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अपमान का बदला

apman ka badla

तेनालीराम

तेनालीराम

अपमान का बदला

तेनालीराम

और अधिकतेनालीराम

    बात उन दिनों की है जब तेनालीराम का विजय नगर के राजदरबार से कोई लेना-देना नहीं था। उन दिनों वे सोचा करते थे कि किसी प्रकार महाराज तक अपनी पहुँचे बनाई जाए। मगर ये आसान नहीं था। इसी अभिलाषा को लेकर उन्होंने राज-गुरु तक अपनी पहुँचे बनाई और उनकी बहुत सेवा की, मगर राजगुरु भी अपने क़िस्म का अकेला ही घाघ था।

    वह तेनालीराम से अपने सारे काम करवा लेता, मगर राजमहल की बात आती तो टाल जाता। इससे तेनालीराम काफ़ी उखड़ा हुआ था। वह उसकी फ़ितरत समझ गया कि इसने कभी मुझे महाराज तक नहीं पहुँचेने देना है। अतः एक दिन उसने उसे सबक सिखाने का मन बना लिया।

    एक बार राजगुरु नदी पर नहाने गया। किनारे पर जाकर उसने वस्त्र उतारे और पानी में उतर गया। तेनालीराम उसके पीछे-पीछे था। वह वृक्ष की ओट में छिप गया और जैसे ही राजगुरु ने नाक बंद करके पानी में गोता लगाया, वैसे ही उसने उसके कपड़े उठा लिए और जाकर पेड़ के पीछे छिप गया।

    कुछ देर बाद जब राजगुरु नहाकर किनारे की ओर बढ़ा तो अपने कपड़े वहाँ पाकर ठिठक गया। अरे यह कौन है? वह चिल्लाया—“मेरे वस्त्र किसने उठाए हैं? ओह! रामलिंग—मैंने तुम्हें देख लिया है उस वृक्ष के पीछे—अरे भई मज़ाक़ छोड़ी और मेरे वस्त्र दो—देखो, मैं तुम्हें महाराज तक अवश्य पहुँचाऊँगा।”

    तेनालीराम का असली नाम रामलिंग ही था। बाद में अपनी ननिहाल तेनाली में होने के कारण वह तेनालीराम कहलाए क्योंकि बचपन से लेकर जवानी तक का उनका समय अपनी ननिहाल में ही बीता था। “तुम झूठे हो राजगुरु! आज तक तुम मुझे झूठे दिलासे देते रहे हो। वह बाहर गया।

    इस बार मैं पक्का वादा करता हूँ।” “वादा करो कि तुम मुझे कंधे पर बैठाकर इसी समय राजमहल लेकर चलोगे।” “कंधे पर बैठाकर?” राजगुरु क्रोधित हो उठा—तुम पागल तो नहीं हो गए रामलिंग ।” “हाँ, तुम्हारे झूठे आश्वासन पा-पाकर पागल ही हो गया हूँ। बोलो, मेरी शर्त मंज़ूर है तो बोलो, वरना मैं चला अपने रास्ते पर।”

    अरे नहीं-नहीं-मुझे तुम्हारी शर्त मंज़ूर है।” हथियार डालते हुए राजगुरु बोला—“लाओ मेरे वस्त्र दो। तेनालीराम ने उसके वस्त्र दे दिए। राजगुरु ने बाहर आकर जल्दी-जल्दी वस्त्र पहने, फिर उसे अपने कंधों पर बैठाकर महल की ओर चल दिया।

    जब राजगुरुनगर में पहुँचा तो लोग यह विचित्र दृश्य देखकर हैरान रह गए। लड़के सीटियाँ और तालियाँ बजाते उनके पीछे-पीछे चलने लगे। चारों ओर शोर मच गया—“राजगुरु का जुलूस देखो राजगुरु का जुलूस।” राजगुरु अपने आपको ऐसा अपमानित महसूस कर रहा था, जैसे भरे बाज़ार में वह नंगा चला जा रहा हो।

    धीरे-धीरे ये क़ाफ़िला राजमहल के क़रीब पहुँचे गया। महाराज अपने कक्ष में बैठे थे। शोर सुनकर वे बाहर बरामदे में आए फिर बुर्ज में आकर नीचे का नज़ारा देखने लगे। उन्होंने देखा कि राजगुरु एक व्यक्ति को कंधे पर उठाए लिए चले रहे हैं, लज्जा से उनका सिर झुका हुआ है और शरीर पसीने-पसीने हो रहा है। पीछे आते लोग उनका मज़ाक़ उड़ा रहे हैं और कंधे पर बैठा व्यक्ति हँस रहा है।

    राजगुरु का ऐसा अपमान देखकर महाराज को बेहद क्रोध आया। उन्होंने अपने दो अंगरक्षकों को आदेश दिया कि जो व्यक्ति दूसरे के कंधों पर बैठा है, उसे नीचे गिरा दो और मुक्कों लातों से ख़ूब पिटाई करके छोड़ दो। मगर दूसरे व्यक्ति को सम्मान सहित हमारे पास ले आओ।

    राजगुरु तो महाराज को नहीं देख पाया, मगर तेनालीराम ने देख लिया कि उनकी ओर इशारा करके महाराज अपने अंगरक्षकों से कुछ कह रहे हैं। बस तेनालीराम को समझते देर नहीं लगी कि दाल में कुछ काला है। वह झट राजगुरु के कंधे से उतरा और क्षमा माँगने लगा।

    क्षमा-याचना करके उसने राजगुरु को अपने कंधे पर उठा लिया और उनकी जय-जयकार करने लगा। तभी राजा के अंगरक्षक वहाँ आए। उन्होंने तेनालीराम के कंधे से नीचे गिरा लिया और बुरी तरह उनकी पिटाई करने लगे।

    बेचारा राजगुरु पीड़ा अएएर अपमान से चीख़ने लगा। सैनिकों ने उसकी ख़ूब पिटाई की, फिर तेनालीराम से बोले—“आइए, आपको महाराज ने बुलाया है।”

    राजगुरु हैरान था कि यह सब क्या हुआ। अंगरक्षक तेनालीराम को लेकर महाराज के पास पहुँचे तो उसे देखकर महाराज भी बौखलाए—“यह किसे ले आए। हमने कहा था कि ऊपर वाले की पिटाई करें और नीचे वाले को ले आएँ।” “ये नीचे वाले ही हैं महाराज! वो पाजी इनके कंधों पर बैठा था।

    “ओह! इसका मतलब यह व्यक्ति बहुत चालाक है। इसने पहले ही अंदाज़ा लगा लिया था कि क्या हो सकता है। इसे ले जाकर मौत के घाट उतार दो। इसने राजगुरु का अपमान किया है। क्रोधावेग में महाराज बोले जा रहे थे—“और हाँ, इसके ख़ून से सनी तलवार सरदार को दिखा देना।”

    उस समय तक वहाँ कुछ दरबारी भी गए थे। वे ऊपर से तो गंभीर थे, लेकिन मन ही मन में ख़ुश हो रहे थे कि इस युवक ने राजगुरु की अच्छी दुर्गति की। जब सैनिक तेनालीराम को लेकर चले तो कुछ दरबारी ख़ामोशी से उसके पीछे हो लिए। एक स्थान पर जाकर उन्होंने असली कारण पूछा तो उन्हें लगा कि तेनालीराम निर्दोष है।

    उसे किसी प्रकार राजदरबार में लाया जाए ताकि उन्हें राजगुरु और दूसरे बेइमान दरबारियों को सबक सिखाने का अवसर मिले। उन्होंने तेनालीराम से दोनों सैनिकों को दस-दस स्वर्ण मुद्राएँ दिलवा कर और इस वादे के साथ उसे छुड़वा लिया कि वह शहर छोड़कर चला जाएगा।

    सिपाहियों ने तबेले में जाकर एक बकरे को हलाल करके अपनी ख़ून से रंगी तलवारें सरदार को दिखा दीं। तेनालीराम को जहाँ जान बचने की ख़ुशी थी, वहीं बीस स्वर्ण मुद्राओं के जाने का दुख भी था। मगर वह भी इस प्रकार चुप बैठने वाला नहीं था। उसने अपने घर जाकर अपनी माँ और पत्नी को सिखा-पढ़ाकर महल में भेज दिया।

    दोनों सास-बहू महाराज के पास जाकर फूट-फूटकर रोने लगीं। “क्या बात है? तुम कौन हो और यहाँ आकर इस प्रकार क्यों रो रही हो?” “महाराज! एक छोटे से अपराध के, लिए आपने मेरे बेटे रामलिंग को मृत्युदंड दे दिया। उसके इस दुनिया से चले जाने के बाद अब मैं किसके सहारे जीऊँगी कौन होगा मेरे बुढ़ापे का सहारा? कहक़र उसकी माँ सिसक-सिसक कर रोने लगी।

    “और मेरे इन मासूम बच्चों का क्या होगा महाराज—मैं अबला इन बच्चों और इस बूढ़ी सास का पेट कैसे पालूँगी।” महाराज को फ़ौरन अपनी ग़लती का एहसास हुआ कि उस छोटी सी भूल की उसे इतनी बड़ी सज़ा नहीं देनी चाहिए थी। अब हो भी क्या सकता था।

    उन्होंने आज्ञा दी : “इन्हें हर माह दस स्वर्ण मुद्राएँ दी जाएँ जिससे ये अपना बच्चों का पेट पाल सकें।” दस स्वर्ण मुद्राएँ तत्काल? लेकर दोनों सास-बहू घर पहुँचीं और तेनालीराम को पूरी बात बताई। तेनालीराम ख़ूब हसा : “चलो, दस स्वर्ण मुद्राएँ अगले माह मिल जाएँगी—हिसाब बराबर।”

    स्रोत :
    • पुस्तक : चर्चित एवं लोकप्रिय कहानियाँ “तेनालीराम” (पृष्ठ 20)
    • रचनाकार : तेनालीराम
    • प्रकाशन : प्रशांत बुक डिस्ट्रीब्यूटर
    • संस्करण : 2018

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