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अनमोल सुझाव

anmol sujhav

तेनालीराम

तेनालीराम

अनमोल सुझाव

तेनालीराम

और अधिकतेनालीराम

    एक बार महाराज कृष्णदेव के दरबार में दो व्यक्ति आए। उनमें से एक के हाथ में सोने का एक हंस था। आते ही वे बोले—“महाराज! हमारा न्याय करें।” “कैसा न्याय?” महाराज ने चौंककर पूछा—“आख़िर बात क्या है—क्या इस स्वर्ण हंस को लेकर तुम दोनों में कोई झगड़ा है।

    झगड़ा नहीं है महाराज मतभेद है।” एक व्यक्ति, जिसके हाथ में हंस था, बोला—“दरअसल हम दोनों आपस में मित्र हैं। हुआ यह महाराज कि मेरी तंगी की हालत में मेरे इस दोस्त ने मुझे अपने खेत की कुछ ज़मीन जोतने के लिए दी थी। जब एक दिन मैं उसी ज़मीन पर हल चला रहा था, तो मुझे यह स्वर्ण हंस मिला।

    मैं यह हंस लेकर जब अपने इस दोस्त के पास पहुँचा तो यह इसे लेने से इंकार कर रहा है।” “मैं कैसे ले लूँ महाराज! जब मैंने वह ज़मीन अपने मित्र को दी थी तो उसमें से उत्पन्न होने वाली हर चीज़ पर इसी का हक़ है।” “किंतु ज़मीन तो इसकी है महाराज!” “मगर वह ज़मीन मैं इसे दे चुका हूँ।”

    इस प्रकार दोनों अपनी-अपनी बात पर अड़े हुए थे। महाराज भी उनकी सच्चाई से अत्यधिक प्रभावित हुए। उनके समक्ष ऐसा मुक़द्दमा पहली बार आया था जिसमें कोई चोर था और साहूकार। क्या फ़ैसला दें, कुछ समझ पा रहे थे। उन्होंने दरबारियों की ओर देखा—“आप लोग क्या कहते हैं?

    महाराज!” एक दरबारी बोला—“सोने का हंस दो हिस्सों में बाँटकर एक-एक हिस्सा दोनों को दे दिया जाए।” “मूर्ख! जब दोनों में से कोई भी पूरा हंस लेने को राज़ी नहीं है तो आधा कैसे स्वीकार करेंगे।” दरबारी सिटपिटाकर चुप हो गया।

    फिर एक अन्य दरबारी बोला—“महाराज! आप इनसे ही पूछें कि ये क्या चाहते हैं—मेरी राय में तो इस हंस को राजकोष में जमा करा देना चाहिए क्योंकि धरती से निकली संपत्ति पर राजा का अधिकार होता है।” “हम ऐसा ही करते, यदि ये लोग चोरी से इस संपत्ति को अपने पास रख लेते, किंतु इन दोनों में से कोई लालची नहीं है, बल्कि दोनों ही सच्चे और ईमानदार हैं। अतः इस संपत्ति का कुछ ऐसा प्रयोग हो जिससे इन दोनों मित्रों की मित्रता की मिसाल कायम हो जाए।”

    दरबारी अपनी-अपनी राय देते रहे, किसी ने कहा कुएँ खुदवाए जाएँ किसी ने धर्मशाला का सुझाव दिया। किसी ने मंदिर का सुझाव दिया। मगर महाराज को कोई सुझाव पसंद आया। फिर उन्होंने तेनालीराम की ओर देखा, इशारा पाकर तेनालीराम बोले—“महाराज! मेरा निवेदन है कि इस हंस को महाराज जौहरियों से मोल लगवाकर स्वयं ख़रीद लें तथा उस धन से इन दोनों की मित्रता के नाम पर एक 'स्वर्ण हंस उद्यान' का निर्माण हो जिसमें छायादार वृक्ष दुर्लभ फल-फूल वाले पौधे हों : उद्यान में एक शानदार सरोवर हो जिसमें दो सफ़ेद हंस तैर रहे हों महाराज! जब तक स्वर्ण हंस उद्यान क़ायम रहेगा, तब तक इनकी अनोखी मिसाल क़ायम रहेगी

    “वाह—स्वर्ण हंस उद्यान।” महाराज मुस्कुराए—“तेनालीराम! तुम्हारा सुझाव तो वास्तव में ही अच्छा है, हमारा फ़ैसला भी यही है कि क़ीमत के धन से 'स्वर्ण हंस उद्यान' बनाया जाए। तेनालीराम के इस अमूल्य सुझाव का पूरे दरबार ने समर्थन किया और यह पहला अवसर था जब उनसे ईर्ष्या रखने वालों ने भी उनकी जमकर प्रशंसा की।

    स्रोत :
    • पुस्तक : चर्चित एवं लोकप्रिय कहानियाँ “तेनालीराम” (पृष्ठ 81)
    • रचनाकार : तेनालीराम
    • प्रकाशन : प्रशांत बुक डिस्ट्रीब्यूटर
    • संस्करण : 2018

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