रवींद्रनाथ टैगोर के उद्धरण
रूप की सीमा होती है, किंतु रूप जब मात्र उस सीमा को ही दिखाता है, तब वह सत्य को प्रकाशित नहीं करता। उसकी सीमा ही जब प्रदीप के समान असीम का दीप जलाकर लाती है, तभी सत्य प्रकट होता है।
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