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हरिशंकर परसाई के उद्धरण

‘महाजनो येन गतः सपंथः’—युधिष्ठिर ने धर्म का मार्ग यों समझाया था, मगर महाजन के मार्ग पर चलकर आदमी लुच्चा, बदमाश, उठाईगीर भी हो सकता है। किसी ‘महाजन’ के पंथ पर अगर सब चलने लगें, तो दुनिया में उसके बाद कोई महाजन पैदा नहीं होगा। क्योंकि हर महाजन का रास्ता अलग होता है—एक ही रास्ते पर भेड़ों का झुंड चलता है, महाजन नहीं चलते।