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देख सीता खो गई...
भंग तृष्णासंग से आनंदघनता हो गई।स्वर्णमृग पर लुब्ध होकर देख सीता खो गई॥
ज्ञानराज माणिकप्रभु
सीता के आँसू
बार-बार मानस का पाठ करती।फिर अचानक एक दिन अशोक वाटिका में सीता के टपकते आँसुओं में पिता का
उदयन वाजपेयी
सीता आज भी धरती के गर्भ में समा जाती है
हम लक्ष्मण-रेखाओं के दायरे में ही रखना चाहते हैं सीता कोऔर डरी-सहमी सीता जब करती है पार लक्ष्मण-रेखा