पिता

और अधिकधीरेंद्र अस्थाना

    'अपन का क्या है/अपन उड़ जाएँगे अर्चना/धरती को धता बताकर/अपन तो राह लेंगे/पीछे छूट जाएगी/घृणा से भरी और संवेदना से ख़ाली/इस संसार की कहानी'—एयर इंडिया के सभागार में पिन ड्राप साइलेन्स के बीच राहुल बजाज की कविता की पंक्तियाँ एक ऐंद्रजालिक सम्मोहन उपस्थित किए दे रही थीं। अब किसी सभागार में राहुल बजाज की कविता का पाठ शहर के लिए एक दुर्लभ घटना जैसा होता था। प्रबुद्ध जन दूर-दूर के उपनगरों से लोकल, ऑटो, बस टैक्सी या अपनी निजी कार से इस क्षण का गवाह बनने के लिए सहर्ष उपस्थित होते थे। राहुल शहर का मान था। साहित्य के जितने भी भारतीय अवार्ड थे, वे सब के सब राहुल के घर में एक वर्गीले ठाठ के साथ शोभायमान थे। दुनिया भर की प्रसिद्ध किताबों से उसकी स्टडी अँटी पड़ी थी। अख़बार, पत्रिकाओं और टीवी चैनल वाले जब-तब उसका इंटरव्यू लेने के लिए उसके घर की सीढ़ियाँ चढ़ते-उतरते रहते थे। उसके मोबाइल फ़ोन में प्रदेश के सी.एम., होम मिनिस्टर, गवर्नर, कल्चरल सेक्रेटरी, पुलिस कमिश्नर, पेज थ्री की सेलिब्रिटिज और बड़े पत्रकारों के पर्सनल नंबर सेव थे।

    वह यूनिवर्सिटियों में पढ़ाया जा रहा था। असम, दार्जिलिंग, शिमला, नैनीताल, देहरादून, इलाहाबाद, लखनऊ,भोपाल, चंडीगढ़, जोधपुर, जयपुर, पटना और नागपुर में बुलवाया जा रहा था। मुंबई जैसी मायावी नगर में वह टू बेडरूम हॉल के एक सुविधा और सुरुचिसंपन्न फ़्लैट में जीवन बसर कर रहा था। वह मारुति ज़ेन में चलता था। रेमंड तथा ब्लैक बेरी की पैंटे, पार्क एवेन्यू और वेनह्यूजन की शर्ट और रेड टेप के जूते पहनता था। विगत में घटा जो कुछ भी बुरा, बदरंग और कसैला था, उन सबको झाड़-पोंछकर नष्ट कर चुका था। लेकिन चीज़ें इस तरह नष्ट होती हैं क्या! 'अतीत कभी दौड़ता है, हमसे आगे/भविष्य की तरह/कभी पीछे भूत की तरह लग जाता है/हम उल्टे लटके हैं आग के अलाव पर/ आग ही आग है नसों के बिलकुल क़रीब/और उनमें बारूद भरा है।' यह उसके बचपन का एक बहुत ख़ास दोस्त बंधु था जो कॉलेज पहुँचने तक कविताएँ लिखने लगा था। और नक्सली गतिविधियों के मुहाने पर खड़ा रहता था। वह बारूद की तरह फटता इससे पहले ही देहरादून की वादियों में कुछ अज्ञात लोगों द्वारा निर्ममतापूर्वक मार दिया गया।

    राहुल डर गया। इसलिए नहीं कि उसने पहली बार मौत को इतने क़रीब से देखा था। इसलिए कि चौबीस बरस का बंधु बीस साल के राहुल के जीवन की पाठशाला बना हुआ था। यह पाठशाला उजड़ गई थी। उसने गर्दन उठाकर देखा, शहर के तमाम रास्ते निर्जन और डरावने लग रहे थे। एक ख़ूबसूरत शहर में कुछ अभिशप्त प्रेतों ने डेरा डाल दिया था। वह एकदम अकेला था और निहत्था भी। कुछ कच्ची अधपकी कविताएँ, थोड़े-बहुत विद्रोही क़िस्म के विचार, कुछ मौलिक और पवित्र तरह के सपने, एक इंटरमीडिएट पास का सर्टिफिकेट, अहंकारी, तानाशाह, सर्वज्ञ और गीता इलैक्ट्रिकल्स के मालिक पिता के एकाधिकारवादी साये के नीचे बिता रहा जीवन। यह सब कुछ इतना थोड़ा और आतताई क़िस्म का था कि राहुल डगमगा गया। उस रात वह देर तक पीता रहा और आधी रात को घर लौटा। पीता वह पहले भी था लेकिन तब वह बंधु के साथ उसके घर चला जाता था।

    राहुल को याद है, एकदम साफ़-साफ़। पिता ने उसे पर्दे की रॉड से मारा था। वह पिटते-पिटते आँगन में गया था और हैंडपंप से टकराकर गिर पड़ा था। पंप और हत्थे को जोड़नेवाली मोटी-लंबी कील उसके पेट को चीरती गुज़र गई थी। पेट पर दाईं ओर बना छह इंच का यह काला निशान रोज़ सुबह नहाते समय उसे पिता की याद दिलाता है। सिद्धार्थ अपनी पत्नी और बच्चों को छोड़कर एक रात से ग़ायब हुआ था और गौतम बुद्ध कहलाया था। राहुल अपने पिता, अपनी माँ और कमरे की खिड़की से झांकते अपने तीन भाई बहनों की भयाक्रांत आँखों को ताकते हुए, ख़ून से लथपथ उसी हैंडपंप पर चढ़कर आँगन की छत के उस पार कूद गया था। उस पार एक आग की नदी थी और तैर के जाना था। पीछे शायद माँ पछाड़ खाकर गिरी थी।

    मेरे पास गाड़ी है, बँगला है, नौकर हैं। तुम्हारे पास क्या है? अमिताभ बच्चन ने दर्प में ऐंठते हुए पूछा है। शशि कपूर शाँत हैं। ममत्व की गर्माहट में सिंकता हुआ। उसने एक गहरे अभिमान में भरकर कहा—मेरे पास माँ है। अमिताभ का दर्प दरक रहा है।

    राहुल को समझ नहीं आता। उसके पास माँ क्यों नहीं है? राहुल को यह भी समझ नहीं आता कि क्यों दुनिया का कोई बेटा घमंड में भरकर यह नहीं कहता कि मेरे पास बाप है। बाप और बेटे अकसर द्वंद्व की एक अदृश्य डोर पर क्यों खड़े रहते हैं?

    अब जबकि उँगलियों से फ़िसल रहा है जीवन/और शरीर शिथिल पड़ रहा है/ आओ अपन प्रेम करें वैशाली।' एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय के कॉन्फ्रेंस रूम में राहुल बजाज की कविता गूँज रही है। कविता ख़त्म होते ही वह ऑटोग्राफ़ माँगती नवयौवनाओं से घिर गया है।

    वह कुमाऊँ विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग का सभागार था। उसके एकल काव्यपाठ के बाद विभागाध्यक्ष ने अपनी सबसे मेधावी छात्रा को नैतीताल घुमाने के लिए उसके साथ कर दिया था। इस छात्रा के साथ राहुल का छोटा-मोटा भावात्मक और बौद्धिक पत्र-व्यवहार पहले से था। वह पत्रिकाओं में राहुल की कविताएँ पढ़कर उसे ख़त लिखा करती थी। बीस-साल पहले माल रोड की उस ठंडी सड़क पर केतकी बिष्ट नाम की उस एम.ए. हिंदी की छात्रा ने सहसा राहुल का हाथ पकड़कर पूछा था—मुझसे शादी करोगे?”

    राहुल अवाक्। हलक़ भीतर तक सूखी हुई। अक्टूबर की उस पहाड़ी