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छांड़ो मेरे लाल अजहुँ लरकाई
छांड़ो मेरे लाल अजहुँ लरकाई।यही काल देखिकैं तोकों ब्याह की बात चलावन आई॥
परमानंद दास
लरिकाई को प्रेम कहौ अलि
लरिकाई को प्रेम, कहौ अलि, कैसे करिकै छूटत?कहा कहौं ब्रजनाथ-चरित अब अंतरगति यों लूटत॥
सूरदास
बसौ यह सिय रघुबर को ध्यान
वहि रहस्य सुख रस को कैसे, जानि सकै अज्ञान।देवहुँ को जहँ मति पहुँचत नहिं, थकि गये वेद पुरान॥
हरिहर प्रसाद
हरिजू को नाम सदा सुखदाता
जाके सरन गये भय नाहीं सकल बात को ज्ञाता।परमानंददास को ठाकुर संकर्षन को भ्राता॥
परमानंद दास
माई, को मिलिबै नन नंदकिसोरै
माई, को मिलिबै नन नंदकिसोरै।एक बार को नैन दिखावै मेरे मन के चोरै॥
परमानंद दास
नखरा राह रहा को नीको
नखरा राह रहा को नीको।इत तो प्रान जात हैं तुम बिनु तुम न लखत दुख जी को॥
भारतेंदु हरिश्चंद्र
निर्गुन कौन देस को वासी
को है जनक, जननि को कहियत, कौन नारि, को दासी?कैसो बरन, भेस है कैसो केहि रस कै अभिलासी॥
सूरदास
अटपट रंग को बिरह सुनि
अटपट रंग को बिरह सुनि, भूलि रहे सब कोइ।जल पीवत हैं प्यास कों, प्यास भयौ जल सोइ॥
ध्रुवदास
बलिराजा को समर्पन सांचो
बलिराजा को समर्पन सांचो।बहुत कह्यो गुरु सुक्र देवता मन दृढ़ आप नहीं कांच्यो॥
परमानंद दास
चित को चोर अब जो पाउं
राखो कुच बिच निरंतर प्रति दिनन को ताप बुझाऊं।परमानंद नंदनंदन को परघर तें परिभ्रमन मिटाऊं॥