा अगले हफ़्ते मिल जाएगा, मैं ख़ुद तो दे कहाँ से सकती हूँ। तब ननकू दूसरे द्वारे पहुँचा। उस आदमी ने भी क़सम दिलाकर कहा कि इस वक़्त पास पैसा है नहीं, नहीं तो मैं क्या मुकरने वाला था? ये पाँच आने हैं, चाहो तो ले जाओ। हालत यह देख ननकू ने कोशिश की कि कुछ तो नक़द दे दूँ, बाक़ी उधार हो जाए, और ऐसे एक लोई ले ही चलूँ। लेकिन दुकानदारों में से किसी ने भी उसका भरोसा किया। कहा कि पैसा ले आओ फिर मन-पसंद लोई छाँट ले जाना। तुम जानो, वसूली में भाई, बड़ी मेहनत लगता है।

    नतीजा यह कि बस्ती में ले देकर जो ननकू ने कमाई की सो कुल जमा पाँच आने। हाँ, एक आदमी ने अपना जोड़ा भी दिया था कि इसके तले मोटा चमड़ा लगाकर ठीक कर देना।

    ननकू का मन इस पर ढीला हो आया। पाँच आने जो मिले, उन्हें दारू में फेंक, बिना कुछ लिए-दिए, ख़ाली हाथ वह घर को वापिस चल दिया। सवेरे आते उसे सर्दी लगी थी; लेकिन अब दारू चढ़ाने के बाद बे-कपड़े भी उसे कुछ गरमी मालूम होती थी। हाथ की लकड़ी को धरती पर पटकता हुआ, दूसरे हाथ में जूता-जोड़ा लटकाए, अपने-आपसे बात करता हुआ, ननकू चला जा रहा था।

    “कंबल नहीं है, लोई, तो भी ख़ासी गरमाई गई। एक घूँट क्या लिया कि नस-नस की ठंड भी भाग गई। अजी, क्या ज़रूरत है लोई की। मज़े में चल रहा है। फ़िक्र काहे की। मैं तो ऐसा ही आदमी हूँ, फ़िक्र नहीं पालता। परवाह क्या, बिना लोई मज़े में कट जाएगी। क्या है, अंह, छोड़ो भी। पर बीबी झींकेगी, झिड़केगी...ज़रूर झिड़केगी। और सच तो है। यह बेशक शर्म की बात है। आदमी दिन भर काम करे और उसे मज़दूरी मिले!..ठहरो, अगर तुम पैसा नहीं देते तो क्या समझा है? मैं चमड़ी उधेड़ दूँगा। मेरा नाम ननकू है। क्या? देने के नाम पाँच आने! पाँच आने का भला बन क्या सकता है? सिवा इसके कि चुल्लू ताड़ी पी ली जाए। आए कहने, तंगी है। होगी तंगी। लेकिन हम? हमारी तंगी भी कोई पूछता है? तुम्हारे पास मकान है, बग़िया है, सब है। मेरे पास जो पहने खड़ा हूँ, वही है। तुम्हारे पास अपनी खेती का अनाज है, मुझे एक-एक दाने का पैसा देना होता है। कुछ करूँ, नाज तो चाहिए ही। और ख़ाली रोटी के लिए काम में पसीना बहाता हूँ तो भी नहीं जुड़ती। तीन रुपए की मज़दूरी हफ़्ते में बनती होगी। हफ़्ते का अंत आया कि चून ख़त्म। वह तो जैसे-तैसे रुपया धेली ऊपर बना लेता हूँ तो काम चलता है, नहीं तो बस राम का नाम। सुनते हो जी, जो हमारा लेना आता है, अभी रख दो। हील-हुज्जत चलेगी।

    यह कहता-सुनता वह सड़क के मोड़ तक गया था। वहाँ था एक शिवजी का मंदिर। देखता क्या है कि शिवालय के पिछवाड़े धौला-सा कुछ दिखता है। दिन का चाँदना धीमा हो रहा था। उसमें ननकू आँख गाड़कर देखने लगा कि वह धौला-धौला क्या है पर उसे पहचान कुछ नहीं आया। सोचा कि जाते वक़्त तो यहाँ कोई सफ़ेद पत्थर था नहीं। क्या फिर बैल है? लेकिन बैल भी नहीं है। सिर तो आदमी का-सा मालूम होता है। पर इतना सफ़ेद! और आदमी का इस वक़्त यहाँ काम क्या है?

    पास आया तो साफ़-साफ़ दिखाई देने लगा। अचंभा देखो कि वह सचमुच आदमी था। जीता हो, चाहे मुर्दा, उघाड़े बदन मंदिर की दीवार से सटा बैठा था। हलन-चलन का नाम नहीं। ननकू को डर लग आया। सोचा कि किसी ने उसे मारकर कपड़े खोंस दिए हैं और वहाँ छोड़ दिया है। मैंने कुछ छेड़ा तो मुसीबत में ही पड़ना होगा।

    सो वह ननकू देखी-अनदेखी कर आगे बढ़ लिया। वह उधर से फेर देकर निकला जिससे आदमी फिर उसे दिखाई ही दिया। कुछ बढ़ गया, तब उसने पीछे मुड़कर देखा। देखता क्या है कि वह आदमी दीवार से लगा हुआ, अब झुका नहीं बैठा है, बल्कि चल फिर रहा है। कहीं वह मेरी तरफ़ तो नहीं देख रहा है।

    उसको पहले से भी ज़्यादा भय हुआ। सोचा कि मैं वापिस उसके पास चलूँ या कि अपनी राह बढ़ता जाऊँ। पास गया तो क्या मामला निकले। उसमें जोखिम भी हो सकता है। जाने कौन बला है। यहाँ सुनसान में किसी नेक इरादे से तो वह आया होगा। पास जाने पर हो सकता है कि कूदकर मेरा गला धर दबाए और भागने का भी रास्ता रहे। यह भी नहीं, तो ऐसे आदमी का मैं करूँगा क्या? मेरे सिर वह बोझ ही हो जाएगा, और क्या? नंग-धड़ंग, भला उसमें मेरा होगा क्या? अपने बदन के कपड़े तो उतारकर मैं उसे दे नहीं सकता। सो अपने राह मैं चला ही चलूँ।

    यह सोचकर ननकू बढ़ा ही चला। मंदिर पीछे छूट गया कि तभी उसके भीतर दूसरा ख़याल आया। बीच सड़क रुककर उसने अपने से कहा कि ननकू, तू यह कर क्या रहा है? क्या जाने वह आदमी भूखा मर रहा हो, और तू डर के मारे पास से कतराकर निकला जा रहा है। क्या तू भी मालदार हो गया कि चोर-डाकू का डर लगे? ननकू, तेरे लिए यह शर्म की बात है।

    दो

    पास पहुँच जो देखा तो जवान आदमी है, तंदरुस्त और शरीर पर कोई चोट-रोग का निशान नहीं है। पर सर्दी के मारे ठिठुरा जा रहा है और सहमा हुआ है। वहाँ दीवार से कमर टिकाए चुपचाप बैठा है, ननकू की तरफ़ आँख उठाकर नहीं देखता। जैसे कि उसमें इतना दम ही नहीं है। ननकू और पास गया तब उस आदमी को चेत होता मालूम हुआ। सिर मोड़कर उसने आँखें खोलीं और ननकू की तरफ़ देखा। उस एक नज़र पर ननकू तो निछावर हो गया। वह तो जैसे निहाल हो आया और उसके मन को यह आदमी एकदम भा गया। उसने हाथ की जूता-जोड़ी ज़मीन पर रख दी। दुपट्टा उतारकर वहीं रख दिया और मिर्जई भी उतारने लगा। बोला—

    सुनो दोस्त, कहने-सुनने की बात नहीं है। अब चटपट ये कपड़े पहन डालो।

    कहा और बाँह से पकड़कर उसने अजनबी को उठाया। खड़े होने पर ननकू ने देखा कि उसका शरीर साफ़ और स्वस्थ है। हाथ-पैर का बनाव सुघड़ और चेहरा भला, भोला और सुंदर है। ननक ने अपनी मिर्जई उसके कंधे पर डाल दी। लेकिन उस 'भले आदमी को आस्तीन में बाँह करना आया। ख़ैर, ननकू ने ख़ुद मिर्जई पहना दी। दुपट्टा लपेट दिया और जूता पहना दिया।

    ननकू ने सिर की टोपी भी उतार उसको दे देनी चाही। लेकिन इसमें उसके अपने सिर को ही ठंडी लगती। उसने सोचा कि एह, मेरा सिर गंजा है और उसके बड़े-बड़े घुँघराले बाल हैं। इससे टोपी अपने सिर पर ही रहने दी। बोला, 'अच्छा दोस्त, अब ज़रा चलो-फिरो। ऐसे गर्मी आएगी। बाक़ी फिर देखेंगे। चल सकते हो न?

    अजनबी खड़ा हो गया और सदय भाव से ननकू को देखने लगा। लेकिन मुँह खोलकर शब्द वह कुछ भी नहीं कह सका। ननकू ने कहा, भाई, बोलते क्यों नहीं हो? यहाँ सर्दी बहुत है। ठिठुर जाओगे। चलो, घर चलें। यह लो लकड़ी। चला जाए तो उसे टेकते चलो। लेकिन बढ़े चलो, बढ़ाओ कदम।

    आदमी चल पड़ा। वह ऐसे चला जैसे क़दम तिरते हों। उसके किसी से पीछे रहने की तो बात थी। चलते-चलते ननकू ने पूछा, भाई, तुम हो कहाँ के?

    मैं इस तरफ़ का नहीं हूँ।

    यही मैं सोचता था। इधर के लोगों को मैं पहचानता हूँ पर यहाँ तुम शिवाले के पास कैसे आन पहँचे?

    मालूम नहीं।

    किसी ने तुम्हें लूटा-ठगा तो नहीं है?

    नहीं, सब ईश्वर का दंड है?

    सो तो है ही। वह सबका मालिक है। तो भी कुछ खाने और कहीं सिर टेकने को जगह पाने की तदबीर तो करनी ही होगी न। तुम्हें जाना कहाँ है?

    मुझे सब जगह समान हैं।

    ननकू को अचरज हुआ। आदमी वह दुष्ट नहीं मालूम होता था। कैसा मीठा बोलता था। लेकिन उसका अता-पता जो था। तो भी ननकू ने सोचा कि कौन जानता है कि बेचारे के साथ क्या अनहोनी हुई हो।

    यह सोचकर उस अजनबी आदमी से उसने कहा, अच्छा, ऐसा है तो मेरे साथ घर चलो। वहाँ थोड़ा आराम करना, फिर देखा जाएगा।

    यह कहकर ननकू घर की तरफ़ चल दिया। नया आदमी साथ-साथ था। हवा तेज़ हो चुकी थी। ननकू को अकेले कुरते में सर्दी लग आई। नशा छूट रहा था और अब ठंड ज़्यादा सताती थी। तो भी सीटी बजाता अपने वह चला जाता था। पर रह-रहकर उसे सोच होता था कि घर में कैसे बीतेगी? चला था कंबल लेने और किस हाल में रहा हूँ। ख़ाली हाथ तो हूँ ही, तिस पर बदन की मिर्जई बदन पर नहीं है और भी बढ़कर यह कि साथ एक आदमी लिए हुए जिसका अता-न-पता और जिसके पास कपड़ा लत्ता। मन्नो भी क्या कहेगी? निश्चय ही बहुत ख़ुश तो वह होने वाली है नहीं।

    यह सोच-सोचकर उसका मन बैठ जाता था। पर जब वह इस अजनबी आदमी की तरफ़ देखता, और उसकी हालत को और भीगी कृतज्ञ निगाह को याद करता तो उसे ख़ुशी और हौसला भी होता था।

    तीन

    उस दिन सवेरे ही ननक की बीबी ने सब काम पूरा कर लिया। पानी ले आई, बच्चों को खिला-पिला दिया, ख़ुद खा-पीकर निबट चुकी और चौका-बासन भी सब कर डाला। फिर बैठी सोचने लगी कि शाम को खाना बनाऊँ कि नहीं। अभी रोटी तो काफ़ी बची हैं अगर कहीं ननकू ने बस्ती में ही कुछ खा-पी लिया तो फिर यहाँ क्या खाएँगे? फिर तो कल के लिए भी यही रोटी चल जाएँगी।

    यह सोचकर उसने बची रोटियों को हाथों पर लेकर जैसे तोला। बोली, “बस, अब आज और नहीं बनाऊँगी। घर में आटा भी बहुत नहीं बचा है। तो भी यह इतवार तो इसमें निकालना ही है।

    सो मानवती ने रोटी अलग ढककर रख दी और पति का कुरता ठीक करने बैठ गई। काम करती जाती थी और सोचती जाती थी, “जाड़ों के लिए वह लोई भी ख़रीदकर लाते होंगे।” वह सोचने लगी, पर कहीं दुकानदार उन्हें ठग ले। वह सीधे बहुत हैं। छल-कपट जानते नहीं। एक बच्चा भी उन्हें बेवक़ूफ़ बना सकता है। दस रुपए पास हैं—कोई कम रक़म नहीं है। लोई और दोहर उतने में दोनों हो सकते हैं। बिना कपड़े जाड़ों में चलेगा कैसे? लोई हो गई तो ठीक हो जाएगा। नहीं तो बाहर कहीं निकलने के लायक भी हम नहीं। पर देखो जी, उनको भी कि जो था सब कपड़ा अपने बदन पर वही लेते गए। कुछ नहीं छोड़ गए। मेरी मिर्जई भी नहीं छोड़ गए। कब आएँगे? ऐसे बहुत सवेरे तो नहीं गए। पर वक़्त है, अब उन्हें आना ही चाहिए। राम, कहीं बहक गए हों। ताड़ी की गंध...

    यह सोच रही थी कि बाहर दरवाज़े पर क़दमों की आहट हुई। सुई को वहीं कपड़े में उड़स मानवती उठकर दरवाज़े की तरफ़ लपकी। देखती क्या है कि एक छोड़ दो आदमी हैं। एक तो ननकू है, दूसरा उसके साथ कोई और भी है। उसके सिर पर टोपी है नहीं, और ऊँचे जूते चढ़ाए हुए है।

    मानवती ने फ़ौरन ताड़ लिया। ताड़ी की गंध आती थी। सोचा कि हज़रत ने पी दिखती है। और जब देखा कि बदन पर मिर्जई नहीं है, दुपट्टा नदारद है, लोई-वोई भी कोई साथ नहीं दिखती है, और आकर सिमटे-से चुप खड़े हैं, तो उसका दिल निराशा से टूट आया। उसने सोचा कि मालूम होता है कि रुपया सब दारू पर उड़ा डाला है और कहीं के उठाईगीर इस आदमी के साथ मौज़-चैन उड़ाई गई है और उसे ले आए हैं मेरे सिर पटकने को।

    द्वार की राह छोड़ उसने दोनों को अंदर जाने दिया। पीछे ख़ुद आई। देखा कि दूसरा आदमी नाज़ुक बदन का है, जवान है, और मेरी मिर्जई उसके तन पर है: नीचे उसके कुरता कमीज़, सिर पर टोपी। आकर सींक-सा सीधा खड़ा हो गया है, हिलता है ऊपर देखता है। मानवती ने सोचा कि ज़रूर कोई बदकार है। नहीं तो ऐसा डरता क्यों?

    वह ग़ुस्से में एक तरफ़ खड़ी हो गई, कि देखूँ, ये क्या करते हैं।

    ननकू ने टोपी उतारी और खटिया पर ऐसे बैठे, जैसे कोई ख़ास बात हुई हो, सब ठीक ही ठाक हो।

    बोला, “मन्नो, खाना हो तो लाओ कुछ दो न?

    मानवती कुछ बुदबुदाकर रह गई। हिली-डुली तक नहीं। एक को देखा, फिर दूसरे को देखा। फिर माथा पकड़ चुप रह गई। ननकू ने देखा कि पत्नी बिगड़ी हुई है। उसने इस बात को दरगुज़र कर देना चाहा, जैसे कुछ हुआ हो। अपने साथी की बाँह पकड़कर कहा—अरे, बैठो भी। अब कुछ खाओगे कि नहीं।

    सो वह अजनबी आदमी भी पास ही खाट पर बैठ गया।

    ननकू ने कहा, “कुछ हमारे लिए क्या पकाकर रखा है? हो तो वैसा कहो। मानवती का ग़ुस्सा उबल पड़ा। बोली, रखा है पकाकर, पर तुम्हारे लिए नहीं। मालूम होता है कि अकल तो तुम दारू के साथ पी आए हो। लेने गए थे लोई-कपड़े, आए तो पास की मिर्जई भी गायब। फिर साथ में लिए रहे हैं जाने किस उठाईगीर को, पास जिसके तन पर ढकने को भी चिथड़ा नहीं।

    बस, बस करो, मानवती। बेमतलब ज़्यादा ज़बान नहीं चलाया करते। भला, पूछ तो लिया होता कि ये कैसे आदमी हैं, कौन हैं—

    तो लो, पहले पूछती हूँ कि बताओ तुमने रुपयों का क्या किया है?

    ननकू ने जेब से पाँच का नोट निकाला और तह खोलकर सामने कर दिया। यह पाँच का नोट है। बंसी ने कुछ दिया नहीं। जल्दी देने को कहता है।

    मानवती का ग़ुस्सा कम नहीं हुआ। देखो न, लोई तो लाना कैसा, ख़ुद अपनी मिर्जई जो तन पर रहने दी हो। वह भी इस फ़क़ीर को दे डाली। फिर उसी को साथ लेते आए हैं घर!

    उसने नोट को ननकू के हाथ से झपट लिया और सँभालकर उसे अंदर रखने चली गई। बोली “मेरे पास नहीं है खाना देने को। दुनिया के तमाम नंगे बदकारों को खिलाने को कोई मैं ही नहीं रह गई हूँ।

    सुनो मुन्नो, ज़रा तो चुप रहो। कुछ दूसरे आदमी की भी सुनो।''

    बड़ी सुनूँ। नशेबाज़ से मिल गई बड़ी अकल। तभी तो मैं तुम्हें ब्याहना नहीं चाहती थी। शराबी बदखोर! मेरी माँ ने जो दिया, सब पी डाला। अब लोई लेने गए, उसे भी पीकर ख़त्म किया।

    ननकू ने बहुतेरा कहना चाहा कि कुल पाँच आने पैसे मैंने ख़र्चे हैं, और कि कैसे और कहाँ यह आदमी मिला और क्यों साथ है। लेकिन मानवती ने एक कहने दी, एक सुनी। वह एक के बदले दस कहती थी। और दसियों बरस पुरानी जाने कहाँ-कहाँ की गड़ी बातें उखाड़कर बीच में ले आती थी।

    बकते-झींकते उसने तेज़ी में आकर ननकू को बाँह से पकड़ खींचा। कहा कि लाओ, मेरी मिर्जई दो। यह अकेली तो मेरे पास है, उसे भी छीन ले गए, हाँ-तो, और दूसरे को दे डाला। अभी मैं उतरवा लूँगी। समझते हो?–अभी-अभी। सत्यानासी कहीं के!

    ननकू ने कहा, ले,ले।

    और उसने ज़ोर से झिटककर अपना कुरता बदन से खींच उतारा।

    मानवती चिल्लाई, इसका क्या करूँगी मैं, नास-जाए!

    लेकिन तैश में ननकू ने कुरता तन से उतार ही डाला और अलग खींचकर उसे मानवती के सिर पर दे मारा।

    मानवती कुरते को लेकर झींकने लगी। वह सामने से चली जाना चाहती थी, पर नहीं भी चाहती थी। असल में किसी तरह ग़ुस्सा निकालकर वह ख़त्म कर देना चाहती थी। ग़ुस्से में उसे तसल्ली नहीं थी। और यह भी उसे मालूम हो रहा था कि इसमें उस बिचारे दूसरे आदमी का कोई कसूर तो है नहीं।

    आख़िर रुककर बोली, “अगर वह भलामानस होता तो उघाड़े बदन होता। उसकी देह पर कुरता तक तो नहीं है। और ठीक-ठिकाना होता तो तुम्हीं बतला देते कि कहाँ और कैसे मिला?

    ननकू, “यही तो बतला रहा हूँ। सड़क का वह पहला मोड़ पड़ता है कि नहीं, वहीं शिवाले पर मैं पहुँचा कि यह आदमी वहाँ बैठा था। बे-कपड़े, मारे जाड़े के ठिठुरा जा रहा था। भला यह मौसम है बदन उघाड़े बैठने का ? यह तो ईश्वर की मर्ज़ी जानो कि मैं वहाँ पहुँच गया। नहीं तो यह बचता नहीं। तब मैं क्या करता?

    हमें किसी के मन का या करनी का क्या पता है? जाने क्या किसी के साथ बीती हो। सो मैंने उसे ढारस दिया, कपड़ा दिया और उसे साथ ले आया। इस पर ग़ुस्सा मत करो, मानो! ग़ुस्सा पाप है। आख़िर एक दिन हम सबको काल के गाल में चले जाना है कि नहीं?

    मानवती के मुँह तक फिर क्रोध के वचन आए, लेकिन उस नए आदमी को देखकर चुप रह गई। वह खटिया की पाटी पर बैठा था। हिलना डुलना, बाहों में घुटने पकड़े, सिर छाती पर डाले, आँखें बंद, ऐसा बैठा था कि शिथिल। माथे पर भौहों के बीच जैसा उसके डर की सिकुड़न थी। सो देख मानवती चुप रह गई।

    ननकू ने कहा, “बताओ, तुम्हें बिल्कुल ईश्वर का ख़याल नहीं है।

    मानवती ने ये वचन सुने। फिर नए आदमी को देखा तो एकाएक उसका जी उसकी तरफ़ कोमल हो आया। वह अंदर गई और चौके में से खाने को ले आई।

    वहीं खाट पर थाली रख दी और पानी के गिलास भी रख दिए। बोली, लो, भूख हो तो यह लो। अब खाते क्यों नहीं?

    ननकू ने अपने साथी को कहा, सुनते हो, भाई, लो शुरू करो।

    रोटी तोड़ी और मठे के साथ मिलाकर दोनों जने खाने लगे। मानो आँगन में बोरी डाल, अलग बैठ गई और हथेली पर सिर रखे वह इस अजनबी को देखने लगी। देखते-देखते इस आदमी के लिए उसके मन में करुणा भर आई। जैसे उस पर प्यार हो आने लगा। इसी समय उस आदमी का चेहरा खिल आया। भवें पहले की तरह सिकुड़ी रहीं, आँखें उठाकर उसने मानो की तरफ़ और मुस्करा दिया।

    मानो का जी हल्का हो गया। खाने के बरतन उसने हटा दिए और फिर उस नए आदमी से बातचीत करने लगी।

    पूछा, कहाँ के रहने वाले हो?

    यहाँ का नहीं हूँ।

    फिर इस राह कैसे लगे?

    कुछ कह नहीं सकता।

    “ऐसा हाल तुम्हारा क्यों है? किसी ने लूटा-लाटा तो नहीं है?''

    जी, सब दंड परमात्मा का है।

    और वहाँ तुम नंगे पड़े थे?

    जी, कपड़े बिना ठिठुरा जाता था। इन्होंने मुझे देखा और याद की। अपने कपड़े उतारकर मुझे दे दिए और यहाँ अपने घर में ले आए और आपने मुझे यहाँ भोजन दिया और मुझ पर कृपा की। ईश्वर आपकी बढ़वारी करेगा।

    मानवती उठी और जो ननकू का कुरता सँभाल रही थी, लाकर इस आदमी को दे दिया। साथ कहीं से धोती-जोड़ा भी निकाल लाई। बोली, यह लो, भाई। पहन लो। अच्छा सोओगे कहाँ। ख़ैर, जगह पड़ी है, पुआल है ही। सो जी चाहे जहाँ सोओ।

    उसने कपड़े पहन लिए और जाकर भीतर कोठरी में पुआल पर लेट गया। मानो ने फिर घर की चीज़-बस्त सँभाली, और दीया बुझाकर वह भी खटिया पर पहुँच गई।

    उसी चीथड़ा रजाई को पति-पत्नी दोनों जने ऊपर ले लेट रहे। लेकिन मानवती को नींद आई। वह आदमी उसके मन से बाहर ही नहीं होता था। सोचती थी कि घर में सब रोटी ख़त्म हो गई हैं। कल को चन भी नहीं बचा है और ले-दे के जो कपड़े बचे थे, सो उसको दे देने पड़े हैं। इस पर थोड़ा उसका मन मंद होता था।

    लेकिन जब उस आदमी की मुस्कराहट की याद आती थी, तो मन ख़ुशी से खिलने को होता था।

    सो देर तक मानवती जागती रही। देखा कि ननकू भी जग रहा है। रजाई उसने उसकी तरफ़ करके कहा—

    ननकू!

    हाँ!

    रोटी तो सब चुक गई। चून दो-एक मुट्ठी बचा होगा। अब कैसे होगा? झुनिया मौसी से आटा उधार लेना होगा, और क्या?

    अरे, जो जिलाता है, वह पेट भरने को भी देगा।

    स्त्री फिर कुछ देर सोचती जगती पड़ी रही। अनंतर बोली, आदमी वह भला मालूम होता है। फिर बताता क्यों नहीं कि है कौन?

    कोई बात होगी।

    ननकू!

    “हाँ।

    क्यों जी, हम देते हैं तो फिर हमें कोई कुछ क्यों नहीं देता?

    ननकू को इसका कोई जवाब नहीं जुड़ा। उससे बोला, “ऊँह, छोड़ो भी, सोओ, सोओ। और करवट ले वह सो चला।

    पाँच

    सवेरे ननकू उठा। बच्चे अभी सोए थे। स्त्री कहीं पड़ोस में आटे का बंदोबस्त करने गई थी। साथ का आदमी अकेला ओसारे में उन्हीं कपड़ों में बैठा आसमान को देख रहा था। चेहरा उसका खुला हुआ और ख़ुश था।

    ननकू ने कहा, ‘“सुनो दोस्त, पेट को खाना चाहिए, तन को कपड़ा। इसके लिए उपाय है मेहनत। सो काम से रोज़ी चला करती है। बोलो, कुछ काम-धाम जानते हो?

    जानता तो मैं कुछ नहीं हूँ।

    ननकू को यह सुनकर अचरज हुआ। लेकिन बोला, “कोई सीखने वाला हो तो सब सीख सकता है।

    अच्छी बात है। सब काम करते हैं, मैं भी करूँगा।

    तुम्हारा नाम क्या है?

    नाम!—मंगल।

    अच्छा मंगल, तुम अपनी बाबत कुछ नहीं बताते हो, जाने दो। तुम जानो तुम्हारा काम! लेकिन गुज़ारे के लिए उद्यम तो कुछ करना होगा न। जैसे मैं बताऊँ करते चलोगे तो तुम्हारे रहने और खाने-पीने के बंदोबस्त में हमें कोई अड़चन नहीं होगी।

    परमात्मा की दया हुई तो मैं काम सीखता जाऊँगा। भगवान् आप का भला करें। मुझे बताते जाइए।

    ननकू ने सूत लिया, पैर के अँगूठे से बाँधा, और उसे बटने लगा। बोला, देखते हो न? कुछ भी तो मुश्किल नहीं है।

    मंगल ग़ौर से देखता रहा। फिर उसी तरह अँगूठे में सूत बाँध वह भी बटने लगा। न-कुछ में यह उसे गया और सूत उसने अच्छा बट लिया।

    फिर ननकू ने बताया कि कैसे मोम से इसे चिकना करते हैं। यह भी मंगल सीख गया। फिर बताया कि कैसे फंदा डालते हैं, कैसे सीते हैं। यह भी मंगल आसानी से सीखता चला गया।

    ननकू जो बताता, मंगल झट समझ जाता। तीन दिन के बाद तो मंगल ऐसा काम करने लगा मानो ज़िंदगी भर यही काम करता रहा हो। लगन से सब दिन वह यही किया करता और थोड़ा खाता। काम के बाद अपने चुपचाप आसमान की तरफ़ देखने लगता। वह शायद ही कहीं इधर-उधर जाता था। बस काम जितनी बात करता था। हँसी, मज़ाक, कुछ। पहले दिन जब मानवती ने उसे खाने को दिया था, उस वक़्त को छोड़कर फिर वैसी मुस्कराहट भी उसके चेहरे पर नहीं दीखी।

    छः

    दिन पर दिन चलते गए। इस तरह साल निकल गया। मंगल ननकू के साथ रहता और काम करता। उसका नाम सरनाम हो चला था। लोगों में हो गया था कि ननकू का आदमी यह मंगल जैसे जूते सीता है, वैसा आस-पास क्या दूर तक भी कोई नहीं सी सकता। काम ऐसा ख़ूबसूरत और मजबूत और सुबुक कि क्या बात। सो ननकू के यहाँ दूर-दूर के लोग जूते बनवाने आने लगे। इससे ननकू की हालत सुधर आई और ख़ुशहाली बढ़ने लगी।

    एक बार जाड़ों के दिन थे। ननकू और मंगल काम करने बैठे थे। तभी दो घोड़ों की बग्घी टनन-टनन करती हुई उनके गाँव में आई। उन्होंने झाँककर देखा। देखते क्या हैं कि बग्घी उनके द्वार पर आकर रुक गई है और वर्दीदार कोचवान ने गाड़ी के रुकते ही चट से नीचे कूदकर दरवाज़ा खोल दिया है। दरवाज़े में से क़ीमती कपड़े पहने कोई रईस आदमी उतरे। और उसी घर की तरफ़ बढ़े। मानवती ने झटपट आकर अपने घर के दरवाज़े चौपट खोल दिए। सज्जन को अंदर आने के लिए दरवाज़े में झुकना पड़ा। फिर आकर जो खड़े हुए तो सर उनका छत को छूता मालूम होता था और जैसे वह सारी जगह उनसे भर गई थी।

    ननकू ने उठकर सलाम किया। वह अचंभे में इन्हें निहार रहा था। इनके जैसा आदमी उसने नसीब में नहीं देखा था। वह ख़ुद दुबला था। मंगल की देह भी इकहरी थी और मानवती के तो हाड़ निकल रहे थे। पर यह सज्जन जैसे दूसरी दुनिया के थे। चेहरा सुर्ख़, दोहरी देह, गर्दन ऐसी कि क्या पूछिए। पूरे देव मालूम होते थे।

    सज्जन ने ऊपर का चोगा उतारा नहीं कि उसे पास खड़े नौकर ने हाथों-हाथ सँभाल लिया। वह बोले, तुममें कौन है जिसका जूता मशहूर है?

    ननकू ने आगे बढ़कर और झुककर कहा, जी, हाज़िर हूँ।

    तब सज्जन ने पुकारकर कहा, छोकरे, वह चमड़ा इधर तो लाओ।

    नौकर चमड़े का बंडल लेकर दौड़ा आया।

    खोला।

    नौकर ने खोला। सज्जन ने छड़ी से चमड़े को दिखाते हुए कहा, देखते हो, यह चमड़ा है।

    जी।

    जी नहीं, जानते हो कैसा चमड़ा है?

    ननकू ने हाथ से टटोलकर चमड़े को देखा। बोला, अच्छा चमड़ा है।

    अच्छा है! बेवक़ूफ़, ऐसा कभी तुमने अपने जनम में देखा भी है? असल जर्मनी का है अकेला वह टुकड़ा बीस रुपए का है।

    ननकू सहमकर बोला, जी, ऐसा चमड़ा हमें कहाँ देखने को मिलता है, हुज़ूर।

    हाँ, सो ही तो। अच्छा इसके जूते तैयार कर सकोगे?

    जी, हुज़ूर! कर सकूँगा।

    यह सज्जन ज़ोर से बोले, कह दिया, सकूँगा। अरे, कर भी सकोगे? याद रखना कौन कह रहा है और क्या चमड़ा है। समझे? ऐसा जूता बनाना होगा कि साल भर पूरा चले। उधड़े बिगड़े। कर सकते हो, तो लो चमड़ा और शुरू करो। नहीं कर सको तो सीधे कहो। समझते हो न, अगर साल भर के अंदर जूते में उधड़न गई या उनकी शकल बिगड़ चली तो तुम हो और जेलख़ाना। क्या समझे? और जो वह फटे नहीं और शक्ल भी क़ायम रही, तो काम के तुम्हें दस रुपए मिलेंगे। सुना?

    ननकू तो रोब के मारे डर गया था। उससे जवाब नहीं दिया गया। उसने मंगल को देखा और धीमे से कोहनी मारकर मानो उससे पूछा, क्या कहते हो? यह काम ले लूँ?

    मंगल ने सिर हिला दिया, जैसे कहा कि हाँ, ले लो।

    मंगल की कही मानकर ननकू ने काम ले लिया। वादा किया कि जूते तैयार कर दूँगा कि साल में एक उनकी सीवन जाएगी, शकल में फरक आएगा।

    तब नौकर को बुलाकर सज्जन ने कहा, ए, हमारे पैर का यह जूता उतारो तो।'' यह कहकर बाईं टाँग उन्होंने आगे बढ़ा दी। फिर ननकू से कहा, “देखते क्या हो? लो अपना नाप लो।''

    ननकू ने काग़ज़ लिया। उसे धरती पर हाथ से बार-बार चपटा किया। झुका, अपने कुरते से अच्छी तरह हाथ पोंछे कि सज्जन के मोज़े मैले हो जाएँ, और नाप लेना शुरू किया। तली नापी, टखना नापा और पिंडली का नाप देखने लगा। पर काग़ज़ उसका छोटा निकला। पिंडली की मोटाई इतनी थी कि काग़ज़ ओछा रहा।

    देखना, नाप कहीं इस जगह सख़्त हो जाए।

    ननकू ने उसमें फिर दूसरा काग़ज़ जोड़ा। सज्जन मोज़े में से अपना अँगूठा चला रहे थे और वहाँ खड़े लोगों को देख रहे थे। इसी दरमियान उनकी नज़र मंगल पर पड़ी।

    ऐ, यह कौन है?

    हुज़ूर, यह मेरा आदमी है। यही जूते सिएगा।

    सज्जन ने मंगल को कहा, यह! अच्छा, सुनते हो जी तुम, देखो भूलना नहीं कि जूते पूरे साल भर चलें। नहीं तो...

    ननकू ने अचरज से मंगल को देखा। देखा कि मंगल जैसे उन रईस को देख ही नहीं रहा है, बल्कि उनके पार जाने कहाँ देख रहा है। जैसे पार पीछे कुछ सचमुच हो। उधर देखते-देखते मंगल एकाएक मुस्करा आया और उसके चेहरे पर चमक झलक गई।

    उस सज्जन ने गरजकर कहा, दाँत क्या निकालता है, बेवक़ूफ़! ख़याल रखना, वक़्त तक जूते तैयार हो जाएँ। सुना न।

    मंगल ने कहा, जी, समय पर तैयार लीजिए।

    हाँ—तैयार!

    यह कहा, जूते पहने, चोगा चढ़ाया और दरवाज़े की तरफ़ बढ़े। लेकिन झुकने की याद रही और दरवाज़े की चौखट खट् से सिर में लगी।

    झुँझलाकर उन्होंने गाली दी और सिर मलते हुए गाड़ी में बैठ चलते बने।

    चले गए तो ननकू ने कहा, क्या ख़ूब, आदमी हो तो ऐसा हो। डील-डौल

    ऐसा कि देव! एक बार घन पड़े तो शायद पता चले। ऐसी देह! देखो न, सिर लगा तो चौखट टूटते बच गई। पर सिर का कुछ बिगड़ा।

    मानवती बोली, “जो खाएगा-पीएगा वह मजबूत होगा तो क्या तुम होगे। ऐसी शिला को तो मौत भी छूते बचे!

    सात

    उनके चले जाने पर ननकू मंगल से बोला, दोस्त, काम ले तो लिया; पर कहीं मुसीबत में फँसना पड़े। चमड़ा क़ीमती है और आदमी तुम समझो वह मुलायम नहीं है। सो काम में कोई नुक्स नहीं रहना चाहिए। सुना न? तुम्हारी आँख सही और हाथ सच्चे हैं। मैं तो फूहड़ हुआ। इससे भाई, इस चमड़े की काट-कूट को तुम्हीं सँभालो। मैं इतने तले सिए डालता हूँ।

    मंगल ने वह चमड़ा ले लिया। उसे बिछाया, मोड़ा और रापी लेकर काटना शुरू कर दिया।

    मानवती आकर देखने लगी। देख रही थी कि उसे अचरज हुआ। उसने बूट बनते देखे थे, लेकिन मंगल बूट के ढंग पर चमड़े को नहीं काट रहा था, और ही तरीक़े पर काटने लगा था।

    उसने रोककर कहना भी चाहा, लेकिन फिर सोचा कि मैं ज़्यादा तो जानती नहीं शायद कोई ख़ास बूट इसी तरह से बनते हों। और मंगल ख़ुद होशियार है, सो मुझे दख़्ल नहीं देना चाहिए।

    चमड़ा काट चुका तो मंगल ने सीना शुरू किया। लेकिन दोहरी सिलाई नहीं की, जैसे कि बूट सिए जाते हैं। बल्कि इकहरी सिलाई शुरू की, जैसे कि सुबुक काम के या बचकाने स्लीपर सिए जाते हैं।

    ननकू ने यह देखा तो उसके मन में बड़ा पछतावा हुआ। सोचा कि मंगल साल भर मेरे साथ रहा है, कभी उसने ग़लती नहीं की। अब यह उसको हो क्या गया है?

    वह ऊँचे पूरे बूट को कह गए थे और मंगल ने इकहरी तली के सुबुक स्लीपर बना डाले हैं।

    ऐसे सारा चमड़ा ख़राब हो गया अब उनको मैं क्या जवाब दूँगा। ऐसा दूसरा चमड़ा कहाँ से लाकर दूँगा।

    बोला, “यह कर क्या रहे हो, मंगल! तुमने तो सारा नाश करके रख दिया। उन्होंने ऊँचें-ऊँचें पूरे बूट के लिए कहा था और यह तुमने क्या बनाकर रख दिया है।

    ऐसा सख़्त-सुस्त सुना कर चुका होगा कि बाहर से किसी के आने की आहट हुई। इतने में तो अपने द्वार पर ही कुंडे की खटखटाहट सुनाई देने लगी। देखें तो घोड़े पर सवार कोई आया है।

    किवाड़ खुले और उन सज्जन के साथवाला वही आदमी सामने दिखाई दिया। बोला, जय रामजी की, चौधरी।

    जय राम जी की भाई, ननकू बोला, कैसे आना हुआ?

    मालकिन ने जूतों की बाबत मुझे भेजा है।

    जूतों की बाबत! क्या मतलब?

    अब बूटों की ज़रूरत नहीं है। क्योंकि मालिक तो रहे नहीं, उन्होंने प्राण छोड़ दिए।

    क्या—आ!

    वह यहाँ से घर तक भी नहीं पहुँच सके, गाड़ी में ही मौत ने ले लिया। घर पहुँचकर हम सबने जो उन्हें उतारना चाहा तो देखते क्या हैं कि वह बोरों की तरह लुढ़क रहे हैं। उनमें जान नहीं रह गई थी। बदन ऐसा अकड़ गया था कि जैसे-तैसे गाड़ी से बाहर उन्हें लिया जा सका। मालकिन ने मुझे यहाँ भेजा है कि जूते वालों से कहना कि बूट जिन्होंने बनवाए थे, उन्हें अब उनकी ज़रूरत नहीं रही। लेकिन अब उनकी जगह मुलायम इकहरी स्लीपर तैयार कर दें। कहा है, जब तक वे तैयार हों वहीं रहना और साथ लेकर आना। सो इस वास्ते मैं आया हूँ।

    इस पर मंगल ने बचे-खुचे चमड़े को समेटा, स्लीपर लिए दोनों की तह की, आस्तीन से फिर एक बार पोंछकर उन्हें साफ़ कर दिया, और दोनों चीज़ उस आदमी के हवाले की।

    अच्छा, जय रामजी की चौधरी। कहता हुआ वह आदमी चला गया।

    आठ

    दूसरा साल निकला, फिर तीसरा। इस तरह ननकू के साथ रहते मंगल को छह साल हो गए। वह पहले की तरह रहता था। इधर-उधर कहीं जाता नहीं था, ज़रूरत पर बोलता था। उस सब काल में वह सिर्फ़ दो बार मुस्कुराया था। एक जब कि मानवती ने उसे खाना दिया था, दूसरे जब वह रईस यहाँ आए थे। ननकू उससे बहुत ख़ुश था और अब ज़्यादा सवाल उससे नहीं पूछता था। उसे ख़याल था तो यही कि मंगल पास से कहीं चला जाए।

    एक दिन सब जनें घर में थे। मानवती खाने की तैयारी कर रही थी, बच्चे खेल रहे थे, ननकू एक तरफ़ बैठा सी रहा था और मंगल एक जोड़ी की एड़ी नई कर रहा था।

    इतने में एक लड़का भागा आया और मंगल की कमर पर कुदा। बोला, चाचा, चाचा, देखो कौन रही हैं। छोटी दो लड़कियाँ भी हैं। यहीं रही मालूम होती हैं। चाचा ओ, एक लड़की लँगड़ी चलती है।

    लड़के के यह कहने पर मंगल ने औजार नीचे रखे और सब काम छोड़ द्वार से बाहर देखने लगा।

    ननकू को इस पर अचरज हुआ। मंगल कभी भी आँख उठाकर बाहर की तरफ़ नहीं देखता था। लेकिन अब तो जाने क्यों वह एकटक देख रहा था। ननकू ने भी उझककर बाहर देखा। देखता क्या है कि सचमुच एक स्त्री अच्छे कपड़े पहने उसी के घर की तरफ़ चली रही है। हाथ पकड़े दो लड़कियाँ हैं। ऊनी, गरम, सलीक़े के कपड़े पहने हैं और कंधों पर दुशाला पड़ा है। लड़कियाँ दोनों एक-सी हैं। एक को दूसरे से पहचानना मुश्किल है। लेकिन दोनों में एक का बायाँ पैर ख़राब है और वह लँगड़ा कर चलती है।

    वह स्त्री उन्हीं के ओसारे में आई। आगे-आगे लड़कियाँ थीं, पीछे वह। आकर स्त्री ने उन लोगों को अभिवादन किया।

    ननकू ने कहा, आइए, आइए। हमारे लायक़ क्या काम है? स्त्री बेंच पर बैठ गई। दोनों लड़कियाँ भी उसके घुटने से चिमट बैठीं। वे जैसे यहाँ इन लोगों के बीच डर गई थीं।

    “मैं इन दोनों बच्चियों के लिए जूते बनवाना चाहती हूँ। ज़रा मुलायम होने चाहिए, गरमियों के लायक़।

    ज़रूर लीजिए, ज़रूर। ऐसी बचकानी जोड़ी हमने बनाई तो नहीं है लेकिन बना देंगे। रुंएदार, सादे या फैंसी, जैसे कहें। मेरे आदमी इस मंगल के हाथ में हुनर है—

    कहकर ननकू ने मंगल को देखा। देखता क्या है कि मंगल का तो काम-धाम सब छूट गया है और उसकी निगाह उन लड़कियों पर जम गई है! ननकू को अचंभा हुआ। लड़कियाँ नन्हीं-नन्हीं बड़ी सुंदर थीं। काली आखें, गुलाबी गाल और अच्छे कपड़े भी पहने थीं। लेकिन ननकू को समझ आया कि मंगल यह उन्हें ऐसे क्यों देख रहा—मानो पहले से जानता हो। वह उलझन में पड़ गया, पर महिला से काम की बात भी चलाता जाता था। कीमत पट गई और ननकू पाँव का नाप लेने बढ़ा।

    स्त्री ने लँगड़ी लड़की को गोद में उठाकर कहा, इस लड़की के ही दो नाप लो। एक लँगड़े पैर के लिए और तीन दूसरे पैर के जूते बना देना। दोनों के हैं। जुड़वाँ बहनें जो ठहरीं।

    ले पाँव ननकू ने नाप लिया और बोला, “जी, ऐसा हो कैसे गया? कैसी सयानी सुंदर लड़की है। क्या जनम से पाँव ऐसा है।

    नहीं, नहीं, उसकी माँ से ही यह टाँग कुचल गई थी।

    इस समय मानवती भी वहाँ आई थी। उसे अचरज हुआ कि यह महिला कौन है और ये बच्चियाँ किसकी हैं। पूछने लगी, तो क्या तुम इनकी माँ नहीं हो?

    नहीं, बीबी, मैं माँ नहीं हूँ। नाते में कुछ लगती हूँ। मैं इनको पहले जानती भी नहीं थी। लेकिन अब तो दोनों मेरी गोद में हैं, मेरी हैं।

    तुम्हारी नहीं हैं, फिर भी तुम इन्हें इतना प्यार करती हो!

    प्यार नहीं तो और क्या करूँ? दोनों को अपना दूध पिलाकर मैंने पाला है। मेरे अपना भी एक बालक था। ईश्वर ने उसे उठा लिया। पर उसका मुझे इतना प्यार नहीं था जितना इन नन्हियों का मोह मुझे हो गया है।

    तो फिर ये किसके बालक हैं?

    नौ

    इस तरह एक बार शुरू होना था कि स्त्री पूरी ही कहानी कह चली—

    “कोई छह साल होते हैं कि इनके माँ-बाप मर गए। दोनों तीन-दिन आगे-पीछे इस धरती से उठ गए। मंगलवार को पिता की अर्थी उठी तो बृहस्पति को माँ ने संसार तज दिया। बाप के मरने के दो दिन बाद इन बेचारे अनाथों ने जन्म लिया। माँ का सहारा तो इनको एक दिन का भी नहीं मिला। हम तब उसी गाँव में रहते थे।

    हमारे यहाँ खेती होती थी। दोनों हम पड़ोसी थे, हमारे घर के घेरे तो मिले ही हुए थे। बाप इनका अकेला-सा आदमी था और पेड़ काटने का काम करता था। जंगल में पेड़ काटे जा रहे थे कि एक के नीचे वह गया। पेड़ ठीक उसके ऊपर आकर गिरा। और वह पिच गया, आँत बाहर गई फिर दम निकलना के घड़ी की बात थी। घर तक ला पाए कि जान जा चुकी थी। उसके तीसरे दिन माँ ने इस जुगल जोड़ी को जन्म दिया। वह अकेली थी और ग़रीबनी थी। जवान या बुड्ढा, कोई उसका था। बेचारी अकेली ने इन नन्हियों को जनमा और अकेली जाकर मौत से मिल गई।

    अगले सवेरे में मैं उसे देखने गई। झोंपड़ी में घुसती हूँ और देखती हूँ कि उस बेचारी की देह तो ठंडी पड़ी थी और अकड़ गई थी। मरते समय दर्द में करवट ली होगी कि उसमें इस बच्ची की टाँग जाती रही। फिर तो गाँव के लोग गए। देह को उठा अर्थी पर रखा और क्रिया-कर्म किया। दोनों बेचारे वे नेक आदमी थे। बच्चे उनके बाद अकेले रह गए। तब उनका क्या होता। गाँव में मैं ही थी जिसकी गोद में दूध-पीता बच्चा था। कोई डेढ़ महीने का मेरा पहलौता मेरी छाती से था। इससे उन दोनों को भी मैंने ही ले लिया। गाँव के लोगों ने बहुतेरा सोचा कि क्या हो। आख़िर उन्होंने मुझे कहा कि भगवती, अभी-अभी तो तुम्हीं इन्हें पाल सकती हो। पीछे देखेंगे कि फिर क्या किया जाए। सो मैं छाती का दूध पिलाकर एक बच्ची को पालने लगी। दूसरी को पहले-पहल मैंने दूध नहीं दिया। सोचती थी कि वह क्या बचेगी? लेकिन फिर मैंने ख़ुद ही ख़याल किया कि वह बेचारी बेकसूर क्यों दुःख पाए और भूखी रहे। सो मुझे दया आई और मैं उसे दूध पिलाने लगी। इस भाँति मैं तीनों को, अपने बालक को और इन दोनों को भी, अपनी छाती के दूध से पालने लगी। मेरी भरी उमर थी और मैं तंदुरुस्त थी और खाना अच्छा खाती थी। सो परमात्मा ने इतना दूध दिया कि कभी तो वह अपने आप ही गिरने लगता था। कभी मैं दो-दो को एक साथ दूध देती। एक को पूरा हो जाता, तो तीसरे को ले लेती। अब परमात्मा की लीला कि ये दोनों बच्चियाँ तो पनपती गईं, और मेरा अपना बालक दो बरस का हो पाया कि जाता रहा। उसके बाद मेरे कोई संतान नहीं हुई, लेकिन हम बराबर ख़ुशहाल होते चले गए। अब मेरा आदमी एक किराने के व्यापारी का एजेंट है। तनख़्वाह ख़ासी है और हम लोग मज़े में हैं। हमारे अपना कोई बालक नहीं है और ये नन्हीं मुझे मिल जातीं तो जीवन सूना ही मुझे मालूम होता। सो इनको प्यार के सिवा भला मैं क्या कर सकती हूँ। यही मेरी आँखों की रोशनी हैं और जीवन का धन हैं।

    यह कहकर उस स्त्री ने लँगड़ी लड़की को एक हाथ से गोद में चिपटा लिया और दूसरे से उसके गाल के आँसू पोंछने लगी।

    सुनकर मानवती ने साँस भरी। बोली, सच है, माँ-बाप के बिना जीना हो सकता है, पर ईश्वर के बिना कोई भी नहीं जी सकता।

    इस तरह वे आपस में बातें करने लगीं कि एकाएक उस जगह जैसे बिजली की रोशनी हो गई हो, ऐसा लगने लगा। सबको बड़ा आश्चर्य हुआ। देखते हैं कि ज्योति उधर से फूट रही है, जहाँ मंगल बैठा था। सबकी नज़र उधर गई। देखते क्या हैं कि घुटनों पर हाथ रखे मंगल बैठा ऊपर की ओर देख रहा है और चेहरे पर उसके मुस्कराहट खेल आई है।

    दस

    महिला लड़कियों को लेकर चली गई। तब मंगल अपनी जगह से उठा। औज़ार नीचे रख दिए और ननकू और उसकी स्त्री के सामने हाथ जोड़कर बोला, अब मुझे विदा दीजिए। ईश्वर ने मेरे अपराध क्षमा कर दिए हैं। जो भूल हुई हो उसके लिए आपसे भी माफ़ी माँगता हूँ।

    सुनकर दोनों जने देखते क्या हैं कि मंगल के चेहरे में एक आभा फूट रही है। यह देख ननकू मंगल के आगे सिर नवाकर बोला, मंगल, मैं देखता हूँ तुम साधारण आदमी नहीं हो। मैं तुम्हें रुकने को कहने लायक़ हूँ कुछ पूछने लायक़। पर इतना बताओ कि यह क्या बात है कि जब तुम मुझे मिले और मैं तुम्हें घर लाया तब तुम उदास मालूम होते थे। लेकिन मेरी बीबी ने खाना दिया तो तुम उसकी तरफ़ मुस्करा पड़े और चेहरा खिल गया। उसके बाद फिर जब वह रईस बूट बनवाने आए तब तुम दूसरी बार हँसे और पहले से ज़्यादा तुम्हारे चेहरे पर रौनक दिखी। और अब यह श्रीमती अपनी लड़कियों के साथ आई कि तुम तीसरी बार हँसे और ऐसे खिल आए जैसे उजली धूप। मंगल, मुझे बताओ कि तुम्हारे चेहरे पर ऐसी शोभा उन तीन बार क्यों आई? तुम मुस्कराए क्यों?

    मंगल ने उत्तर दिया, “शोभा इसलिए कि मुझे दंड मिला था, सो अब ईश्वर ने माफ़ कर दिया है। और मैं तीन बार हँसा, क्योंकि ईश्वर ने मुझे तीन सत्य जानने के लिए यहाँ भेजा था, और अब मैं उन्हें जान गया हूँ। एक मैंने तब जाना जब तुम्हारी स्त्री ने मुझ पर करुणा की। इसलिए पहली बार तो मैं तब हँसा। दूसरा सत्य मैंने जाना जब वह रईस यहाँ जूते बनवाने आए थे। इससे दूसरी बार मैं उस समय मुस्कुराया। और अब इन लड़कियों को देखकर मैंने तीसरा और अंतिम सत्य जान लिया। इससे अब मैं तीसरी बार हँसा हूँ। और मेरा दुःख कट गया है।

    इस पर ननकू बोला, मंगल, हमें बतलाओ कि ईश्वर ने तुम्हें दंड क्यों दिया था और ये तीन सत्य क्या हैं, कि हम भी उन्हें जान सकें।

    मंगल ने जवाब दिया, “भगवान ने मुझे सज़ा इसलिए दी कि उनकी आज्ञा मैंने टाली थी। मैं स्वर्ग में एक देवता था, पर मैंने ईश्वर की आज्ञा भंग की। ईश्वर ने मुझे एक स्त्री की आत्मा लेने भेजा था। मैं उड़कर धरती पर आया। देखता हूँ कि स्त्री वह अकेली है, बेहाल पड़ी, और अभी हाल जुड़वा बच्चियों को जन्म दे चुकी है। बच्चियाँ माँ के बराबर पड़ीं अपनी नन्हीं-सी जान से चिचिंयाकर रो रही हैं, पर माँ उन्हें उठाकर छाती तक नहीं ले जा सकती। मुझे देखकर वह समझ गई कि मैं ईश्वर का दूत हूँ और उसे लेने के लिए आया हूँ सो वह रोने लगी। बोली, परमात्मा के दूत! मेरे पति की राख अभी ठंडी भी नहीं हुई है। पेड़ गिरने से उसके असमय प्राण गए। मेरे बहन है, चाची हैं, माँ। इन अनाथों को पीछे देखने वाला कोई नहीं है। देखो, मुझे अभी मत ले जाओ। बच्चों को दूध पिलाकर पाल-पोस देने दो कि वे पैरों चल जाएँ। तब बेखटके ले जाना। तुम्हीं सोचो बच्चे माँ-बाप के बिना भला कैसे रहेंगे?

    मेरा जी पसीज आया और मैंने माँ की विनती रखी। उठाकर एक बच्ची को मैंने उसकी छाती से लगा दिया, दूसरी को उसकी बाँहों में दे दिया। वापिस आया। स्वर्ग और ईश्वर के पास पहुँचकर कहा कि मैं उस माँ की आत्मा को नहीं ला सका। पति उसका एक पेड़ के गिरने से हाल ही में मरा है और उसके अभी दो जुड़वां बच्ची हुई हैं। सो उसका निवेदन है कि अभी मुझे ले जाओ। कहने लगी कि मुझे बच्चों को पाल-पोस लेने दो कि वे चलने लगें, नहीं तो बच्चे माँ-बाप के बिना कैसे जिएँगे? मैंने इसलिए उन्हें अपना हाथ नहीं लगाया।

    ईश्वर ने कहा, जाओ, उस माँ की आत्मा को लो और तीन सत्य सीखो। सीखो कि आदमियों में किस तत्त्व का वास है, आदमी का क्या वश नहीं है, और वह किसका जिलाया जीता है। जब ये तीन बात सीख लोगे तब ही तुम फिर स्वर्ग वापस सकोगे।

    सो मैं उड़कर फिर धरती पर आया और माँ को उठाकर चला। बच्चियाँ तब उसकी छाती से गिर गईं और अंतिम करवट जो ली तो देह उसकी एक बच्ची पर जा रही। उससे उसकी बच्ची की एक टाँग बेकाम हो गई। मैं आत्मा को लेकर ऊपर उड़ा कि ईश्वर के पास ले जाऊँ। पर जाने कैसा एक हवा का चक्कर आया कि मेरे डैने गिरने लगे। मैं उड़ने में असमर्थ हो गया। माँ की आत्मा फिर अकेली ईश्वर की तरफ़ उड़ गई और मैं धरती पर सड़क के किनारे गिरा।

    ग्यारह

    ननकू और मानवती अब समझे कि कौन था जो इन सब दिन उसके साथ घर में रहा-सहा था और घर में खाया-पिया था। वे गर्व और भय से भर आए।

    देवदूत ने कहा, मैं अकेला पड़ा था। अनजान, कपड़ा था कुछ। आदमी होने से पहले मैं सर्दी या भूख नहीं जानता था। आदमी की कोई ज़रूरत नहीं समझता था। लेकिन वहाँ भूख मालूम हुई और मैं ठंड में ठिठुर जाने लगा। जानता नहीं था कि क्या करूँ। तभी पास ईश्वर के नाम पर बनाया गया आदमियों का एक मंदिर मुझे दिखाई दिया। मैं वहाँ गया कि शरण मिलेगी। पर मंदिर में ताला जड़ा हुआ था और मैं अंदर जा नहीं सका। सो हवा की शीत से बचने के लिए मैं मंदिर के पीछे दीवार के सहारे उकड़ूँ बैठ गया। साँझ हो रही थी। मैं भूखा था। दर्द और ठंड से बदन मेरा अकड़ जाता था। तभी एकाएक सड़क पर आते हुए एक आदमी की आहट मुझे मिली। हाथ में उसके एक जोड़ी जूते लटके थे और वह अपने आप से बात करता हुआ जा रहा था। ख़ुद आदमी होने के बाद पहली बार मैंने मनुष्य चेहरा देखा। वह मुझे बड़ा भयानक मालूम हुआ और उधर से मैंने आँखें मोड लीं। वह आदमी बात करता जाता था कि कैसे जाड़ों के लिए मुझे कपड़े बनवाने हैं, और बीबी के लिए क्या करना है, और बच्चों के लिए क्या करना है। मैं सोचने लगा कि मैं यहाँ पास ही सर्दी और भूख के मारे मरा जा रहा हूँ और एक आदमी यह है कि अपने और अपनी स्त्री के लिए ही खाने-पहनने की बात सोचता है। वह मुझे मदद नहीं कर सकता। मुझे देखकर उस आदमी की भवें तन गईं और चेहरा भी भयावह हो आया। वह मुझसे क़तराकर दूसरी राह निकल गया। मेरी आस टूट चली। लेकिन एकाएक जान पड़ा कि वह लौटा रहा है। ऊपर निगाह उठाकर मैंने देखा तो वह वही नहीं दिखता था। पहले उसके चेहरे पर मौत का डर था, अब जीवन वहाँ था और ईश्वर की सत्ता का चिह्न मुझे उस मुख पर मिला। वह आदमी मेरे पास आया। कपड़े दिए और मुझे फिर घर भी ले गया। घर आने पर एक स्त्री मिली और मुँह खुलना था कि वह मर्द से भी ज़्यादा भयावनी मालूम हुई। वाणी में उसकी मौत विराजमान थी और उसमें से चारों ओर जो यम की गंध लपटें ले-ले कर फूटती थीं उसमें साँस लेना मुझे दूभर हो गया। बाहर मैं चाहे सरदी में ठिठुर मरूँ, लेकिन मुझे वह अपने घर से निकाल बाहर करने को तैयार थी। मैं जानता था कि अगर ऐसा हुआ तो इसमें उसका अनिष्ट है। लेकिन पति का उसे ईश्वर की याद दिलाना था कि वह स्त्री एकदम बदल गई। फिर वह मेरे लिए खाने को लाई और मुझे करुणा की आँखों से निहारा तब मौत का वास उसमें नहीं था, और उसमें विद्यमान ईश्वर की महिमा मुझे दिखाई दे आई। उस समय मुझे पहली सच्चाई की बात याद आई। ईश्वर ने कहा था कि यह जानो कि आदमी के अंतर में किसका वास है। और मैंने प्रतीति पा ली कि आदमी के अंदर प्रेम का वास है। मुझे हर्ष हुआ कि ईश्वर की कृपा-दृष्टि मुझ पर बनी है और सत्य-दर्शन में वह मेरे सहाई हैं। तब सहसा मुझसे मुस्कराहट फूट गई लेकिन अभी सब मैंने नहीं जाना था। जानना शेष था कि क्या आदमी का वश नहीं है और आदमी किसके जिलाए जीता है।

    मैं फिर आप लोगों के साथ रहने लगा और एक साल बीत गया। तब एक आदमी आया। वह जूते बनवाना चाहता था जो एक साल तक काम दें। बीच में कहीं से उधड़े, बिगड़े। मैंने उसकी ओर देखा। एकाएक देखता क्या हूँ कि उस आदमी के ठीक पीछे-पीछे मेरा ही साथी है, जो उसे उठा लेने को आया हुआ है। मेरे सिवा उस यमदूत को किसी ने नहीं देखा। लेकिन मैंने उसे पहचान लिया और जान गया कि आज का सूरज छिपने पाएगा कि उससे पहले ही मेरा वह साथी उस आदमी की आत्मा को ले उड़ेगा। यह देख मैंने सोचा कि देखो, यह आदमी साल भर का बंदोबस्त कर रहा है, लेकिन उसे पता नहीं कि वह के घड़ी का मेहमान है। उस समय मुझे ईश्वर का दूसरा वचन याद आया कि यह सीखो कि आदमी का वश क्या नहीं है?

    आदमी के अंतर में किसका वास है, यह तो मैं जान गया था। अब जाना कि आदमी का वश क्या नहीं है। आदमी का यह वश नहीं है कि वह अपनी आगे की ज़रूरतें जाने। इस दूसरी सच्चाई का दर्शन पाने पर दूसरी बार फिर मुझे हर्ष की मुस्कुराहट गई। एक बिछोह के बाद अपने स्वर्ग के साथी को देखकर भी मुझे आनंद हुआ और परम संतोष हुआ कि ईश्वर ने मुझे दूसरे सत्य के दर्शन दिए।

    लेकिन अब भी सब मैं नहीं जानता था। तीसरा सत्य मुझसे ओझल बना था। वह यह कि आदमी किसके श्वास से जीता है। फिर कुछ दिन बीते। मैं उत्कंठा में रहने लगा कि ईश्वर कब तीसरे सत्य का उद्घाटन करते हैं कि छठे साल जुड़वां बहनों को लेकर वह महिला आई। देखते ही उन लड़कियों को मैंने पहचान लिया। फिर क्या सुनी कि कैसे वे बच्ची पलीं और जीती रहीं। वह सुनकर मैंने सोचा कि माँ ने उन बच्चियों के लिए मुझे रोका था। मैंने उसकी यह बात मान ली थी कि बच्चे माँ-बाप से जीते हैं। लेकिन देखो कि एक बिल्कुल अनजान औरत ने उन्हें पाला-पोसा और बड़ा किया। जब वह स्त्री उन बच्चियों को प्यार करती थी, जो उसकी कोख की नहीं थीं, और उस प्यार में उसकी आँखों में आँसू रहते थे, तब साक्षात् शरण-शरण का रूप उनमें मुझे दिखाई दे आया। मैं समझ गया कि लोग किसके जिलाए यहाँ जीते हैं। उस समय मैं धन्य हो गया, क्योंकि ईश्वर ने तीनों सच्चाइयों के समाधान का मुझे दर्शन करा दिया था। मेरे बँधन कट गए, पाप क्षमा हो गए। और तब मैं तीसरी बार मुस्कुराया।

    बारह

    अनंतर उस देवदूत का शरीर दिव्य होकर दसों दिशाओं में मिल गया। अब प्रकाश ही उसका परिधान था और आँखें उस पर ठहरती थीं। वाणी गंभीर सुन पड़ी थी जैसे कि घन-घोष हो और स्वयं आकाश से दिव्य ध्वनि बिखरती हो। इसी वाणी में देवदूत ने कहा—

    मैं सीख गया हूँ कि लोग अपनी-अपनी चिंता करके नहीं रहते हैं, बल्कि प्रेम से रहते हैं।”

    बच्चियों की माँ को नहीं मालूम था कि उनके जीवन को क्या चाहिए, उस अमीर आदमी को मालूम था कि उसे क्या चाहिए, किसी आदमी का वश है कि उसको मालूम हो कि शाम होने तक क्या होनेवाला है। कोई क्या जानेगा कि शाम तक भोग भोगना मिलेगा कि राख में मिलना बदा है!

    आदमी बनकर मैं ज़िंदा रहा तो इसलिए नहीं कि अपनी परवाह की या कर सका! बल्कि इसलिए ज़िंदा रहा कि एक राहगीर के दिल में प्रेम का अंश था। उसने और उसकी बीबी ने मुझ पर करुणा की और मुझे प्रेम किया। अनाथ बच्चियाँ जीती उसने रहीं, तो माँ की चिंता के भरोसे नहीं, लेकिन इसलिए जीती रहीं कि एक बिल्कुल अनजान स्त्री के हृदय में प्रेम का अंकुर था और उसने उन पर दया की और प्यार किया। और सब लोग अगर रहते हैं तो अपनी-अपनी फ़िक्र करने के बल पर वे नहीं रहते, बल्कि इसलिए रहते हैं कि उनमें प्रेम का आवास है।

    मैं अब तक जान सका था कि ईश्वर ने मनुष्य को जीवन दिया कि वे जीएँ। लेकिन अब मैं उससे आगे भी जानता हूँ।

    मैंने जाना है कि ईश्वर यह नहीं चाहता कि लोग अलग-अलग जिएँ। इसलिए हक़ नहीं है कि कोई जाने कि किसी की अपनी ज़रूरतें क्या हैं। ईश्वर तो चाहता है कि सब एक्य-भाव से जिएँ। इसलिए सबको पता है कि सबकी ज़रूरतें क्या हैं।”

    “अब मैं समझ गया हूँ कि चाहे लोगों को पता हो कि वह अपनी फ़िक्र करके जीते हैं, लेकिन सच्चाई में तो प्रेम है जो उन्हें ज़िंदा रखता है। जिसमें प्रेम है, वह भगवान में हैं और भगवान उसमें है। क्योंकि भगवान प्रेममय है।

    इतना कहकर देवदूत ने ईश्वर की स्तुति की, जिसकी गूँज से मानो सारा वाताकाश हिल गया। तभी ऊपर छत खुली और धरती से आसमान तक एक जलती लौ की ज्योति उठती चली गई। ननकू और उसके स्त्री-पुत्र चमत्कार से सहमे-से धरती पर रहे। तभी देवदूत में प्रकाश के पंख उग आए और वह आकाश में उड़कर अंतर्धान हो गया।

    ननकू को चेत आया तो मकान ज्यों-का-त्यों खड़ा था और घर में उसके कुनबेवालों के सिवाय कोई था।

    स्रोत :
    • पुस्तक : लियो टॉल्सटॉय प्रतिनिधि रचनाएँ भाग-3 (पृष्ठ 201)
    • संपादक : कृष्णदत्त पालीवाल
    • रचनाकार : लियो टॉल्सटॉय
    • प्रकाशन : सस्ता साहित्य मंडल प्रकाशन
    • संस्करण : 2019

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