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वात्स्यायन के उद्धरण

मैंने लोकोत्तर ब्रह्मचर्य और निर्विकल्पक समाधि के द्वारा; कामशास्त्रीय विषयों का साक्षात्कार करके, लोकव्यवहार की सफलता के लिए इस शास्त्र की रचना की है—रति-राग एवं काम-वासना के प्रचार के लिए नहीं।