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श्यामसुंदर दास के उद्धरण

जातीय साहित्य केवल उन पुस्तकों का समूह नहीं कहलाता, जो किसी भाषा या किसी देश में विद्यमान हों। जातीय साहित्य; जाति-विशेष के मस्तिष्क की उपज और उसकी प्रकृति कि उन्नतिशील तथा क्रमगत अभिव्यंजन का फल है।