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हरिशंकर परसाई के उद्धरण

मुहावरे युगों के जातीय अनुभव से बनते हैं और व्यक्ति की ज़बान पर आ जाते हैं। युग बदलता है तो मुहावरा बना रहता है, पर अर्थ बदल जाता है।