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वीभत्स रस में ईश्वर-स्तुति
कितै मच्छ औ कच्छ की तुच्छ देही।कितै केहरी कोल है रक्त-नेही॥
शिवकुमार केडिया 'कुमार'
इंद्र हू की असवारी
इंद्र हू की असवारी, पयैया नकीब कीनौं, देस-देस खबर सारी।गरज दमामा मारू, धुरवा निसान बान,
बैजू
माई री, हौ आनंद गुन गाऊँ
माई री, हौ आनंद गुन गाऊँ।गोकुल की चिंतामनि माधो जो माँगौ सो पाऊँ॥
परमानंद दास
हिंडोरे माई, झूलत गिरिधर लाल
हिंडोरे माई, झूलत गिरिधर लाल।संग राजत वृषभानु-नंदिनी अंग-अंग रूप रसाल॥
नंददास
देखौ माई! कान्ह हिलकियनि रोवै
देखौ माई! कान्ह हिलकियनि रोवै!इतनक मुख माखन लपटान्यौ, डरनि आँसुवनि धोवै॥
सूरदास
गोविंद माई मांगत है दधि रोटी
गोविंद माई मांगत है दधि रोटी।माखन सहित देहु मेरी जननी शुभ्र सुकोमल मोटी॥
परमानंद दास
कैसे जल जाऊ मै पनघट जाऊँ
कैसे जल जाऊ मै पनघट जाऊँ।होरी खेलत नन्द लाड़िलो क्यों कर निबहन पाऊं।
रसिकबिहारी
माई री, कमलनैन स्यामसुंदर
माई री, कमलनैन स्यामसुंदर, झूलत है पलना॥बाल-लीला गावत, सब गोकुल की ललना॥
परमानंद दास
हो घनस्याँम, भरौ जिन मो तन
हो घनस्याँम, भरौ जिन मो तन, चोबा छिरकन भोरे ही।अपने रंग मिलायौ चाँहत, सहत नाहिं कहु गोरे ही॥
रूप रसिक
गोपाल माई कानन चले सवारे
गोपाल माई कानन चले सवारे।छीकें कांधे बांधि दधि ओदन गोधन के रखवारे॥