श्री श्रीठाकुर अनुकूलचन्द्र के उद्धरण
संदेह को प्रश्रय देने से यह घूण की तरह मन पर आक्रमण करता है, अंत में अविश्वासरूपी जीर्णला की चरम मलिन दशा को प्राप्त होता है।
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