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वात्स्यायन के उद्धरण

मध्यम राग वाले नायक-नायिका के मिलन से जो राग उत्पन्न होता है, उसे 'आहार्य' राग कहते है। उस समय नायक को आलिंगनादि चौंसठ कलाओं के यथावसर अनुकूल प्रयोग से, नायिका की कामवासना को जगा-जगाकर राग अर्थात संभोग में प्रवृत्त होना चाहिए।