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सूर न पूछे टीपणौ
सूर न पूछे टीपणौ, सुकन न देखै सूर।मरणां नू मंगळ गिणे, समर चढे मुख नूर॥
कविराजा बाँकीदास
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सुन्दर सूर न ग्रासणा
सुन्दर सूर न गांसणा, डाकि पडै रण मांहिं।घाव सहै मुख सांमही, पीठि फिरावै नांहिं॥
सुंदरदास
सूर समर करनी करहीं
सूर समर करनी करहीं, कहि न जनावहिं आप।विद्यमान रिपु पाइ रन, कायर करहिं प्रलाप॥
तुलसीदास
हिंदी साहित्य में शृंगार
हिंदी साहित्य में शृंगार का रसराजत्व यदि किसी ने पूर्ण रूप से दिखाया, तो सूर ने।
आचार्य रामचंद्र शुक्ल
सुंदर सद्गुरु शशिमयी
सुंदर सद्गुरु शशिमयी, सुधा श्रवै मुख द्वार।पोष देत हैं सवनि कौं, प्रगटे पर उपकार॥
सुंदरदास
द्वैज-सुधा दीधिति-कला
द्वैज-सुधा दीधिति-कला, वह लखि, दीठि लगाइ।मनौ अकास-अगस्तिया, एकै कली लखाइ॥
बिहारी
जब तक हिंदी का साहित्य
जब तक हिंदी का साहित्य और हिंदीभाषी हैं, तब तक सूर और तुलसी का जोड़ा अमर है।
आचार्य रामचंद्र शुक्ल
साजन सावन-सूर-सम
साजन सावन-सूर-सम, और कछू देखैं न।तुव दृग-दुति-कर-निकर, किय अंध बिंदुमय नैंन॥
दुलारेलाल भार्गव
लई सुधा सब छीनि विधि
लई सुधा सब छीनि विधि, तुव मुख रचिवे काज।सो अब याही सोच सखि, छीन होत दुजराज॥
बैरीसाल
सुधा लहर तुव बाँह के
सुधा लहर तुव बाँह के, कैसे होत समान।वा चखि पैयत प्रान को, या लखि पैयत प्रान॥
रसलीन
बाल साहित्य बचपन
कृष्ण कुमार
फटिक सिलानि सौं सुधार्यो सुधा मंदिर
फटिक सिलानि सौं सुधार्यो सुधा मंदिर,उदधि दधिको सो उफनाय उमगै अमंद।





