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दुर्गा भागवत के उद्धरण

प्राचीन भारतीय साहित्य को विनोद से परहेज है। किंतु लोक परंपरा ने विनोद की निर्मिति व्यर्थ नहीं जाने दी।

अनुवाद : वासंतिका पुणतांबेकर