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वात्स्यायन के उद्धरण

प्रयोजनकर्ता नायक एक बार प्रयोजन को सिद्ध करके अपने को उपकारी समझने लगता है, किंतु त्यागी नायक तो अतीत की अपेक्षा ही नहीं करता।