महादेवी वर्मा के उद्धरण
किसी जाति की संस्कृति; उसके शरीर का वस्त्र न होकर उसकी आत्मा का रस है, इसी से न हम उसे बलात् छीन सकते हैं और न चीर-फाड़ कर फेंक सकते हैं।
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