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दो साथी

do sathi

लियो टॉल्स्टॉय

और अधिकलियो टॉल्स्टॉय

    एक

    एक बार की बात है कि दो बूढ़े आदमी थे। उन्हें परम तीर्थ-धाम येरुशलम के यात्रा-दर्शन की चाह हुई। उनमें एक का नाम था एफिम शुएव। यह एक ख़ासा ख़ुशहाल काश्तकार था। दूसरे का नाम था एलीशा। एलीशा की हालत उतनी अच्छी थी।

    एफिम आदमी औसत तरीक़े का था। संजीदा, इरादे का मज़बूत, आदत का नेक। शराब उसने जीवन में कभी नहीं पी थी। बीड़ी पीता था, तंबाकू। और कभी उसके मुँह पर गाली नहीं आती थी। दो बार गाँव में वह सरपंच चुना गया था और उसके काल में हिसाब पाई-पाई का दुरुस्त रहता था। बड़ा उसका कुनबा था।

    दो बेटे थे और एक नाती का भी ब्याह हो गया था और सब जने साथ रहते थे। वह मिलनसार था और उसकी काया अभी तंदुरुस्त बनी थी। दाढ़ी नीचे तक आती थी और साठ पार तो गए तब दाढ़ी के एक-आध बाल कहीं चाँदी के होने शुरू हुए थे।

    एलीशा संपन्न था, दीन। काम उसका बढ़ईगीरी का था और बाहर बस्ती में जाकर मज़दूरी कर लिया करता था। पर उमर हो आई तो बाहर अब नहीं जा सकता था। सो घर रहकर उसने मधुमक्खी पाल ली। इसका एक बेटा काम की तलाश में दूर देश चला गया था। दूसरा घर रहता था। एलीशा दयावान और ख़ुशमिज़ाज आदमी था। कभी-कदास पी लेता था और सोने की आदत भी थी और गाने का भी शौक़ था। लेकिन आप भी वह शांत प्रकृति का था और पास-पड़ोस के साथ या घर में सबसे बनाकर रहता था। क़द में ज़रा नाटा, रंग कुछ पक्का। दाढ़ी घुँघराली घनी। और सिर अपने हमनाम पुराने ऋषि एलीशा की भाँति हमारे इन एलीशा का भी बालों से एकदम सूना था।

    इन दोनों वृद्धजनों ने, एक मुद्दत हुई कि साथ येरुशलम की यात्रा को चलने का संकल्प किया था। लेकिन एफिम को फुरसत का समय नहीं निकला। काम उसे बहुत रहा करता था। एक निबटता कि दूसरा हाथ घेर लेता। पहले तो नाती की शादी की बात ही आगे गई। फिर अपने छोटे बेटे के लाम पर से लौटने के इंतज़ार में रहने में समय निकल गया। उसके बाद एक नए मकान के सिलसिले में मदद लगनी शुरू हो गई।

    सो एक इतवार के दिन दोनों जने, जहाँ मदद लग रही थी, उस नए घर के आगे मिले। वहाँ बल्लियों के चट्टे पर बैठकर बात करने लगे। एलीशा ने कहा, “क्यों जी; वह यात्रा का संकल्प हमारा कब पूरा होने में आएगा?

    एफिम का मुँह लटक गया। बोला, अभी थोड़ी बार और देखो। यह साल तो तुम जानो कैसा कठिन मुझे पड़ा है। सोचा था रुपए दो-सौ एक में यह झोंपड़ी खड़ी हो जाएगी। लेकिन चार-सौ ऊपर लग गए और अभी कितना काम बाक़ी है। गरमी आने तक और ठहरो। भगवान ने चाहा तो गरमी में ज़रूर-ही-ज़रूर चलेंगे?

    एलीशा ने कहा, “मेरी राय तो है कि हमें जल्दी-से-जल्दी चल देना चाहिए। मौसम बसंत का है, सो समय अच्छा भी है।

    समय तो अच्छा है, लेकिन इस लगी मदद का क्या करूँ? इसे छोड़ कैसे दूँ?

    तुम तो ऐसे कहते हो जैसे देखने-भालने को दूसरा कोई है ही नहीं। तुम्हारा बेटा ही जो है।

    बेटा! भली कही! उसका एतबार मुझे नहीं है। कभी हज़रत ज़्यादा भी चढ़ा जाते हैं।

    भाई, आँख मिचने पर भी तो हमारे सब कुछ काम चलेगा न। सो बेटा बड़ा हुआ, आप भुगत के सब सीख जाएगा।

    तुम्हारा कहना तो ठीक है, लेकिन काम छेड़ा तो अधबीच में उसे छोड़ा भी नहीं जाता है।

    भाई, सब कुछ तो इस जन्म में कभी पूरा हुआ नहीं है। उस दिन की बात है कि हमारे घर ईस्टर के लिए झाड़ा-बुहारी और सफ़ाई-धुलाई हो रही थी। सो कुछ यहाँ करने को है, तो कुछ वहाँ निपटाना है। इस तरह यह कर वह कर, बस यही लगा-लगी रही। फिर भी सब काम पूरा नहीं हुआ। सो बड़े-बेटे की बहू जो हमारी है बड़ी समझदार है। बोली, परव-त्यौहार का दिन हमारी बाट नहीं देखता, यही ग़नीमत है। नहीं तो कितना ही करें, हम उसके लिए कभी तैयार हो पाएँ और ऐसे तो त्यौहार कभी मनें।

    एफिम सुनकर सोच-विचार में पड़ गया। बोला, इस झोंपड़े पर मेरा ख़ासा ख़र्चा गया है और यात्रा पर तुम जानो खाली हाथ तो जाया नहीं जाता। हरेक पर सौ-सौ रुपया तो भी लगेगा। और सौ रुपया कोई छोटी रक़म नहीं है।

    एलीशा यह सुनकर हँस पड़ा। बोला, छोड़ो भी, कैसी बात करते हो। मुझसे दस गुना तुम्हारे पास होगा। फिर भी पैसे की चलाते हो। मुझे बता दो कि कब चलना है, और आज पास कुछ नहीं तो क्या, तब तक मैं चलने जोग कर ही लूँगा।

    एफिम भी इस पर हँसा। कहने लगा, “भई, पता नहीं था कि तुम ऐसे रईस हो। अच्छा, यह रक़म ले कहाँ से आओगे?

    घर में मिल-मिला कर जमा-बटोर कुछ हो ही जाएगा। वह काफ़ी हुआ तो कुछ मधुमक्खी के छत्ते एक पड़ोसी के हाथ उठा दूँगा। वह अरसे से लेना भी चाह रहा है।

    अगर कहीं शहद उनसे पीछे ख़ूब पका तो तुम्हें बेचने का अफ़सोस होगा।

    अफ़सोस? नहीं भाई, अफ़सोस में नहीं जानता। अपने पाप के सिवा मैं किसी और बात के लिए पछतावा नहीं करता। भई, अपनी आत्मा से बढ़कर तो दूसरा कुछ है नहीं।

    सो तो ठीक है, फिर भी घर के काम-धाम का हर्ज करना भी ठीक नहीं लगता।

    लेकिन आत्मा का हर्ज हो रहा है, सो यह तो उससे बुरी बात है ना। हम दोनों ने तीर्थ का संकल्प किया था। सो चलना ही चाहिए।

    दो

    एलीशा ने आख़िर साथी को मोड़ ही लिया। ख़ूब सोच-विचारने के बाद सवेरे के समय एफिम एलीशा के पास आए। बोले, भई, तुम्हारी बात सही है। चलो, चलें। मौत-ज़िंदगी परमात्मा के हाथ है। सो जब तक देह में सामर्थ्य है और दम बाक़ी है। तभी चल दें तो अच्छा है।

    सो सात रोज़ के अंदर दोनों जने प्रस्थान के लिए तैयार मिले। एफिम के पास नक़द पैसा काफ़ी हो गया। सौ-एक रुपया उसने साथ ले लिया। दो-सौ बीबी के पास छोड़ दिया।

    एलीशा ने भी तैयारी कर ली थी। दस छत्ते उसने पड़ोसी को उठा दिए थे। जो नई मधुमक्खी की मुहाल उन छत्तों पर आकर लगे, वे भी उसी की। इस तमाम पर सत्तर रुपए उसे मिले। सौ में के बाक़ी उसने अपने कुनबे के और लोगों से जमा बटोरकर पूरे कर लिए। इसमें इधर के और लोग सब खोखले ही रह गए। बीबी ने अपनी मौत के बाद क्रिया-कर्म के वास्ते बचाकर कुछ रख छोड़ा था सो सब दे दिया। बहू ने भी पास का अपना सब कुछ सौंप दिया।

    एफिम ने अपने बड़े लड़के को ठीक-ठीक पूरी तरह सब कुछ समझाकर ताकीद दे दी थी कि कब और कितनी घास कहाँ से कटेगी, खाद का क्या इंतज़ाम होगा और छत कैसी पड़ेगी। उसने एक-एक बात का विचार रखा था और पूरा बंदोबस्त समझा दिया था। दूसरी तरफ़ एलीशा ने अपनी बीबी को बस इतना कहा कि उन छत्तों को जो बेच दिए हैं न, अपनी मक्खी लगने देना कि कहीं उनका शहद कम हो जाए। और देखना, सब छत्ते पूरे-के-पूरे पड़ोसी को मिल जाएँ, कुछ अपनी तरफ़ से चूक हो। बाक़ी घर की और बातों के बारे में एलीशा किसी तरह का कोई ज़िक्र भी मुँह पर नहीं लाया। बोला, “जैसी ज़रूरत देखना, वैसा अपने आप कर लेना। तुम्हीं लोग तो मालिक हो। सो जो ठीक जानो अपने सोच-विचारकर वह कर ही लोगे।

    इस तरह दोनों वृद्ध जन तैयार हो गए। लोगों ने खाना बनाकर साथ बाँध दिया और पैरों के लिए पट्टियाँ तैयार करके दे दीं। जूते उन्होंने एक जोड़ी पहन लिए, एक साथ रख लिए। परिवार के लोग गाँव के किनारे तक साथ-साथ आए और वहाँ दोनों को विदा दी। दोनों जने अपनी यात्रा पर चल दिए।

    एलीशा मन से हलका और प्रसन्न था। गाँव से निकलना था कि घरबार की सब बातें उसने मन से भुला दीं। उसको बस अब यह लगन थी कि अपने साथी को कैसे आराम से और ख़ुश रखूँ। किसी को कोई सख़्त कडुआ शब्द कहूँ और सारी यात्रा कैसी प्रीति और शांति से पूरी करूँ। सड़क पर चलते हुए एलीशा या तो मन-मन में प्रार्थना दुहराता रहता, या संत-महात्माओं के जीवन का विचार करता। जो थोड़ा-बहुत उनके बारे में उसने सुना-जाना था वही उसे बहुत था। रास्ते में कोई मिलता या रात में कहीं ठहरना होता तो वह बड़ी विनय से बात करता और सबसे मीठे बैन बोलता। इस तरह मगन भाव से वह अपनी यात्रा पर आगे बढ़ता रहा। एक बात बेशक़ उसके बस की नहीं हुई। सुँघनी उससे नहीं छोड़ी गई। सुँघनी की डिबिया तो उसने घर छोड़ दी थी, लेकिन उसके बिना अब उसे कल नहीं पड़ती थी। आख़िर एक राहगीर ने उसे कुछ सुँघनी दी। सुँघनी पाकर वह फिर चलते-चलते राह में रुक जाता (कि कहीं उसके साथी को बुरा लगे या मन चले) और पीछे रहकर सुँघनी की वह ज़रा नक्की ले लेता और फिर आगे बढ़ता था।

    एफिम भी मज़बूत तबियत से चल रहा था। कोई खोटा काम नहीं करता था और अहंकार के वचन नहीं बोलता था, लेकिन मन वैसा हलका नहीं था। घर की फिकर का बोझ उसके मन पर बना था। जाने घर पर कैसे चल रहा हो। देखो, बेटे से यह और कहने की याद रही। और हाँ, वह भी नहीं बतलाया। लड़का ठीक-ठीक चला भी लेगा कि नहीं। रास्ते में कहीं खाद की गाड़ी जाती उसे दिखती या आलू ढोते हुए लोग मिलते तो एफिम के मन में एकदम ख़याल होता कि घर पर हमारे सब काम ठीक-ठीक हो रहे होंगे कि नहीं। उन्हें अपने हाथों से करके बता और समझा आऊँ।

    इस तरह पाँच हफ़्ते वे दोनों चलते गए, चलते गए। उनके जूते के तले बेकार हो गए। छोटा-रूस आते-आते दूसरे जूतों के बंदोबस्त की उन्हें सोचनी पड़ी। घर से चले तब से अब तक खाने और रात के ठहरने के उन्हें दाम देने हुआ करते थे। यहाँ आकर अब लोग उन्हें ठहराने और सत्कार करने में मानो आपस में होड़-सी करने लगे। अपने घर ठहराते, खिलाते-पिलाते और बदले में पैसा एक छूते। इतना ही क्यों, आगे राह के लिए वे आग्रह के साथ खाना भी उनके साथ बाँध दिया करते थे।

    कोई पाँच-सौ मील की यात्रा इन लोगों ने इस तरह बे-लागत की। इसके बाद जो जगह आई, वहाँ उस साल काश्त सूख गई थी। वहाँ के किसान लोग ठहरा तो मुफ़्त लेते थे, पर खाना बे-लागत नहीं दे सकते थे। सो कभी तो रोटी उन्हें मिलती भी नहीं थी। दाम देने को तैयार थे, पर रोटी मयस्सर नहीं होती थी। लोग बोले कि खेती पारसाल एकदम सत्यानाश हो गई। जिनके खलिहान भरे रहा करते थे, उन्हें ही अब घर का बासन-कूसन बेच देना पड़ रहा है। उनसे कुछ उतरी हालत जिनकी थी, उनका हाल बेहाल है। और जो ग़रीब थे, उनमें भाग गए, सो गए, बाक़ी जो बचे माँग-ताँग कर पेट पालते या घर में पड़े भूखों मर रहे हैं। जाड़ों में तो चोकर और पत्तियाँ खाकर तन जोड़े रहे।

    एक रात दोनों आदमी एक छोटे देहात में ठहरे। रात वहाँ नींद ली और अगले दिन तड़का फूटने से पहले चल दिए। वहाँ से काफ़ी रोटी ले रखी। धूप में ताप चढ़ने तक ख़ासी राह उन्होंने तय कर ली। कोई आठ मील चलने पर एक चश्मा आया। वहाँ दोनों जने बैठ गए और पानी लेकर उसके साथ रोटी भिगो-भिगोकर खाई। फिर पाँवों की पट्टी खोल ज़रा विश्राम किया। एलीशा ने अपनी सुँघनी की डिबिया निकाली।

    देखकर एफिम ने नापसंदगी में सिर हिलाया। कहा, यह क्या बात जी? यह गंदी लत तुम नहीं छोड़ पाते?

    एलीशा ने कहा, यह लत मेरे बस से भारी हो गई दिखती है। नहीं तो और क्या कहूँ?

    विश्राम के उपरांत उठकर वे लोग वहाँ से आगे बढ़ लिए। कोई मील और चलने पर एक बड़ा गाँव आया जिसके ठीक बीच में से गुज़रना हुआ। अब घाम का ताप बढ़ गया था।

    एलीशा को थकान हो आई थी और ज़रा वहाँ ठहरकर पानी पी लेने को उसका जी था। लेकिन एफिम बिना रुके चला जा रहा था। दोनों में एफिम अच्छा चलने वाला था और एलीशा को उसका साथ पकड़े रहने में भी कठिनाई होती थी।

    एलीशा ने कहा, जो कहीं यहाँ पानी मिल जाता, तो अच्छा था।

    एफिम ने कहा, अच्छी बात, पियो पानी, पर मुझे प्यास नहीं है।

    एलीशा ठहर गया। बोला, तुम चलते चलो। मैं ज़रा उस झोंपड़ी तक जाकर पानी पी आता हूँ। थोड़ी देर में बढ़कर तुम्हारा साथ लूँगा।

    अच्छा।

    यह कहकर एफिम सड़क पर अकेला ही आगे बढ़ लिया। एलीशा झोंपड़ी की तरफ़ मुड़ा।

    झोंपड़ी छोटी-सी थी। दीवारें मिट्टी से पुती थीं। फ़र्श काले रंग का और इस्तेमाल से चिकना था। ऊपर सफ़ेद पोता। लेकिन दीवारों की मिट्टी गिरने लगी मालूम होता था मिट्टी थोपे मुद्दत हो गई है। ऊपर एक तरफ़ से छप्पर-छत थी। छिदीली थी। दरवाज़े के आगे एक आँगन-सा था। एलीशा आँगन में आया। देखा कि मिट्टी के डंडे का घेर जो घर के चारों तरफ़ खिंचा हुआ है, उसके तले अंदर एक आदमी ढेर की मानिंद पड़ा है। देह का मज़बूत, दाढ़ी नहीं है और कुरता पाजामे के अंदर उड़सा हुआ है। आदमी वह वहाँ छाया में ही लेटा होगा, लेकिन अब सूरज घूमकर पूरा उसके ऊपर पड़ रहा था। वह सोया नहीं था, फिर भी पड़ा हुआ था। एलीशा ने उसके पास जाकर पानी माँगा; लेकिन आदमी ने कुछ जवाब नहीं दिया।

    एलीशा ने सोचा कि या तो यह बीमार है या जान-बूझकर सुनना नहीं चाहता। दरवाज़े के पास गया तो अंदर से एक बच्चे के रोने की आवाज़ आई। उसने कुंडी पकड़ दरवाज़े को खटखटाना शुरू किया।

    'भाई, कोई है?

    एलीशा ने पुकारा। पर जवाब कोई नहीं। अपने डंडे से किवाड़ को ठोकते हुए उसने फिर पुकारा, ये जी, कोई सुनने वाला अंदर है?

    पर कोई उत्तर नहीं।

    ये सुनो, कोई है?

    जवाब नदारद।

    एलीशा लौटने को हुआ। लेकिन तभी ऐसा मालूम हुआ कि जैसे दूसरी तरफ़ से कोई कराहने की आवाज़ उसके कान में पड़ी हो।

    कोई मुसीबत इन लोगों पर पड़ी मालूम होती है। चलूँ। देखूँ तो।”

    और एलीशा झोंपड़े में घुसा।

    खटका उसने खोला। दरवाज़े की कुंडी अंदर से बंद नहीं थी, वह सहज खुल गया और एलीशा जिस कमरे में पहुँचा उसमें बाईं तरफ़ चूल्हा था। सामने आले के ऊपर मसीह का क्रूस टँगा था। पास एक मेज़ थी। वहीं बेंच पड़ी थी। बेंच पर थी एक स्त्री। सिर उसका खुला था, तन पर अकेला एक कपड़ा। उमर की बुढ़िया थी। मेज़ पर सिर रखे झुकी बैठी थी। पास ही पोता मिट्टी-सा पीला दुबला एक बालक जिसका पेट आगे को निकला हुआ था। वह कुछ माँग रहा था और ज़ोर-ज़ोर से रोकर बुढ़िया का पल्ला खींचता था। एलीशा घुसा तो हवा वहाँ की उसे बहुत गंधीली मालूम हुई। उसने मुड़कर देखा तो चूल्हे के पास धरती पर एक औरत और पड़ी थी। आखें बंद थीं। और गले में कुछ घर-घर आवाज़ हो रही थी। वह वहाँ चित्त पड़ी आसमान में रह-रहकर टाँगें फेंक रही थी। कभी उन टाँगों को सिकोड़ती, समेटती और फिर फेंकने लगती। दुर्गंध वहीं से रही थी। मालूम होता था कि वह ख़ुद उठ बैठ सकती है नहीं, कोई और देखने-भालने वाला है। बुढ़िया ने सिर उठाया और आगंतुक को देखा। बोली, क्या है? कुछ चाहते हो? यहाँ कुछ नहीं।''

    भाषा उसकी दूसरी थी। फिर भी एलीशा बात समझ गया। बोला भगवान की दया हो। ज़रा पीने को पानी चाहता था।

    यहाँ कोई नहीं है, कुछ नहीं है। पानी काहे में लाकर रखें? जाओ, रास्ता देखो।

    उस समय एलीशा ने पूछा, क्यों जी, कोई तुममें नहीं जो यहाँ उस बेचारी बीमार को ज़रा सँभालने लायक़ हो?

    नहीं कोई नहीं। लड़का मेरा बाहर बेबस मर रहा है। हम यहाँ अंदर मर रहे हैं।

    बच्चे ने एक नए आदमी को देखकर रोना बंद कर दिया था। लेकिन बुढ़िया बोली तो फिर उसने वही राग शुरू कर दिया। बुढ़िया का आँचल खींचकर बोला, दादी रोटी, दादी रोटी।

    एलीशा बुढ़िया से पूछने वाला था कि बाहर से वह आदमी लड़खड़ाता-लड़खड़ाता वहाँ पहुँचा। वह दीवार को पकड़े पकड़े रहा था; पर कमरे में घुसा कि देहली के पास धड़ाम से गिर पड़ा। फिर उठकर चलने और पास आने की उसने कोशिश नहीं की। वहीं से टूटती ज़बान में बोलने लगा। एक शब्द निकलता कि फिर साँस लेने को वह रुक जाता और हाँफता हुआ फिर आगे का शब्द मुँह से बाहर होता।

    बोला, “महामारी ने हमें पकड़ लिया है।...और अकाल...वह भूखा है...मर रहा है...

    “कहकर उसने बच्चे की तरफ़ इशारा किया और ख़ुद फूटकर रोने लगा। इस पर एलीशा ने कंधे पर लटके अपने बकचे को लिया और कमर पर से उतारकर धरती पर रख दिया। फिर बेंच पर उसे खोल उसमें से रोटी (डबल रोटी) निकाली। चाक़ू लेकर उसमें से एक टुकड़ा काटा और उस आदमी की तरफ़ बढ़ा दिया। लेकिन आदमी ने उसे तो लिया नहीं, बल्कि उस बच्चे और चूल्हे के पीछे दुबकी बैठी एक दूसरी लड़की को इशारे से एलीशा को बताया। मानो कहा, देते हो तो उन्हें दो, उन्हें।

    यह देखकर एलीशा ने रोटी बालक की ओर बढ़ाई। रोटी का देखना था कि बालक ने दोनों हाथ बढ़ाकर उसे झपट लिया और नन्हें-नन्हें हाथों में टुकड़े को पकड़ उसमें ऐसा मुँह गाड़कर खाने लगा कि उसकी नाक का पता चलना मुश्किल था। पीछे से लड़की भी चलती वहाँ पहुँची और रोटी पर आँख गाड़े खड़ी हो गई। एलीशा ने उसे भी टुकड़ा दिया। फिर एक और टुकड़ा काटकर उस बुढ़िया स्त्री को दिया। वह बुढ़िया भी अपने बूढ़े मुँह से उसे कुतरकर खाने लग गई।

    बोली, “जो कहीं थोड़ा इस वक़्त पानी कोई और ले आता! तालू तो बेचारों के सूख रहे हैं! कल मैं पानी लेने गई थी, या आज, याद नहीं...सो बीच में ही गिर पड़ी। आगे फिर जा नहीं सकी। डोल वहीं पड़ा रह गया। कोई ले गया हो, कौन जाने वहीं पड़ा हो।

    एलीशा ने कुएँ का पता पूछा। बुढ़िया ने बता दिया। सो एलीशा गया, डोल लिया और पानी लाकर सबको पिलाया। बच्चों ने और बुढ़िया ने पानी आने पर उसके साथ फिर और कुछ रोटी खाई। लेकिन आदमी ने एक कन मुँह में डाला। बोला, मैं खा नहीं सकता।

    अब तक वहाँ पड़ी दूसरी स्त्री को कोई होश नहीं मालूम होता था। वह वैसे ही अधर में टाँग फेंक रही थी। एलीशा तब फिर गाँव की एक दुकान पर गया। वहाँ से कुछ जई का चून लिया। नमक, दाल और तेल ले लिया। एक कुल्हाड़ी भी कहीं से खोज ली और काटकर लकड़ी जमा की। फिर आग जलाई। लड़की भी आकर उसमें मदद देने लगी। उपरांत उन्होंने खाना तैयार किया और भूखे जनों को खिलाया।

    तीन

    उस आदमी ने तो नाममात्र खाया। बुढ़िया ने भी कम ही खाया। पर बच्चों ने तो बरतन को चाटकर साफ़ कर दिया। फिर वे दोनों बालक आपस में गलबाहीं डाले गुड़ी-मुड़ी होकर सो गए।

    उस वक़्त बुढ़िया स्त्री और उस आदमी ने एलीशा को अपने दुःख की सारी कथा सुनाई कि कैसे उनकी यह दशा हुई। बोले, ग़रीब तो हम पहले ही थे। पर इस साल के सूखे ने मुसीबत ला दी। जो जमा था कठिनाई से सरदी तक चला।

    जाड़ों के दिन आते-आते यह नौबत हुई कि पड़ोसी से या जिस-तिस से माँगकर काम चलाना पड़ा। पहले तो उन्होंने दिया, पीछे वे भी इनकार करने लगे। चाहते थे कि दें, पर देने को उनके पास होता नहीं था। और हमें भी माँगते शर्म आती थी। सो कर्ज़ में हम गले तक डूबते गए। एक-एक कर सबका लेना हम पर हो गया। किसी का पैसा चाहिए था तो किसी का अनाज वाजिब था और किसी तीसरे की और कोई चीज़ उधार चढ़ गई थी।

    ऐसी हालत होने पर आदमी बोला, “मैं काम की तलाश में लगा, पर कोई काम नहीं मिला। पेट रखने जितना अनाज मिल जाए, तो उसी मजूरी पर काम करने के लिए बेतादाद लोग तैयार थे; और कभी कुछ काम मिला भी तो, अगले दिन फिर ख़ाली। फिर और काम ढूँढ़ों। मैं इस चक्कर में बीत चला। बुढ़िया और लड़की ने उधर कहीं दूसरी जगह जा भीख माँगना शुरू कर दिया था। पर कभी बेखाए, तो कभी अधपेट, जीते ही गए। आस थी अगली फ़सल आने तक ज्यों-त्यों चले चलें तो फिर देखा जाएगा। पर पतझड़ आने तक तो हमें भीख में कुछ भी मिलना बंद हो गया। ऊपर से बीमारी ने पकड़ा। हालत बद से बदतर होती गई। आज कुछ मिल जाता, तो दो दिन फाके के होते। आख़िर घास खाकर हम लोग तन रखने लगे। मालूम नहीं घास की वजह थी कि क्या, मेरी बीबी बीमार पड़ गई। टाँगों पर उससे चला नहीं जाता, खड़ी रह पाती है। मेरा भी दम छीन होता गया। और मदद कहीं कोई दिखती नहीं...।

    तो भी बुढ़िया बोली, मैं कुछ बची थी। पर निराहार काया कब तक चलती। आख़िर मैं भी गिरती गई। यह लड़की दुबला गई और डरी-सहमी-सी रहने लगी। मैं कहती कि जा, पड़ोसियों से कुछ माँग-ताँग ला! पर वह घर से बाहर जाती और कोने में सरककर गुमदुबक बैठ जाती। अभी परसों एक पड़ोसन यहाँ पर झाँकने आई। पर यहाँ का हाल देख उल्टे पाँव चली गई। देखा कि यहाँ तो ख़ुद सब बीमार और भूखे पड़े हैं। असल में उसके आदमी ने कहा था कि जा, कहीं से इन नन्हों के मुँह डालने के लिए तो कुछ ला। सो उस आस में बेचारी आई थी। पर हम पहले ही यहाँ मौत की बाट देखते पड़े थे।

    उनकी यह दुःख-कथा सुनी तो एलीशा ने उस रोज़ जाने और अपने साथी का संग पकड़ने का विचार छोड़ दिया। रात वह वहीं रहा। अगले सवेरे अँधेरे-दम उठा और घर का काम-धाम सहारने लगा। काम में वह ऐसे अनायास लग गया कि उसी का घर हो। आग जलाई और आटा गूँथा। बुढ़िया उसका साथ देती जाती थी। फिर वह लड़की को साथ लेकर पास-पड़ोस से ज़रूरी चीज़-बस्त लेने चला। क्योंकि घर में कुछ था नहीं, अनाज पाने में सब कुछ बिक गया था। दो बासन रह गए थे, कोई वस्त्र सो एलीशा ज़रूरी सामान जुटाने लगा। कुछ अपने पास से मुहय्या हो गया, बाक़ी ख़रीदकर ला दिया। सो वहाँ वह एक दिन रहा, फिर दूसरे दिन, और फिर तीसरे दिन। छोटे बालक में अब वह दम गया और एलीशा बैठा होता तो वह सरक-सरककर उसकी गोद में चढ़ जाता। लड़की का चेहरा भी खिल आया और वह हर काम में दौड़कर मदद करने लगी। और ज़रा बात हो तो झट एलीशा के पास भाग आती। कहती, दादा, दादा!

    बुढ़िया में भी अब ताक़त आती जाती थी और पास-पड़ोस में अब घूम सकती थी। आदमी के बदन में भी बल रहा था और दीवार का सहारा लेकर अब वह चल-फिर सकता था। बस उसकी बीबी चँगी होने में नहीं रही थी। लेकिन तीसरा दिन होते उसे भी होश हुआ और उसने खाने को माँगा।

    एलीशा सोचने लगा कि रास्ते में इतना वक़्त बरबाद हो जाएगा, इसका भला क्या पता था। चलो, अब बढ़ना चाहिए।

    चार

    चौथा रोज़ ईस्टर के व्रत-पर्व का आख़िरी रोज़ था। वह रोज़ उपवास के पारण का दिन होता और लोग खा-पीकर ख़ुशी मनाते हैं। एलीशा ने सोचा कि इस दिन को तो यहीं इन्हीं लोगों के साथ मुझे गुज़ारना चाहिए। जाकर दुकान से इनके लिए कुछ ला-लू दूँगा और त्यौहार के आनंद में साथ दूँगा। फिर निबटकर शाम को अपनी राह चल दूँगा।

    यह सोचकर एलीशा गाँव में गया और दूध-सेवई का इंतज़ाम किया और घर पहुँचकर अगले रोज़ के त्यौहार की तैयारी में मदद देने लगा। कहीं कुछ उबल रहा है तो कुछ सिक रहा है। पर्ववाले दिन एलीशा गिरजे गया। आकर तब सबके संग-साथ में उपवास तोड़ा और जीमन किया। उस रोज़ बीबी भी उठकर कुछ-कुछ टहलने लायक़ हो आई थी और पति ने हजामत की और बुढ़िया ने धोकर कुरता नया कर रखा था सो पहना। तब वह गाँव के महाजन के पास क्षमावनी माँगने गया।

    ज़मीन और चरागाह उनकी उसी महाजन के यहाँ गिरवी रखी थी। वह कहने गया था कि महाजन, खेत और ज़मीन बस एक फ़सल के लिए दे दो। लेकिन शाम को लौटा तो बड़ा उदास था। आकर वह आँसू गिराने लगा। असल में महाजन ने कोई दया नहीं दिखलाई थी। सीधे कह दिया था कि पहले मेरा रुपया दो।

    एलीशा इस पर फिर सोच-विचार में पड़ गया। मन में बोला कि अब ये लोग रहेंगे कैसे? और जने काटकर घास तैयार करेंगे तब ये क्या काटेंगे? इनकी ज़मीन तो गिरवी रखी है। जई पकने के दिन आए। और फिर इस साल देखो धरती-माता ने फ़सल में क्या धन-धान उगला है; पर दूसरे लोग कटाई कर रहे होंगे और इन बेचारों के पास कुछ भी नहीं। उनकी तीन एकड़ ज़मीन महाजन के ताबे है। सो मेरे पीछे इन बेचारों की दशा वैसी ही हो जाएगी जैसी आने पर मैंने देखी थी?

    सोचकर एलीशा दुविधा में हो गया। आख़िर तय किया कि आज शाम जाऊँ, कल तक और ठहर जाऊँ। यह विचार पक्का करके रात में सोने को वह ओसारे में गया और प्रार्थना करके बिछावन पर लेट गया। पर वह सो नहीं सका एक तरफ़ तो सोचता था कि चलूँ, क्योंकि यहाँ उसका काफ़ी समय और काफ़ी पैसा लग गया था। पर दूसरी तरफ़ इन लोगों पर उसके मन में करुणा भी आती थी। और...।

    मन में बोला, इसका तो कोई अंत ही नहीं दिखता है। पहले तो मैंने ही सोचा था कि लाकर इन्हें पानी दिए देता हूँ। और यह पास की रोटी। तब क्या जानता था कि बात ऐसी बढ़ जाएगी। लो, अब तो खेत और चराई की धरती को गिरवी से छुड़ाने की बात सामने गई है। यह किया तो फिर उनको गाय भी लेकर देनी होगी। फिर एक घोड़ा भी चाहिए जिससे गाड़ी में लान-वान ढोया जा सके। वाह दोस्त एलीशा, तुमने तो गले में यह अच्छा फँदा डाल लिया है। अपनी सुध बिसार तुम तो ख़ासे गड़बड़ झाले में पड़ गए हो। यह सोचता हुआ एलीशा उठा और सिरहाने से कोट निकाल, तह खोल, अपनी सुँघनी की डिबिया बाहर की और उसमें से एक नक्की ली। सोचता था कि सुँघनी से मदद मिलेगी और झमेला कटकर मन के ख़याल साफ़ होने में आएँगे।

    लेकिन कहाँ? बहुतेरा सोचा, बहुतेरा विचारा। पर निश्चय होता था एक मन होता कि चल देना चाहिए। पर दया रोक लेती थी। उसे सूझ पड़ती थी कि करूँ तो क्या! कोट की तह कर आख़िर फिर उसने सिरहाने ले लिया। ऐसे बहुत देर पड़ा रहा। होते-होते मुर्ग़े की पहली बाग उसे सुनाई दी। तब उसकी पलकों पर नींद उतरने लगी। पर सो पाया होगा कि उसे ऐसा लगा कि किसी ने उठा दिया है। देखा, तो वह सफ़र के लिए तैयार है, वकचा कमर पर कसा है, हाथ में लाठी लिए है। बाहर दरवाज़ा भी इतना खुला है कि वह तरक़ीब से चुपचाप निकल जा सकता है। वह निकलकर जा ही रहा था कि कमर के बकचे के बंध एक तरफ़ तार में हिलग गए। वह उसे छुड़ाने में लगा कि इतने में दूसरी तरफ़ बाएँ पैर की पट्टी अटक गई और खिंचकर खुलने लगी। आख़िर उचककर बकचे को उसने ठीक कमर पर लिया, पर देखता क्या है कि तार ने उसे नहीं हिलाया, बल्कि छोटी लड़की उसे पल्ले से पकड़े हुए है। कह रही है—

    दादा, रोटी! दादा, रोटी!

    फिरकर पैर की तरफ़ जो उसने देखा तो क्या देखता है कि छोटा बच्चा उसके पाँव की पट्टी को पकड़े हुए है। और बराबर की खिड़की में से बुढ़िया और घर का मालिक वह आदमी, दोनों जने उसे जाते देख रहे हैं।

    एलीशा इस पर जग आया। उठकर अपने आपसे ऐसे बोलने लगा कि दूसरा भी सुन ले। कहने लगा कि कल मैं उनके खेत उन्हें छुड़ा दूँगा और एक घोड़ा ले दूँगा। बच्चों के लिए एक गाय और फ़सल आने तक के लायक़ अनाज भी भर दूँगा। नहीं तो मैं उधर समंदर पार भगवान को पाने जाऊँ, तो कहीं ऐसा हो कि अंदर के भगवान को ही मैं खो बैठूँ।

    इस विचार के बाद एलीशा अपनी गाढ़ी नींद सो गया, तड़का फूटने पर उठा। अध-सवेरे ही उठ महाजन के पास जाकर उसने चराई की धरती और खेती की ज़मीन दोनों को पैसा चुकाकर छुड़ा लिया। फिर एक दाँत ली। (क्योंकि अकाल में यह भी काम गई थी) और उसे साथ लेकर घर लौटा। आकर आदमी को तो कटाई करने भेजा और ख़ुद फिर गाँव की तरफ़ चला। वहाँ पता लगा कि चौपाल पर एक गाड़ी घोड़ा बिकाऊ है। मालिक से भाव-सौदा करके उसने दोनों ख़रीद लिए।

    फिर एक बोरा अनाज भी ले लिया और उसे गाड़ी में रखवा लिया। उसके बाद गाय की तलाश में चला जा रहा था कि दो औरतें मिलीं। आपस में बात बतलाती जा रही थीं। वे अपनी भाषा में बोल रही थीं, तो भी एलीशा समझ सका कि वे क्या कह रही हैं।

    अरी, पहले तो वे समझे नहीं कि कौन है। सोचा, आता-जाता होगा कोई भला—मानस। पीने को पानी माँगता आया था कि फिर वह वहीं रह गया बहिन, सुना कुछ, क्या-क्या सामान उनके लिए उसने ले डाला है। रामदुहाई, कहते हैं कि एक घोड़ा और एक गाड़ी तो अभी सवेरे ही चौपाल में उसने मोल लिए हैं। ऐसे आदमी दुनिया में बिरले मिलते हैं। चलती हो, चलो उन पुण्यात्मा के दर्शन ही करें।

    एलीशा सुनकर समझ गया कि यह उसी की तारीफ़ की जा रही है, सुनकर वह आगे गाय लेने नहीं गया। लौटा, चौपाल पर आया, दाम चुकाए और गाड़ी जोतकर घर गया। गाड़ी से उतरा तो घर के लोगों को घोड़ा-गाड़ी देखकर बड़ा अचंभा हुआ। उन्होंने सोचा तो कि कहीं सब यह उन्हीं के वास्ते हो, पर पूछने की हिम्मत नहीं हुई। इतने में आदमी घर का दरवाज़ा खोल बाहर आया। बोला, दादा, यह घोड़ा कहाँ से ले आए?”

    एलीशा ने कहा, अजब सवाल करते हो। ख़रीदे लिए रहा हूँ, नहीं तो सस्ता बिका जाता था। अच्छा, जाओ और काटकर घास नांद में डाल दो कि रात को इसके लिए हो जाए। और गाड़ी में से यह बोरा भी उतार लो।

    आदमी ने घोड़ा खोल लिया और बोरा अनाज कोठे में ले गया। फिर घास काटकर नाँद में डाल दी। आख़िर निबट-निबटा सब जने अपने सोने चले गए। एलीशा आज रात सोने के लिए बाहर रास्ते से लगे ओसारे में रहा था। उस शाम उसने अपना बकचा भी पास ले लिया। सब-के-सब सो गए थे, उस वक़्त वह उठा। बकचा अपना सँभाला और कमर पर कस लिया। पट्टियाँ टाँगों से बाँध लीं, कोट पहन लिया और जूते चढ़ा आगे राह पर एफिम को पकड़ने बढ़ लिया।

    पाँच

    एलीशा कोई तीन मील से ऊपर चलते चला गया होगा कि चाँदना होने लगा। तब एक पेड़ के नीचे उसने बकचा खोला और पास के पैसे गिने। कुल सात रुपए और पाँच आने के पैसे बचे थे।

    सोचने लगा कि उतने पैसे लेकर समंदर पार की यात्रा की सोचना वृथा है। अगर भीख माँगकर यात्रा पूरी करूँ तो उससे तो जाना अच्छा है। एफिम मेरे बिना भी येरुशलम पहुँच ही जाएँगे और मंदिर में वहाँ मेरे नाम का भी एक दिया रख देंगे। और मेरी बात पूछो तो इस जन्म में अपना प्रण पूरा करने को मुझे अब क्या मौक़ा मिलेगा। बड़ा शुक्र है कि प्रण और संकल्प मैंने मालिक के सामने ही किए थे जो दयासागर हैं और पापियों के पाप माफ़ कर देते हैं।

    एलीशा उठा, झटककर फिर अपना बकचा कमर पर लिया, और वापिस मुड़ चला। वह यह नहीं चाहता था कि कोई उसे पहचान ले। सो गाँव को बचाने के लिए चक्कर लेकर वह अपने देश की तरफ़ तेज़ चाल चल दिया। घर की तरफ़ जाते इस बार वही रास्ता उसे हलका लगा जो पहले कठिन मालूम हुआ था। पहले एफिम का साथ पकड़े रहने में मुश्किल होती थी, अब ईश्वर की दया से लंबी राह चलते उसे थकान आती थी। चलना बालक का खेल-सा लगता था। लाठी हिलाता, एक दिन में चालीस से पचास मील तक आसानी से नाप लेता था।

    देश अपने घर जाकर पहुँचा तो फ़सल हो चुकी थी। कुनबे के लोग उसे वापिस आया पाकर बहुत ख़ुश हुए। सब पूछने लगे कि क्या हुआ, कैसे बीती, कैसे पीछे और अकेले रह गए। येरुशलम जाए बिना क्यों लौट आए? पर एलीशा ने उनको कुछ कहा नहीं। इतना ही कहा कि भगवान की इच्छा नहीं थी कि मैं वहाँ पहुँचूँ। सो राह में मेरा पैसा जाता रहा और साथी का साथ छूटकर मैं पीछे पड़ गया। भगवान मुझे माफ़ करेंगे और आप लोग भी माफ़ करें।

    इतना भर कहकर जो पैसा बचा था सब अपनी बुढ़िया बीबी के हाथों में दे दिया। फिर घर-बार के हाल-अहवाल पूछे। सब ठीक-ठीक चल रहा था। काम सबने पूरा किया था। किसी ने कोर-क़सर नहीं की थी और सब जने मेल और शांति से रहे थे।

    उसी दिन एफिम के घर के लोगों को भी उसके लौटने की ख़बर मिली। वे भी अपने दादा की ख़बर लेने आए। उनको भी एलीशा ने यही जवाब दिया। कहा, “एफिम तेज़ चलते हैं। संत पीटर के पर्व के दिन से तीन रोज़ इधर मेरा उनका साथ छूट गया सोचता था मैं फिर साथ पकड़ लूँगा। लेकिन ईश्वर का चाहा होता है। मेरा पैसा जाता रहा और फिर आगे बढ़ने लायक़ मैं नहीं रहा। सो अधबीच से लौट आया।

    लोग अचरज करते थे कि ऐसे समझदार आदमी होकर उन्होंने क्या यह मूरखपने की बात की। चलने को चल पड़े; पर जाना था वहाँ पहुँचे नहीं और रास्ते में ही सब पैसा फूँक दिया। कुछ काल तो वे इस पर विस्मय में रहे। फिर धीरे-धीरे सब भूल चले। एलीशा के मन से भी सब बिसर गया। वह अपने घर के काम-धँधे में लग गया। अपने बेटे की मदद से जाड़ों के लिए लकड़ी काटकर भर ली। औरतों ने और सबने मिलकर अनाज गाह रखा, फिर बाहर के छप्पर को ठीक कर लिया।

    मक्खियों के छत्तों को छा दिया और पड़ोसी को उसने वे दस छत्ते दे दिए जो बेचे थे उस पर जितना मधु-महाल आया, सब-का-सब ईमानदारी से पड़ोसी की तरफ़ कर दिया। बीबी ने कोशिश भी की कि बताऊँ कि इन छत्तों पर से कितने मधु-मुहाल हुए हैं। लेकिन एलीशा सब जानता था कि कौन छत्ते फले हैं, कौन नहीं। सो दस की जगह पड़ोसी को सत्रह भरे छत्ते मिले। जाड़ों की सब तैयारी करके उसने लड़के को काम तलाश करने दिया। ख़ुद मधु-मक्खी के कोटर तैयार करने और लकड़ी की खड़ाऊँ वग़ैरह बनाने के काम में जुट गया।

    छः

    एलीशा उधर पीछे गाँव में रह गया था तो उस दिनभर एफिम ने राह में उसका इंतज़ार देखा। आगे कुछ ही क़दम चलने पर वह बैठ गया था। बाट देखता बैठा रहा, बैठा रहा। झोंक आई और एक नींद वह सो भी लिया। उठकर फिर बाट जोहने लगा। लेकिन उसका साथी नहीं लौटा। बाट देखते उसकी आँखें दुख आईं। उस पेड़ के पीछे सूरज डूबने लग रहा था, पर एलीशा का उस सड़क पर आता दिखता था पता।

    एफिम ने सोचा, शायद हो कि इसी रास्ते वह मुझसे आगे निकला चला गया हो। क्या पता किसी ने अपनी गाड़ी पर बिठा लिया हो, मैं सो रहा हूँ तभी बिना मुझे देखे आगे बढ़ता गया हो। लेकिन ऐसा हो कैसे सकता है कि मैं उसे देखूँ। यहाँ तो पट पर मैदान में दूर-दूर तक साफ़ दिखता है। चलूँ, लौटकर देखूँ। लेकिन जो कहीं वह आगे बढ़ गया होगा तब तो फिर ऐसे हम दोनों बिछुड़ ही जाएँगे और कोई किसी को मिलेगा। सो अच्छा है मैं चला ही चलूँ। रात को जहाँ पड़ाव होगा, वहाँ तो आख़िर दोनों मिलेंगे ही।

    सो चलते-चलते गाँव आया। वहाँ उसने चौकीदार से कहा कि इस शक्ल का कोई मेरी उमर का आदमी चलता हुआ आएगा, तो उसे जहाँ में ठहरा हूँ वहीं ले आना। लेकिन एलीशा उस रात भी नहीं आया। एफिम अकेला आगे बढ़ा। राह में जो मिलते सबसे पूछता कि नाटे क़द का सिर साफ़, बूढ़ी उमर का कोई मुसाफ़िर तो तुमने नहीं देखा है? पर किसी ने उसे नहीं देखा था। एफिम को अचरज होता और अकेला आगे बढ़ लेता। सोचा कि आख़िर ओडेसा पहुँचकर तो हम दोनों मिलेंगे ही। नहीं तो जहाज़ पर मुलाक़ात पक्की है। यह सोच उसने फिर उस बाबत सब फिकर छोड़ दी।

    चलते-चलते रास्ते में उसे एक यात्री मिला जो एक लंबी कफ़नी पहने था। बाल बड़े थे और सिर पर ऐसी टोपी थी जैसे उपदेशक हो। वह थौसके तीरथ की यात्रा से आता था और दूसरी बार येरुशलम धाम को जा रहा था। वे दोनों रात एक ही जगह ठहरे थे, सो वहाँ मिल गए। फिर तो साथ-ही-साथ वे चलने लगे।

    ओडेसा दोनों कुशलपूर्वक पहुँच गए। वहाँ जहाज़ के लिए तीन दिन बाट देखने में रुकना पड़ा। जगह-जगह और दूर-दूर से और बहुत से यात्री भी उसी तरह जहाज़ की प्रतीक्षा में थे। वहाँ फिर एलीशा के बारे में एफिम ने पूछताछ की पर किसी से कुछ पता नहीं मिला।

    एफिम ने वहाँ फिर अपने पास पर सही कराई, जिसकी फीस पाँच रुपए बैठी। चालीस रुपए में येरुशलम का वापसी टिकट मिला। सफ़र के लिए खाने-पीने के लिए सामान भी साथ ख़रीदकर उसने रख लिया।

    साथ के यात्री ने तरक़ीब बताई कि किस तरह बिना, पैसे भी जहाज़ पर जाना हो सकता है। लेकिन एफिम ने उधर ध्यान नहीं दिया। बोला, मैं ख़र्च के लिए तैयार होकर आया हूँ। सो मैं तो पैसा देकर चलूँगा।

    जहाज़ की सवारियाँ पूरी हो गईं और सब यात्री उस पर रहे। एफिम और उसके साथी भी उसमें थे। लंगर उठा और जहाज़ समंदर में बढ़ लिया।

    दिन भर तो मज़े में चलता गया। पर रात हवा कुछ तेज़ उठ आई। पानी पड़ने लगा और जहाज़ डगमग-डगमग होने लगा। लोग डर गए। स्त्रियाँ चीख़ने-चिल्लाने लगीं और आदमियों में जो कमज़ोर थे, वे भी बचत की जहाँ-तहाँ जगह ढूँढ़ते भागने लगे। डर एफिन को भी लगा, लेकिन उसने ज़ाहिर नहीं किया। डेक पर जहाँ पहले जमकर बैठ गया था वहीं बैठा रहा। वहाँ पास टांबो के और लोग भी बैठे थे। सो तमाम दिन और तमाम रात वे सब जने अपने-अपने थैले या बक्स से लगकर चिपके हुए चुपकी मार बैठे रहे। तीसरे दिन जाकर हवा थमी। समंदर शांत हो आया और पाँचवें दिन जहाज़ कुस्तुनतुनिया बंदर पैर जा लग गया। कुछ लोग उतरकर संत-सोफ़िया के गिरजा के, जो तुर्कों के अधिकार में था, दर्शन करने उतर गए। और लोग तो गए; लेकिन एफिम जहाज़ पर ही रहा। उसने तो बस किनारे से ही कुछ रोटी ख़रीदकर कनात मानी। जहाज़ वहाँ चौबीस घंटे रहा और फिर आगे बढ़ा। फिर समन बंदर पर वह ठहरा। उसके बाद अलेक्जेंड्रीया। आख़िर सब लोग सकुशल जाफा बंदर पर पहुँचे। वहाँ सब यात्रियों को उतरना था। अभी यहाँ से भी येरुशलम पक्की सड़क चालीस मील से कुछ ऊपर ही था। जहाज़ से उतरते भी लोगों को बड़ा डर लगा। जहाज़ ऊँचा था और नाव इतनी नीची कि जैसे नाव में एक-एक करके वे लोग उतरे क्या गिराए जाते थे। और नीचे पानी में खड़ी नाव इससे बड़ी डगमगाया करती थी। यह भी डर था कि ज़रा कुछ हो जाए कि नाव में तो आदमी पहुँचे नहीं और पानी में गिर जाए! दो-एक आदमी इस तरह गिरकर भीगे भी। ख़ैर, आख़िर जैसे-तैसे सब लोग सकुशल किनारे पहुँच गए।

    वहाँ से ये पाँव-पाँव चले और तीसरे दिन दुपहरी के वक़्त येरुशलम पहुँच गए। शहर के बाहर रूस के लोगों के लिए एक जगह बनी थी, वहाँ सब जने ठहरे। सबके पासों पर वहाँ भी सही की गई। फिर खा-पीकर एफिम अपने उस यात्री के साथ तीर्थ-धाम देखने निकला। पर मंदिर खुलने का यह समय नहीं था सो वे धर्माचार्य के रहने की जगह चले गए। वहाँ सब-के-सब यात्री जमा थे। स्त्री अलग और पुरुष अलग, सबको दो घेरों में बैठाया गया था। जूते बाहर छोड़ने को कह दिया था और सब वहाँ नंगे पैर थे। बैठने के बाद एक साधु आए, जिनके कंधे पर तौलिया था और साथ-साथ जल। उन्होंने अपने हाथों से सबके पाँव धोए। तौलिए से पोंछ और माथा नवाकर सबके चरन छुए। घेरों में बैठे हर स्त्री-पुरुष के साथ उन्होंने ऐसा किया। औरों में एफिम के पैर भी धोए और माथे छुए गए थे। सो सवेरे-शाम प्रभु-कीर्तन में एफिम शामिल हुए, प्रार्थना की और वेदी पर, अपना दीपक जलाकर रखा। अपने माँ-बाप के नाम की, लिपि लिखकर पुरोहित को दी कि उसके नाम भी धर्म-प्रार्थना के बीच ले लिए जाएँ। धर्माचार्य के यहाँ सब यात्रियों को खाने-पीने को भी वहाँ दिया गया। अगले सवेरे मिस्र की मरियम माता की गुहा देखने वे लोग गए। वहाँ ही माता मरियम ने तपस्या की थी। वहाँ भी उन्होंने दीप जलाए और स्तुति पढ़ी। वहाँ से हज़रत इब्राहीम के मठ में गए और वह जगह देखी जहाँ हजरत, परमात्मा की भेंट-स्वरूप, अपने पुत्र को मारने को तैयार हो गए थे। फिर वह स्थान देखा जहाँ मरियम मगदालिन को प्रभु ईसा के दर्शन मिले थे। जेम्स का चर्च भी उन्होंने देखा। इस तरह साथ के यात्री ने एफिम को ये सभी स्थान दिखाए। वह बताते भी गए कि कहाँ क्या चढ़ाना चाहिए। दुपहर बीते वे अपने स्थान पर लौटे और भोजन किया।

    उसके बाद लेटकर आराम करने की तैयारी कर रहे थे कि साथ का यात्री चीख़ने-चिल्लाने लगा और अपने सब कपड़े फेंक-बिखेरकर टटोलने लगा। बोला, मेरा बटुआ किसी ने चुरा लिया है। उसमें तेईस रुपए थे। दो तो दस-दस के नोट थे, बाक़ी खरीज।

    वह यात्री झीकता-रोता रहा, पर रंज मनाने से क्या होता था। कोई और चारा नहीं था। सो फिर चुपचाप अपनी जगह ही वह जा लेटा और नींद लेने की कोशिश करने लगा।

    सात

    बराबर में एफिम पड़ा हुआ था। उस समय उसके मन में विकार हो आया। वह सोचने लगा कि इसका किसी ने कुछ चुराया नहीं मालूम होता। सब झूठ-मूठ की बात है। जान पड़ता है उसके पास था ही कुछ नहीं। देखो न, कहीं जो पैसा उसने दिया हो। जहाँ देना होता, पट्ठा मुझसे ही दिलवाता। और हाँ, मुझ से एक रुपया भी तो उधार ले रखा है!

    यह ख़याल आना था कि एफिम ने मन की लगाम खींची। अपने को झिड़ककर कहा कि दूसरे आदमी के दोष देखने का मुझे क्या हक़ है। यह तो पाप की बात है। नहीं, मैं उसके बारे में और ख़याल नहीं लाऊँगा। पर जैसे ही मन और तरफ़ फेरा कि छूटकर फिर वह वहीं अपने साथी की बात पर पहुँच जाता था। उसे ख़याल होता कि देखो, पैसे का वह कैसा नदीदा है। और जब चिल्ला रहा था कि मेरा बटुआ चोरी चला गया है तो आवाज़ उसकी कैसी खोखली और नकली मालूम होती थी।

    सो फिर सोचा कि नहीं जी, उसके पास पैसा-वैसा कुछ था ही नहीं। झूठ-मूठ की बात है।

    साँझ को दोनों जने उठे और बड़े मंदिर में संध्या की आरती में शामिल हुए। साथ का यात्री एफिम से लगा-लगा ही चल रहा था। हर कहीं कंधे के पास दिखता। मंदिर में आए, जहाँ बहुत से यात्री थे। रूसी थे, उसी भाँति और बहुतेरे देशों के लोग थे। ग्रीक के, अरमीनिया के, तुर्किस्तान के, सीरिया के। एफिम भी उनके साथ मंदिर के तोरणद्वार में से दाख़िल हुआ। पुजारी उन्हें तुर्की संतरियों के पास से होकर मंदिर के दालान में उस जगह ले गया, जहाँ ईशु मसीह को क्रूस से उतारा गया था और उनकी देह का अभिषेक हुआ था। वहाँ बड़े-बड़े नौ शमादान रखे थे और बत्तियाँ जल रही थीं। पुजारी ने उनको सब दिखाया और बताया। एफिम ने अपने नाम का भी एक दीपक वहाँ रखा। फिर पुजारी सीढ़ियाँ चढ़कर सीधे वहाँ उन्हें ले गया जहाँ मसीह का सलीब खड़ा था। एफिम ने वहाँ झुककर इबादत की। फिर वह जगह उन्हें दिखाई जहाँ धरती पाताल तक फट गई थी। फिर वह स्थान देखा जहाँ मसीह के हाथ और पैर कीलों से ठोंककर सलीब में जड़े गए थे। फिर आदम-की दरगाह देखी जहाँ मसीह की देह से ख़ून चूकर उस पर गिरा था। फिर वह पत्थर देखा जहाँ मसीह बैठे थे और सिर पर उनके काँटों का ताज़ चढ़ाया गया था। फिर वह खंभा दिखाया, जहाँ प्रभु को बाँधकर बेंत लगाए थे। फिर पत्थर पर मसीह के चरण चिह्न के दर्शन किए। और आगे भी कुछ देखने को था कि तभी भीड़ में सनसनी पड़ी और लोग मंदिर के भीतर आँगन की तरफ़ भागने लगे। वहाँ एक पूजा हो चुकी, अब दूसरे कीर्तन का आरंभ था। एफिम भी भीड़ के साथ पत्थर की चट्टान में कटे मसीह के ताबूत की तरफ़ बढ़ा चला।

    वह साथ के यात्री से पीछा छुड़ाना चाहता था। मन-मन में उसके बारे में बुरे भाव उसमें रहे थे। उसे इस बात का चेत था। लेकिन यात्री साथ नहीं छोड़ता था। पास-ही-पास लगा हुआ वह भी ताबूत तक आया। वे बढ़कर आगे की पंगत में पहुँचना चाहते थे। लेकिन अब नहीं हो सकता था, वे बिछुड़ गए थे। भीड़ इतनी थी कि आगे हिलना बन सकता था, पीछे जाना मुमकिन था। एफिम अपने सामने निगाह रखे मन में दुआ दोहरा रहा था। रह-रहकर अपने बटुए की सँभाल भी कर लेता था। चित्त उसका दो तरफ़ बंटा था। कभी तो सोचता कि यात्री ने उसके साथ छल किया है। पर फिर ख़याल होता कि कौन जाने वह सच ही बोलता हो और सचमुच बटुआ उसका चोरी गया हो। आख़िर मेरे ही साथ ऐसा हो सकता है कि नहीं।

    आठ

    ताबूत के ऊपर छत्तीस शमादान जल रहे थे। वेदी छोटी थी और एफिम उधर ही निगाह जमाए खड़ा था। औरों के सिर के ऊपर से निगाह ऊँची कर वह सामने देख रहा था कि कुछ उसे दीखा और वह अचंभे में रह गया। उस शमादानों के ठीक नीचे जहाँ अखंड जोत जल रही थी, सब के आगे की पंक्ति में देखता क्या है कि एक बुढ़ी उमर का आदमी बड़ा-सा कोट पहने वहाँ खड़ा है। सिर बालों से साफ़ चमकीला चमक रहा है। ऐनमैन वह एलीशा मालूम होता है।

    एफिम ने सोचा कि मालूम तो होता है, लेकिन एलीशा हो नहीं सकता। मुझसे आगे भला कैसे वह यहाँ पहुँच सकता था। हमसे पहले का जहाज़ तो एक हफ़्ता पेश्तर ही छूट गया था। वह तो एलीशा को किसी हालत में नहीं मिल सकता था।

    रहा हमारा जहाज़, सो उस पर तो वह था नहीं, क्योंकि मैंने एक-एक यात्री को देख और पूछ लिया था।

    एफिम यह सोच ही रहा था कि वह सामने का वृद्ध पुरुष इबादत में झुका और फिर उठकर तीन बार तीनों दिशाओं में झुककर उसने सबको नमस्कार किया। पहले तो सामने ईश्वर को नमन किया। फिर दाएँ-बाएँ अपने सब भाइयों को। दाईं तरफ़ मुड़कर जब वह व्यक्ति प्रणाम कर रहा था, उस वक़्त एफिम ने साफ़-साफ़ देखा। संदेह की जगह थी। वह तो एलीशा ही है। वही दाढ़ी, वही भवें। आँखें और नाक वही सब का सब चेहरा वही-का-वही। और कोई नहीं जी, एलीशा ही है।

    एफिम को अपने बिछुड़े साथी के मिलने पर बड़ी ख़ुशी हुई। विस्मय भी हुआ कि उसके आगे एलीशा आया तो कैसे?

    सोचा कि शाबाश एलीशा। देखो कैसे वह बढ़ता हुआ ठेठ आगे पहुँच गया है। कोई ज़रूर साथ लेकर रास्ता बताता उसे आगे ले गया होगा। यहाँ से निकलकर उसको पाना चाहिए। और यह जो भलामानस यात्री साथ लग गया है, सो इसे छोड़ एलीशा का संग पकड़ना ठीक होगा। उससे शायद मुझे भी आगे पहुँचने की राह मिल जाएगी।

    एफिम एकटक सीध में निगाह जमाए रहा कि एलीशा आँख से अलग हो जाए। पर कीर्तन पूरा हुआ, भीड़ में हलचल हुई और सब जने ताबूत पर माथा टेकने को बढ़ने लगे। इस धक्कम-धक्के में एफिम को फिर भय हुआ कि कहीं ऐसे में बटुआ कोई चुरा ले। हाथ में उसे दबाए, भीड़ में कोहनी मारता, वह पीछे की ओर बढ़ने लगा। अब तो वह बस किसी तरह बाहर हो जाना चाहता था। बाहर खुले में आया और वहाँ बहुत काल एलीशा की खोज में रहा। गिरजे के अंदर देखा। बाहर देखा; आँगन में या धर्मशाला में खाते-पीते, पुस्तक बेचते या सोते उसे बहुत भाँति के बहुतेरे आदमी मिले; पर एलीशा कहीं नहीं दीखा। सो एफिम बिना अपने साथी को पाए अपने ठहरने की जगह लौटकर आया। उस शाम साथ का यात्री भी फिर नहीं लौटा। उधार का रुपया बिना चुकाए वह चला गया था और एफिम अकेला पड़ गया था।

    अगले दिन एफिम दर्शन को मंदिर गया। अबकी जहाज़ पर मिले एक दूसरे बूढ़े यात्री का साथ उसने ले लिया था। मंदिर में जाकर फिर उसने अगली पंक्ति में पहुँचने की कोशिश की। लेकिन भीड़ के दबाव में ही रह गया। ख़ैर, वहाँ एक खंभे के सहारे टिक कर उसने अपनी इबादत पूरी की। पर सामने जो देखता है तो ठीक अखंड ज्योति के नींचे वेदी के ऐन पास सबके आगे खड़ा है कौन?—वही एलीशा। बाहें उसकी पुजारी की भाँति वेदी की तरफ़ फैली हैं और सिर उसका रोशनी में चमचम चमक रहा है।

    एफिम ने सोचा कि इस बार तो मैं उसे खोने नहीं दूँगा।

    सो धकियाता हुआ वह आगे बढ़ा। लेकिन वहाँ पहुँचा तो एलीशा वहाँ नहीं था। अनुमान किया कि चला गया होगा।

    तीसरे दिन एफिम फिर दर्शन के लिए आया और देखता क्या है कि मंदिर में वेदी से लगकर सबसे ख़ास और अगली पवित्र जगह पर सबकी निगाह के बीचोंबीच खड़ा है एलीशा! बाहें फैली हैं और निगाह आकाश की ओर है। जैसे ऊपर उसे कुछ प्रकाश दिख रहा हो। और उसका साफ़ सिर सदा की भाँति चमकीला चमक रहा है।

    एफिम ने सोचा कि इस बार तो किसी तरह मैं उसे अपने से जाने नहीं दूँगा। जाकर दरवाज़े पर खड़ा हुआ जाता हूँ। फिर एक-दूसरे को पाए बिना हम किसी तरह भी नहीं रह सकेंगे।

    एफिम गया और दरवाज़े से लगकर खड़ा हो गया। ऐसे खड़े-खड़े दुपहर बीत गया। तीसरा पहर बीत चला। हर कोई मंदिर से जा चुका था। लेकिन एलीशा की मूरत नहीं दिखी, नहीं दिखी।

    येरुशलम में एफिम छह हफ़्ते रहा और सब धाम देखे। बैथलेहम के दर्शन किए, बेथैनी गया और जार्डन भी देखा। मंदिर में अपने नाम का दीपक छोड़ा। जार्डन के पवित्र जल की शीशी भरकर साथ में ली और वहाँ की मिट्टी भी बाँध ली। और कुछ मोमबत्तियाँ भी लीं जिन्हें अखंड ज्योति से छूकर एक बार जगा लिया था। आठ जगह पर उसने अपने नाम की प्रार्थना के अर्थ दान दिया। बस राह ख़र्च भर को उसने पैसा रखा, बाक़ी सब पुण्य कर दिया। आख़िर तीर्थ पूरा कर अपने घर की तरफ़ वापिस हो लिया। जाफ़ा तक पैदल यात्रा की। वहाँ से ओडेसा तक जहाज़ में। और फिर आगे पाँव-पाँव घर चला।

    नौ

    जिस राह गया, उसी राह एफिम लौट रहा था। ज्यों-ज्यों घर पास आता, उस पर चिंता बढ़ती जाती थी कि पीछे घर के काम-धाम की क्या हालत हुई होगी। कहते हैं कि एक साल में कितना कुछ नहीं बह जाता। बनाने में ज़िंदगी लग जाती है, पर बिगड़ सब क्षण में सकता है। तो वह सोचता था कि उसके लड़के ने पीछे जाने क्या कुछ करके रखा होगा। कैसा मौसम वहाँ चल रहा होगा। जाड़ों में चौपायों पर कैसी बीती होगी और मकान भी ठीक-ठीक पूरा हुआ होगा कि नहीं। एफिम जब उस देश में आया, जहाँ परसाल एलिशा बिछड़ गया था तो गाँवों को वह मुश्किल से पहचान सका। हालत अब कुछ-की-कुछ थी। पिछली साल तो अनाज के दाने का ठिकाना था। अब सब ख़ुशहाल थे। फ़सल ऐसी भरी हुई थी कि क्या कहा जाए। अब सबके घर भर-पुर गए थे और पहली मुसीबत याद भी आती थी।

    एक शाम एफिम ठीक वहाँ पहुँचा जहाँ एलीशा रुककर पीछे रह गया था। वहाँ से पहले घर के पास आना था कि एक लड़की बाहर भागती आई। सफ़ेद फ़्रॉक पहने बड़ी भली लगती थी।

    बोली, दादा, दादा! चलो हमारे घर।

    एफिम अपनी राह बढ़े जाना चाहता था। लेकिन उस नन्हीं नटखट ने जाने दिया। कोट का छोर पकड़ लिया और हँसती हुई घर की तरफ़ खींचकर ले चली। वहाँ छोटा बच्चा लिए एक स्त्री मिली, उसने आवभगत के भाव से कहा कि आइए दादा, कुछ खा लीजिए और यह रात यहाँ विश्राम कीजिए।

    सो एफिम अंदर पहुँचा। सोचा कि यहाँ एलीशा की बाबत पूछकर देखना चाहिए। मैं समझता हूँ कि पानी पीने एलीशा इसी घर की तरफ़ बढ़कर आया था। स्त्री ने आगे बढ़कर मेहमान का बकचा कंधे पर से उतरवाया और हाथ-मुँह धोने को पानी दिया। फिर मेज़ पर बिठाकर सामने दूध रखा और चपातियाँ, दलिया वग़ैरह लाकर दिया। एफिम ने बहुत शुक्रिया माना कि चलते राहगीर पर आप ऐसी दया दिखलाती हैं। एफिम ने उसके इस सत्कार की बहुत तारीफ़ की।

    लेकिन स्त्री ने मानो इनकार में सिर हिलाया। बोली, यात्रियों की ख़ातिर करने का तो हमारा धर्म है। और वजह भी है। असल में एक यात्री ही थे, जिन्होंने हमें जीवन में धरम का रास्ता दिखाया। हम ईश्वर को भूलकर रहा करते थे। सो ईश्वर ने हमें ऐसा दंड दिया कि बस मौत ही से बचे। पिछली गरमियों में हालत ऐसी गई कि हम सब लोगों को बीमारी ने घेर लिया। बिलकुल बेबस और मोहताज हो गए। खाने को पास दाना नहीं था। वह तो हम मर ही जाते कि ईश्वर के दूत बनकर एक वृद्ध पुरुष हमारी मदद को पहुँचे। वह ऐसे ही थे जैसे आप। एक दिन पीने को थोड़ा पानी माँगने आए थे, लेकिन हमारी यह हालत देखी तो उन्हें दया हो आई। फिर हमारे साथ ही कुछ दिन रह गए। उन्होंने हमें खाने को दिया, पीने को दिया और फिर हमें अपने पैरों पर खड़ा किया। धरती हमारी गिरवी से छुड़ा दी और एक गाड़ी घोड़ा ख़रीदकर हमको दे दिया।

    इसी समय एक बूढ़ी माँ वहाँ आई और बीच में बात काटकर बोली, अजी, हम कैसे कहें कि वह मनुष्य ही थे और ईश्वर के भेजे कोई फ़रिश्ते नहीं थे। उन्होंने हम सबको प्रेम किया और करुणा की। और गए ऐसे कि हमें नाम भी नहीं बता गए। सो हम यह भी नहीं जानते कि किस के नाम की हम माला फेरें और वह दुआ करें। वह हालत मेरी आँखों के आगे है। मैं मौत की बाट देखती वहाँ पड़ी थी, कि आए वह वृद्ध। उनका सिर साफ़ था। देखने में कोई ख़ास बात नहीं थी। आकर उन्होंने पीने को पानी माँगा। और मैं थी मन की पापिनी। सोचने लगी कि जाने यह आदमी किस ताक में यहाँ आया है। मैं तो ऐसी थी, और देखो कि उन्होंने हमारे साथ क्या किया। ठीक यही जगह जहाँ तुम बैठे हो, वहीं, बेंच पर, हमें देखते ही अपनी कमर से सामान उतारकर रखा और खोलने लगे।

    तभी वह लड़की बीच में बोली, ना दादी, ना। पहले तो उन्होंने गठरी यहाँ बीच में रखी थी, कोई बेंच पर थोड़ी रखी। बेंच पर तो फिर पीछे उठाकर रखी थी।

    इसके बाद वे सब जन उन्हीं पुरुष की याद करने लगे और उन्हीं की बाबत बहस और चर्चा करने लगे, कि उनके मुँह से क्या-क्या शब्द निकले, क्या उन्होंने दिया, कहाँ वह बैठते थे, कहाँ सोते थे, और किससे कब और क्या-क्या बातें उन्होंने की थीं।

    रात को घर का मर्द भी अपने घोड़े पर आया और वह भी एलीशा के बारे में बखान करने लगा कि कैसे वह दयावान यहाँ रहा करते थे।

    वह आते तो हम अधम अपने पाप के बीच मरे ही पड़े हुए थे। निराश, पल-पल मौत के मुँह में हम सरकते जा रहे थे। ईश्वर को कोसते और आदमी को कोसते थे। लेकिन वह दयालु आए और हमें अपने पैरों पर खड़ा किया। उनसे हमने परमात्मा को जानना चाहा। उनसे हमने विश्वास पाया कि आदमी में नेकी का वास है। भगवान उनका भला करे। हम जानवर की तरह रहते थे। उन्होंने हमें आदमी बनाया।

    एफिम को खिला-पिला कर उन्हें बिछौना बतला दिया और फिर वे ख़ुद अपने सोने चले गए।

    एफिम लेट तो गया, पर सो नहीं सका। एलीशा उनके मन से बाहर नहीं होता था। उसे स्मरण हुआ कि येरुशलम तीर्थ में तीन बार सबसे आगे के स्थान पर उसने एलीशा को देखा था।

    सोचा कि एलीशा इसी भाँति मुझसे आगे निकला है। भगवान ने मेरी तीर्थ यात्रा को तो स्वीकार किया हो या नहीं भी स्वीकार किया हो, पर एलीशा के पुण्य को तो प्रत्यक्ष ही उसने ग्रहण कर लिया है।

    अगले सवेरे एफिम ने उन लोगों से विदा माँगी। परिवार के लोगों ने राह के लिए उसके साथ कलेवा बाँध दिया और एफिम घर की तरफ़ आगे बढ़ा।

    दस

    पूरा सालभर एफिम को यात्रा में लग गया। गर्मी लगते गया था कि उन्हीं दिनों लौटा। पर जिस शाम घर पहुँचा तो उसका लड़का वहाँ था नहीं। बाहर दारू-घर पर गया था। लौटा तो ज़्यादा चढ़ा आया था। एफिम ने उससे घर के हाल-चाल की बाबत पूछा। पर साफ़ ही दिखाई देता था कि बाप के पीछे उसने जमकर कुछ नहीं किया है। पैसा जहाँ-तहाँ ख़र्च डाला है और काम का ख़्याल नहीं रखा है। सो बाप ने लड़के को डाँटना शुरू किया।

    लड़के ने भी बेअदबी से जवाब दिया। बोला, “तो तुम्हीं ने यहाँ रहकर क्यों नहीं सब देखा-भाला। पैसा बाँधकर आप ख़ुद तो चल दिए तीरथ करने और अब कहते हैं कि कमाकर रखूँ मैं। बूढ़े को सुनकर ग़ुस्सा गया और पीटने लगा।

    सवेरे एफिम गाँव के चौधरी के पास अपने बेटे के चाल-चलन की शिकायत करने लगा। रास्ते में एलीशा का मकान पड़ता था। वहाँ उसकी बीबी उसारे में खड़ी थी। बोली, आओजी, आओ। कब आए? क्या हाल है? तीरथ आपका राज़ी-ख़ुशी तो हुआ न?

    एफिम रुक गया बोला, हाँ, ईश्वर की दया है। तीरथ सब राज़ी हुआ। पर एलीशा तो बीच में छूट गए कि फिर दीखे ही नहीं। वह कुशल से घर गए हैं न?

    स्त्री को बात करने का चाव था। बोली, हाँ जी, वह वापिस घर गए हैं। आए उन्हें दिन भी हो गए। मैं समझूँ कार्तिक बीते ही वह गए थे। भगवान की कृपा हुई कि उन्हें जल्दी वापस भेज दिया। उनके बिना यहाँ सब सूना लगता था। काम की तो उनसे अब बहुत आस नहीं है। काम की उमर उनकी गई। पर तुम जानो घर के बड़े तो वह हैं। और वह होते हैं तो घर में उछाह रहता है। और हमारा लड़का तो—उसके आनंद की क्या पूछो, “भाभी, सूरज छिप जाता है न, सो पिताजी के बिना वैसी हालत हो जाती है जैसे धूप उठ गई हो। अजी, उनके पीछे तो सब बिरथा लगता है और घर में आनंद उमंग नहीं रहती। हम लोग सब उनका ख़याल रखते हैं और आराम देते हैं। और हमें भी तो वह कितना प्यार करते हैं।

    वह घर ही हैं न?

    हाँ जी, घर ही हैं। अपनी मधु-मक्खियों के पास होंगे। वहीं सदा दिखते हैं। कहते थे, इस साल ख़ूब मधु होगा। भगवान ने ऐसी कृपा की है कि ख़ूब मक्खी फली हैं। ऐसी कि कभी उन्होंने भी अपनी उमर में नहीं देखी। वह कहते हैं कि भगवान हमारे अवगुन के माफ़िक़ तो यह हमें इनाम नहीं दे रहे हैं। आओ, बड़े जी, तुम आओ। तुमसे मिलकर उन्हें बहुत ख़ुशी होगी।

    एफिम उधर बरामदे में से निकलता हुआ दूसरी तरफ़ के घर में गया। वहाँ एलीशा मिला। वही लंबा चोगा था। मुँह ढकने की कोई जाली थी हाथ में दस्ताने। पेड़ों के कुंज के नीचे, खुले सिर बाँह फैलाए खड़ा था। एफिम को येरुशलम के मंदिर में दिखे चित्र की याद हो आई। उसी भाँति सिर उसका चमक रहा था और पेड़ों के ऊपर छनकर आनेवाली धूप भी ठीक मंदिर की अखंड ज्योति-सी दिखती थी। और मक्खियों ने उसके सिर के आस-पास उड़कर अपने सुनहरे पंखों से वहीं के जैसा उज्ज्वल प्रभा-मंडल बना रखा था। प्रेम से सब उसके चारों तरफ़ मँडरा रही थीं और कोई काटती नहीं थीं।

    एफिम रुक गया और दूर से ही स्त्री अपने पति को पुकारकर बोली, अजी, देखो भी, वह बड़े जी आए हैं।

    एलीशा ने मुड़कर देखा। चेहरा उसका प्रसन्न था। धीमे से दाढ़ी में उलझी दो-एक मक्खियों को निकालते हुए एफिम बढ़कर मित्र की तरफ़ आया।

    आओ भाई, आओ। कहो, तीरथ कुशल से तो हुआ?

    हाँ, काया तो मेरी तीरथ करने गई ही थी और जार्डन का जल भी तुम्हारे लिए भरकर लाया हूँ। पर उसके लिए तो तुम हमारे घर आओगे, है न? लेकिन मालिक को मेरी तीरथ यात्रा स्वीकार हुई कि नहीं...

    एलीशा बोला, अजी, तारन तरन वही हैं। भगवान का ही सब है।

    एफिम कुछ देर चुप रहा। फिर बोला, काया तो वहाँ पहुँची, पर सच पूछो तो आत्मा मेरी वहाँ पहुँची कि दूसरे की यह...

    बीच में एलीशा ने कहा, भाई, यह तो भगवान के देखने का काम है। भगवान सब देखते हैं।

    एफिम, और वापसी में उस घर पर भी ठहरा था जहाँ तुम पीछे छूट गए थे...

    एलीशा सुनकर जैसे भय से भर गया। जल्दी से बोला, भगवान का काम है, भाई, सब भगवान का! आओ, अंदर आओ। हमारा शहद तो ज़रा देखो

    कहकर एलीशा ने बात बदल दी और घर के हाल-चाल की चर्चा छेड़ दी।

    एफिम मन की साँस मन में रोके रह गया। फिर उस घर के उपकृत लोगों की बात उसने नहीं की। यही बतलाया कि किस रूप में परमतीर्थ येरुशलम के मंदिर की ठीक वेदी के पास एलीशा को उसने तीन बार देखा था। पर अब मन के भीतर ख़ूब समझ गया कि ईश्वर की प्रतिज्ञा और उसके आदर्श को पालन करने का सबसे अच्छा मार्ग क्या है। यही कि आदमी जब तक जीए, औरों की भलाई करे और प्रेम से व्यवहार करे।

    स्रोत :
    • पुस्तक : लियो टॉल्सटॉय प्रतिनिधि रचनाएँ भाग-3 (पृष्ठ 177)
    • संपादक : कृष्णदत्त पालीवाल
    • रचनाकार : लियो टॉल्सटॉय
    • प्रकाशन : सस्ता साहित्य मंडल प्रकाशन
    • संस्करण : 2019

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