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घंटी

ghanti

ब्रजेश्वर मदान

और अधिकब्रजेश्वर मदान

    केशवानी साहेब कुर्सी को ऐसे देख रहे थे जैसे उन्होंने पहले कभी कुर्सी को देखा हो। यूँ इस तरह पहले उन्होंने कभी कुर्सी को देखा भी नहीं था कि कैसे लोहे के एक पाइप को मोड़कर कुर्सी का एक ढाँचा बनाया गया है। पाइप में कहीं कोई जोड़ नहीं है। फिर उन्होंने देखा कि उस ढाँचे पर कैसे बैठने और पीठ टिकाने की जगह लकड़ी के दो चौखटे फिट करके ख़ाली जगह केन से बुनी गई है। बाँहों की जगह भी पाइप की लकड़ी लगाई गई है।

    उन्हें याद आया कि लकड़ी पर पहले काले रंग की पॉलिश थी। वे एकदम चौक गए। कुर्सी की बाँहों से पॉलिश उतर गई थी और उन्हें लगा कि पॉलिश उतरने से कुर्सी की बाँहों का रंग बिल्कुल उनकी बाँहों के रंग जैसा निकल आया था।

    उन्हें यूँ महसूस हुआ जैसे कुर्सी पर जो बाँहें लगी हैं, वे उनकी अपनी बाँहें हाँ। बारी-बारी कभी वह अपनी बाँहों को और, कभी कुर्सी की बाँहों को देखते। जैसे वह फ़ैसला कर पा रहे हों, कुर्सी को उनकी बाँहें लगी हैं या उन्हें कुर्सी की बाँहें लग गई हैं।

    बैठने के लिए केशवानी साहेब को बाँहों वाली कुर्सी चाहिए। घर के लिए भी वह कुर्सियाँ लाए थे तो अपने लिए बाँहों वाली। दफ़्तर में भी उनकी कुर्सी बाँहों वाली थी। बाक़ी स्टाफ़ बिना बाँहों की कुर्सियों पर बैठता था। उन्हें याद आया, दफ़्तर में उनकी कर्सी पर चमड़ा भी लगा था।

    केशवानी साहेब ने कभी यह जानने की कोशिश नहीं की थी कि वह चमड़ा किस जानवर का है। लेकिन यह ज़रूर होता था कि उस चमड़े पर हाथ फेरते हुए उनके मन का पशु प्रेम जागने लगता। उन्हें अपने कुत्ते टॉमी की याद जाती। वे भूल जाते कि वे घर में नहीं हैं और टॉमी को बुलाने के लिए घंटी बजा देते, थोड़ी देर में वह देखते कि उनके सामने टॉमी की बजाए गोबर चपरासी खड़ा है।

    घर में उन्होंने टॉमी को बुलाने के लिए भी घंटी रखी हुई थी। सुबह वह टॉमी को घंटी बजाकर अपने जागने की सूचना देते और वह दरवाज़े में पड़ा अख़बार उठा लाता। टॉमी की जगह गोबर को देखकर वह उसे भी चाबी देकर अपनी कार में से अख़बार निकाल लाने के लिए कह देते।

    लेकिन अब कुर्सी पर लगे चमड़े का ख़याल आते ही उन्हें लगा कि जैसे उनका चमड़ा उसी कुर्सी पर लगा रह गया है। रिटायर होने के बाद वह कितने कमज़ोर हो गए हैं। नहीं तो उनकी बाँहें इतनी पतली तो नहीं थीं। दफ़्तर की कुर्सी जैसी ही मोटी-मोटी बाँहें थीं और अब इस कुर्सी की तरह पतली हैं। कई बार तो उन्हें यह भी लगता कि कहीं उनकी बाँहें लकड़ी की तो नहीं हो गईं और कुर्सी की बाँहें गोश्त की हो गईं। यह सोचकर वह बाँहें उठाना चाहते। ज़रा अँगड़ाई लेकर ही देखें। लेकिन उनसे बाँहें उठाई जातीं। अपनी बजाए कुर्सी की बाँहों को उठाने की कोशिश करते-करते वह हाँफने लगते।

    वह कुर्सी से बाहर निकल आते। उन्हें लगता कि वह बिना बाँहों के हो गए हैं। फिर कुर्सी पर बैठने और पीठ टिकाने की जगह भी जहाँ-जहाँ पॉलिश घिस गई थी, उन्हें अपनी चमड़ी नज़र आने लगती। वे पीठ और कूल्हों पर हाथ लगा-लगाकर देखने लगते कि क्या सचमुच वहाँ चमड़ी कम हो गई है। यही नहीं, सुबह पाख़ाने के बाद चूतड़ धोते हुए भी उन्हें दफ़्तर वाली कुर्सी की गद्दी का ख़याल आता। उन्हें लगता कि उनकी चमड़ी वहीं रह गई है।

    केशवानी साहेब की हालत यह हो गई कि उनकी बाँहें, पीठ, टाँगें, चमड़ी जैसे सब कुछ कुर्सी से लगा हुआ है। कुर्सी से बाहर वह अपने जिस्म को महसूस ही कर पाते।

    यही वजह थी कि जब कुर्सी पर बैठने की जगह केन टूट गई थी तो वह बहुत परेशान हो गए थे। कहीं उनसे बैठा ही नहीं जाता था। पता नहीं, किस-किस को जाकर कह आए कि कुर्सी बुनने वाला आए तो हमारे यहाँ भेजना। घर में और कुर्सियाँ थीं, लेकिन वो बिना बाँहों की थीं। उन्हें ऐसे लग रहा था कि जैसे वह दुबारा रिटायर हो गए हैं।

    जब वह रिटायर थे तो उनकी अजीब कैफ़ियत थी। घर में उनसे कहीं बैठा ही नहीं जाता था। बाँहों वाली कुर्सी की केन टूटने के बाद वह कुर्सी में अपनी चमड़ी का रंग देखकर ऐसे हिप्स को हाथ लगाते हुए घूमते तो पत्नी को लगता कि उन्हें बवासीर के मस्से फिर हो गए हैं और उसने खाने में उन्हें मिर्च वग़ैरह देनी बंद कर दी।

    रिटायर होने के बाद वह पंचकुइया रोड जाकर बाँहों वाली कुर्सी लेकर आए थे। यह कुर्सी भी बहुत मुश्किल से मिली थी। पूरा पंचकुइया रोड छानने के बाद। वहाँ जो कुर्सियाँ थीं, वे लोहे के हाथों वाली थीं। लकड़ी महँगी हो गई तो उसकी जगह लोहा लगने लगा। कुर्सी पसंद करते वक़्त भी उन्होंने इतना नाटक किया कि उनके बेटे मनोहर को शर्म आने लगी थी। पता नहीं कितनी कुर्सियों पर उन्होंने बैठकर देखा और फिर वह कुर्सी चुनी। उसके बाद मनोहर ने क़सम खा ली थी कि उनके साथ बाज़ार नहीं जाएगा।

    कुर्सी बुनने वाले आए तो पत्नी ने वापस भेज दिए। कहा कि वे किसी नेत्रहीन से कुर्सी बनवाएँगी। बाज़ार से उनके लिए नई कुर्सी ले आईं। उस पर केशवानी साहेब से इसलिए नहीं बैठा जा रहा था कि हत्थों पर पॉलिश थी, काले रंग की। यह रंग उन्हें परेशान करता। वह अपनी चमड़ी का रंग देखना चाहते और कुर्सी के हत्थों पर कुहनियाँ रगड़ने लगते ताकि पॉलिश उतर जाए और वह अपनी चमड़ी को महसूस कर सकें।

    एक बार तो वह अपने पुराने दफ़्तर भी हो आए। वह अपनी कुर्सी को देखना चाहते थे, लेकिन उन्हें दरवाज़े से ही लौटना पड़ा। कर्मचारियों ने हड़ताल कर रखी थी और वे वेतन बढ़ाने की माँगों को लेकर नारे लगा रहे थे।

    घर आकर उन्होंने मनोहर को बड़े गर्व से बताया था कि कैसे उनके रिटायर होने के बाद दफ़्तर में लोग काम नहीं कर रहे। तनख़्वाह बढ़ाने की माँग करने लगे। यह सब उनके होने की वजह से हुआ है। उनके ज़माने में ऐसी अव्यवस्था नहीं थी। अब तो कोई अफ़सर की इज़्ज़त ही नहीं करता।

    गोबर चपरासी के अलावा उन्हें किसी ने सलाम ही नहीं किया था। उसे भी वह कह आए थे कि कुर्सी बुनने वाला आए तो हमारे यहाँ भेजना।

    केशवानी साहेब ने इतने लोगों से कह दिया था कि जब उनकी पत्नी ने अन्य विद्यालय से नेत्रहीन को बुलवाकर कुर्सी बनवा ली, उसके बाद भी कुर्सी बुनने वाले उनके यहाँ आते रहे। घर के दरवाज़े की घंटी जब भी बजती, घर के लोग यही समझते कि कोई कुर्सी बुनने वाला आया है। एक दिन केशवानी साहेब पेंशन लेकर लौटे तो उनकी पत्नी ने उन्हें भी कुर्सी बुनने वाला समझ लिया। यह कहकर उन्हें बिना देखे दरवाज़ा बंद कर दिया, हमें नहीं बनवानी कुर्सी। केशवानी साहेब जब बार-बार घंटी बजाते रहे तो उन्हें यह सुनने को मिला—यह कुर्सी बुनने वाले भी कितने बदतमीज़ होते हैं। एक बार कह दिया, नहीं बुनवानी कुर्सी, फिर भी घंटी बजाए जा रहे हैं।

    केशवानी साहेब को अफ़सरी में घंटी बजाने की आदत पड़ गई थी। दफ़्तर में तो घंटी सुनकर गोबर जाता था लेकिन अब घर में भी पत्नी या बेटे में से किसी को बुलाना होता तो वह टॉमी के लिए रखी घंटी उठाकर बजाने लगते। घंटी सुनकर टॉमी ही आता। वह भूल जाते कि यह घंटी आदमियों के लिए नहीं है। जब घर का कोई व्यक्ति आता तो वह झल्ला जाते। उन्हें लगता, सब नमकहराम है। सिर्फ़ टॉमी वफ़ादार है। शोर मचाने लगते, सब बहरे हो गए हैं क्या!

    घर के लोग इसलिए नाराज़ थे कि वह घंटी उनके लिए बजाते हैं। एक बार पत्नी ने उनकी घंटी छिपा दी तो टॉमी अपने दाँतों से वह घंटी उठा लाया।

    उस रोज़ उन्होंने टॉमी को बहुत प्यार किया। उन्हें फिर दफ़्तर की चमड़े वाली कुर्सी याद आई। फिर घर वाली कुर्सी की लकड़ी की बाँहों पर हाथ फेरकर उन्हें लगा कि उनकी बाँहें कितनी पतली हो गई हैं। वह इतने कमज़ोर हो गए हैं कि उनकी बाँहें जहाँ लगी हैं, वहाँ से उठा नहीं सकते। मेज़ पर कुहनियाँ तक नहीं रख सकते।

    केवल वह आदमियों के लिए घंटी बजाते बल्कि घर में भी दफ़्तर वाली व्यवस्था चाहते। एक बार एक पड़ोसी सीधा उनके कमरे में गया तो उन्होंने अपने बेटे मनोहर को बुलाकर डाँट दिया, 'मुझसे बिना पूछे उसे क्यों आने दिया?'

    वह भूल गए थे कि जिसे वह डाँट रहे हैं, उनका बेटा है, गोबर चपरासी नहीं।

    बहू को देखकर उन्हें अपनी स्टैनो की याद आती। एक दिन तो उन्होंने बहू को कमरे में बुला लिया। 'क्यों बहू, डिक्टेशन ले सकती हो? टाइप-शॉर्टहैंड सीखने जाया करो।'

    फिर उसे उन्होंने कुछ चिट्टियाँ लिखने के लिए बिठा लिया तो उन्हें अपने रिश्तेदारों के नाम ही याद नहीं आए। बहुत मुश्किल से उन्हें अपनी बहिन का ख़याल आया। वह बहुत ग़रीब थी। उन्हें पता नहीं था कि अब वह कहाँ है। एक बार उनके दफ़्तर में एक नौकरी निकली थी। बहिन चाहती थी कि वह उसके बेटे को वहाँ लगवा दें, लेकिन केशवानी साहेब ने कहा, तुम तो जानती हो, यह मेरे सिद्धांत के ख़िलाफ़ है।'

    बात दरअसल सिद्धांत की नहीं थी। वह नहीं चाहते थे कि किसी को पता चले कि उनकी बहिन इतनी ग़रीब है और उसका बेटा उनके दफ़्तर में मामूली नौकरी करता है।

    बहिन की याद आते ही उन्होंने कुर्सी से पीठ टिका ली। रीढ़ की हड्डी में दर्द महसूस हुआ तो उन्हें लगा कि कुर्सी राजधानी एक्सप्रेस की चेयरकार वाली होनी चाहिए। लेटने को दिल करे तो लंबी हो जाए।

    दफ़्तर में भी कभी उन्हें नींद आती थी तो ऐसी ही कुर्सी की ज़रूरत महसूस होती थी। अक्सर ख़ुद सोने के बाद वह गोबर चपरासी को बुलाकर डाँट दिया करते थे, 'सो रहे थे क्या, मैं इतनी देर से घंटी बजा रहा था।'

    रिटायर होने से पहले केशवानी साहेब ने ऐसी कुर्सी के लिए डिपार्टमेंट को दरख़्वास्त भी दी थी।

    यह याद आते ही वह उठे कि दफ़्तर जाकर देखें कि वह कुर्सी अभी आई या नहीं। फिर उन्हें ख़याल आया कि क्यों वह अपनी बजाए मनोहर को यह देखने के लिए भेज दें।

    मनोहर को बुलाने के लिए उन्होंने घंटी बजाई और एक घटना हो गई। घंटी ज़िंदा हो गई और उनका शरीर मृत है, उनकी अँगुली घंटी पर रखी हुई है और वह लगातार बजे जा रही है।

    स्रोत :
    • पुस्तक : शताब्दी की कालजयी कहानियाँ (खंड 3) (पृष्ठ 301)
    • संपादक : कमलेश्वर
    • रचनाकार : ब्रजेश्वर मदान
    • प्रकाशन : किताबघर प्रकाशन
    • संस्करण : 2010

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