गैब्रिएला मिस्ट्राल के उद्धरण
मैं कविता लिखती हूँ क्योंकि मैं इस प्रेरणा की अवहेलना नहीं कर सकती; यह ऐसा होगा जैसे मेरे गले में उठते हुए झरने को रोकना। लंबे समय तक, मैं उस गीत की दासी रही हूँ जो अपने आप आता है, प्रकट होता है और जिसे छिपाया नहीं जा सकता। अब मैं ख़ुद को कैसे क़ैद करूँ? अब इससे कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता कि कौन मेरी प्रस्तुत रचना को प्राप्त करता है। जो कुछ मैं करती हूँ, वह मुझसे अधिक महान और गहरा है। मैं केवल एक माध्यम हूँ।
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