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वात्स्यायन के उद्धरण

प्रथम समागम में नायिका, लज्जा के कारण अपनी दोनों जंघाओं को सटाकर अपने गुप्तांग को छिपा लेती है। ऐसे में नायक को दोनों जंघाओं के बीच में हाथ से सहलाते हुए, जाँघो को अलग करना चाहिए। नायिका के स्तनों, हाथ, काँख, कंधे, गर्दन आदि का स्पर्श करते हुए, उसे धीरे-धीरे सहलाना और दबाना चाहिए। कुमारी कन्या के साथ भी, प्रथम समागम में इसी प्रकार का व्यवहार करना उचित है।