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श्यामाचरण दुबे के उद्धरण

परंपराएँ जब तेज़ी से विशृंखलित होती हैं; तब समाज की जातीय अस्मिता का ह्रास होने लगता है, और धीरे-धीरे स्थिति इतनी बिगड़ती है कि समाज अपने अस्तित्व की आहटें सुनने में असमर्थ हो जाता है।