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जैनेंद्र कुमार के उद्धरण

मैं अकेला रहूँगा, क्योंकि मैं न बँधना चाहता हूँ। न बाँधना चाहता हूँ। स्नेह का बंधन ही मेरे लिए हो, क्योंकि वह बाँधकर भी खोलता है।