रवींद्रनाथ टैगोर के उद्धरण
'महाभारत' का समस्त कर्म; जिस प्रकार महाप्रस्थान में समाप्त हुआ है, उसी प्रकार 'कुमारसंभव' के समस्त प्रेम का वेग मंगलमिलन में ही परिसमाप्त हुआ है।
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