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इस ज़हर की तासीर

is zahr ki tasir

कुसुम भट्ट

कुसुम भट्ट

इस ज़हर की तासीर

कुसुम भट्ट

और अधिककुसुम भट्ट

    “काली बौनी प्लास्टिक की कुर्सी खिसकाती है—बैठो...पानी दे मीना’’ बहू पास खड़ी है पानी का गिलास थामे।

    काली बौनी की आँखें चमकती हैं—“रास्ते में कोई तकलीफ़ तो नहीं हुई बाबा?’’

    इसके होंठों से षहद की झिरझिर बरस रही है, आँखें मेरे भीतर ख़ुब गई हैं—टटोल रही है कोने अंतरे...इससे पहले मैं फफक पडूँ, ममता मेरे पास आकर बैठ गई है, उसकी आँखें डबक-डबक भरी बावड़ी हैं।

    “नाऽ... नाऽ... बाबा न... रोना नहींऽ... दूसरों के घर में बिल्कुल नहीं अशुभ होता है, बल...’’ काली बौनी फुसफुसा रही है। शहद की बूँदें गिर रही हैं, अँधेरा अपना विकराल रूप फैला रहा है, बाहर की कालिमा में काली बौनी घुलने को है..., इसकी आँखों का बिल्लीपन मुझे कचोट रहा है...

    मेरी सुख-सुविधा का इसे ख़याल है, बस के धक्के नहीं खाए, कार में आई हूँ सुरक्षित, मैं कहना चाहती हूँ पर नहीं कहती, शायद इसे यकीन नहीं था, मैं पाऊँगी पहली मर्तबा, मैं अकेली निरीह प्राणी इसकी मोहताज़, मेरे गिरते स्वास्थ्य ने मुझे दस बारह वर्श आगे ठेल दिया है। मेरे चेहरे पर झुर्रियों का जाल फैलता देख काली बौनी ख़ुश है। मुझसे कई वर्श बड़ी, उसके चेहरे पर एक भी झुर्री नहीं! पहले गाल पिचके रहते थे, पर, अब साँवले गाल गुलगुले से फूले हुए हैं। काले गालों पर लुनाई की परत है। इन गुलगुलों की फूलन से मैं हैरान हूँ।

    “ममता डबकती बावड़ी के जल को आँखों से घूँटती है और मुझे कोहनी मारकर चाय सुड़कने लगती है, फिर भी एक बूँद गिलास में टप्प गिर ही जाता है। इसके युवा होनहार बेटे को कोरोना काल के पैने पंजे छीन ले गए, बहू और नातिन को देखकर दिन भर जाने कितनी बार झिर-झिर बहती आँखों को पोंछती है। पर, मेरी आँखें ख़ारा पानी रोकने को असमर्थ हैं। ऊपर देखती हूँ मेरा घर जिसकी बालकनी की रेलिंग टूट कर गिर चुकी है, समय अपनी क्रूरता में ठेंगा दिखाते हुए फुसफुसा रहा है—देखा...मेरा बल...पल भर नहीं लगा तुम्हारा सुख चींधने में...हा-हा-हा’’

    ऊपर छोटी-सी रसोई का ताला जंक में लिपटा है, “जब वे लौटे थे रसोई समेट कर दालें डिब्बों में भरकर आटा, चावल, सारी वस्तुएँ इसी छुटकी रसोई के अंदर कितना मोह था, उन्हें अपनी बनाई इस छुटकी रसोई से। सुघड़ गृहणी की तरह रसोई में भोजन तैयार करते थे, जब भी मुझे आना होता पूछते ’’ खाने में क्या बनाऊँ...

    विधि? दाल भात और हरी सब्जी “तू तो विधि बिना दही सब्जी के नहीं खाती, अब गाँव क्या मिलना ठहरा जो है उसी में स्वाद है, सोच लेना।’’

    वे गरम-गरम परोसते खाना, खाकर मैं गाँव के चक्कर लगा आती। बड़ों को प्रमाण कर आती, बच्चों को प्यार करती, आशीष दे आती, आज मैं इन कुटनियों की मोहताज जिन्हें मैं फूटी आँख नहीं सुहाई कभी!

    इनकी बातों को कभी रस लेकर नहीं सुना इनकी परनिंदा में सहमत नहीं हुई। खाली समय पर पुस्तक प्रेमी हुई और चीड़ वन की पुलिया पर बैठी पुस्तकों में डूबी शब्द ब्रहम से साक्षात्कार करती रही बस यहीं से खटक गई, इनकी गिरगिट आँखों में! काली बौनी, इसकी कूटनीति काम कर गई हमें घर नहीं बनाने दिया कि हमारा हिस्सा है ही नहीं। जिस टूटे घर को मैं हसरत से देख रही हूँ, नीचे के पोर्सन में इसने ताला लगा दिया था और हमारे एक साझे खेत पर जबरन क़ब्ज़ा करके अपना दो मंज़िला मकान बना दिया था।

    हम बेघरबार रोते रहे जार-जार। अब जिस ऊपरी मंज़िल को टूटा देख रही हूँ वह भी पैतृक नहीं अच्छी ख़ासी रक़म देकर ख़रीदा था हमने। पति को शहर नहीं सुहाया, गाँव प्यारा था, गाँव के लोग बीबी-बच्चों से बढ़कर हुए। पहले छुट्टी लेकर आते रहे, रिटायर्ड होने के बाद यहीं बसावट हो गई— “सुख भरे दिन आए रे भैया’’ ख़ूब मस्त! व्यस्त ख़ूब ख़ुश! पहाड़ों को देखते हिमालय को पिघलती चोटियाँ और सामने बहती अलकनंदा की कल-कल बहती धारा। प्रकृति के सौंदर्य की भव्यता जंगल-जंगल घूमते गाँव के हिंसक लोगों के साथ शिकार खेलने जाते, कभी कोई तीतर बटेर, जंगली मुर्गी हाथ लग जाती। पर जब से गाँव वाले शहरों में स्थापित हुए, गाँव खाली हो गया। खेतों में वीरान, सूअर, बंदर धावा बोलने लगे। बाघ द्वार पर गुर्राने लगा, तो भी उनको गाँव छोड़ने का मन नहीं हुआ।

    काली बौनी का गाँव में एकछत्र साम्राज्य हुआ, कहने को सगी हुई पर जेठानी के बेटे को फूटी आँख देख पाई- ओऽ...रेऽ...विशाल ख़ूब मन लग रहा है गाँव में बल बेटा?

    वे हँसते—हाँ चाची...ख़ूब ही तो मन लग रहा, अपना गाँव, अपनी जगह ज़मीन, अपना पानी पंदेरा, अपने पूर्वजों की याद और अपने लोग, ऐसा आनंद और कहाँ ठहरा।

    काली बौनी का चेहरा निचुड़ जाता—शहर में सारे सुख हैं, बबा क्या ठहरा बल इस गाँव में? साग सब्जी को भी तरसते हैं हम! कई मर्तबा विशाल साग सब्जी भी ला देते, “फिर भी आनंद है चाची’’ वे चाय का गिलास थमाते—लो चाची गरम गरम चा पी लो, कितनी दूर से गौ दूध लाया हूँ।

    काली बौनी मोटी धोती के पल्लू से गिलास पकड़ती फूँक मार कर सुड़-सुड़ सुड़कती एक घूँट भरती, आँखें चमकाती, ‘‘तभी तो कहूँ तू जवान क्यों हो रहा है बल गाँव में आकर...! ’’

    मुझे एकाएक याद आता है विशाल भूटान से गाँव आए थे, कुछ वर्श भूटान में सेवा देने के बाद सीधे गाँव आए तो उनका वजन बढ़ गया था। काली बौनी की आँखें चैड़ी हो गई थी, सगे संबधियों की भीड़ में चिहुंकने लगी थी—ओ रेऽ विशाल क्या खाया बल तूने भूटान में, इतनी चैड़ी पीठ! दाल पीसने का मन हो रहा रेऽ...बबा...तेरी पीठ पर! ही-ही-ही, मैं अवाक! क्या ही बोलती। जीभ तालू से चिपकी रही। विशाल भोलेनाथ कुछ भी कहे कोई मुल-मुल हँसते रहते, कभी पलट कर जवाब देना उनके स्वभाव में नहीं हुआ। अलबत्ता वे चाची की सेवा में हमेशा तत्पर रहते, फिर भी काली बौनी की बिल्ली आँखों में द्वेश ही दिखता जिसे वह अपनी झूठी शहदीली मिठास से झिर-झिर सींचने में माहिर रही।

    विशाल ने पुराना घर तोड़कर नया बनाने का सोचा तो काली बौनी अड़ गई—कैसे बनेगा तेरा सुखमैल रेऽ विशाल छोरा... आँगन में खड़े होकर चार फुट की काया हाथ नपाती रही, नागिन का लहराना देख में दहशत से भर गई थी—छोड़ दे घर बनाने का ख़याल बबा...नी हो सकता रेऽ...कब्बी नी हो सकता बाबा...वह मीठा-मीठा फुफकार मारती। विशाल ने नीचे के भीतरी खंड का दरवाज़ा बंद कर बेसमेंट बनाया, आगे का हिस्सा काली बौनी के लिए छोड़ दिया था।

    फिर भी वह विशाल को कचोटती रही—ये खंबा क्यों गाढ़ दिया यहाँ...? ये लकड़ी क्यों रखी इधर, ये बक्षा क्यों रख दिया नीचे? बौनी विशाल को आहत करने के नए-नए बहाने खोजती। विशाल हँस कर कहते—लकड़ियाँ ऊपर रख लेता हूँ चाची, पर खंभा तो हिलने से रहा, अब इस खंबे का क्या करूँ...तुम ही बताओ बल चाची। “विशाल ख़ूब हँसते। वे आँगन में पड़ी कुर्सी सरकाते—बैठो चाची, कब तक खड़ी रहोगी’’ इसी छुटकी रसोई से विशाल कुछ खाने को लेकर आते—चाची, देवलगढ़ का फगणू लाला भी क्या नमकीन बनाता है बल, खाकर तो देखो... काली बौनी चाय सुड़कती नमकीन खाने लगती पर उसे हैरानी होती कि विशाल को रोज़-रोज़ टोककर ये सहज कैसे बना रहता है, इसे ग़ुस्सा क्यों नहीं आता! ये यहाँ से जाता क्यों नहीं?

    काली बौनी को हमेंशा अज्ञात भय बना रहता। विशाल के चाचा मंदिर के वर्शों तक पुजारी रहे फिर एक दिन अचानक उसके हाथ से मंदिर की चाबी जबरन छीन ली गई, उन्हें मंदिर में मूर्ति चोरी का भय दिखा कर पद से हटा दिया गया था। बौनी की जीभ पर भक्तों द्वारा भेंट में आए धन, बर्तन, कपड़े, फल, मिठाई आदि का स्वाद गहरे तक समा चुका था। वह आक्रमक होने लगी, राह चलते लोगों को सुना कर कडुवाहट उगलती। नए पुजारी को ताने मारती, कभी बददुआएँ देती, अचानक गाँव में ख़बर हुई कि नए पुजारी सुदर्शन लाल के बेटे के घर डाका पड़ा, सारी ज्वैलरी और कैश ले गए चोर। उस रात विवाह समारोह में गए थे बहू बेटा, सारे ताले टूटकर जीने की सीढ़ियों में गिरे थे। चोरों ने बर्तन भाड़े, रजाई, बिस्तर भी नहीं छोड़ा, कगांल कर दिया, काली बौनी की खुशी का पारावार रहा। सबसे कहती कि कलजुग में शनि भगवान तुरंत पाप का फल देते हैं। बल! जैसी करनी वैसी भरनी। उस रात काली बौनी के घर दीवाली मनी, लोगों ने भी छककर पकवान खाए।

    अब काली बौनी विषाल पर और ज़्यादा डंक मारने लगी थी क्योंकि सुदर्शन लाल विशाल की ईमानदारी और उनका मधुर व्यवहार देखकर उन्हें पुजारी बनाना चाह रहे थे, पहले विशाल को मंदिर में कई मर्तबा कुछ दिनों के लिए पूजा करने का मौक़ा मिलता तो वे भक्तों द्वारा भेंट की गई वस्तुएँ फल, मिठाई, नारियल आदि गांव में बाँट देते। जब नियुक्त पुजारी लौटते तो विशाल का दरियादिल देखकर उनके प्रति प्यार और सम्मान बढ़ जाता। पर गाँव में मंदिर के प्रति कई लोगों का लालच देखकर वे इस कार्यभार को संभालने में ख़ुद भी असहमति दिखाने लगे तो काली बौनी का लालच साँप की तरह फन फैलाने लगा था—बेटा विशाल तू तो बबा क्या कर सकेगा पूजा बल, बबा चार बजे उठना पड़ता है रेऽ...जाड़ों की रातें और बाघ का आतंक! सुबह में तो बल बर्फ़ की हवा चलती हैं! विशाल काली बौनी की बातें समझ पाने में असमर्थ, तब क्या करें चाची सुदर्शन मामा बीमार है बल...तो करना ही पड़ेगा...बाघ खाए या शेर... हा-हा’’ वे हँसते।

    ....तोऽ अपने चाचा को पकड़ा दे चाबी तेरे चाचा तीन बजे ही उठ जाते है रे विशाल...वे करेंगे बल पूजा, “काली बौनी की बिल्ली आँखें चमकती रहीं। पर गाँव वालों ने उनको चाबी नहीं दी तो नहीं ही दी। बस काली बौनी का ज़हर और फैलने लगा, वह विशाल को मौक़ा मिलते ही बार-बार डंक मारने लगती। उसने गाँव में लोगों को भड़काना शुरू कर दिया—देखो तो पूजा करने में विशाल देर करता है बल! बेचारे को बाघ का डर लगता होगा रे रामा! अब जंगली सुअर भी गांव में घुर्र-घुर्र बोलने लगे हैं। बेचारा लड़का ज़िंदगी भर शहर में रहा, अब गाँव में क्या ही ठहर पाएगा बल...’’ काली बौनी की आँखें डबडबाने लगती—मुझे तो डर लग रहा है कहीं बाघ ने झप्पट्टा मार दिया तोऽ...उसे उठा ले गया तो...

    अब काली बौनी ने अपने परिवार के सुगम को भड़काना शुरू कर दिया— “रेऽ...सुगू तू तो चुप बैठा है, देख तो विशाल का कैसा नाम चमक रहा इस पट्टी में!’’ सुगम नाम सुगम पर असल में दुर्जन ठहरा, जिसकी मन की थाह पाना गाँव में किसी के वश की बात नहीं कुँठित मन गाँव वालों की प्रगति वैभव को देख जलता भुनता ख़ुद दसवीं कक्षा पास कर सका, पर भाग्य ने पासा फेंक दिया पिता को सेवानिवृत्त होने में कुल दो वर्श बचे थे, टी.बी. की बीमारी से चल बसे। पिता की सरकारी नौकरी उसकी झोली में अनायास गिरी। विशाल का चचेरा कुटिल भाई विशाल को मंदिर से हटाने की चाल चलने लगा।

    चाची कुटनी और कुटिल भाई विशाल के कार्य पर गिद्ध से मँडराने लगे थे। चाची काली बौनी ने सटीक उपाय करने की सोची, वे विशाल के बारे में अफ़वाहें फैलाने लगे। सुगम की पत्नी उससे दो गुनी कुटिल निकली—अरेऽ देखो तो...जेठ जी मंदिर खुला छोड़कर ग़ायब हो जाते हैं...अगर चोरी हो गई तोऽ...? गाँव में बात फैल गई, काली बौनी और गोरी कुटनी ने लोगों के कानों में झूठी सच्ची कहानी गढ़ ली—शहरी आदमी क्या जाने गाँव का मिजाज दूर से पूजा करना मंदिर खुला छोड़कर जाना, सफ़ाई करना, देवता नाराज़ हो गए तोऽ...?

    विशाल अपने सीधेपन में उनकी कुटिल चालों को समझ पाएँ। इसी बीच कोरोना गया और सुदर्शन लाल का बेटा शहर से आकर पिता को कोरोना दे गया, हमेंशा स्वस्थ और ख़ुश रहने वाले सुदर्शन बुखार से पीड़ित होकर सप्ताह भर में चल बसे, विशाल का साथ देने वाले एक कद्दावर आदमी का जाना, इनकी पौ बारह हो गई। कब से इस घड़ी का इंतज़ार कर रहे थे।

    एक मनहूस शाम पहाड़ियों से अँधेरा अपना साम्राज्य फैलाने छल-बल के साथ उतरने लगा तो विशाल के हाथ से चाबी छीन ली! गाँव में कह दिया कि विशाल भाई ने स्वयं उसके हाथ में चाबी थमाई कि उनसे नहीं होती अब पूजा।

    अगली सुबह मुँह अँधरे मंदिर का घँटा ज़ोर-ज़ोर से बजने लगा तो पता चला कि सुगम ने पुजारी की कमान संभाल ली और विशाल छाती की पीड़ा से तड़प रहे थे। कोई सुधि लेने वाला था। वे मानसिक परेशानी से इस क़दर घिर चुके थे कि सुगम के झूठ प्रपंचों में हामी भरने लगे थे, वे अपनों के विश्वासघात से अति आहत हुए, फिर उभर ही पाए। दिनों दिन उनकी मानसिक अंर्तव्यथा बढ़ती ही गई, उनका बीपी बढ़ता गया, वे दवा भी लेते, उनकी जीने के इच्छा ही समाप्त हो चुकी थी।

    फ़ोन पर भी वे ज़्यादा बात करने में असमर्थ थे। मैंने उन्हें वापस बुला लिया पर जो आघात उन्हें काली बौनी चाची और कुटिल चचेरे भाई ने दिया था, वह भीतर नासूर बन कर टीस रहा था। ये ऐसा छलिया रोग था जो बाहर से नज़र नहीं आता, भीतर से समूचा जीवन रस चूसकर खोखला कर देता है। विशाल का जिस्म इस रोग को झेल नहीं पाया, उन्हें 13 जनवरी की ठँडी रात में ब्रेन स्ट्रोक हो गया। इस बीच काली बौनी का इकलौता बेटा शशांक भी ब्रेन हैमरेज से चल बसा।

    सुगम और उसकी कुटिल बीबी की राह का काँटा निकल चुका तो उन्होंने मंदिर पर पूरा क़ब्ज़ा जमा लिया। मंदिर की सारी आमदनी सुगम के पास आने लगी तो वह अभिमानी पंचायती चैक में छाती फुलाकर कहता—मेरे पास इतना पैसा हो गया कि अब और नहीं चाहिए।

    उसने शहर में फ़्लैट लिया, ज़मीन ली, गाँव में बड़ा घर बनाया, बैंकों में उसका पैसा बढ़ता ही जा रहा था। नई सरकार आने से मंदिर का जीर्णोंद्वार हुआ, सड़के बनीं, धर्म का डंका बजाने वाली सरकार ने मंदिर समिति को लाख़ों का बजट दिया। सड़कों के किनारे पोस्टर लगाए गए जिसमें देवताओं की स्तुतियाँ, वेद की ऋचाएँ, शिव पार्वती श्रोत, उनकी भव्य तस्वीरें पेंट की गई, उन उसके बीच सुगम ने अपनी पूजा करते हुए तस्वीर और घँटी बजाते हुए तस्वीर चेप दी, तवे जैसा काला चेहरा लंबा मीकिया जिस्म, ऊँट जैसा कूबड़, जिस्म पर पीली धोती कुर्ता लाल बास्केट सिकुड़े माथे पर चंदन का लेप, ऊँट जैसी गर्दन पर रूद्राक्ष मालाओं की लड़ी, काले लम्बे चेहरे पर गिद्ध की चालाकी भरी छोटी-छोटी आँखों की ढकने के लिए मोटे फ़्रेम का चश्मा, लोग देख कर हँसते, जाने कितने पोस्टर उसने सड़क के किनारे चिपका दिए थे। उसने कुछ वाक्य वेद की ऋचाओं के रट लिए थे, जिन्हें पूरी लय के साथ वह गाता रहता, लोग सोचते पंडित वेदपाठी है जिन्हें पता लगता कि ग़लत बोल रहा है वे टोक भी देते।

    फ़िलहाल सुगम ने वो हासिल कर ही लिया जिससे सुख, वैभव, आनंद का जीवन कहा जा सकता है, वह और उसकी कुटिल पत्नी मदमस्त गाँव के सिरमौर बने हैं। काली बौनी को क्या मिला इकलौता बेटा खोया, गाँव छोड़कर ऐसे शहर में बसावट करनी पड़ी जहाँ की हवा में इतना प्रदूशण ठहरा कि साँस लेना भी दूभर।

    मैं अपने दरकते घर को देख रही हूँ। विशाल इस घर को अपने सपनों का घर बनाने की अधूरी इच्छा लिए दुनिया से रूखसत हो गए! इसकी टूटी बाहें, दुखती पसलियाँ, घुटनों से मुड़े पाँव ब्रेन के अंदर रक्त के क्लाट घर मानव आकृति में तब्दील होने लगा है। मैं भय से जड़ हो रही हूँ—विशाल!

    भाभी!... कहीं गहरे कुएँ से आती आवाज़—संभालो ख़ुद को...कोई अमर नहीं है, सभी को जाना है बारी...बारी

    छनाक् कोई काँच टूटता है, लहुलुहान मेरा जिस्म...भानु मुझे झकझोर रहा है, भानु विशाल की दूसरी चाची का युवा बेटा— “ऐसे जी पाओगी तुम...वह मुझे गले गला रहा है...तुम तो हम सबकी ताक़त हो भाभी! तुम इतनी कमज़ोर! नहीं टूट सकती तुम...’’ भानु की आँखें भी उबकने को तैयार हैं।

    मेरे भीतर बगूला फूट रहा है—हाँ मैं कमज़ोर हूँ... “मेरे भीतर एक चीख़ फूटती है और मैं संज्ञा शून्य हो जाती हूँ।’’ आधे दिन पूरी रात से उजली सुबह तक समय के साथ मेरे इर्द-गिर्द कितना दर्द बहा, नहीं मालूम। आज मेले में हूँ, सूनी पथराई आँखें लिए विशाल को खोजती...राह में कोई पुकारता है—भाभी!

    वह मेरे पाँवों को छू रही है—पहचाना।

    मैं स्मृतियों को बटोरते हाथ बढ़ाती हूँ—कौन? कौन? सुशमा उँगली उठाती—उस घर की बेटी...

    स्मृति पंख झपकते रही है—इसके इकलौते इंस्पेक्टर भाई ने सुसाइड किया था!

    “इसकी इकलौती बेटी अभी तीन महीने पहले दो छोटे बच्चों को छोड़कर दुनिया से रूख़सत हुई है कोई स्वर हवा में तैर रहा है... ’’ पर इसके चेहरे पर दुख की एक परछाई भी नहीं! मैं सोचती हूँ...

    जीना सीख लिया मैंने भाभी... ‘‘वह फुसफुसा रही है।’’

    थोड़ी देर पहले इसकी समधन मिली थी, दो बच्चों का हाथ पकड़े—इनकी माँ अब मैं ही हूँ... बाबू... जितने चेहरे दिखे दर्द में लिपटे मैं अकेली इस दर्द की लाठी टेकती इस पहाड़ पर चढ़ रही हूँ।

    नहींऽ...

    मैं ही अकेली नहीं इस पहाड़ पर, हम सभी अपने-अपने दर्द का बोझ लिए चढ़ते जा रहे हैं, कोई हँस कर, कोई रोकर, कोई खीझकर...सुबमा की आँखों में पल भर ठहरी हुई...ज़िंदगी मुझे उकसा रही है..., “सुबमा की आँखें कुछ कह रही हैं, मैं जो आत्मदया के भाव से भरी थी, अपने दर्द की लाठी को हवा में उछाल देती हूँ—नहीं हूँ... मैं कमज़ोर...’’ कोई शक्ति बहुत गहरे बैठी अँकुराने लगी है।

    लगता है जितना भी जब-जब मेरे भीतर से बह गया, मुक्त कर गया, अब मैं रूई के फूल-सी हल्की महसूस कर रही हूँ...

    स्रोत :
    • रचनाकार : कुसुम भट्ट
    • प्रकाशन : हिन्दवी के लिए लेखक द्वारा चयनित

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