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आचार्य रामचंद्र शुक्ल के उद्धरण

जीवन का नित्य स्वरूप दिखानेवाला दर्पण मनुष्य के पीछे रहता है, आगे तो बराबर खिसकता हुआ दुर्भेद्य पर्दा रहता है।