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जिण गुरुनै सिंवर ओ प्राणी
जिण गुरुनै सिंवर ओ प्राणी, जिण आ सिस्ट उपाई।ओंकारे आप उपन्ना, जळ सूं जोत सुवाई।
जसनाथ
पूरै गुरु री आलंग कर प्राणी
पूरै गुरुनै सिंवर ओ प्राणी, बिना हथोड़ै देह घड़ै।रळ च्यारूं वनवासा चाल्या, हांडी रै'अर हंस खड़ै।
जसनाथ
विष्णु विष्णु तू भण रे प्राणी
विष्णु विष्णु तू भण रे प्राणी, इस जीवन के होवै।क्षण-क्षण आव घटंती जावै, मरण दिनेदिन आवै॥
जांभोजी
मकर भूला माघ पिराणी
मकर भूला माघ पिराणी, काचै कांधै गाजूं।काचो कांधो है कुमलाणो, ज्यों तोड़्योड़ो सागूं।
जसनाथ
धरती इंद सिरे जोड़ावो
पूरै गुरुनै जपो रे प्राणी, आवै पापां रा छेहा।गुरु प्रसादे गोरख वचने, (श्रीदेव) जसनाथ(जी)
जसनाथ
द्वापर वरत्यो कळजुग आयो
सो गुरु सदा सिंवर ओ प्राणी, (जिण) थारी उमत आव उपाई।उमत घटती वाचा वधती, जै गुरु गोरख जाग जगाई।
जसनाथ
ओं तंते मंते जोत जगाई
जसनाथ
सुमरन प्रभुजी को करि रे प्रानी
सुमरन प्रभुजी को करि रे प्रानी।कौन भरोसे तू सोवै निसिदिन, अष्ट करम तेरे अरि रे॥