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सब साधन को एक फल
सब साधन को एक फल, जेहिं जान्यो सो जान।ज्यों त्यों मन मंदिर बसहिं, राम धरें धनु बान॥
तुलसीदास
मन कौ साधन एक है
मन कौ साधन एक है, निस दिन ब्रह्म बिचार।सुन्दर ब्रह्म बिचारतें, ब्रह्म होत नहिं बार॥
सुंदरदास
घी को घट है कामिनी
घी को घट है कामिनी, पुरुष तपत अंगार।रतनावलि घी अगिनि को, उचित न सँग विचार॥
रत्नावली
ग्राम-सिंह भूखो बिपिन
ग्राम-सिंह भूखो बिपिन, देखि सिंह को रूप॥सुनि-सुनि भूखैं गलिन में, सर्व स्वान वेकूप॥
भगवत रसिक
बरषा को गोबर भयो
बरषा को गोबर भयो, को चहै को करै प्रीति।तुलसी तू अनुभवहि अब, राम बिमुख की रीति॥
तुलसीदास
मोहि मोह तुम मोह को
मोहि मोह तुम मोह को, मोह न मो कहुं धारि।मोहन मोह न वारियें, मोहनि मोह निवारि॥
दयाराम
प्रेमामृत को स्वाद कस
प्रेमामृत को स्वाद कस, को कबु कह्यों न जाइ।अनभविकों हिय जान ही, मुक मिसरी की नाइ॥
दयाराम
साधु नहूँ को होय दुख
साधु नहूँ को होय दुख, संग गहे अति खोट।घटी पात्र जल को हरै, परै घड़ी पर चोट॥
दीनदयाल गिरि
मूरख खल को साधु
मूरख खल को साधु जन, उपदेसत न विचारि।कपि को दीन्हीं सीख खग, कीन्यो गेह उजारि॥