कुँवर नारायण के उद्धरण
विश्वविद्यालयों में अक्सर प्राचीनों को जितनी भक्ति से पढ़ाया जाता है, शायद उतनी समझदारी से नहीं। साहित्य को इस प्रकार पढ़ाया जाना; विद्यार्थी को कदाचित् साहित्य इसी प्रकार पढ़ाने के योग्य भर ही रखता है—उसमें उस स्वतंत्र दृष्टिकोण का विकास नहीं होने पाता, जिसका संबंध रचनात्मक साहित्य से है।
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