आचार्य रामचंद्र शुक्ल के उद्धरण
उक्ति की वहीं तक वचनभंगी या वक्रता के संबंध में; हमसे कुंतलजी का 'वक्रोक्तिः काव्यजीवितम्' मानते बनता है, जहाँ तक कि वह भावानुमोदित हो या किसी मार्मिक अंतर्वृत्ति से संबद्ध हो—उसके आगे नहीं।
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