Font by Mehr Nastaliq Web

अपराधी बकरी

apradhi bakri

तेनालीराम

तेनालीराम

अपराधी बकरी

तेनालीराम

और अधिकतेनालीराम

    एक बार महाराज कृष्णदेव राय ने अपनी कश्मीर यात्रा के दौरान सुनहरी फूलवाला एक पौधा देखा। वह फूल उन्हें इतना पसंद आया कि लौटते समय उसका एक पौधा वह अपने बग़ीचे के लिए भी ले आए।

    विजय नगर वापस आकर उन्होंने माली को बुलाया और सुनहरे फूल वाला पौधा उसे सौंपकर बोले—“इसे बग़ीचे में हमारे शयन कक्ष की खिड़की के ठीक सामने रोप दो। ध्यान रहे, इसकी देखभाल तुम्हें अपनी जान की भाँति करनी है। यदि पौधा नष्ट हुआ तो तुम भी अपने जीवन से हाथ धो बैठोगे।

    माली पौधा लेकर चला गया। फिर बड़ी ही सावधानी से उसने वह पौधा निश्चित स्थान पर रोप दिया। वह उसकी देखभाल भी बड़े मन से करता। नियमपूर्वक सींचता। महाराज कृष्णदेव भी सुबह-शाम उसे अपनी खिड़की से देखते। वे माली की मेहनत से संतुष्ट थे।

    महाराज को तो उस पौधे से इतना लगाव हो गया था कि यदि किसी दिन उसे देखे बिना वह दरबार मैं चले जाते तो उस दिन उनका मन उखड़ा-उखड़ सा रहता। राजकाज के किसी भी कार्य में जैसे उनका मन ही नहीं लगता। एक दिन महाराज सोकर उठे और आदत के अनुसार उन्होंने खिड़की खोली तो यह देखकर स्तब्ध रह गए कि पौधा अपने स्थान पर नहीं था। वह परेशान हो उठे। उन्होंने फ़ौरन माली को तलब किया। भय से थर-थर काँपता माली उनके सामने गया।

    “पौधा कहाँ है?” महाराज ने गरजकर पूछा। “म-महाराज! उसे तो मेरी बकरी चर गई।” महाराज के क्रोध का ठिकाना रहा। उनकी आँखें सुर्ख़ हो गईं और आवेश में आकर उन्होंने माली को प्राण दंड दे दिया। सैनिकों ने माली को तुरंत बंदी बना लिया।

    “मूर्ख—लापरवाह हमने कहा था कि उस पौधे की अपनी जान से भी अधिक हिफ़ाज़त करना ऐसी हिफ़ाज़त की है—ले जाओ इसे हमारी नज़रों के सामने से।” सैनिक उसे लेकर कारागार की ओर चल दिए। थोड़ा दिन चढ़ते ही यह ख़बर पूरे राज्य में फैल गई कि राजमाली को मृत्युदंड दे दिया गया है।

    यह ख़बर माली की पत्नी तक भी पहुँची तो वह रोते-रोते राजदरबार में आई। किंतु महाराज उस समय तक भी क्रोध में भरे बैठे थे, उन्होंने उसकी फ़रियाद सुनने से इंकार कर दिया। अब वह अबला क्या करे? किसी ने उसे तेनालीराम से मिलने की सलाह दी : “तुम तुरंत तेनालीराम के पास जाओ—यदि वे चाहेंगे तो तुम्हारे पति का बाल भी बाँका नहीं होगा।

    माली की पत्नी रोती-कलपती तेनालीराम के घर चल दी। वहाँ पहुँचकर उसने उन्हें सारी बात बताकर अपने पति के प्राणों की भीख माँगी। तेनालीराम ने सांत्वना दी, फिर समझा-बुझाकर घर भेज दिया। अगले दिन सुबह-सुबह हम्फी में एक और हंगामा हुआ।

    माली की पत्नी बकरी को मज़बूत रस्सी से बाँधे नगर के हर चौराहे पर जाती-खूँटा गाड़कर उसे उससे बाँधती, फिर हाथ में डंडा लेकर निर्दयता से उसकी पिटाई करती। बकरी अंतर्नाद करती, इधर-उधर कूदती-फाँदती। मगर मालिन का डंडा रुकता।

    विजय नगर में पशुओं के प्रति निर्दयी व्यवहार पर प्रतिबंध था। लोग मालिन को रोकते कि वे ऐसा करे, मगर वह किसी की सुनती। वह तो जैसे पागल हो गई थी। उधर पिट-पिटकर बकरी भी अधमरी हो गई थी। उसके पाँवों में खड़े रहने की भी शक्ति शेष बची थी।

    कुछ लोगों ने बकरी की हालत से द्रवित होकर इसकी सूचना नगर कोतवाल को दे दी। कोतवाल सिपाहियों के साथ आया और बकरी सहित मालिन को पकड़कर ले गया। कोतवाल जानता था कि यह मसला माली के मृत्युदंड से जुड़ा है। अतः उसने मामले को राजदरबार में पेश करना ही उचित समझा।

    महाराज ने मालिन से पूछा : “क्यों तुमने इस बेजुबान को इतनी बेरहमी से पीटा। अन्नदाता! जिस बकरी के कारण मैं विधवा होने वाली हूँ—जिसके कारण मेरे बच्चे अनाथ होने वाले हैं—जिसने मेरे भरे-पूरे घर को उजाड़कर रख दिया हो, आप ही बताएँ कि उस जीव के साथ मैं कैसा व्यवहार करूँ।

    “क्या मतलब?” उलझनपूर्ण लहज़े में महाराज ने पूछा : “इस निरीह पशु के कारण तुम विधवा हो रही हो। तुम्हारे बच्चे अनाथ हो रहे हैं—यह बात कुछ समझ में नहीं आई विस्तार से बताओ।” “महाराज! माली की पत्नी हाथ जोड़कर बोली : “क्षमा करें, यह वही बकरी है जिसने आपका सुनहरी फूल वाला पौधा खाया है : अपराध इसने किया है, मगर सजा मेरे पति को मिल रही है—फूल इसने खाया और घर मेरा उजड़ रहा है।

    माँग मेरी सूनी हो रही है : अब आप ही बताएँ कि आप जैसे न्यायशील राजा के राज्य में कोई इतना भयंकर अपराध करके भी सजा से बचा रहे, क्या यह उचित है : आख़िर इसे इसके अपराध का दंड मिलना चाहिए कि नहीं?

    “ओह-ओह!” महाराज उसकी बात सुनकर सब कुछ समझ गए। मगर उनके चेहरे पर यह सोचकर आश्चर्य के चिह्न उभर आए कि एक मामूली औरत इतनी बड़ी और सूझ-बूझ वाली बात कर रही है। 'नहीं, इसके पीछे अवश्य ही किसी और का दिमाग़ है।'

    “हम तुम्हारे पति का दंड माफ़ करते हैं, किंतु सच-सच बताओं कि यह सारा नाटक तुमने किसके कहने पर किया है?” “जी, तेनालीराम जी के।” “ओह तेनालीराम—तुम बड़े अजीब-अजीब तरीक़े अपनाकर हमारा ध्यान हमारे ग़लत निर्णयों की ओर आकर्षित करते हो। महाराज ने उसी समय तेनालीराम को पाँच सौ स्वर्ण मुद्राएँ पुरस्कार देने का ऐलान किया और उस निर्दोष माली की फाँसी की सज़ा को भी स्थगित कर दिया।

    स्रोत :
    • पुस्तक : चर्चित एवं लोकप्रिय कहानियाँ “तेनालीराम” (पृष्ठ 38)
    • रचनाकार : तेनालीराम
    • प्रकाशन : प्रशांत बुक डिस्ट्रीब्यूटर
    • संस्करण : 2018

    Additional information available

    Click on the INTERESTING button to view additional information associated with this sher.

    OKAY

    About this sher

    Close

    rare Unpublished content

    This ghazal contains ashaar not published in the public domain. These are marked by a red line on the left.

    OKAY