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विश्वनाथ त्रिपाठी के उद्धरण

मीरा की कविताओं से उनके रचनाकार का जो रूप उभरता है; वह पिंजरे में हताशा-बद्ध पक्षी का है, जो दूरस्थ नीड़ के ध्यान में मग्न होकर नाच रहा है।