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रवींद्रनाथ टैगोर के उद्धरण

संपूर्णता का आदर्श प्रबलता में नहीं है। समग्र के सामंजस्य को नष्ट करके प्रबलता अपना स्वातंत्र्य जताती है; इसीलिए वह बड़ी लगती है, पर वास्तव में वह क्षुद्र है। भारत ने इस प्रबलता को नहीं, परिपूर्णता को चाहा था।