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कृष्ण बिहारी मिश्र के उद्धरण

व्यक्ति की भोगेच्छा और अनाचार समष्टि के मंगल का संहार न कर दे, इस सहज चिंता ने तरह-तरह की आचार-मर्यादा के विधान की प्रेरणा दी।