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हरिशंकर परसाई के उद्धरण

स्त्रियों की सभा में व्याख्यान देने का भी मौक़ा कौन चूकना चाहेगा। यदि सभाओं में, श्रोताओं में स्त्रीजाति न होती, तो हमारे युग में ही वक्ताओं की पैदाइश शायद एक-चौथाई रह जाती।