Font by Mehr Nastaliq Web

अज्ञेय के साथ

agyey ke saath

जानकीवल्लभ शास्त्री

जानकीवल्लभ शास्त्री

अज्ञेय के साथ

जानकीवल्लभ शास्त्री

और अधिकजानकीवल्लभ शास्त्री

    एक अजब-सा नाम साँप की आँख की तरह अपनी ओर खींचने वाला, मैंने जब पहले-पहल सुना, मेरे कोई काम था। 'हरी घास पर क्षण भर' औचक ही जब उसे देखा तो 'इत्यलम्' की 'परछाई-सी चोर की' ने बुरी तरह चौंका दिया, मेरी कोई आँख थी क्या उसे सही-सही देखने-परखने के क़ाबिल?

    परंपरा को आगे बढ़ाने वाले कवि देते थे। Traditional निराला थे। उनके काव्य के लक्ष्य और शिल्प को एक हद तक Unconventional कहा जा सकता था, फिर भी उनके—

    'वीक्षण अराल

    बज रहे जहाँ जीवन के स्वर भर छंद-ताल

    मौन में मंद,

    *** *** ***

    प्रणय के प्रियंगु की डाल-डाल।'

    —जैसे काव्य-विंब कालिदास की कला को भूलने-बिसरने देते थे, प्रत्युत उनकी याद ताज़ा कर देते थे।

    हरी घास पर...बाजरे की कलगी का तीखा टटकापन किंतु अपनी अलग स्थिति रखता था। उसका आकर्षण मन के स्वाभाविक लगाव में था, जानबूझ कर किए कटाव में, सबसे अलग-थलग होने में था। चेतना में एक ही झटके में उत्तर आने वाली यह तेज़ी बहुत कुछ—

    When the evening is spread out against the sky

    Like a patient etherised upon a table.—

    जैसी थी। मैं समझता हूँ कि ईलियट के दर्पस्फीत अंदाज़ में ही अज्ञेय ने हिंदी कविता के क्षेत्र में बेख़ौफ़ क़दम रखा था। ढल-ढल उच्छल भावुकता को अति संयत शीतल शब्दों की रूपहली धूप में सुखाता, अनावश्यक विस्तार का अनिवार्यतः परिहार कर रचना के दायित्व पर निःशब्द कठोर दबाव डालता हुआ [तो तू क्या कवि है? क्यों और शब्द जोड़ना चाहता है? कविता तो यह रखी है।] एक वयस्क संवेदनशील व्यक्तित्व तभी मेरे छायाच्छादित गहन गगन को छू गया था। और तो और, तब मुझे पंडितराज की भव्य भावुकता भी इस सुंदर संशय से समाहित निश्चय की छवि दिखा सकी। शास्त्रीय दोषों से सर्वथा मुक्त, गुणों की खान, रस-भावों-भरी, अलंकार-संभार से अंतर्दृष्टि में चौंध पैदा करने वाली और कानों में अमृत उड़ेलने वाली उनकी वर्णावली सहसा इरा ठेठ वस्तु और शिल्प का टटकापन झुठला सकी। अपनी प्रेरणा प्रिया के विछोह पर वह जो रोए- गाए कि अब कमल के फूलों का सोच सदा के लिए समाप्त हो गया और चटक चाँदनी में भरपूर निखार भी गया। और तो और कोयलों की बन आई, अब वे बेधड़क वन-बाग़ों में जब देखो तब, कुहलती रहती हैं!

    तो ऐसा कहाँ क्या बन पड़ा भी कालिदास, भवभूति या श्रीहर्ष से अछूता रह आया था? अवश्य अज्ञेय का विद्रोह वैचारिक विश्वेषण के स्तर पर भी चित्त की चमत्कृत करता था। मैं मुग्ध भाव से परंपरा से पूछता था : यह ज़हर (!) कहाँ पाया!

    दिल्ली, लखनऊ, इलाहाबाद से पटना तक के कितने ही रेडियो कवि-सम्मेलनों में हम साथ-साथ काव्य-पाठ करते रहे थे। मैं उन्हें ख़ूब डूब कर सुनता था, चाहता था : बंद खिड़कियाँ, दरवाज़े पर पड़े मोटे रंगीन पर्दे—सब ऐसी ताज़ा हवा के झोंकों से हिलने-फूलने लगें। मेरी कच्ची ललक की मायूसी हुई हो, यह एहसास बेशक हुआ कि विवेक स्थिरता लाता है, रस की छलकन मशहूर है। अज्ञेय का विरस, शांत लेखन अपनी अलग अहमियत रखता है। गद्य-पद्य के सभी आयामों पर श्वेत-श्याम परछाइयाँ डालकर उन्होंने कितनी जल्दी अपनी अलग पहचान बना ली थी।

    लखनऊ सम्मेलन में समादृत 'उदय के पथ पर' नामक स्वच्छंद छंद की मेरी एक रचना सुनकर बहु उसे अपनी साइक्लोस्टाइल से छपी पत्रिका के लिए माँग बैठे थे। इलाहाबाद में ‘ताड़ की आड़ से चाँद नया झाँकता!’ सुनकर आप ही गद्गद हुए, उसी समय किसी का फ़ोन आया तो बोले : आपका गीत सबको बहुत पसंद आया है। पीछे चलकर 'रूपाम्बरा' में मेरी दो तीन रचनाएँ संकलित कीं।

    'चक्रांतशिला'—जैसी एकाध को छोड़कर उनी बुली तिजोरी के कितने ही हीरे-जवाहरात का वज़न मेरे बटखरों के मुक़ाबले भारी पड़ा है। मैंने मोल-तोल के दायरे पर पड़े मकड़ियों के जालें को बिना नुक़सान पहुँचाए उनके प्रकार को हल्के-हल्के छुआ है। शराब शराबे-मार्फ़त बन पाई क्योंकि दफ़ातन नुमायां तरक़्क़ी हुई, यह बात और है।

    चाँदनी चौक के एक होटल में ठहरा हुआ था। आगे अज्ञेय जी से भेंट हो चुकी थी, उस सुबह उन्होंने कई बार रिंग किया था। मैं पृथ्वीराज जी से मिलने चला गया था, उस दिन 'पठान' नाटक में शम्मी कपुर उतर रहे थे। बंबई में चुप-चाप गीतावाली से शादी कर ली थी, अभी पापा जी के पाँव छूने पहुँचे हुए थे दोनों। बेर ढले होटल लौटा तो अज्ञेय जी के फ़ोन की बात मालूम हुई। जी मसोस कर रह गया। शाम को हंसकुमार तिवारी से राजकमल में भेंट हुई तो बोले : अज्ञेय जी आपको बहुत ढूँढ़ रहे थे। 'अरी करुणा प्रभामय।'—नामक उनकी सबसे नई काव्य-पुस्तिका का उद्घाटन-समारोह था उस दिन। काश कि उस समारोह में दो शब्द बोल कर मैं अपनी जंगआलूदा अभिज्ञता मांज पाता!

    छुटपुट मुलाक़ातों और उड़ती-उड़ती-सी बातों ने उनके तेजस्वी व्यक्तित्व को अधिक आकर्षक बना दिया था। जयस्तंभ-से सुदृढ़ ऊँचे का वह मंद-मधुर स्वर अपने आप में एक प्रिय विस्मय था। एक अपरिभाषित चरित्र, समकालीन वात्या के वक्ष पर खड़े अक्षयवट की परिक्रमा करना लक्ष्य था मेरा, कोई भी सबक सीखना कुंद और तीखे एहसासों से गुज़रने पर ही संभव था।

    वक़्त के मोड़ की शुरुआत पत्थरों से अटे रास्ते से हुई। उन दिनों डॉ. प्रभाकर माचवे (उज्जैन, माधव कॉलेज में दर्शन शास्त्र के प्रोफ़ेसर होने के ज़माने से मेरे मित्र) नागपुर रेडियो स्टेशन में थे। भारतीय स्तर पर एक कवि सम्मेलन आयोजित किया था और उसमें भाग लेने के लिए अपने ही अंदर बंद रहने वाले मुझ जैसे गुमनाम को भी आमंत्रित किया था। मैं गाँव से चीथड़े लपेटे पुतलों की तरह के लोगों के बारे में सोचता-सोचता लौट रहा था। दरअसल पिता श्री को लिवा लाने गाँव गया था। पटना हिंदी साहित्य सम्मेलन भवन में रात बिताने ठहरा हुआ था कि मुज़फ़्फ़रपुर में छाया का भेजा हुआ एक दूत नागपुर रेडियो का अनुबंध पत्र लिए हुए पहुँच गया। यदि मैं ठीक उसी समय छूटने वाली गाड़ी पकड़ लेता तो नियत समय पर नागपुर हर्गिज़ नहीं पहुँच सकता था। भागमभाग कि अपने बदन की धूल झाड़कर उठ खड़ा हुआ और पिताजी के श्री चरणों की धूल से आँख आंज कर पटना जंक्शन पहुँच गया। सवेरा मुग़लसराय के आस-पास हुआ। इलाहाबाद में शांति मेहरोत्रा, विजयदेव नारायण साही आदि के उसी डिब्बे में जाने पर वातावरण जीवित जान पड़ने लगा। एक अजीब गहमा-गहमी माहौल में मदहोशी-सी महसूस होने लगी।

    नागपुर में पहले भी जा चुका था, राष्ट्र-भाषा-प्रचार-समिति, वर्धा के विशेषाधिवेशन में। वहीं पहले-पहल मैंने तुकड़ो महाराज के कीर्तन-प्रवचन सुने थे। पंडित माखनलाल चतुर्वेदी में दुराग्रह करके 'कोयल बोलो तो' कविता सबको सुनवाई थी। विक्रयार्थ अपनी किताबों का बड़ा-सा बंडल लिए हुए 'अश्क' जी गए थे और उम्र बार भी रेडियो वाले मुझे स्टुडियो बुला ले गए थे। श्रीमती सुमति मुटाटकर का अविस्मरणीय गीतिगोविंद-गायन मैंने स्टुडियो में ही सुना था। मेरे कितने ही गीतों पर रेकार्ड बना था। वहीं वारणासि राममूर्ति रेणु मुझसे मिले और सदा के लिए मित्र हो गए थे। कुछ ही दिनों बाद मुझे हैदराबाद बुलाया था।

    इस बार नागपुर उतर कर सीधे माचवे जी के घर जाना था। पिछली बार तो छात्राओं का परम प्रफुल्ल दल स्वागतार्थ उपस्थित था। तुर्त-फुर्त बिस्तर बाँधा, हँसते-हँसते स्वयं उठाकर कार पर डाल दिया फिर नियत स्थान पर स्थापित कर दिया। वहाँ अवासीय व्यवस्था भी लड़कियों के ही हाथ में थी, नाश्ता, चाय, भोजन बनाने और खिलाने का पूरा दायित्व उन्हीं पर था। ऐसा अद्भुत दृश्य मैंने राष्ट्रभाषा-प्रचार-समिति की कृपा से, जीवन में पहली ही बार देखा था। बिहार में किसी साहित्यक आयोजन के आरंभ में शास्त्रीय शैली में मंगलाचरण करने के लिए कोई ढूँढ़े मिलेगी, सौ-सौ बहाने सुनने को मिलेंगे। यहाँ सम्भ्रांत महिलाओं की एक अपनी अनोखी टीम थी। तानपूरे पर मंद्र-मधुर कंठ से दरबारी कान्हड़ा में मंत्रोपम विशुद्ध उच्चारण के साथ वर दे, वीणा वादिनि, वर दे' का अनन्य तन्मयता पूर्ण गायन कितने ही दिनों तक मेरे मन-गगन में गूँजता रहा था। मैंने लाल क़िले से लेकर गोत्र की पाठशाला तक में इसके अनगिनत गायन सुने थे, इमन, भीमपलासी, केदारा, छायानट आदि में, यहाँ पहली बार दरबारी की बंदिश में—नव गति, नव लय, ताल, छंद नव—अंतरतर में कौंधा था।

    इस बार तो रेडियो का कवि सम्मेलन था। यहाँ कौन किसे रिसीव करने आता। होल्डाल, ब्रीफ़केस और बेंत की डलिया लादे-लूदे मैं माचवे जी के क्यार्टर में दाख़िल हो गया। इनके परिवार ने उज्जैन से ही घुल-मिल गया था। श्रीमती माचवे ने मुक्तिबोध, मावचे और मुझे—साथ बैठा कर ऊज्जैन में जो गर्म पकौड़ियाँ खिलाई थीं, उन स्वाद की याद दिलाता हुआ, उनसे मिला। माचवे जी कमल-दल-लोचनों में आनंद का मकरंद भरे हुए उमंग तरंगित आत्मीयता से भुज-भर भेट रहे थे कि अचानक अज्ञेय जी गए। वह पर्वतारोही के चुस्त-दुरुस्त वेश में थे। बोले : आप ‘रामटेक’ चलेंगे? —अंधे को नैन मिलें तो और क्या चाहिए, यहाँ तो कमलनयन बाँटने की बात थी।...

    रात में कवि सम्मेलन ख़ूब जमा। विनय मोहन शर्मा ने गीतिगोविंद का अनुगायन सुनाया तो मुझे आर्नल्ड के सींग ऑफ़ सौग्स की याद गई। अज्ञेय जी तो एक में ही हिमालय और सागर हैं। काव्यपाठ का उनका ढंग भी पेटेंट है। परिवेश को प्रिय गंभीरता दी। विजयदेव नारायण साही ने एक अँग्रेज़ी कविता के अनेक हिंदी-रूपांतर पंत, रामकुमार वर्मा आदि की शैली में सुनाकर सबको ख़ूब हँसाया।

    संयोग से प्रचार-समिति वाले पं. हृषिकेश शर्मा जी वहाँ उपस्थित थे। उन्होंने कल की एक संगोष्ठी के लिए अज्ञेय जी को और मुझे अत्यंत आग्रह-अनुरोध-अनुनयपूर्वक रोक लिया। अज्ञेय की एक छोटी-सी शर्त पर राज़ी हो गए कि सभा विसर्जन के पश्चात् रात में ही वह हम दोनों को कार से जबलपुर पहुँचा देने का प्रबंध कर देंगे। हम वहाँ से बौंबे मेल पकड़ लेंगे।

    वह अजीबोगरीब संगोष्ठी वरवस—

    'मंज़िल की जुस्तुजू से पहले किसे ख़बर थी

    रस्तों के बीच होंगे और रहनुमा होगा।'

    अज्ञेय का सप्राण, उदात्त और उद्यत उन व्यक्तित्व मेरे निर्जल, निस्तेज और निष्प्राण अस्तित्व को आरंभ से ही उद्दीप्त और आंदोलित करता रहा है। भग्नदूत और चिंता के अनचीन्हे स्वर में मेरा अँधेरा कैशोर झुटपुटे के बीच का अध-उघड़ा प्रकाश ढूँढ़ता था; विपथगा की कहानियों ने कठुआए चौकठे को आमूल हिला दिया था और शेखर ने...

    वही अज्ञेय अभी अकेले मेरे साथ थे शांत, गंभीर, उदासे-से। कुछ ही दिन पहले 'नदी के द्वीप' की एक आलोचना आँखों में चुभी थी : जो शेखर है वही भुवन है और वह दूसरा कोई नहीं, स्वयं अज्ञेय हैं। वह सौम्य, शिष्ट, निर्व्याज-मनोहर आकार क्या उन परछाइयों के अहंकार से लिपटा है? निमिष भर पहले की निर्धूम आग विराग की नीरवता में हिमानी हो गई है?

    जैसे अपने जड़ तन से निकल कर तदात्म मन कहीं घोर निभृत में विभोर हो रहा हो; चेहरे पर तनाव नहीं, रम्य रेखाओं में सलवटें नहीं, —असंभव की संभावनाओं से उदासीन, आत्मानुशासित दृष्टि का सृष्टि-चेतन प्रसार। मैं छेड़ता था कि उम्र एकात्म चैतन्य-चंद्र पर बादल रुके, कुमुद कुम्हलाए, तनिक कंकड़ी के पड़े स्वस्थ जल घायल हो।

    कि सड़क के दोनों ओर वन-फूलों से लदे पेड़-पौधे बार-बार चमकीली कार पर छाँव करने लगे और मखमली घास पर ओस के बिखरे मोती हार्न की ध्वनि से काँपने लगे। अब सीट पर तने बैठे अज्ञेय की खोल से एक नया अज्ञेय निकला और ड्राइवर को गाड़ी रोकने कहा और मुझे बाँहों से खींचकर बाहर निकाला और झींगुरों की झंकार से झनझनाते वन-प्रांतर पर छाए आधी रात के काँटे की मानिंद चुभन भरे सन्नाटे और चेहरे पर पड़े कुहरे को चीरते हुए कहा : टेसू।

    मैंने हँसकर कहा हाँ, मैं टेसुओं को ख़ूब पहचानता हूँ। जहाँ पैदा हुआा हूँ, चपड़े के कई कारख़ाने हैं!

    हुलसकर बोले : ठीक है। तब तो मुश्किल होगी। मैं पेड़ पर चढ़ता हूँ, टहनियाँ और डालियाँ तोड़-तोड़कर गिराऊँगा, आप उन्हें लोक लेंगे, ऊपर-ऊपर हाथों में थाम लेंगे। ज़मीन पर गिरने से फूल टूट-बिखर जाएँगे।

    बोले और सघन पलाशवन में खो गए। आधे-अँधेरे, आधे-उजेले में किसी ख़ूब खिले पेड़ को ढूँढ़ निकालना कुछ ऐसा आसान था, मगर हार सप्तक की सन्धानी दृष्टि से बच निकलना भी कठिन था। पल भर की ख़ामोशी में ड्राइवर परेशान, मेरी साँसें ऊपर-ऊपर टँगी, कि थोड़े फ़ासले से बच्चों-सी किलकारी सुनाई दी। ड्राइवर बाहर निकला। मैं आवाज़ की अँधेरी ड्योढ़ी पार कर वाघ-छाल-सी बिछी चाँदनी की छींट पर सिमटते-ठिठकते पाँवों जा खड़ा हुआ। आज़ू-बाज़ू झुकी-झुकी शाखाओं के भीतर से ताका : अज्ञेय फुनगियों में उलझी चाँदनी की तरह इतमीनान से बैठे निर्गंध किंशुक-कलियों की अनाघ्रात गंथ पी रहे थे। डालियों की महरावों के बीच मेरी कमज़ोर आवाज़ पहचान कर बोले : आप गए? कैसा अच्छा लग रहा है!

    माघ-फागुन का जाड़ों का महीना। ओस से जुड़ाए बदन को ठंडी हवा सुखा रही थी और अज्ञेय थे कि हवा खा रहे थे। फुनगियों के अनछुए आकाश में रंगीले बादलों की मस्ती देख रहे थे।

    रामटेक के बाद उनकी मौज की गिलहरी का यह रंग कुतर-कुतर फर फेंकना और उतावली को क़रीब फटकने देना मुझे बहुत अच्छा लग रहा था।

    मैंने स्वर में लय भर कर कहा : अज्ञेय जी, आप तो मुझसे छह साल बड़े है, वह तीन-चार साल छोटा रहा होगा। नवश आपसे बेहद मिलता-जुलता। मैं रायगढ़ में राजकवि था, वह वहाँ के नायब दीवान महंत जी का लड़का था—देवेंद्र।

    ‘आह! देवेंद्र? वह तो मेरा सगा भांजा था। अब रहा!’

    मैं निःशब्द सोचता रहा :

    टेसुओं के वन में भी मेरे चेहरे का रंग उड़ गया। यह मेरे रायगढ़-प्रवास का सबसे प्यारा संगी या। कार्तिकेय-सा सुंदर ममर रोबीला चेहरा, बेहद ज़िंदादिल और साहसी, अँग्रेज़ी पर मास्टरी, फ़्रेंच रेडियों के ज़रिए सीख ली थी। हम जब-तब जंगल-पहाड़ में घूमते वक़्त साथ-साथ सिने-संगीत गाते-गुनगुनाते थे। दीवान डॉ. बलदेव प्रसाद मिश्र का बंगला मेरे ड्रेक गेस्ट हाउस से सटा था। उनके बड़े लड़के से उस की दोस्ती थी। रोज़ ही आता था। आता था, तो इधर मुझ से मिले बिना नहीं लौटता था। मैंने सन् '39 में रायगढ़ छोड़ दिया था। आज अचानक इस पोज में अशेव को देखकर उसकी हैरतअंगेज ज़िंदादिली सूची पलकों में तैर गई थी। और आह! ऐसा कैसा समाचार सुना कि हौसला ही निचुड़ गया; निर्गंध टेसुओं की सौगंध, मेरा तो अंतरंग बदरंग हो गया।

    अब तक काफ़ी टहनियाँ गर्दन, कंधों और हाथों से ढंग गई थी। अज्ञेय जी ऋतुराज की तरह हौले-हौले रूप-रंग के आकाश से उतर आए। उनके कला-कार की निःसंगता, बीरानी और निर्वैयक्तिकता मुझ पर गहरा असर छोड़ गई।

    'अब नहीं रहा' के अलावा एक शब्द भी देवेंद्र के बारे में वह बोले थे। इधर देवेंद्र और उसकी माँ से मैंने अनदेखे अज्ञेय के बारे में कितना कुछ जान लिया था। कुछ कहने को मेरे होंठ फड़फड़ाए कि यही निःसंगता आपकी सृष्टि का स्वर्ग है; बौद्धिक दृढ़ता पर ऐसा निरपवाद अधिकार अन्यंत वितृष्णा का कारण बन जाता, अप्रताड़ित भावना का लाच्छनहीन, सुरुचि-संपन्न परिहार अपने, समग्र साहित्य में, आत्म-सीमित हो सकता है, अतिरिक्त व्यक्तिवद्ध कदापि नहीं।

    अज्ञेय परिस्थिति की सीमाओं विडंबनाओं से ऊपर उठे अज्ञेय कार से बैठते-बैठते शिशु सुलभ हार्दिकता उछालकर बोले : शास्त्री जी, (निस्संदेह वैसे पूर्ण व्यक्तित्व से ऐसे संबोधित होते मेरे तन-मन और आत्मा की इकाई टूटने लगती है।) वे टेसू में दिल्ली के दोस्तों को होली के उपहार के रूप में दूँगा। कहूँगा, ये तुम्हारे अनुरूप भी हैं, प्रतिरूप भी।

    उनकी ज़िंदादिली, उनकी मुस्कान होंठों के दरमियान ज़रा की ज़रा थमी कि मैंने दबी-दबी-सी आवाज़ में अपना साज छेड़ा :

    दिल्ली वालों को भले-भले दे लेंगे, दिलवालों (विद्यानिवास जी-जैसों) को देना मुश्किल होगा,—वे 'निर्गंधा इव किंशुका :’ से वाक़िफ़ जो होते हैं।

    —मेरे इस जुमले से उनके चेहरे के भावों में हल्की-सी भी तब्दीली नहीं आई। मैंने आँखें खोलकर हारी हुई निगाहों से उनकी शिलीभूत स्थितप्रज्ञता देशी, जिस पर कैसे भी सादे रंगीन शीशे गिरकर चकनाचूर हो जाते!

    जबलपुर तक सवाल-जवाब का सिलसिला अटूट रहा। बातचीत में बेपनाह खिंचाव, आँखों में अजब-सी चमक और होठों पर गहराइयों से फूटी मुस्कान—और ऐसे सादे गहरे दिलचस्प अज्ञेय के बारे में कैसी-कैसी अफ़वाहें और अटकल वाजियाँ और ऊटपटाँग क़िस्म की कथा कहानियाँ हैं; कैसी खामख़याली, लफ़्फ़ज़ी और संतरानी 'भिन्न रुविहि लोक:'

    पौ फटने ही वाली थी। महाकवि पंत के शब्दों में—

    “चीर तीर-सी रही क्षितिज-उर

    अरुणचूड़ की ध्वनि मतवाली

    *** *** ***

    अब प्रकाश-गर्भित लगता तम

    अंगड़ाता सोया समीर जग।”

    के पारदर्शी दृश्यों में में देख रहा था कि हिंदी कविता के छायावादी संस्कारों को पौंड और ईलियट के समानांतर अज्ञेय ने ही सर्वप्रथम तूल की तरह तूम-कर उड़ाना आरंभ किया था। और पश्चिमी साहित्य शास्त्र की पारंगतता और पच्छिमी साहित्यांदोलनों को सर्वात्मना समर्पित प्रज्ञा द्वारा अज्ञेय का कवि पढ़ा गया है। उसे भारतीय काव्य-परंपरा के इतिहास के प्रकाश में नहीं पड़ा जा सकता। संस्कृत और बंगला के उद्धरण उन्हें भारतीय आकाश में उड़ने भर देते हैं, यहाँ की मिट्टी में उनके कलमी पोदे पूरी तरह पनप नहीं पाते। उनके द्वारा खिलाए हुए रंगारंग फूल यहाँ के नासापुटों में पल भर को चौंकाने वाली गंध ज़रूर भरते हैं पर वे आत्मा को यह रस नहीं देते, जो भारत की अपनी प्रत्यभिज्ञा है। सच तो यह कि वह चिद्‌विलास या शिल्प-संतुलित अभिनय बुद्धि-वैभव ही है जो नित नए प्रयोगों से हिंदी को नई शक्तिमत्ता प्रदान करता रहा है और सबसे बड़ा सच यह कि संस्कृत-बंगला की चाहे जैसी जानकारी मुझे हो मगर अँग्रेज़ी की आधी-अधूरी अँधेरी जानकारी अज्ञेय-साहित्य को चौंध को आत्ममात करने में मेरी बहुत बड़ी बाधा है। जिसने 'माडर्न इंगलिश प्रोज' का मर्म नहीं समझा, वह अक्षय की अँग्रेजी-हिंदी के मज़े भी नहीं ले सकता। वैस्टलैंड के खंडित बिंबों के ढेर से गुज़रने वाली भारतीय आत्मा ह्रास-विघटन, अवसाद और मृत्यु-भय के मुलम्मे को नई चेतना की गर्म राख से घिस-घिसा कर छुड़ा सकती है।

    बला से पूँजीवाद और समाजवाद की ख़राद पर खरा उतरा साहित्य मेरी समझ में आए, यह व्यक्ति अज्ञेय तो लाखों में एक हैं। इनकी प्रसन्न-गंभीर आकृति, सजे-सँवरे बोल, अंतर-प्रांतर में अंक जानेवाले व्यवहार इस पल को निस्तंद्र निस्तलता से जीने के लिए क्या कम है? इनके खुलाव की रहस्य समझने भर सँवर लूँ।

    मैंने कहा : रिटायरिंग रूम था किसी ग्रैंड होटल की सुविधाओं का लोभ हो तो मेरा यहाँ एक दिली दोस्त है—डॉ. रमेशचंद्र मिश्र, आप वहाँ चलें, उसकी पत्नी ललिता कालिदास के देश—उज्जैन—की है, जील और शालीनता की स्फटिक प्रतिमा, आपको अचानक अपने बीच पाकर दंपती अंदरूनी ख़ुशी से खिल उठेंगे।'

    अज्ञेय जी ने छोहा कर जंचे-तुले शब्दों में स्वीकृति दे दी। मेरे तो एकटक जक-सी बंध गई। यों असली हाल ही बतलाया था, जटल ही हाँकी थी, वत्तीसी चमकाता रमेश छज्जे पर किसी कमज़ोर पौदे को टीकन देता, थूनी लगाता दिख गया।

    रमेश कवि भी है, कविराज भी, नाज़ुक-मिज़ाज भी है, शेर की दाढ़ में पहुँचा पेल देनेवाला भी, हिंदू यूनिवर्सिटी के ज़माने का छाप-मित्र, जो स्टेज पर फ़्री ऐक्टिंग के लिए मशहूर था, गोष्ठियों में शेरो शायरी के लिए, हरदिलअज़ीज़ी हद से गुज़र गई थी, बच्चन जी ट्रेनिंग करते वक़्त जिस हसीन माहौल में रहते थे, ऐक्टर रमेश की 'राइवलिरी' उसकी चहारदीवारी फाँद गई थी। निराला जब अचानक जाते थे, उनके, अटपटे आतिथ्य का बोझ रमेश के कंधे डाल में मुफ़्त का यश लूटता था।

    इकले होकर मरा ही जा सकता है। जीने के लिए रमेश-से दोस्त का साथ काफ़ी है। तनहा बैठकर अंगराओ पलक झपकते संगी-साथियों के दल-बादल से घिरा पाओगे अपने आपको!

    मेरे किए कुछ हुआ। लोग कहते हैं—सुनी-अनसुनी कर देता हूँ। अब साथ किस-किस को कहता फिरूँ : मैंने यह जन्म व्वर्थ नहीं गँवाया, रमेश-सा दोस्त पाया है!

    चाय-नाश्ते के बाद अज्ञेय ने कहा : क्यों हम नर्मदा नहाने चलें? भेड़ाघाट दूर है तो गायघाट ही सही।

    रमेश डिस्पेंसरी जाने की जल्दी में था। सवारी मँगवा दी। कहने की हम दोनों नर्मदा नहाने निकले थे, मगर में रास्ते भर अज्ञेय की निर्वाध, वेगवती ज्ञान-गंगा में डुबकियाँ लगाता रहा था। किनारे पर कपड़े उतारे और अज्ञेय का स्वर्ण-वर्ण सुडौल शरीर स्नान के नील परिधान में बलराम बन गया।

    अपनी ज़िंदगी तो धोती-कुर्ते-चप्पल में घुट गई। किसी हिंदी के कवि की यह विदेशियों-सी चुस्ती और फुर्ती पलकों में अट नहीं रही थी। तैराकी का शौक़ मुझे भी है, एक बार इसी नर्मदा के धुआँधार जलप्रपात में शहीद होते-होते रह गया था। तैर-तैर कर देर तक कीलाल-लीला का स्फार संभार चला। पहाड़ और नदी—दोनों ने दो ही दिनों में अज्ञेय की ऊँचाई और गहराई दिखा दी थी। मन मत्त था। देश-विदेश की अनेक अनुभूतियों के तीव्र-वेग जलद-यान से हम जल्दी ही लौट आए, यहाँ दो नयन मेरी प्रतीक्षा में खड़े थे।

    ललिता जी संस्कृत से एम. ए., पी-एब, डी. होंगी, पाक-कला में किंतु सुपर—डी. लिट्। पल भर को छककर खाने-पीने का सिलसिला चला। निराला के बाद लगभग उसी क़द के अज्ञेय को अत्यंत मिताहार देखकर अपनी बेहयाई पर बेहद दया आई। मैं तो भीम-भोजनालय में खाते वक़्त भी सुध-बुध विसार बैठता हूँ कि आख़िर खिलाने वाले पर क्या गुज़र रही होगी।

    बांबे मेल के आने का वक़्त हो गया था। दिल भर आया कि इस छोटो-सी मुलाक़ात में—

    ‘मेरे रमेश, सब के रमेश,

    उद्दाम प्रतिभ गोबर-गनेस।’

    की ज़हर छहरती हँसी और मधु-मद वोरे भोरे बोल नसीब हुए। सदर बाज़ार से कैंट दूर था। घास की गंध, धूप का रूप (Electronic pace-maker) द्वारा चलाए गए यूँ वीरानी में छुप बैठे दिल का स्पंदन लिए-दिए कंपार्टमेंट में पहुँचा और होल्डआल फैलाकर झटपट एक बर्थ दख़ल कर लिया। कुछ परे हुट कर उपरले बर्थ पर अज्ञेय जी ने भी अपना बिस्तर फैला दिया। उनके तकिए के नीचे से अमृतराय का हाल का छपा लाल कवरवाला ‘बीज’ निकला। वह मेरे पास ही बैठ गए थे। बीज के 'बाद' में विश्व चौखूँट बैठ सकेगा, यही वार्ता का मूल और स्थूल विषय था।

    काफ़ी देर बाद जब जबलपुर जंक्शन से गाड़ी चली, कल-परसों से ही अपनी आत्मिक आर्द्रता से भिगोते आते शिशु-सदृश सस्मित स्वर में बोले; जानते हैं, मेरी साहित्यिक गतिविधि का आरंभ एक तरह से, इसी जबलपुर शहर से हुआ था। हिनकारिणी सभा हाई स्कूल के वार्षिकोत्सव के लिए मैंने एक अभिभाषण...

    हाँ-हाँ, मैंने पढ़ा है 'त्रिशंकु' का वही तो पहला निबंध है।

    हाई स्कूल के स्तर से बहुत ऊँचा है वह लेख। आप बुरा मानें तो उसके संबंध में कुछ निवेदन करूँ।

    अज्ञेय जी की मद्धम आवाज़ और नरम और मुलायम हो गई।

    मैंने कहा : उस निबंध में आपने लारेंस का लंबा उद्धरण दिया है, रवींद्रनाथ का कहीं नाम तक लिया। उनके शिक्षा-संबंधी मौलिक विचारों का आपका निबंध ऋणी है।

    उन्हें मेरी बात पर विस्मय हो रहा था तो मैंने हँसाने के अभिप्राय में बताया कि बीस तक कालिदास और बीस में पच्चीस की उमर तक में मैंने रवींद्रनाथ का सारा साहित्य पढ़ डाला था।

    तरह-तरह की वैयक्तिक और निर्वैयक्तिक बातों में बेला ढलने को आई तो मैंने चौंककर देखा, इलाहाबाद गया था। उन्होंने झटपट अपना बिस्तर लपेट लिया, उन्हें दिल्ली के लिए गाड़ी बदलनी थी। मुझे चुपचाप बैठे रहने के लिए कहा और आप तेज़ क़दम चलकर भीड़ में खो गए। कुछ देर बाद लौटे तो हँसते हुए मेरे हाथ में पटना तक का एक टिकट थमाया :

    आपकी यात्रा सीधी है बैठे-बैठे इसी से पहुँच जाएँगे।

    'शुभास्ते संतु पंथानः।' फिर हौले-हौले खिसकती हुई गाड़ी से अपना सामान उतारते-उतारते बोले।

    मेरा रास्ता ऐसा आसाम नहीं, मुझे प्रतीक्षा करनी होगी।

    स्रोत :
    • पुस्तक : हंस बलाका (पृष्ठ 407)
    • रचनाकार : जानकीवल्लभ शास्त्री
    • प्रकाशन : अंतरा प्रकाशन
    • संस्करण : 1983

    Additional information available

    Click on the INTERESTING button to view additional information associated with this sher.

    OKAY

    About this sher

    Close

    rare Unpublished content

    This ghazal contains ashaar not published in the public domain. These are marked by a red line on the left.

    OKAY