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भर्तृहरि के उद्धरण

स्त्री तभी तक अमृतमय है कि जब तक नेत्र के सामने है, नेत्र से जैसे दूर हुई कि विष से भी अधिक कष्टकारी हो जाती है, अर्थात् विरह से संताप देती है।