औचक नज़र मिली और धक्क हुआ दिल... स्थिर हो गई शिवा... एक चेहरा जो उसके बगलगीर होकर गुजरा, उसे स्वीकार करने में पल दो पल लगे—हाँ...है तो वही...साँवले पिचके चेहरे पर भराव आ गया है। मोटे गाल लावण्यीय होकर दमकने लगे हैं। वह ठिठकने लगी थी, पर जाने क्या सोचकर लम्बे-लम्बे डग भरती आगे निकल गई। शिवा उसकी भूरी आँखों की हल्की सी जुंबिश पर ठहर कर आगे लपकी, चौराहा था, जाने किधर वो आलोप हो गई। शिवा को लगा इस मर्तबा भी वह चूक गई! जिसके बारे में वह वर्शों से पूछताछ करना चाह रही थी, जिसके सवाल उसे एकांत में मथते जा रहे थे, लम्बे समय से उसी का पता-ठिकाना पाने में ही चूक गई! अनगिन ज़ख़्मों के बीच उन सवालों की मुठभेड़ से वह हलकान होती रही थी बार-बार...और कोई उत्तर नहीं मिलता। दिल-दिमाग़ पर भारी बोझा ढोती शिवा ख़ुद को ही लहुलुहान करने लगती—तुझे जीने का कोई हक नहीं मूर्ख...एक साथ कितनी ज़िंदगियों को घूँट-घूँट विश पिलाती रही तू...सिर्फ़ अपनी मूर्खता से...?
प्रश्न थे कि नागपाश से लिपटे हुए डस रहे थे... “अब क्या? उसे तो उसका पता ठिकाना भी नहीं मालूम, पर क्या पता वह दुनिया से ही कूच कर गई हो?” ऐसा हुआ तो धरती का भार कुछ हल्का अवश्य हुआ होगा या किसी अस्पताल के अँधेरे किसी कोने में सिर पटक रही होगी। कितने ही निर्मम चित्र शिवा की आँखों के आगे छाने लगे... बनते बिगड़ते चित्रों को देखकर उसे ख़ुद पर भी खीझ होती—क्यों सोच रही हूँ उसके बारे में इतना बुरा...? कभी शिवा अपनी ग्लानि की पिसती गाँठ खोलने लगती—मनुष्य के मनोभाव को परखने की क्षमता प्रकृति ने तुम्हें क्यों नहीं दी शिवा? एक वह ख़ुशनुमा शाम जिसे वह शाप मान कर ढोती आई है...
कितनी ख़ूबसरत थी उसकी ज़िंदगी, उसका छोटा-सा रैन बसेरा, ज़िम्मेदार पति, प्यारे बच्चे। जैसे किसी डायन की नज़र लग गई हो।
वह शाम, मार्च के शुरुआती दिन, पेड़ पर पत्तों के बीच छुपी कोयल कूक रही थी। सामने सड़क के किनारे का पलाश दहक रहा था। सूरज थकान लिए अवसान की ओर जा रहे थे। पेड़ों की फुनगियों में धूप नीचे से चढ़ते-चढ़ते स्थिर थी। सामने की छत की चादर चमकती धूप से जलजला रही थी, सर्र सर्र हवा एकाएक बहती हुई पेड़ों की टहनियां को हिलोरे दे रही थी। शिवा बदामदे में बेंत की चियर पर बैठी तस्लीमा नसरीन की लज्जा पढ़ने में व्यस्त थी कि गेट पर जोर से खटका हुआ, एक युवा स्त्री दरोगा-सी बिना किसी अनुमति लिए धड़-धड़ गेट खोलकर तेज़ी से आई। बेखौफ़ आती स्त्री को तेज़ी से आते देख शिवा चकित रह गई, वह कुछ कहती, इससे पहले स्त्री की मधुर बाली गूंजी— “हाउ क्यूट! जैसे स्टैचू हो, वह पीछे मुड़—है न मम्मी?’’ शिवा के चेहरे पर नज़र फेंकती माँ की बाँह पकड़ कर बरामदे में ले आई।
उसके साथ यह बूढी स्त्री प्रेमालु होती उसे अंक में भरने लगी—“सचमुच बहुत प्यारी बच्ची है स्टैचू-सी...’’ शिवा पर जैसे मोहनी मंत्र मार दिया हो, वह विस्मय भरी उन दोनों को देखती रह गई। युवा स्त्री लम्बी गदराई देह, गुलाबी गोरा गोल चेहरा, बड़ी-बड़ी आँखों मैं नशा-सा...देह पर नई फ़िरोज़ी कुर्ती शरारा, बड़े-बड़े भारी उन्मुक्त वक्ष पर फ़िरोज़ी दुपट्टा, हवा में उड़ता सा काले घुँघराले कंधों तक बाल। ‘‘आपका एक सैट किराए के लिए खाली है? सामने वाले लाला जी ने बताया।’’ युवा स्त्री की शहद में लबरेज़ आवाज़ शिवा ने अपने ऊपर गिरती महसूस करते बूढ़ी स्त्री को बेंत की कुर्सी पर बिठाया। बूढ़ी स्त्री की देह पर क़ीमती गरम सूट दुपट्टा, उसमें उसकी देह अपनी उम्र से बहुत कम दिखी, वे भी जवानी में बहुत ख़ूबसूरत रही होंगी, पर युवा स्त्री के बरक्स दुबली देह, गोरा गुलाबी लम्बा चहेरा, ख़ूबसूरत आँखें जैसे स्नेह का महुवा फूल झरता, वह वात्सल्य छलछलाती आँखों से शिवा के चेहरे पर स्थिर रही— ‘‘चल पुत्तर दिखा दे रूम..’’
शिवा उनके बीच मोह से भरी दोनों को देखने लगी—‘‘इतनी सभ्रांत स्त्रियाँ एक रूम के सैट में कैसे रहेंगी?’’ उसकी सोच को युवा स्त्री ने पकड़ लिया—नो प्राब्लम! हम दो ही प्राणी हैं...’’
शिवा नेप्रश्वानचक दृष्टि से उसे देखा था—‘‘जी मैं और मेरा बच्चा’’
‘‘...और हसबैंड?’’
वह उदास हो गई—‘‘नहीं हैं... आई मीन मैं डाइवोसी हूँ...’’
शिवा असमंजस में, पति का चेहरा सामने आया...एक बारगी काँप उठी, फिर दोनों महिलाओं का व्यक्तित्व देख उनकी आत्मीयता से भरती हुई सोचने लगी—अगर इन्हे पंसद है तो...’’ इतनी देर में उन्होंने शिवा के दिल में बसावट करने में कोई चूक नहीं होने दी थी। बूढ़ी स्त्री के स्नेह की आव वह पल-पल महसूस करती रही। युवा स्त्री का बिंदासपन उच्च शिक्षित होना और हमउम्र की सहज मीठी दोस्ती का अपनापन उसके अभिजात्य व्यक्तित्व से शिवा भी प्रभावित हो रही थी— ‘‘पति से पूछकर बताती हूँ!’’ युवा स्त्री सनाका खा गई— ‘‘ओह माई गाड! इतनी-सी बात के लिए पति की रजामंदी! आप कौन से समय में जी रही मैडम...?’’
शिवा सकपका गई काश! पर अपनी इच्छा से जी पाती, उसे पति की हुक्मअद्ली के बग़ैर फैसले लेने की आज़ादी कहाँ ठहरी, इस बीच बूढ़ी स्त्री उसकी मासूमियत को कितने अलंकरणों से नवाजती, उस पर आशीष की बौछारें करती रही—रब तुझे ख़ुश रखे पुत्तर!
लम्बी उम्र बक्शे ‘‘रब हाय रब्बा कितनी सोणी बच्ची! तेरा पति तो निहाल होता होगा... शिवा को झपाक से पति के कटु वचनों ने लपेट लिया, जैसे पेड़ से गिरता उसकी गले में नाग पाश! पति का पथरीला चेहरा जिसमें एक भी प्रेमरस की बूंद स्थिर नहीं रह सकती— ‘‘ज़्यादा मिठास मत घोला कर स्त्री... मीठी बातों और प्यार से ज़िंदगी नहीं चलती, ज़िंदगी की गाड़ी पथरीली कंटीली सड़क पर संतुलन सधते चलती है, प्यार प्रेम से पेट भरना कहाँ हुआ?’’
इन बोलों से एकाएक शिवा के भीतर का उमगता प्रेम रस सूखकर कंकड़ों में तब्दील हो जाता... अभी जहाँ नीले पानी की नदी कलकल छल बहने लगी थी, अब एकदम सूखा उजाड़!
उसे जब भी प्रेम का नशा चढ़ता, उसका पति अपने वजनी पत्थर जैसे शब्दों से वहाँ अँकुराई मुलायम घास को कुचल कर रख देता। शिवा जितना भी प्रेम का अहसास लिए टुकर-टुकर ताकती, पति यार दोस्तों के आगे उसका अपमान करने लगते। शिवा को याद नहीं कभी पति ने उसे सम्मान दिया हो, उसकी प्रशंसा में दो बोल मीठे बोले हों। उनकी भृकुटि हमेंशा तनी ही रहती! इसलिए कुटुम्ब परिवार समाज के लोगों ने भी उसे सम्मान देने में कंजूसी की थी। पति का उपहास और कटु वचन उसकी चेतना में गाँठे बनाते गए, वह ख़ुद को कम देखती आत्मविश्वास खो रही थी।
पुलक से भरी शिवा झर-झर बरसते स्नेह की धाराओं के बीच कब तीन मग काफ़ी बना लाई! उसे ख़ुद पर अचरज होने लगा। मुझसे ज़्यादा ये मुझे जानती हैं, लगा किसी जन्म की बिछुड़ी हुई बेहद अपनी...इतनी देर में शिवा अपने बारे में वो सब सुन चुकी थी जिसे वह वर्षों से सुनना चाहती थी, उस पल उसके भीतर ख़ुद के लिए पहली मर्तबा प्रेम उमड़ा।
उसे लगा पहली मर्तबा किसी ने उसके भीतर तल के अँधेरे कोने में दफ़न हुए उन प्रकाश कणों को खींचकर उसकी हथेली पर रख दिया, जिनमें वर्षों से धूल की मोटी परत जम चुकी थी, शिवा भूल ही गई थी कि उसके भीतर तहख़ाने में वे भी हैं। अब उसकी हथेली जगमगाने लगी तो वह उन्हें मोहक दृष्टि से देखती सोचने लगी कि ये आ जाए तो वह अपना खोया वह ‘कुछ’ लौटा लेगी जो ज़ालिमों के हाथों ध्वस्त हो चुका है...।
दोनों उसके दिल में ढेर सारी मिठास घोलकर रुख़सत हुई तो शिवा को पति का चेहरा याद आ गया था। झपाटे से वह लपक कर आगे बढ़ी, उनको अपनी नज़रों से दूर होने से पहले उसने ठँडे स्वर में कहा था—एक बार पूछ लूँ...
युवा स्त्री ने पल भर उसके चहेरे पर आँखे टिकाई? उन बड़ी आँखों में शिवा के लिए असीम करुणा थी, शिवा की आँखों के कोर भीग गए थे, पति और उन दो स्त्रियों के बीच उहापोह में फंसी शिवा विचलन में रात का इंतज़ार करने लगी थी। खाना खाने के बाद जैसे ही पति पंलग पर लेटे, उसने दृश्य सामने रख दिया, वे एकाएक तनाव में आ गए। डिवोर्स!! नहीं... बिल्कुल नहीं... कोई और आ जाएगा...
शिवा भी तमक उठी थी—क्यों डिवोर्स क्या उसके अकेले की गलती का परिणाम है? रोज़ के झगड़े क्लेशों से तो मुक्ति होना ही सुखद, वह भी तनाव में आ गई थी, जैसे अपने रिश्ते की काँटोंदार बाड़ को काटने के लिए उत्प्रेरक हो रही हो, पर अपना स्वालम्बन का शून्य महसूस करते ही चुप रह गई, काश! वह भी सशक्त आर्थिक ज़मीन की नींव में पाँव टिकाए रहती तो उसका पंछीमन भी उन्मुक्त हो सकता था।
पति ने एक बार उसे समझाने की कोशिश की थी, पर वह द्वंद में स्पष्ट नहीं हो सकी थी।
अगली दोपहर दोनों स्त्रियाँ भारी भरकम बैग घिसटकर लाते हुए दिखीं तो शिवा अकबका कर बोली— ‘‘इतनी जल्दी! अभी तो मैंने पूछा ही नहीं...’’ शिवा को दूर तक भी ख़्याल नहीं आया कि उन्हें पिछले मकान से निकाल दिया गया है। उसके सामने स्थिति संभालने का सवाल उठा— ‘‘मैं उनकी आज्ञा के बगैर कैसे दे सकती हूँ कमरा...?’’ उसका असमंजस देखकर युवा स्त्री हँसते हुए उपहास करने लगी— ‘‘इस देश की नाइंटीनाइन लेडिज स्टुपिट हैं मम्मी...’’
‘‘पुत्तर हम कोई ऐसे वैसे नहीं हैं, रिस्पेक्टेड फैमली से बिलांग करते हैं...’’ उनकी बूढ़ी हथेलियाँ शिवा के सिर में स्नेह घोल रही थी और बेटी वन रूम सेट में घड़ल्ले से सामान ले जाकर रख रही थी।
कुछ देर में शिवा कॉफी बना कर ले आई—‘‘अब आ ही गए हो आँटी जी, तो दो-चार दिन रह ही लीजिए, उसके बाद मेरे पति को गवारा न हुआ तो...?’’
दोनों ने उसे घूर कर देखा, शिवा सकपका गई थी— ‘‘मैं खोज लूँगी घर...आप क्यों चिंता करते हो...’’
दो-तीन दिन में सामान सैट करके उसने छोटी-सी टेबल में एक जोगिया भेष वाले पुरुष की फ़ोटो जमाई और सामने तश्तरी में अगरबत्ती जला दी। जोगिया पुरुष के आगे शिवलिंग था और गले में सर्प लिपटा था!
सुर्दशन पुरुष का जोगिया भेष, उस पर सर्प गले में... शिवा का दिल काँप उठा। ‘‘ये मेरे गुरु हैं’’ दिव्या अपने भीतर की खोह में बैठ आँखें बंद किए जाने क्या बुदबुदाती हाथ जोड़कर बैठ गई— ‘‘साक्षात शिव हैं ये...’’ कुछ देर बाद आँखे खोली उसने। शिवा कुछ समझ नहीं पाई, तभी बूढ़ी स्त्री आई, फ़ोटो देकर उसे डपटने लगी— ‘‘इन्हें फिर क्यों ले आई?’’ बूढ़ी स्त्री के झुर्रियों भरे चेहरे पर कोहरा छा गया— ‘‘दिव्या पुत्तर बक्से में रख दे इन्हें...’’ वे उठाने को हुई तस्वीर... पर दिव्या चीख़ उठी—‘‘डोंट टच मम्मी...इनके बिना में अधूरी हूँ यार...मेरे गुरु हैं वे...सम्मान करो इनका...’’ उसने झपट कर माँ का हाथ पकड़ लिया। शिवा को समझ नहीं आया, उसका सिर चकराने लगा, तभी दिव्या कॉफी बनाकर ले आई— ‘‘लो पी लो शिवा...सिर दर्द ठीक होगा...’’
शिवा ने घूँट भरा, एक-दो-तीन, उसे कॉफी का स्वाद कुछ अलग लगा और उसकी मनस्थिति बदलने लगी, उसे दिव्या बहुत अपनी लगने लगी, जैसे जन्मों से इसे जानती हो।
माँ ने माथे पर हाथ मारा और बिखरी चीज़ें समेटने लगी।
अब शिवा दिव्या के पास बैठने लगी, धीरे-धीरे उसे अपने ज़रूरी कामों को करना भी टाल दिया, पहले कुछ देर, फिर घँटा दो घँटा, फिर पूरे दिन, जब बच्चे स्कूल से नहीं आ जाते, कच्चा पक्का खाना परोस कर देती और फिर उसी के पास। दिव्या ने उसे आध्यात्मिक दुनिया की तस्वीर दिखानी शुरू कर दी—‘‘मेरे गुरू ने मुझे मंत्र दिया है शिवा...हिमालय पर तपस्या की है इन्होंने। घुटनों तक बर्फ़ में रहे हैं गुरुदेव महीनों।’’
‘‘अच्छा!’’ शिवा ने उसका गर्व से भरा चेहरा देखा—‘‘पर गुरू बनाने की जरूरत क्यों पड़ी?’’
‘‘गुरु तो ज़रूर बनाने चाहिए स्टुपिड... गुरु बिन ज्ञान नहीं रे’’ वह उसको अजीब नज़रों से देखने लगी, मानो गुरू न बनाकर शिवा ने कोई बड़ी भूल कर दी हो।
शिवा अब ख़ुद में आए परिवर्तन से हैरान थी, घर में उसका मन नहीं लगता, पहले खाली समय में साहित्य पढ़ती, अब वह छूटने लगा—कुछ नहीं मिल रहा इन पुस्तकों में। वह दिव्या के आध्यात्मिक शब्दों में घिरने लगी—‘‘संभाला सुना है शिवा...?’’
‘‘नहीं.. वो क्या होता है...?’’ शिवा बेवकूफ़-सी उसे टुकर-टुकर देखने लगी—सचमुच मैं कितना कम जानती हूँ!’’
‘‘संभाला हिमालय में सूक्ष्म शरीरधारी ऋशि देवदूतो की दुनिया...गुरूदेव भी गए थे वहाँ।’’ ‘‘हिमालय में...?’’ बर्फ़ से ढके पहाड़ों के बीच!’’ वह चकित थी—माइनस डिग्री में कोई कैसे जा सकता है? ‘‘बर्फ़ के बीच ही है, हर कोई नहीं जा सकता, सिर्फ़ योगी जा सकते हैं, सूक्ष्म शरीर से भी गए’’ गुरुदेव और दिव्या ने फिर ऐसी कहानी सुनाई कि शिवा के रोंगटे खड़े होने के बावजूद रुचि बढ़ने ही लगी।
‘‘आज मैं बाहर जा रही हूँ, मम्मी आएगी तो बता देना।’’ वो मुस्कराई— ‘‘देर से आऊँगी तो चिंकू को मम्मी रख लेगी।’’ वह एकदम नया ख़ूबसूरत गुलाबी कुर्ता प्लाजो पहन अफ़सरा जैसे किसी दूसरी दुनिया की वाशिंदा हो...
दोपहर में माँ आई ताला देखकर पूछा तो शिवा ने बता दिया। माँ के चेहरे पर हवाईयाँ उड़ने लगी— ‘‘कितनी देर हुई पुत्तर?’’
‘‘यही आधा घँटा...’’
‘‘ओह! अब तो पहुँच ही चुकी होगी दूर...’’ वह बुदबुदाई जैसे ख़ुद से... ’’अब क्या करूँ?’’
’’पर हुआ क्या माँजी? आप घबरा क्यों रही हैं, दिव्या कोई छोटी बच्ची तो है नहीं..’’
रात को दिव्या वापस नहीं आई, माँ की बेचैनी बढ़ती जा रही थी। माँ का घर भी कॉलोनी में ही था, इसलिए वो दिन में कई चक्कर लगा लेती थी, शाम होते ही पाँच साल का चिंकू रोने लगा— ‘‘मम्मा क्यों नहीं आ रही नानी...?’’
नानी किसी तरह उसे बहला रही थी, कभी चिप्स, चाकलेट, कभी कथा सुनाकर, कभी खिलौनों से, पर बच्चा व्याकुल रहा।
‘‘अपना बच्चा होता तो...दिल दुखता...’’ माँ बुदबुदा रही थी, तभी भाई आ गया— ‘‘लौटी नहीं अभी...?’’
माँ का चेहरा कंपकंपाने लगा, गोरे चेहरे पर ख़ौफ़ भरता देख शिवा भी डरने लगी।
‘‘मैं उसे गोली मार दूँगा...’’ भाई फनफनाता चला गया, तो माँ ने रब का शुक्रिया करने के लिए हाथ जोड़े, कुछ देर इंतज़ार करने के बाद माँ चिंकू को अपने साथ ले गई।
रात को अचानक बादल घिर आए, तूफ़ान आने लगा, शिवा को भी चिंता होने लगी, पर उसने पति पर ज़ाहिर नहीं होने दिया।
सुबह आई वह... उजली... निखरी बहुत ख़ुश... किसी बात का कोई ख़ौफ़ नहीं। भीतर ही सुख के घूँट को भरती, बच्चे के बारे में नहीं पूछा, ‘‘तुम्हारी माँ और भाई आए थे दिव्या...तुम रात भर कहाँ रही...वे चिंतित थे...भाई ग़ुस्से में था।’’ शिवा ने पूछा तो वह हँसने लगी—बास्टर्ड हैं वे, मेरी मम्मी तो एकदम कमीनी...यू नो बेटी का सुख बर्दाश्त नहीं है इन्हें...’’
शिवा चकित हिरणी-सी उसमें खिले ख़ूबसूरत गुलाबी चेहरे को दहकते हुए देख कर सोचती रह गई— ‘‘कौन-सा सुख?’’
‘‘आओ तुम्हें बढ़िया स्पेशल कॉफी पिलाती हूँ शिवा’’ वो किचन में चली, शिवा लौट आई तो उसने आवाज़ दी— ‘‘आओ न डियर...’’ गुरूदेव के पास गई थी शिवा, महीनों बाद मिले, उन्होंने एक साधना के बारे में बताया और मंत्र दिया, फिर तूफान आ गया!’’
‘‘कहाँ रहते हैं तुम्हारे गुरूदेव...?’’
‘‘यहीं इसी शहर में तपोवन के पास...कभी ले जाऊँगी तुम्हें... तुम्हारे सारे प्रारब्ध से मिलने वाले दुखों का निवारण कर देंगे गुरुदेव...साक्षात शिव हैं वे...’’ उसने कॉफी का घूँट भरा- पिओ... ‘‘अच्छी बनी है न?’’ शिवा को कॉफी का स्वाद बहुत अच्छा लगा।
शिवा को गोया नशा तारी होने लगा, उसे दिव्या किसी और दुनिया दिखाई देने लगी— देवकन्या-सी। वह कभी गले में सर्प लिपटाए सुर्दशन पुरुष को देखती, कभी दिव्या का गुलाब का खिला चेहरा...
‘‘रात भर कौन-सी साधना करवाई इन्होनें?’’ उसने तस्वीर की तरफ़ इशारा किया।
वह हँसी मीठी हँसी—‘‘तुम नहीं समझोगी... इन्हें समझना आसान थोड़े न है...’’ वह फिर दृश्य में खो गई।
कुछ देर तक शिवा उसका दमकता चेहरा बंद आँखों से देखती रही—‘‘दिव्या!’’ उसने छुआ उसको।
वह चौंकी— आँ...हाँ...कितना स्पिरिचुल सीन था।
‘‘कहाँ?’’
‘‘गुरूदेव के रूम में...’’ उसने सुख का घूँट भरा—शिवालिंग के पास साधना में रत गुरूदेव आँखें बंद चेहरे पर असीम शांति।
‘‘गुरूदेव! मैंने चीन्हा उनका मौन— ‘‘मेरे लिए क्या आज्ञा है?’’
गुरूदेव के गले से सर्प उतर कर कुडली मार कर किनारे बैठ गया!
‘‘उमा... तुम तो मेरे साथ कैलाश में नृत्य कर रही हो, इतना भी नहीं जानती कि तुम पार्वती की चेतना हो...जाओ सामने पंलग पर रेस्ट करो।’’
‘‘फिर?’’ शिवा को कहानी में रस आने लगा। फिर मेरी आँख लगी और एक अदभुत ख़ुशबू में तैरने लगी मैं... उसके भीतर से सुख की गागर छलक-छलक गिरने लगी। उसके बाद मदहोशी में मैं... स्वर्ग के महल में गुरुदेव की आत्मा में घुलने लगी...
‘‘दिव्या! आ गई तू...अरे! मर जाणी कुत्ती तेरा भाई आया था’’ माँ हताश, आवेश में खडे़-खडे़ थर-थर काँपने लगी— ‘‘पीछा छोड़ दे कुत्ती...वो गुरु हैं...’’
दिव्या की देह सुख से लरज रही थी, वह उठी, माँ की बाँह पकड़ कर पलंग पर बिठाया— ‘‘मम्मी आपको क्या हो गया? समझ क्यों नहीं लेती, गुरुदेव कहते हैं कि तुम पार्वती की चेतना हो... ’’ वह मदहोश पलंग पर औंधी लेट गई।
माँ किसी तरह अपने आवेश पर काबू पाए थी— ‘‘तेरे बच्चे को कौन देखेगा, मरजाणी... ये क्यों नहीं समझती कि उनका भी परिवार है।’’
दिव्या ने खिड़की से सुना—देबांशु ने पार्सल भेजा है, कितना चाहता है तुझे, 50 हज़ार भी भेजे हैं।
‘‘नहीं चाहिए... ’’ वह चिल्लाई। ‘‘ओऽ मूर्ख देख ये कपड़े कितने सोणे प्यार करदा तुझे देबू...’’ माँ ने समझाना चाहा।
‘‘मम्मी ओऽ मम्मी! कितनी बार कहा कि मुझे देबू का गिफ़्ट लाना पंसद नहीं’’ वह फिर चिल्लाई।
‘‘अच्छा! जीना तो उसी के पैसों पर है, अगर वो महिना पैसे न भेजे तो कैसे तड़फड़ाती है कुत्ती!’’ माँ का आवेश फिर जागा—ले संभाल ले कपडे़ माँ बाथरूम गई, तभी दियासलाई से एक तीली निकली झर्रर कपड़ों पर लगी। पल भर में कपड़े आँगन में धू-धू जलने लगे! माँ बाहर आई— ‘‘ओऽ रब्बा इस कुत्ती ने क्या कर दिया।’’ माँ ने कपड़ों को बचाने के लिए आग में हाथ डाला तो हाथ जल गए। दिव्या हा हा हॅंसती रही—‘‘देखा मम्मी कहा था मैंने...?’’
माँ माथे पर हाथ मारकर भरभरा कर रोने लगी। शिवा को नींद की झपकी लगी थी कि करुण रुलाई से उसका हृदय द्रवित हो गया, लपक-झपक बाहर आई, ख़ौफ़नाक मंजर देख ख़ौफ़ खा गई—‘‘ये औरत है या डायन?’’
दिव्या हा हा हँसने लगी—‘‘मैं जोगन हूँ सखी, मेरी माँ समझती नहीं... अपने गुरु की जोगन हूँ, मैं... मुझे इन कपड़ों की क्या ज़रूरत...? वह भी पराए मर्द से...?’’ वह शिवा से प्रश्न करने लगी। शिवा की समझ में कुछ न आया, वह टुकर-टुकर उस बूढ़ी औरत को देखने लगी जिसकी आँखों से धार-धार बूँदें बरस रही थी, जो दीवार पर अड़सी जाने क्या बड़बड़ा रही थी। शिवा ने उसे उठाया, पानी पिलाया और बाँह पकड़ कर अपने कमरे में ले आई। बूढ़ी स्त्री शिवा के आगे शुर्तुमुर्ग में तब्दील हुई जा रही थी। शिवा चाय बनाकर ले आई, उनके आँसू पोंछे, हुलिया दुरस्त करने लगी—‘‘ये सब क्या माता जी...?’’
जवाब में बूढ़ी स्त्री ने फिर जोर से माथा फोड़ा। अकेला वारिस कर्नल चोपड़ा का लम्बा चौड़ा देबू... दिल्ली पॉश कॉलोनी में बड़ी कोठी, नामी कम्पनी का मैनेजर पंसद आया और हो गया विवाह...
पहली रात यों ही साँय-साँय हवा के साथ चली गई।
दूसरी रात... वो सो गया।
तीसरी रात दुल्हन का मन घुटने लगा, जाकर पूछा—सोने के लिए विवाह किया देबाशु...?
वो अकबक-हकबक उसे देखता—‘‘सॉरी डार्लिंग’’ उफ़! वह कयामत की रात दिव्या ने चर्र अपनी मलमल कुर्ती फाड़ दी। अगले दिन बूढ़ी स्त्री के पास आकर उसे झिंझोड़ते हुए बिलख-बिलख रोने लगी। बूढ़ी स्त्री स्तब्ध रह गई।
कहीं से कोई रास्ता नज़र नहीं आया। चारों तरफ़ घना अँधेरा। आगे का किवाड़ बंद। समझ नहीं आया, क्या करें। बूढ़ी स्त्री पति को लेकर गई... जवाब मिला—हमें पता थोड़े ही था...
देबाशु ने समस्या का समाधान खोजा—‘‘दिव्या अपने घर रहेगी, मैं हर माह पर्याप्त रक़म भेजता रहूँगा, पर मुझे टार्चर न किया जाए।’’
दिव्या का समय काटे न कटता, स्कूल में पढ़ाने लगी। इसी बीच पता चला कि हिमालय से कोई पहुँचे हुए योगी सिद्धि लेकर तपोवन में आश्रम बनाए हैं। उन्हें भूत-भविष्य का ज्ञान है। पहुँचे हुए साधक हैं। दोनों माँ बेटी शरण में पहुँची। पहुँचे हुए योगी ने सलाह दी कि ‘‘बच्चा एडाप्ट कर लो बालिके...’’
इस तरह ज़िंदगी जरा पटरी पर आने लगी तो बूढ़ी स्त्री रोड़ा बन गई। ‘‘मम्मी तू नर्क में जाऽ...’’ दिव्या बड़बड़ाती— ‘‘कोई रास्ता नहीं बचाया... कैसे जिऊँ अब...?’’
बूढ़ी स्त्री हलकान-परेशान। दिन भर में एक घर से दूसरे घर डुलती चीख़ती-चिल्लाती— ‘‘हाँ मेरा ही बोया बीज है... तो काटने दो फसल भी मुझी को कमबख़्तों!’’
बेटे की आँखें कपाल पर चढ़ी रहती, बहन की गरदन मरोड़ दे या योगी को गोली मार दे।
माँ आवेशित—‘‘योगी को क्यों मारोगे पुत्तर जी, वो तो नहीं आते तुम्हारे घर...वो तो नहीं बुलाते तुम्हारी आवारा बहन को, जो करना है इसी का करना है...’’ बूढ़ी स्त्री कभी सहज होकर पूछती—‘‘दिव्या पुत्तर तुम्हारी शादी कर देते हैं। चिंकू को मैं बड़ा कर दूँगी।’’
पुत्तर चिल्लाती— ‘‘ख़बरदार! मम्मी जो मुझे किसी पुरुष के साथ जोड़ा... मैं गुरु की आत्मा में हूँ। वे मेरी आत्मा में घुले हैं... वे हर पल देख रहे हैं मुझे...हमारे बीच टैलीपैथी में बातें होती हैं... देखो मम्मी वे कह रहे हैं कि बालिके! तुमने किस स्त्री की कोख से जन्म लिया... जो तुम्हारा जरा सा सुख बर्दाश्त नहीं कर सकती!’’ बूढ़ी स्त्री फिर माथा फोड़ने लगती— ‘‘मर जाती कुत्ती! नर्क में पड़ेगी, क्यों बरबाद कर रही उनका घर...?’’
बूढ़ी स्त्री के शब्द और स्वर हवा में अटके रहे, दिव्या कुछ दिन बाद फिर तपोवन के वरद आश्रम में—‘‘मैं आ गई गुरुदेव...’’
‘‘तुम फिर आ गई! क्यों? अरे! कांछा दरबान तुमने इन्हें आने दिया! अभी हमने हवन भी नहीं किया।’’ योगी ने नंगे बदन पर शाल डाली और बाहर निकले—‘‘मेरी अनुमति के बिना कैसे अंदर आ गई मैंडम?’’
काँछा थर-थर काँपने लगा—‘‘साहब.... मानी ही नहीं मैडम... बोली गुरुदेव ने बुलाया है... टैलीपैथी से बात हुई है... ’’
गुरुदेव दिव्या की उपेक्षा करते हुए हवन करने लगे, दिव्या भी हवन कुंड के पास बैठ गई—‘‘हम भी आहुति देंगे आपके साथ... ’’
योगी ने हवन किया उसे प्रसाद दिया, कॉफी मंगाई और एक मंत्र दिया—‘‘इसे जप लो... शांति मिलेगी।’’ फिर प्रयायाम बताए और बच्चे के लिए मेवे और फल दिए। सम्मान से विदा कर दिया।
दिव्या ने माँ को दिखाई गुरुदेव की दी हुई सौगात और मंत्र भी। बूढ़ी स्त्री की छाती में ठंडक हुई— ‘‘मंत्र जपो जैसे बताया है गुरुदेव ने... ’’
‘‘मंत्र ऐसा वैसा नहीं मम्मी, बीजमंत्र है, मेरी आत्मा में ठिठका... मन ही मन जपना है, किसी को नहीं बताना।’’ वह सुख से लबरेज मनपसंद व्यंजन बनाकर छकती, सोती और अकेले में बुदबुदाती, हँसती, रूठती, कभी सिसकियाँ भरती... शिवा कौतुहल से देखती। वह कहती—‘‘तू नहीं समझेगी शिवा...योगी हैं, हम दोनों की टैलीपैथी से सारी बातें होती हैं। संभाला में क्या चल रहा है बताते हैं गुरुदेव... ’’ आने वाला समय तूफ़ान लाने वाला है... ‘‘वह उड़ते बादल की ऐक्टिंग करती—इतना बड़ा तूफ़ान कि...वह कंपकंपाने लगती—पता नहीं क्या होगा....? धरती पर दूसरे ग्रह से विचित्र आत्माएँ घुस आई हैं... ये उत्पात मचा देंगी...’’
पता नहीं शिवा मूर्ख थी, महामूर्ख या उसने शिवा को कोई जादू की पुड़िया खिला दी थी, शिवा उस पर यक़ीन करने लगी।
बूढ़ी स्त्री कहती इसका दिमाग़ फिर गया है, वह जितना रोकती वो हवा की मानिंद उसके पास उड़ती जाती—‘‘शिवा देख एक तू ही समझती है मुझे...मेरा यकीन करो... मेरा जिस्म ही यहाँ है, आत्मा गुरुदेव के पास है। गुरुद्वारा स्वर्ग का द्वार है दोस्त...मेरी माँ को समझा यार!’’
वह शाम को जाती जब अँधेरा रोशनी की परत हटाकर अपना एकछत्र साम्राज्य फैलना को लपकता।
टिम-टिम घरों की देहरी में दीपक जलते, शहर रोशनी में जगमगाने को अकुलाता, आकाश में टिम-टिम तारे टिमकने को होते लोग बाहर से भीतर लपकते, वो भीतर के बाहर लपकती। बच्चा खेल-कूद कर घर आता। माँ नदारत। वह हताश नानी के पास दौड़ता। नानी छाती में दुबका देती उसे। बच्चा पूछता— ‘‘मम्मी कहाँ गई है नानी?’’ नानी क्या जवाब दे, खौलता हुआ लावा छाती में लेकर बच्चे को भींचती, मन में बुदबुदाती— ‘‘मरजाणी बच्चे की भी फ़िक्र नहीं कोख से पैदा किया होता तो चिंता होती न...’’ बूढ़ी स्त्री फ़ोन मिलाती रही पर...
आधी रात में आई वह... बदहवाश... माथे पर ज़ख़्म, पीठ झुकी, बाल बिखरे, कपड़े अस्त-व्यस्त कराहती पीड़ा को दबाती—‘‘मम्मी! दरवाज़ा खोलो...’’ उस रात बूढ़ी स्त्री उसी के कमरे में बच्चे को छाती में दुबकाये रब से गुहार लगाते सो गई थी। नींद तो उड़ पर झपकी जैसे लगा सपना देख रही... बुरा सपना ख़ौफ़ में जागी दरवाज़ें पर कराहने का स्वर। घबराई बूढ़ी स्त्री—‘‘कौन रो रहा इस वक्त...?’’ डरी...डरी...किवाड़ खोला... गठरी देखी देहरी पर...सनाका खा गई... हिलाया, डुलाया, वह अचेत हो गई थी तब तक...बॉंह पकड़ घसीटते हुए भीतर लाई, हालत देख काँप उठी—‘‘हे रब्बा! ये हालत किसने बनाई?’’ पानी के छींटे दिए...उसने आँख खोली... आँखे भी सूजी—‘‘मम्मीऽ...’’ वह लिपट गई बूढ़ी स्त्री पर...
शिवा पति को घोर नींद में पाकर चुपके से उठी, दरवाज़ा भिड़ा दिया पीछे के किवाड़ पर... बूढ़ी स्त्री ने दरवाज़ा खोला, मोमबत्ती जलाई, ज़्यादा रोशनी में सच और भी ख़ौफ़नाक दिखता है—‘‘देखा पुत्तर... मना किया था न कि छोड़ दे जिद...’’
शिवा हालत देखकर काँप उठी—‘‘किसने किया...?’’
‘‘इसके कर्मों ने...कोई क्यों करेगा पुत्तर?’’ बूढ़ी स्त्री ने आँखें मिचमिचाई, भीतर से कच्ची, कोख जाई के दुख से गले तक भरी...बाहर से हिम्मत बटोरती, दोशी को बक्षने की कला में प्रवीण— ‘‘इतनी रात में कुछ भी हो सकता था पुत्तर, ये तो दुर्घटना ही थी, गाड़ी पिचका कर चली जाती! शुक्र है बच गई मरजाणी...’’ बूढ़ी स्त्री का बदहवाश झुर्रियों भरा चेहरा देख शिवा ने उसके दोनों हाथ थाम लिए— ‘‘अभी इसके ज़ख़्मों पर दवा लगाते हैं।’’ वह फटे कपड़े बदलने को हुई, जिस्म पर हाथ लगते ही कराह उठी— ‘‘ओऽ मम्मी!’’
शिवा ने उसकी रसोई में दूध हल्दी गरम किया, उसे पिलाने लगी, उसने आधी आँखें खोली— ‘‘भूख लगी है...’’ शिवा ने देखा रसोई में कुछ नहीं था। बूढ़ी स्त्री क्या बनाती, बिस्कुट, ब्रैड, दूध, दवा पीकर ऐसी सी किसी घटना का इंतज़ार कर रही थी—‘‘यह तो होना ही था...’’
शिवा पलंग पर लेटी तो पति ने बाँहो में थाम लिया— ‘‘शिवा...तू भी चली जा...अपना भविष्य पूछने उस तांत्रिक के पास...’’, ‘‘शिवा घबरा गई। जिस आदमी को वह नींद में सोचकर दरवाजा भिड़ा गई थी, उसे तो सब पता है। बेहद चौकन्नी होकर वह छिटक गई— ‘‘अनाप-शनाप ही कहोगे...!’’
पति ने कहा—‘‘कहा था न कि मत बसा नागिन कोऽ...’’ शिवा बेहद डर गई— ‘‘ठीक है, खाली करने को कह देती हूँ...’’
अगले दिन वह हाल पूछने गई, बूढ़ी स्त्री सौदा लेने गई थी। शिवा ने उसके सिर पर हाथ रखा, तवे की तरह गरम था— ‘‘तुझे बुखार है? कल क्या हुआ था?’’ वह बिलखने लगी— ‘‘पता नहीं क्या हुआ, औघड़ को भांग का नशा चढ़ता है, मुझे देखकर बोले क्यों आती हो बार-बार...? हाथ में चिलम थी, मैंने कहा, मुझे भी एक कश मार लेने दो, गुरुदेव... देखूँ कितना आनंद आता है... ’’
शाला जोगी उखड़ गया हत्थे से, बोला—‘‘आनंद जितना मिला है, उसी में सब्र कर...यहाँ लोग आते हैं... मेरे पवित्र माथे पर काला टीका मत लगा... तुझे सुख से भर दिया है...अब अपने बच्चे को पाल-पोस, पढ़ा-लिखा और षिक्षा का भी सदुपयोग कर स्कूल में लगा रखा है। बच्चों को पढ़ा, उन्हीं में अपना सुख तलाश...’’
‘‘मैं आपके बिना नहीं रह सकती गुरुदेव, मैं उनके चरणों में गिर पड़ी, पर गुरुदेव ने नाग की तरह केंचुली उतार ली...बोले— ‘‘अब भाग यहाँ से...’’ चिमटा उठा लिया! मुझे बाहर किया! मैं गिड़गिड़ाई— ‘‘रात में कहाँ जाऊँ?’’ वे डंडा लेकर मुझे खींचकर ले आए, गाड़ी में बिठाया। मैं जार-जार बदहवाश रो रही थी, उन्होंने राजपुर रोड़ पर उतार दिया। मैंने पाँव पकड़े, फिर वह मेरी पीठ पर डंडे मारने लगे।
अघोड़ी ने मुझे सड़क पर मारा! सड़क सुनसान थी, फिर एक ऑटो आया, उसे रोका और मुझे घसीट कर बिठा दिया! वह हँसी— ‘‘अघोरी ऐसे ही होते हैं शिवा... फिर कुछ दिन बाद ख़ुद ही बुलाएँगे...’’ हा-हा-हा ‘‘उफ!’’ शिवा के रोंगटे खड़े हो गए, वह कहना चाहती थी कि दूसरा घर देख लो दिव्या...मेरे पति दबाव डाल रहे मुझ पर, पर कह नहीं पाई।
कुछ दिन वह सोती ही रही, बूढ़ी स्त्री उसकी तीमारदारी में लगी रहती। फिर एक दोपहर देबांशु आया, उसने दरवाज़ा नहीं खोला, वह बाहर ही बैठा रहा, जब बूढ़ी स्त्री आई तो दरवाज़ा खुला, दिव्या की नींद खुली, वह चीत्कार करने लगी। देबांशु चैक पकड़ा कर लौट गया। कुछ दिन बाद शिवा को कहना ही पड़ा पर वह समझी नहीं, बूढ़ी स्त्री को समझाया, वह विवश, कौन देगा कमरा? पर कॉलोनी में ही मिल गया तो शिवा ने चैने की साँस ली, पर इस बीच शिवा का किशोर बच्चा घर छोड़कर चला गया। उस दिन पति के ऑफिस जाने के बाद दिव्या ने उसे गाजर का हलवा बहुत प्यार से खिलाया था। पता नहीं हलवे में क्या मिला दिया कि अच्छे-भले बच्चे की बुद्धि का हरण हो गया!
शिवा का परिवार बिखरने लगा...अब उसे शक होने लगा। तांत्रिक से राख की पुड़िया लाती एक शाम उसकी रसोई में देखा...दिव्या कॉफी में राख की पुड़िया डाल रही थी। वह ओट में हो गई, दिव्या उसे आवाज देती आँगन में आई थी— ‘‘शिवा... आओ कॉफी पीते हैं...’’
शिवा बाहर निकली, दिव्या ने उसका हाथ पकड़ कर भीतर लाकर पलंग पर बिठा दिया— ‘‘शिवा मुझे तुम्हारा साथ छोड़ना अच्छा नहीं लग रहा, तुम अपने पति को समझाओ एक दुखियारी को अपनी पनाह में रहने दो...’’ वह टलबल-टलबल मोटे-मोटे आँसू बहाने लगी— ‘‘लोऽ कॉफी पिओऽ’’ आँसू पोंछते हुए वह बोली थी। तभी उसकी भाभी आ गई थी। शिवा ने कॉफी मग उसे पकड़ा दिया। भाभी ननद के कारनाओं से व्यथित सास के आदेश से घर संभालने आई थी। शिवा पूछना चाहती थी भाभी से बहुत कुछ, पर वह दहशत से काम में ही लगी रही। मौका मिलते ही पल भर फुसफुसाते हुए बोली थी— ‘‘दीदी हमारा घर भी तहस-नहस कर रही हैं...ये बहुत ग़ुस्से में हैं... मैं इनको किसी तरह शांत करके आई हूँ। माता जी बीमार हैं...’’
योगी के बिछोह में दिव्या रेत में मछली-सी तड़फड़ाने लगी, उसकी हालत बद से बदत्तर होती गई। अब उसको कमरा बदलना था तो वह शिवा को देखकर हँसती— ‘‘तूने अच्छा नहीं किया, शिवा.... मैं तेरी दोस्ती का दम भरती थी, तूने भी दगा दे दिया! मेरा शाप लगेगा...’’ जहरीली हँसी उसके चेहरे को विकृत बना देती, कहीं से उसे सुकून नहीं था। योगी हिमालय पर चले गए थे या भूमिगत हो गए थे। वह उनके अहसासों को जीती-हँसती-रोती— ‘‘चला गया धोखेबाज योगी...’’ फिर अगले ही क्षण—‘‘अब उनकी साधना चरम पर है, मेरे गुरु एक महान योगी हैं। संसार का भला करने धरती पर आए हैं...मुझे वेट करना होगा...’’ वह बड़बड़ाती। भाभी उसकी सेवा में हलकान...भाई जब मौका मिलता ग़ुस्से से भरा आता और उसे थप्पड़ मारकर योगी को भद्दी-भद्दी गाली देकर चैन पाता...
कुछ दिनों बाद दूसरे घर से भी निकाल दिया उसे, शिवा कमरा देखने गई, दीवार पर तांत्रिक की पेंटिंग, ख़तरा, सर्प, रेत में जड़फती मछली और जाल फेंकता मछुवारा, कहीं शिव-शक्ति की अर्धनग्न पेंटिंग, कहीं एक-दूसरे पर लिपटे नाग-नागिन।
- रचनाकार : कुसुम भट्ट
- प्रकाशन : हिन्दवी के लिए लेखक द्वारा चयनित
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