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सरस्वती वंदना
शुकराय चंचु कि भुवनमनिशिष नासिका बर निरखियै।कलधौत नथ मधि लाल मुत्तिय ऊपमा आकरषियै॥
मान कवि
श्री राधा वंदना
‘प्रीतम’ सु कवि आधि-ब्याधि की बिनासिका ह्वैब्रज बन बीच बनि नित्य निरबाधिका।
यमुना प्रसाद चतुर्वेदी
इंद्र हू की असवारी
बादरन की फ़ौजें छाईं बूँदन की तीरा कारी॥दामिनी की रंजक, तामैं ओले-गोले तोप छुटत,
बैजू
मंगल आरति प्रिया प्रीतम की
जुगलप्रिया
झूलै कुँवरि गोपराइन की
झूलै कुँवरि गोपराइन की। मधि राधा सुंदरि-सुकुमारि॥प्रथमहि रितु पावस आरम्भ। श्रीवृषभानु मँगाये खंभ॥
गदाधर भट्ट
ब्रज की नारी डोल झुलावैं
ब्रज की नारी डोल झुलावैं।सुख निरखत मन मैं सचु पावें मधुर-मधुर कल गावैं॥
नंददास
संगत साधुन की करिये
संगत साधुन की करिये, कपटी लोगन सों डरिये।कौन नफा दुरजन की संगत, हाय-हाय करि मरिये॥
निपट निरंजन
ब्रज की बीथिन निपट सांकरी
ब्रज की बीथिन निपट सांकरी॥यह भली रीति गाऊं गोकुल की जितही चलीए तितहिबां करी॥
परमानंद दास
अब की लगी खेप हमारी
सौदी करत बहुत जुग बीते, दिन दिन टूटी आई।अब की बार बेबाक भये हम, जग की तलब छोड़ाई॥