सच्चे काव्य में सहज भाव प्रधान होता है, आरोपित नहीं। उसमें कवि, पात्र और श्रोता—तीनों के हृदय का समन्वय होता है। जिससे काव्य का जो प्रकृत लक्ष्य है, पदार्थों के साथ भात्रों के प्रकृत संबंध का प्रत्यक्षीकरण, जगत् के साथ हमारी रागात्मिका वृत्ति का सामंजस्य—वह सिद्ध हो जाता है।